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उदारता की क़ीमत

14 मार्च
लोहे का तेजधार कुल्हाड़ा, वन वन भटक रहा था। सहमे से पेड़ डर से थर थर कांपने लगे। एक बूढ़े पेड़ ने सभी को धीरज बंधाई- “यह कितना भी तेज धार कुल्हाड़ा हो, हमारा तब तक कुछ नहीं बिगाड़ सकता जब तक हमारा ही कोई अंग इसका हत्था नहीं बनता। बिना हत्थे के इसमें वह सामर्थ्य नहीं कि हमें नष्ट कर सके।“ बूढ़े पेड़ की बात सुन शाखाएँ नरम और आश्वस्त होकर विश्राम करने लगी।

कुल्हाड़ा भटकता रहा, वांछित के लिए उसका श्रम जारी था, वह शाखाओं को अपनी अपेक्षा अनुसार सहलाता, किन्तु उलट शाखाओं की नम्रता, उसके उद्देश्य को विफल कर रही थी। सहसा एक सीधी सरल टहनी से कुल्हाड़े का तनाव देखा न गया। दया के वशीभूत उसने उदारता दर्शायी। कुल्हाड़े के दांत चमक उठे। धीमे से उसने अपना काम कर दिया। समय तो लगा पर आखिर कुल्हाड़ा, हत्था पाने में सफल हो गया। बूढ़ा पेड़ विवशता से देखता ही रह गया।

कुल्हाड़ा अट्टहास करने लगा। बूढ़े पेड़ ने कहा- “अगर हमारा ही कोई अपना, तेरा साथ न देता तो तूँ कभी अपने कुत्सित इरादों मे सफल न हो पाता।”  साथ ही उस सीधी सरल टहनी को उपालंभ देते हुए कहा, “तूँ अपने विवेकहीन सद्भाव पर मत इतरा, एक दिन यह तुझे भी उखाड़ फैकेगा, किंतु तेरी इस उदारता की कीमत हमारा समग्र वंश चुकाएगा।“ कुल्हाड़ा,  पेड़ दर पेड़ को धराशायी करने लगा।

कुल्हाड़ा, वन साफ होने से मिली भूमि पर भी कब्जा करने लगा। उसने वहाँ अपने लोह वंश विस्तार के उद्योग लगाए। लोहे की सन्तति हरे भरे वनो की जगह फैलती चली गई। अब अधिकाँश भूमि पर उसका साम्राज्य था।
उसने अपने आप को विकसित करना सीख लिया था। अब तो बस उसे लकड़ी पर अपनी निर्भरता को समाप्त करना था। कुल्हाडे ने लकड़ी के उस हत्थे को निकाल भट्ठी में झोंक दिया, और स्वयं इलैक्ट्रिक शॉ मशीन का रूप धर लिया, विनाश को और भी प्रबल और विराट करने के लिए।

अहिंसा के पालन के लिए उदारता बरती जा सकती है किन्तु वह कैसी उदारता जिसमें हिंसक मानसिकता का संरक्षण और हिंसा को समर्थन देने की बाध्यता हो।

 

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15 responses to “उदारता की क़ीमत

  1. प्रवीण पाण्डेय

    14/03/2013 at 9:35 अपराह्न

    अहिंसा स्वयं को नष्ट कर लेने के लिये न हो।

     
  2. शालिनी कौशिक

    14/03/2013 at 9:36 अपराह्न

    .एक एक बात सही कही है आपने . आभार ''शालिनी''करवाए रु-ब-रु नर को उसका अक्स दिखाकर . .महिलाओं के लिए एक नयी सौगात WOMAN ABOUT MAN

     
  3. भारतीय नागरिक - Indian Citizen

    14/03/2013 at 9:43 अपराह्न

    अब भी न चेते तो यही होगा..

     
  4. रविकर

    14/03/2013 at 9:44 अपराह्न

    सुन्दर सीख-आभार आदरणीय-

     
  5. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

    14/03/2013 at 10:02 अपराह्न

    सदा याद रखने योग्य गहरी बात। आभार!

     
  6. धीरेन्द्र सिंह भदौरिया

    14/03/2013 at 11:03 अपराह्न

    बहुत उम्दा सीख देती प्रस्तुति,,,बीबी बैठी मायके , होरी नही सुहायसाजन मोरे है नही,रंग न मोको भाय…उपरोक्त शीर्षक पर आप सभी लोगो की रचनाए आमंत्रित है,,,,,जानकारी हेतु ये लिंक देखे : होरी नही सुहाय,

     
  7. डॉ. मोनिका शर्मा

    14/03/2013 at 11:44 अपराह्न

    सही सन्देश …आजकल देश में ऐसे हालात देखे जा सकते हैं

     
  8. वाणी गीत

    15/03/2013 at 8:01 पूर्वाह्न

    मनन करने योग्य विचार !

     
  9. संजय अनेजा

    15/03/2013 at 8:43 पूर्वाह्न

    कुटिलता सरलता को मोहरा बना ही लेती है।

     
  10. vandana gupta

    15/03/2013 at 4:47 अपराह्न

    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार (16-3-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।सूचनार्थ!

     
  11. सुज्ञ

    15/03/2013 at 7:04 अपराह्न

    आभार, वंदना जी!!!

     
  12. सतीश सक्सेना

    15/03/2013 at 10:42 अपराह्न

    दया और करुणा न हो तो संसार का क्या हो …??

     
  13. Shanti Purohit

    16/03/2013 at 2:47 अपराह्न

    umda shik deti hui rachna

     
  14. Dr.NISHA MAHARANA

    16/03/2013 at 5:57 अपराह्न

    ati sundar sikh…

     
  15. Kailash Sharma

    16/03/2013 at 8:56 अपराह्न

    विचारणीय प्रस्तुति…

     

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं यह ब्लॉग लिखने के अलावा गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। रेलवे से ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर्ड अफसर।

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