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Monthly Archives: जून 2010

धार्मिक कट्टरता व पाखण्ड पर शक किसे रास नहीं आता?

  • मैने एक ब्लॉग पर कुछ यह टिप्पनी कर दी……
“तजुर्बा हमारा यह है कि लोग पहले, अमन व शान्ति के सन्देश को सौम्य भाषा में ले आते है और आखिर में कट्टरवादी रूख अपना लेते है। एक पूरा मुस्लिम ब्लॉगर गुट कुतर्कों के द्वारा  इस्लाम के प्रचार में सलग्न है। यह पहले से ही आपकी नियत पर शक नहीं हैं, पर यदि आप इस्लाम के प्रति फ़ैली भ्रान्तियों को तार्किक व सोम्य ढंग से दूर करने का प्रयास करेंगे तो निश्चित ही पठनीय रहेगा।“
सलाह देने का दुष्परिणाम यह हुआ कि शक करने पर उन्होने एक पोस्ट ही लगा दी…

    • शक और  कट्टरता पर उनका मन्तव्य………
    “कुछ लोगों को यह अमन का पैग़ाम शायद समझ मैं नहीं आया, उनको शक है कहीं यह आगे जाके कट्टरवाद मैं ना बदल जाए. शक अपने आप मैं खुद एक बीमारी है, जिसका इलाज सभी धर्म मैं करने की हिदायत दी गयी है. यह कट्टरवाद है क्या, इसकी परिभाषा मुझे आज तक समझ मैं नहीं आयी? अपने धर्म को मान ना , उसकी नसीहतों पे चलना, अगर कट्टरवाद है, तो सबको कट्टर होना चहिये. हाँ अगर अपने धर्म को अच्छा बताने के लिए , दूसरों के धर्म मैं, बुराई, निकालना, बदनाम करना, धर्म के नाम पे नफरत फैलाना कट्टरवाद कहा जाता है, तो यह महापाप है,”
      “शक अपने आप मैं खुद एक बीमारी है” ?

    नहीं!!, शक कभी बीमारी नहीं होता, शक वो हथियार है, जिसके रहते कोई धूर्त, पाखण्डी अथवा ठग अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाता। किसी भी शुद्ध व सच्चे ज्ञान तक पहुंचने में संशय सीढ़ी का काम करता है। इन्सान अगर शक संशय पर आधारित जिज्ञासा न करे तो सत्य ज्ञान तक नहीं पहुँच सकता। विभिन्न आविष्कार और विकास संशययुक्त जिज्ञासा से ही अस्तित्व में आते है। दिमागों के दरवाजे अंध भक्ति पर बंद होते है और शक के कारण खुलते है। संशय से ही समाधान का महत्व है। शक को मनोरोग मानने वाले  अन्ततः  अंधश्रद्धा के रोग से ग्रसित  होकर मनोरोगी बन जाने की सम्भावनाएं प्रबल है ।

    धूर्त अक्सर अपने पाखण्ड़ को छुपाने के लिए सावधान को शक्की होने का उल्हाना देकर, शक को दबाने का प्रयास करते है इसी मंशा से शक व संशय को बिमारी कहते है।

    • कट्टरता की परिभाषा………॥

    अपने परम सिद्दांतो पर सिद्दत से आस्थावान रहना कट्टरता नहीं है, वह तो श्रद्धा हैं। सत्य तथ्य पर प्रत्येक मानव को अटल ही रहना चाहिये।
    दूसरों के धर्म की हीलना कर, बुराईयां (कुप्रथाएं) निकाल, अपने धर्म की कुप्रथाओं को उंचा सिद्ध करना भी कट्टरता नहीं, कलह है। वितण्डा  है।

    कट्टरता यह है……
    एक व्यक्ति शान्ति का सन्देश देता है, जोर शोर से ‘शन्ति’  ‘शन्ति’ शब्दों का उच्चारण करता है,
    दूसरा व्यक्ति मात्र मन में शान्ति धारण करता है। अब पहला व्यक्ति जब दुसरे को शान्ति- शान्ति आलाप करने को मज़बूर करता है, और कहता है कि जोर शोर से बोल के दिखाओ,  तो ही तुम शान्तिवान!  इस तरह दिखावे की शान्ति लादना ही कट्टरता हैं। विवेकशील व चरित्रवान रहना  व्यक्तिगत विषय है। गु्णों का भी जबरदस्ती किसी पर आरोहण नहीं होता।

    अर्थात्, किसी भी तरह के सिद्धान्त, परम्पराएं, रिति-रिवाज दिखावे के लिये, बलात दूसरे पर लादना कट्टरता हैं।

    केवल कथनी से नहिं, बनता कोई काम।
    कथनी करनी एक हो, होगा पूर्ण विराम ॥
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    3 टिप्पणियाँ

    Posted by on 30/06/2010 in बिना श्रेणी

     

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    शोषण

    आज के युग में उंच नीच समाप्त प्राय: है, ब्राह्मणवाद यह स्वीकार कर चुका है कि चारों ही वर्णों में भेद भाव एक त्रृटि थी। आज लगभग जातिआधारित भेदभाव गौण चुके है, डा. भीमराव अम्बेडकर का स्वप्न अब साकार हो चुका है, हिंदु ग्रन्थों के ये सब सन्दर्भ इतिहास बन चुके है, अब उन्हे बार बार उल्लेखित करना बुद्धिमानी नहिं है।
    आज वही शोषित वर्ग, सत्ता में भागिदारी कर रहा है, प्रशासन में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन है, उद्ध्योग-व्यापार में सलग्न है।दलित,अपने सारे नागरिक अधिकारों सहित, विशेष अधिकारो का उपयोग करने में समर्थ है। अब नई पीढी से हजारों साल का हिसाब मांगना उचित नहिं है।
    आज तो हर जाति में दो वर्ग बन गये हैं, एक जिनके पास सत्ता और समृद्धि हैं। तो दूसरा वर्ग सत्ता और समृद्धि से वंचित। दलितो में भी सत्ता और समृद्धि वाला वर्ग गरीब दलितों के शोषण पर ही अपनी सत्ता व समृद्धि कायम रखे हुए है।
    गरीब दलित बिचारा विशेषाधिकारों के लिये आन्दोलन करता है,और उनके नेता उसी के परिणाम स्वरूप सत्ता भोगते है। ठीक उसी तरह जिस तरह सर्वहारा मजदूर वर्ग तो आन्दोलनों में ही व्यस्त रह्ता है और कम्युनिष्ट नेता वर्ग सत्ता सुख भोगते है।
    नेता बनना किसी भी युग में फ़ायदे का सौदा रहा है।
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    1 टिप्पणी

    Posted by on 26/06/2010 in बिना श्रेणी

     

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    चींटी चुने कण कण, हाथी खाये मण मण

    आज के युग में उंच नीच समाप्त प्राय: है, ब्राह्मणवाद यह स्वीकार कर चुका है कि चारों ही वर्णों में भेद भाव एक त्रृटि थी। आज लगभग जातिआधारित भेदभाव गौण चुके है, डा. भीमराव अम्बेडकर का स्वप्न अब साकार हो चुका है, हिंदु ग्रन्थों के ये सब सन्दर्भ इतिहास बन चुके है, अब उन्हे बार बार उल्लेखित करना बुद्धिमानी नहिं है।
    आज वही शोषित वर्ग, सत्ता में भागिदारी कर रहा है, प्रशासन में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन है, उद्ध्योग-व्यापार में सलग्न है।दलित,अपने सारे नागरिक अधिकारों सहित, विशेष अधिकारो का उपयोग करने में समर्थ है। अब नई पीढी से हजारों साल का हिसाब मांगना उचित नहिं है।
    आज तो हर जाति में दो वर्ग बन गये हैं, एक जिनके पास सत्ता और समृद्धि हैं। तो दूसरा वर्ग सत्ता और समृद्धि से वंचित। दलितो में भी सत्ता और समृद्धि वाला वर्ग गरीब दलितों के शोषण पर ही अपनी सत्ता व समृद्धि कायम रखे हुए है।
    गरीब दलित बिचारा विशेषाधिकारों के लिये आन्दोलन करता है,और उनके नेता उसी के परिणाम स्वरूप सत्ता भोगते है। ठीक उसी तरह जिस तरह सर्वहारा मजदूर वर्ग तो आन्दोलनों में ही व्यस्त रह्ता है और कम्युनिष्ट नेता वर्ग सत्ता सुख भोगते है।
    नेता बनना किसी भी युग में फ़ायदे का सौदा रहा है।

     
    2 टिप्पणियाँ

    Posted by on 25/06/2010 in बिना श्रेणी

     

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    सर्वधर्म समान?

    अक्सर मैने देखा कि बुद्धिजीवी लोग धर्म पर चर्चा मात्र से कतराते हैं। कोइ सज्जन तो सोचते है, क्यों पंगा लें, तो कोई इसलिये कि यह सम्वेदनशील मामला है। कुछ लोगों का मत है,क्यों फ़ाल्तू की बहस करना या फ़साद खडा करना। कुछ बन्धु धर्म-चर्चा के नाम पर धर्म-प्रचार में लीन हैं,तो अन्य सज्जन उनके कुप्रचार के खन्डन से ही नहिं उभर पाते। एक मत अधर्मिओं का हैं कि वे धर्म को अफिम मान, स्वयंभू नास्तिकता की ओट लेकर, धर्म की पीठ पर वार करने से नहिं चुकते। तो कुछ छोटी- छोटी टिप्पणियों से ही भडास निकाल लेते है।
    धर्म ने आदि काल से हमारे जीवन को प्रभवित किया है,हमारी समाज व्यवस्था को नियन्त्रित किया है,फ़िर क्यों न हम इस पर खुलकर चर्चा करें।
    धर्म का शाब्दिक अर्थ है स्वभाव, स्व+भाव,स्वयं का आत्म-स्वभाव, अपनी आत्मा के स्वभाव में स्थिर होना, आत्मा का मूल स्वभाव अच्छा है,अतः अच्छे गुणों में रहना। धर्मों को वस्तुतः मार्ग या दर्शन कहना उचित है। दर्शनों ने मानव के व्यवहार को सुनिश्चित करने एवं समाज व्यवस्था को नियंन्त्रित करने के लिये कुछ नियम बनाए, उसे ही हम धर्म कहते है। यह स्वानुशासन हैं जिसमें स्वयं को संयमित रखकर नियन्त्रित करना होता है।
    याद रहे अच्छाई बुराई का फ़र्क और सभ्यता इन्ही दर्शनों (धर्मों) की देन है अन्यथा हम किसी का अहित करके भी न समज़ पाते कि हमने बुरा किया। हमारी शब्दावली में व्याभिचार, बलात्कार, जुठ, चोरी, हिंसा आदि शब्दों के मायने ही न होते।
    मानव मात्र को किसी भी अनुशासन में रहना अच्छा नहिं लगता, इसिलिये धर्म की बातों(नियमों) को हम अपने जिवन में अनावश्यक हस्तक्षेप मानते है। और हमारी इस मान्यता को दृढ करते है,वे अधकचरे ज्ञान के पोन्गापन्डित,जो ग्रन्थों से चार बातें पढकर उसका (पूर्वाग्रहयुक्त)मनमाना अर्थ कर भोले श्रद्धालुओं के लिये नियमावली गढते हैं। इन ज्ञानपंगुओं ने सुखकर धर्म को दुष्कर बना दिया हैं। हमारे पास बुद्धि होते हुए भी हमे जडवत रहने को अभिशप्त कर दिया हैं।
    सर्वधर्म समान?
    क्या कुदरत ने हमें सोचने समजने की शक्ति नहिं दी है? क्यों मानें हम सभी को समान? हमारे पास तर्कबुद्धि हैं,हम परिक्षण करने में सक्षम हैं,निर्णय लेने में समर्थ हैं। फ़िर कैसे बिना परखे कह दें कि सभी धर्म समान है। मानव है, कोई कोल्हू के बैल नहीं। हीरे और कोयले में अन्तर होता है, भले आप हमे मतिभृष्ट करने हेतू कह दें, दोनो ही कार्बन तत्व के बने है,पर हमें दोनों के उपयोग और कीमत की जानकारी हैं।
    हां आपका आग्रह इसलिये है,कि धर्मो का मामला है,क्यों फ़साद खडा करना,हमारा दिल विशाल होना चाहिये। तो ठिक है, सर्वधर्म सद्भाव (द्वेषरहित), लेकिन सर्वधर्म सम्भाव या सर्वधर्म समान नहिं।।_______________________________________________________________________

     

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    आओ, धर्म धर्म खेलें !!

    विगत दो माह से ब्लोग जगत को खंगालनें के बाद, मैंने देखा कि बुद्धिजीवी लोग धर्म पर चर्चा मात्र से कतराते हैं। अधिकतर सज्जन सोचते है, क्यों पंगा लें तो अधिकांश का मानना धर्म एक सम्वेदनशील मामला है, अनावश्यक विवाद खड़े होंगे। कुछ लोगों का मत है, क्यों फ़ालतू  की बहस करना या फ़साद खडा करना। तो कुछ धर्म पर ही दोषारोपण करते है कि धर्म आपस में लडवाता है। कुछ बन्धु धर्म-चर्चा के नाम पर धर्म-प्रचार में लीन हैं, तो अन्य सज्जन उनके कुप्रचार के खण्ड़न से ही नहीं उभर पाते। एक विशेष अधर्मियों का मत हैं कि धर्म तो अफिम है और स्वयंभू नास्तिकता की ओट लेकर, धर्म की पीठ पर ही सवार होकर उस पर वार करते है। तो कुछ छोटी- छोटी टिप्पणियों से ही भड़ास निकाल संतोष मान लेते है।

    धर्म ने आदि काल से हमारे जीवन को प्रभवित किया है, हमारी समाज व्यवस्था को नियन्त्रित किया हैफ़िर क्यों न हम इस पर खुलकर चर्चा करें।

    धर्म का शाब्दिक अर्थ है, स्वभाव (स्व+भाव) स्वयं का आत्म-स्वभाव, अपनी आत्मा के स्वभाव में स्थिर होना, आत्मा का मूल स्वभाव है निर्मलता। अतः सरल निश्छल भावो व सुगुणों में रहना ही आत्मा का धर्म हैं धर्मों को वस्तुतः मार्ग या दर्शन कहना उचित है। दर्शनों ने मानव के व्यवहार को सुनिश्चित करने एवं समाज व्यवस्था को नियंन्त्रित करने के लिये कुछ नियम बनाए, उसे ही हम धर्म कहते है। यह स्वानुशासन हैं, जिसमें स्वयं को संयमित रखकर, स्वयं नियन्त्रित (मर्यादित) रहना ही धर्म कहा गया हैआत्मा की निर्मलता बरकरार रखने के लिए मर्यादित रहना ही धर्म है। वही उस आत्मा का ‘स्वभाव’ है।

    याद रहे अच्छाई और बुराई में भेद करना और सभ्य-सुसंस्कृत रहना, इन्ही दर्शनों (धर्मों) की देन है अन्यथा हम किसी का अहित करके भी यह न सम पाते कि हमने कोई बुरा कृत्य किया है। हमारी शब्दावली में व्याभिचार, बलात्कार, झू, चोरी, हिंसा आदि शब्दों के कोई अर्थ ही न होते।

    प्राकृतिक रूप से मानव को किसी भी अनुशासन में रहना हीं सुहाताइसिलि धर्म की बातों(नियमों) को हम अपने जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप मानते है। और हमारी इस मान्यता को दृढ करते है, वे अधकचरे ज्ञान के पोंगाण्डि, जो ग्रन्थों से चार बातें पढकर, उसका (पूर्वाग्रहयुक्त) मनमाना अर्थ कर, भोले श्रद्धालुओं के लि अजब भेदभाव युक्त नियमावली गढते हैं। इन ज्ञानपंगुओं ने वास्तव में सुखकर धर्म को, दुष्कर बना दिया हैं। हमारे पास बुद्धि होते हुए भी हमे जडवत रहने को भिशप्त कर दिया हैं।

    सर्वधर्म समान?

    क्या कुदरत ने हमें सोचने समने की शक्ति नहीं दी है? क्यों मानें हम सभी को समान? हमारे पास तर्कबुद्धि हैंहम परीक्षण करने में सक्षम हैंनिर्णय लेने में समर्थ हैं। फ़िर कैसे बिना परखे कह दें कि सभी धर्म समान है। मानव है, कोई कोल्हू के बैल नहीं। हीरे और कोयले में अन्तर होता है, सभी का मूल्य समान नहीं होता। भले आप हमें भ्रांत करने के लिए तर्क  दें कि, दोनो ही कार्बन तत्व से बने है,पर हमें दोनों के उपयोग और कीमत की सुदृष्ट जानकारी हैं।

    हां यदि आपका आग्रह इसलिये है कि यह धर्मो का मामला है,क्यों फ़साद खडा करना? सभी धर्मो के लिए हमारा दिल विशाल होना चाहि। तो मात्र यह मान सकते है कि ‘सर्वधर्म सद्भाव (द्वेषरहित)  किन्तु, सर्वधर्म सम्भाव या सर्वधर्म समान तो कदापि  हीं। गुणों के आधार पर अन्तर तो लाजिमि है।

    आओ हम परखें और चर्चा करें……आप क्या कहते है?


     
    13 टिप्पणियाँ

    Posted by on 15/06/2010 in बिना श्रेणी

     

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    आधी दुनिया से द्रोह

    मैं अपनी पहली ही पोस्ट में आधी दुनिया के विषय को छूना चाहता हूँ, यह  बात है  महिला शक्ति की।  क्योंकि आज अक्सर बात की जाती है महिला अधिकारों के बारे में, पुरुष से समानता के बारे में, नारी स्वतन्त्रा के बारे में।

    महिलाओं के अधिकारो पर इतनी जागृति आई है, कि महिलाओं को सदा दमित शोषित करने वाला इस्लाम भी आयतों से खोज खोज कर स्वयं को महिला अधिकारों का पैरोकार दर्शाने का जी-तोड़ प्रयास कर रहा है। तो वहाँ इसाईयत नारी की स्वतन्त्रता एवं विकास का एकाधिकार दावा प्रस्तुत कर रहा है। और हिन्दुत्व तो मंत्रोचार ही कह रहा है कि हमने तो नारी को सदैव देवी की तरह पूजा है।

    लेकिन धरातल पर शोषण और दमन आज भी जारी है। बस कुछ फ़र्क है तो  वर्तमान में  कुछ एक दमन और शोषण के किस्से प्रकाशित होते हैं। और बहुत से लोग पैरोकार बन कर आगे आते है।

    कौन है ये लोग, क्या ये वाकई महिला अधिकारों पर चिन्तित हैक्या ये लोग महिलाओं के हितचिन्तक है?  क्या वाकई कोई  दर्द है इनके सीनों में?
    मैं बताता हुं कौन हैं ये लोग?, और क्यों इतनी हाय-तौबा मचाते हैं. पहले तो हम विचार करते है, महिलाओ पर ये बन्दिशें और रोक कहां से आती है, निश्चित ही यह आती है धार्मिक संसकृति के नाम पर।

    अब पुन: चलते है, कौन लोग है, जो तेज तर्रार आवाज उठाते है, महिलायें स्वयं?, नहीं!! बहुत से मामलों में तो महिलायें दिखाई ही नहीं देती। तो फिर कौन ये, ये है सेक्युलर मीडिया, सुडो-सेक्युलर,और कम्युनिस्ट्। क्योंकि इन्ही के पास है मक़सद। ये विचारधाराएँ धर्म को नहीं मानतीऔर इसी  बहाने वे धर्म पर आरोप मढ़कर, इसी बहाने उसे हरानें का सुख भोगती हैं। 

    मेरा प्रयोजन धर्मों के बचाव पक्ष में खडा होना नहीं, और न ही मैं नारी अधिकारो के विरुद्ध हूँ। मेरी भावना है, एक सर्वथा भिन्न दृष्टि से देखा जाय, क्योंकि वास्तविकता आधारित चिन्तन के बिना इस समस्या का निवारण नहीं। जबकि इसके कथित आन्दोलनकारियों का मक़सद इस आग को जलते रखने में है।

    कौन है जो कहते है, “कैसे भी कपडे पहने यह उनकी व्यक्तिगत पसन्द है।बात तो नारी हित की है पर मकसद जुदायह  ‘नारी स्वतन्त्रता’ जैसे  मीठे शब्दों से समाज को उन्मुक्त बनाकर, तहस नहस करने की मंशा रखते है। ताकि वे बिखरे समाज पर सत्ता कायम कर सके। स्वतंत्रता स्वछंद मानसिकता  की एक विद्रुप चाल है। स्वछंदता पर अन्दर से गुदगुदी महसूस करते, रोमांच भोगते ये लोग दूसरों को केवल ग्राहक या वोट के रूप में देखते हैं।

     
    10 टिप्पणियाँ

    Posted by on 13/06/2010 in बिना श्रेणी

     

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    गहराना

    विचार वेदना की गहराई

    ॥दस्तक॥

    गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

    तिरछी नजरिया

    हितेन्द्र अनंत का दृष्टिकोण

    मल्हार Malhar

    पुरातत्व, मुद्राशास्त्र, इतिहास, यात्रा आदि पर Archaeology, Numismatics, History, Travel and so on

    मानसिक हलचल

    ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर रेलवे अफसर।

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