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Monthly Archives: मार्च 2013

शिष्टाचार

पाश्चात्य देशों में जो ‘शिष्टाचार’ बहुप्रशंसित है। वह ‘शिष्टाचा’र वस्तुतः भारतीय अहिंसक जीवन मूल्यों की खुरचन मात्र है। भारतीय अहिंसक मूल्यों में नैतिकता पर जोरदार भार दिया गया है। पाश्चात्य शिष्टाचार उन्ही नैतिक आचारों के केवल अंश है। पश्चिम ने सभ्यता और विकास के अपने सफर में यह शिष्टाचार, भारतीय अहिंसा के सिद्धांत से ही तो ग्रहण किए है। उनके लिये जितना भी अहिंसा का पालन  “सुविधाजनक” था, इतना अपना लिया। जो दूभर था छोड दिया। परिणाम स्वरूप, उनका वह सहज अहिंसक आचरण,  शिष्टाचार के स्वरूप में स्थापित हो गया।

जबकि भारत में यह अहिंसा पालन और नैतिक आचरण किताबों में कैद और उपदेशों तक सीमित हो गया। क्योंकि पालन बड़ा कठीन था और मानवीय स्वभाव सदैव से सरलतागामी और सुविधाभोगी रहा है। हमें अहिंसा कठिन तप लगने लगी और नैतिकता दुष्कर और दूरह। नैतिक निष्ठा से दूर होकर हम, उस पतन की ओर ढ़लने लगे जो हमें बिना किसी विशेष परिश्रम के, सुखदायक स्थिति में रखता था। इस प्रकार सुविधाभोगी मानस से नैतिक आचरण तो गया ही गया, उसके अंश स्वरूप का शिष्टाचार भी हमारे जीवन से तिरोहित हो गया।

वस्तुतः सदाचरण हमारे जीवन को मंगलमय रखता है। शान्ति फैलाता है और जीवन संघर्ष के कितने ही तनावों से मुक्त रखता है, इसलिए कल्याणकारी है। इसका पालन कठिन है, लेकिन इस गुण के लाभ देखकर इसके प्रति आकर्षण हमेशा ही बना रहता है। इसी कारण पाश्चात्य शिष्टाचार के प्रति हमें अहोभाव होता है। किन्तु सदाचार का मूल ‘अहिंसा’ जो हमारी भारतीय संस्कृति का सुदृढ़ आधार था, हम विस्मृत कर बैठे। हम इतने सुविधाभोगी हो गए कि अहिंसा का विचार भी हमें अव्यवहारिक और अति समान प्रतीत होता है, जबकि शिष्टाचार के प्रति चाहने मात्र को आकर्षण बना रहता है। इसलिए हमें लगता है कि अगर पश्चिम से शिष्टाचार के गुर सीख लिए तो भयो भयो।

अहिंसा गंगोत्री है, सदाचरण और नैतिक आचरण की। उसके प्रबल प्रवाह से घबराकर हमने उसे मुख पर ही बांध दिया है, फिर भी उससे निकलती सदाचार की स्वच्छ धाराएँ है किन्तु उसे भी हमने गंदला कर दिया है। उन्ही धाराओं से अंश रूप भरा शिष्टाचार रूपी छोटी बोतल का पानी हमें सुहाने लगा है।

श्रेष्ठ संस्कृति पर मात्र गर्व लेने से कुछ नहीं होगा। जो गर्विला खजाना था वह तो कबका गर्त में गढ़ चुका है। पुनः श्रम कर खोद निकालना होगा, व्यर्थ धूल कचरा झाड़ना होगा। और दृढ मनोबल से उसे चलन में लाना होगा। कठिनाईयां तो असंख्य आएगी, पहले पहल तो शायद कीमत भी पूरी न मिले। लेकिन अन्ततः सतत उपयोग से आचार-स्मृद्धि आएगी ही। तब उस श्रेष्ठ आचार समृद्धि पर अवश्य गर्व लिया जा सकता है।

हम, पोलिश कर चमकाए गए एक दो ओंस के हीरे पर मोहित हो रहे है जबकि हमारे पास हीरे की पूरी खदान मौजूद है, बस हम उसके अस्तित्व और उपादेयता से अनभिज्ञ है। हमें परख ही नहीं है।

अब अहिंसा और नैतिकता से मुंह बिचकाना छोडिये, वह निधि है, वह हमारी जड़ें है। यह कभी भी गुजरे जमाने की बात नहीं हो सकती। उलट अहिंसा तो सभ्यता, विकास, शान्ति और चिरस्थायी सुख का मेरूदंड़ है।

 

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अहिंसा के मायने

कई बार लोग अहिंसा की व्याख्या अपने-अपने मतलब के अनुसार करते हैं। पर अहिंसा का अर्थ कायर की तरह चुप बैठना नहीं है।

एक राज्य पर किसी दूर देश के विधर्मी शासक ने एक बार आक्रमण कर दिया। राजा ने अपने सेनापति को आदेश दिया कि सेना लेकर सीमा पर जाये और आक्रमणकारी का मुँहतोड़ उत्तर दे। सेनापति अहिंसावादी था। वह लड़ना नहीं चाहता था। पर राजा का आदेश लड़ने का था। अत: वह अपनी समस्या लेकर परामर्श करने के लिए भगवान बुध्द के पास गया। सेनापति ने कहा, ”युध्द हो पर शत्रु सेना के सैकड़ों सैनिक मारे जायेंगे, क्या यह हिंसा नहीं है ?” ”हाँ, हिंसा तो है।” भगवान बोले। ”पर यह बताओ, यदि हमारी सेना ने उनका मुकाबला न किया, तो क्या वे वापस अपने देश चले जायेंगे ?”

”नहीं, वापस तो नहीं जायेंगे।” सेनापति ने कहा। ”अर्थात वे हमारे देश में निरपराध नागरिकों की हत्या करेंगे। फसल और सम्पत्ति को नष्ट करेंगे ?” ”हाँ, यह तो होगा ही।” सेनानायक बोला। ”तो क्या यह हिंसा नहीं होगी ? यदि तुम हिंसा के भय से चुप बैठे रहे, तब हमारे देश के नागरिक मारे जायेंगे। और इस हिंसा का पाप तुम्हारे सिर आयेगा।” सेनापति ने सिर झुका लिया। ”क्या हमारी सेना आक्रमणकारियों को रोकने में सक्षम है ?” भगवान ने आगे पूछा। ”जी हाँ। यदि उसे आदेश दिया जाये, तो वह हमलावरों को बुरी तरह मार भगायेगी।” सेनापति का उत्तर था। ”ऐसी दशा में देश व प्रजा की रक्षा करना ही तुम्हारा परम कर्तव्य है,यही तुम्हारा प्रतिरक्षा धर्म है।” स्पष्ट है कि अंहिसा का अर्थ कायरता नहीं है। अहिंसा का अर्थ है किसी दूसरे पर अत्याचार न करना। लेकिन यदि कोई हम पर आक्रमण और अत्याचार करे, तो वीरतापूर्वक उसके द्वारा की जाने वाली हिंसा का प्रतिरोध करना।

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चरित्र : सर्व गुण आधार

किसी भी व्यक्ति में शरीर का बल तो आवश्यक है; पर उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण उसमें चरित्रबल अर्थात शील है। यदि यह न हो, तो अन्य सभी शक्तियाँ भी बेकार हो जाती हैं। प्राचीन भारतीय साहित्य में प्रह्लाद की कथा आती है, जो शील के महत्त्व बखुबी स्थापित करती है। 

राक्षसराज प्रह्लाद ने अपनी तपस्या एवं अच्छे कार्यों के बल पर देवताओं के राजा इन्द्र को गद्दी से हटा दिया और स्वयं राजा बन बैठा। इन्द्र परेशान होकर देवताओं के गुरु आचार्य वृहस्पति के पास गये और उन्हें अपनी समस्या बतायी। वृहस्पति ने कहा कि प्रह्लाद को ताकत के बल पर तो हराया नहीं जा सकता। इसके लिए कोई और उपाय करना पड़ेगा। वह यह है कि प्रह्लाद प्रतिदिन प्रात:काल दान देते हैं। उस समय वह किसी याचक को खाली हाथ नहीं लौटाते। उनके इस गुण का उपयोग कर ही उन्हें पराजित किया जा सकता है। इन्द्र द्वारा जिज्ञासा करने पर आचार्य वृहस्पति ने आगे बताया कि प्रात:काल दान-पुण्य के  समय में तुम एक भिक्षुक का रूप लेकर जाओ। जब तुम्हारा माँगने का क्रम आये, तो तुम उनसे उनका चरित्र माँग लेना। बस तुम्हारा काम हो जाएगा।

इन्द्र ने ऐसा ही किया। जब उन्होंने प्रह्लाद से उनका शील माँगा, तो प्रह्लाद चौंक गये। उन्होंने पूछा – क्या मेरे शील से तुम्हारा काम बन जाएगा ? इन्द्र ने हाँ में सिर हिला दिया। प्रह्लाद ने अपने शील अर्थात् चरित्र को अपने शरीर से जाने को कह दिया। ऐसा कहते ही एक तेजस्वी आकृति प्रह्लाद के शरीर से निकली और भिक्षुक के शरीर में समा गयी। पूछने पर उसने कहा – मैं आपका चरित्र हूँ। आपके कहने पर ही आपको छोड़कर जा रहा हूँ। कुछ समय बाद प्रह्लाद के शरीर से पहले से भी अधिक तेजस्वी एक आकृति और निकली। प्रह्लाद के पूछने पर उसने बताया कि मैं आपका शौर्य हूँ। मैं सदा से शील वाले व्यक्ति के साथ ही रहता हूँ, चूँकि आपने शील को छोड़ दिया है, इसलिए अब मेरा भी यहाँ रहना संभव नहीं है। प्रह्लाद कुछ सोच ही रहे थे कि इतने में एक आकृति और उनके शरीर को छोड़कर जाने लगी। पूछने पर उसने स्वयं को वैभव बताया और कहा कि शील के बिना मेरा रहना संभव नहीं है। इसलिए मैं भी जा रहा हूँ। इसी प्रकार एक-एक कर प्रह्लाद के शरीर से अनेक ज्योतिपुंज निकलकर भिक्षुक के शरीर में समा गये।

प्रह्लाद निढाल होकर धरती पर गिर गये। सबसे अंत में एक बहुत ही प्रकाशमान पुंज निकला। प्रह्लाद ने चौंककर उसकी ओर देखा, तो वह बोला – मैं आपकी राज्यश्री हूँ। चँकि अब आपके पास न शील है न शौर्य; न वैभव है न तप; न प्रतिष्ठा है न सम्पदा। इसलिए अब मेरे यहां रहने का भी कोई लाभ नहीं है। अत: मैं भी आपको छोड़ रही हूँ। इस प्रकार इन्द्र ने केवल शील लेकर ही प्रह्लाद का सब कुछ ले लिया।

नि:संदेह चरित्रबल मनुष्य की सबसे बड़ी पूँजी है। चरित्र हो तो हम सब प्राप्त कर सकते हैं, जबकि चरित्र न होने पर हम प्राप्त वस्तुओं से भी हाथ धो बैठते हैं।

विदेशेसु धनम् विद्या… व्यसानेसु धनम् मतिः ।
परलोके धन: धर्मम् … “”शीलम”” सर्वत्रवे धनम्

 

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तनाव मुक्ति के उपाय

    • एक बार की गई गलती दुबारा न हो।

    • अपनी तुलना दूसरों के साथ न करें।

    • वर्तमान को श्रेष्ठ बनाने का पुरूषार्थ करें।

    • ‘सबक’ सिखाने की मानसिकता का त्याग करें।

    • ‘जैसे को तैसा’ जवाब, अन्तिम समाधान नहीं है।

    • बदला न लो स्वयं को बदलो।

    • जहाँ तक सम्भव हो सभी के सहयोगी बने रहें।

    • निंदा करने वाले को अपना मित्र मानें।

    • ईर्ष्या न करें, समता धारण करें।

    • अहंकार को त्यागो, विनम्रता धारण करो।

    • जिस परिस्थिति में आप परिवर्तन नहीं ला सकते, संयोग पर छोड़ दो।

    • चिंताएँ छोड़ो, मात्र चिंता से कोई समाधान नहीं होना है। संतोष धारण कर लो।

    • यदि मन स्वस्थ रहे तो सभी समस्याओं का समाधान अंतरस्फुरणा से हो जाता है।

       

      “कहने की आवश्यकता नहीं कि मूढ़ता, अबूझ प्रतिस्पर्धा, प्रमाद,  प्रतिशोध, द्वेष, निंदा, ईर्ष्या, अहंकार, अविवेक, और तृष्णा मन के रोग है। इन्हें दूर रखने से ही मन स्वस्थ रह सकता है और एक स्वस्थ मन ही तनावों से मुक्त होने में समर्थ हो सकता है।”

     

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    उदारता की क़ीमत

    लोहे का तेजधार कुल्हाड़ा, वन वन भटक रहा था। सहमे से पेड़ डर से थर थर कांपने लगे। एक बूढ़े पेड़ ने सभी को धीरज बंधाई- “यह कितना भी तेज धार कुल्हाड़ा हो, हमारा तब तक कुछ नहीं बिगाड़ सकता जब तक हमारा ही कोई अंग इसका हत्था नहीं बनता। बिना हत्थे के इसमें वह सामर्थ्य नहीं कि हमें नष्ट कर सके।“ बूढ़े पेड़ की बात सुन शाखाएँ नरम और आश्वस्त होकर विश्राम करने लगी।

    कुल्हाड़ा भटकता रहा, वांछित के लिए उसका श्रम जारी था, वह शाखाओं को अपनी अपेक्षा अनुसार सहलाता, किन्तु उलट शाखाओं की नम्रता, उसके उद्देश्य को विफल कर रही थी। सहसा एक सीधी सरल टहनी से कुल्हाड़े का तनाव देखा न गया। दया के वशीभूत उसने उदारता दर्शायी। कुल्हाड़े के दांत चमक उठे। धीमे से उसने अपना काम कर दिया। समय तो लगा पर आखिर कुल्हाड़ा, हत्था पाने में सफल हो गया। बूढ़ा पेड़ विवशता से देखता ही रह गया।

    कुल्हाड़ा अट्टहास करने लगा। बूढ़े पेड़ ने कहा- “अगर हमारा ही कोई अपना, तेरा साथ न देता तो तूँ कभी अपने कुत्सित इरादों मे सफल न हो पाता।”  साथ ही उस सीधी सरल टहनी को उपालंभ देते हुए कहा, “तूँ अपने विवेकहीन सद्भाव पर मत इतरा, एक दिन यह तुझे भी उखाड़ फैकेगा, किंतु तेरी इस उदारता की कीमत हमारा समग्र वंश चुकाएगा।“ कुल्हाड़ा,  पेड़ दर पेड़ को धराशायी करने लगा।

    कुल्हाड़ा, वन साफ होने से मिली भूमि पर भी कब्जा करने लगा। उसने वहाँ अपने लोह वंश विस्तार के उद्योग लगाए। लोहे की सन्तति हरे भरे वनो की जगह फैलती चली गई। अब अधिकाँश भूमि पर उसका साम्राज्य था।
    उसने अपने आप को विकसित करना सीख लिया था। अब तो बस उसे लकड़ी पर अपनी निर्भरता को समाप्त करना था। कुल्हाडे ने लकड़ी के उस हत्थे को निकाल भट्ठी में झोंक दिया, और स्वयं इलैक्ट्रिक शॉ मशीन का रूप धर लिया, विनाश को और भी प्रबल और विराट करने के लिए।

    अहिंसा के पालन के लिए उदारता बरती जा सकती है किन्तु वह कैसी उदारता जिसमें हिंसक मानसिकता का संरक्षण और हिंसा को समर्थन देने की बाध्यता हो।

     

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    अपने की चोट

    एक सुनार था। उसकी दुकान से लगी हुई एक लुहार की भी दुकान थी। सुनार जब काम करता, उसकी दुकान से बहुत ही धीमी आवाज होती, पर जब लुहार काम करता तो उसकी दुकान से कानो के पर्दे फाड़ देने वाली आवाज सुनाई पड़ती।

    एक दिन सोने का एक कण छिटककर लुहार की दुकान में आ गिरा। वहां उसकी भेंट लोहे के एक कण के साथ हुई। सोने के कण ने लोहे के कण से कहा, “भाई, हम दोनों का दु:ख समान है। हम दोनों को एक ही तरह आग में तपाया जाता है और समान रुप से हथौड़े की चोटें सहनी पड़ती हैं। मैं यह सब यातना चुपचाप सहन करता हूं, पर तुम इतना आक्रंद क्यों करते हो?”

    “तुम्हारा कहना सही है, लेकिन तुम पर चोट करने वाला लोहे का हथौड़ा तुम्हारा सगा भाई नहीं है, पर वह मेरा सगा भाई है।” लोहे के कण ने दु:ख भरे कातर स्वर में उत्तर दिया। फिर कुछ रुककर बोला, “पराये की अपेक्षा अपनों के द्वारा की गई चोट की पीड़ा अधिक असह्य होती है।”

    “नास्ति राग समं दुःखम्” अपनो के प्रति अतिशय आसक्ति,  हमारे परितापों में वृद्धि का प्रमुख कारण है।

     

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    शुद्ध श्रद्धा : आत्मविश्वास

    पुराने जमाने की बात है। एक शिष्य अपने गुरु के आश्रम में कई वर्षों तक रहा। उसने उनसे शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया। एक दिन उसने देखा कि उसके गुरु पानी पर चले आ रहे हैं। यह देखकर उसे बहुत हैरानी हुई। जब गुरु पास में आए तो वह उनके पैरों पर गिरकर बोला, ‘आप तो बड़े चमत्कारी हैं। यह रहस्य आपने अब तक क्यों छिपाए रखा? कृपया मुझे भी यह सूत्र बताइए कि पानी पर किस प्रकार चला जाता है, अन्यथा मैं आप के पैर नहीं छोडूंगा?’ गुरु ने कहा, ‘उसमें कोई रहस्य नहीं है। बस भरोसा करने की बात है। श्रद्धा चाहिए। श्रद्धा हो तो सब कुछ संभव है। इसके लिए उसका नाम स्मरण ही पर्याप्त है जिसके प्रति तुम भक्ति रखते हो।

    ‘वह शिष्य अपने गुरु का नाम रटने लगा। अनेक बार नाम जपने के बाद उसने पानी पर चलने की बात सोची पर जैसे ही पानी में उतरा डुबकी खा गया। मुंह में पानी भर गया। बड़ी मुश्किल से बाहर आया। बाहर आकर वह बड़ा क्रोधित हुआ। गुरु के पास जाकर बोला, ‘आपने तो मुझे धोखा दिया। मैंने कितनी ही बार आप का नाम जपा, फिर भी डुबकी खा गया। यों मैं तैरना भी जानता हूं। मगर मैंने सोचा कि बहुत जप लिया नाम। अब तो पूरी हो गई होगी श्रद्धा वाली शर्त और जैसे ही पानी पर उतरा डूबने लगा। सारे कपड़े खराब हो गए। कुछ बात जंची नहीं। ‘ गुरु ने कहा, ‘कितनी बार नाम का जाप किया?’ शिष्य ने कहा, ‘ हजार से भी ऊपर। किनारे पर खड़े- खड़े भी किया। पानी पर उतरते समय भी और डूबते-डूबते भी करता रहा।

    ‘ गुरु ने कहा, ‘बस तुम्हारे डूबने का यही कारण है। मन में सच्ची श्रद्धा होती तो बस एक बार का जाप ही पर्याप्त था। मात्र एक बार नाम ले लेते तो बात बन जाती। सच्ची श्रद्धा गिनती नहीं अपने ईष्ट के प्रति समर्पण मांगती है।

     

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    सनातन भवन

    “सनातन धर्म को लेकर अक्सर संशय पैदा किए जाते है कि इसमें न जाने कितने पंथ सम्प्रदाय है, सभी के दर्शन विचार भिन्न भिन्न है जो परस्पर विरोधाभास का सर्जन करते है्। तो दूसरी ओर इसे उदारता या खुलेपन के नाम प्रसंशित कर प्रत्येक विचारधारा को समाहित करने के विशेषण की तरह निरूपित करते है। यह दोनो ही परस्पर विरोधाभासी बयान सनतन धर्म के यथार्थ चरित्र से कोशों दूर है। सनातन धर्म में कितने भी भिन्न भिन्न दर्शन पंथ सम्प्रदाय हो, सनातन धर्म और उसकी सभी शाखाएँ , सनातन के ‘मूल तत्वो और सिद्धांतो ‘ पर प्रतिबद्ध है। विचार और विवेचन पर उदार होने के उपरांत भी अपने आराध्यों  की पूजनीयता पर संदेह स्वीकार नहीं करते। इसी निष्ठा  के बल पर सनातन धर्म  आज भी अपना अस्तित्व बनाए हुए है।”

    सनातन एक प्राचीन विशाल और विख्यात भवन है। एक पुरातत्व धरोहर है। इस में अभी तक समग्र भवन का आमूल चूल परिवर्तन नहीं हुआ है बल्कि अपने अपने कमरे को सजाने का कार्य हुआ है, सजाने में भी प्रतिस्पर्धात्मक सज्जा। इस तरह की सज्जा ने मूल तत्वो और सिद्धांतो की नींव को जस का तस रखा, उसमें कोई समझोता नहीं किया। किसी कक्ष ने पुरातत्व को समझा तो उसने जीर्णोद्धार करते हुए पुनः पुरातन साज सज्जा में बनाया। तो किसी कक्ष ने सुविधा और सरलता को ध्यान में रखते हुए उपयोगी सज्जा प्रदान की। किसी ने अपनी सुविधा तो किसी ने दूसरो की सुविधा को महत्व देते हुए सज्जा को स्वरूप दिया। तो किसी ने सुरक्षा के मद्देनजर भवन को सुरक्षा उपकरणो से सज्जित किया। लेकिन किसी ने भी नींव को कमजोर करने का दुस्साहस नहीं किया। कुछ भौतिकवादीयों नें इसी भवन में तलघर बानाने के लिए तल खोद दिया, इस खुदाई में नींव पर भी आघात हुए पर नींव मजबूत थी, कुछ गम्भीर बिगाड नहीं हुआ। अल्प काल तक भौतिकवादी इसमें रहे किन्तु शीघ्र ही यह तहखाना, वीरान अन्धेरी कोठरी में परिवर्तित हो गया। आज-कल इस तलघर में  कुछ मजदूर, मोहल्ले के सताए लोग और इन दोनो के रहनुमा, रात अंधेरे ताश खेलकर टाईम-पास करते है। बहुत पहले कुछ लोगों ने इसके मझले बढा दिए थे, टॉप पर उन्होने हवादार खिडकियां, प्रकाश के लिए खूबसूरत बाल्कनी से कक्ष सजा दिए थे, इनके द्वारा किए गए अतिरिक्त निर्माण से भी सनातन भवन की नींव को कोई खतरा नहीं था। समय समय कभी इसकी या कभी उसकी सजावटें बढती घट्ती रहती, नए युग में नया दौर आया, भवन के बाहरी रंग-रोगन का प्रस्ताव आता और पास भी होता, कुछ पुरातन धरोहरवादीयों ने दबी जुबां से विरोध भी किया कि इससे भवन की पुरातत्व पहचान विकृत हो जाएगी किन्तु नींव को कोई खतरा न देख, चुप लगा गए। इस तरह आन्तरिक और बाहरी सजावटें निरन्तर बदलती रही पर भवन की नींव मजबूत थी हर नवनिर्माण सह गई। किन्तु अब इस आधुनिक काल में प्रगतिशील निवासी अजीब प्रस्ताव लाने लगे है। आजकल सुन्दर कंगूरों का फैशन चल पड़ा है, और वे नींव में लगे बेशकीमती पत्थरो को निकाल कर उससे भवन के कंगूरे अलंकृत करना चाहते है। किन्तु नई फैशन का मोह ऐसा है कि दूरदृष्टि कुंठित हो चली है। नींव जिस पर भवन टिका हुआ है, और भवन जिस पर इनका ही अस्तित्व आश्रय लिए हुए है।

    पास में ही कोई ऐसा ही वैभवशाली भवन बनाने की महत्वाकांक्षा लिए हुए है। वह ऐसा ही सुदृढ भवन बनाना चाहता है। वह स्ट्रक्चर तो अपनी पसंद का रखना चाहता है किन्तु नींव सनातन भवन जैसी बनाना चाह्ता है। वह अपनी भूमि से सूरंग खोद कर बार बार इसकी नींव देखता है इसी सुंरग खुदाई से सनातन भवन में हल्का सा कम्पन महसुस होता है लेकिन यह पडौसी आज तक नहीं जान पाया कि इसकी नींव किन कारणो से मजबूत है। उसकी समस्या यह है कि इस नीव और अपने स्ट्रक्चर के वास्तु की इन्जिनियरिंग का मेल नहीं बैठ रहा। निर्माण काल में बिगडे सम्बंधो से आज भी सनातन भवन और इनके बीच झगडे आम है।

    दूसरी तरफ के पडौसी के पास सनातन भवन का पूरा नक्शा, निर्माण कला का इतिहास और रिपोर्ट्स उपलब्ध है जो कभी वह इस भवन से चुरा ले गया था। यह ज्यादा समझदार है, अपनी इस जानकारी का ढिंढोरा नहीं पीटता, उसने सनातन भवन की नींव के लिए बने विराट प्लेटफार्म का उपयोग, अपनी नींवें ठहराने के लिए किया। परिणामस्वरूप सनातन भवन का एक अंश झुकाव इस भवन की ओर हो गया, जो देखने पर नज़र नहीं आता। अपने स्ट्रक्चर में जरा सा अनुकूल परिवर्तन कर भवन खडा कर ही लिया है। शान्त रहता है और दबे पांव लक्ष्य की ओर बढ़ता है, इस तरह स्वयं के भवन को सुदृढ करता रहता है।

    इन दोनो पडौसियों ने अपनी इमारत पर लिख रखा है ‘अपने पडौसी से प्रेम करो’ जिसकी पूरा शहर सराहना करता है। किन्तु सनातन भवन ने लिख रखा है ‘पूरे शहर को अपना परिवार समझो’ पर पता नहीं शहर इस तख्ती की तरफ आंख उठा कर नहीं देखता, शायद ईर्ष्या वश श्रेय देना नहीं चाहता।

     
    55 टिप्पणियां

    Posted by on 06/03/2013 में बिना श्रेणी

     

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    मैं, ज्ञानदत्त पाण्डेय गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश (भारत) में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर रेलवे अफसर।

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