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Monthly Archives: अक्टूबर 2010

बुद्धु, आलसी, डरपोक, कायर, मूर्ख, कडका, जिद्दी… … …

ऐसा खोजुं मैं मित्र ब्लॉग जगत में………

  • बुद्धु    :जिसका अपमान हो और उसके मन को पता भी न चले।
  • आलसी : किसी को चोट पहूंचाने के लिये हाथ भी न उठा सके।
  • डरपोक : गाली खाकर भी मौन रहे।
  • कायर  : अपने साथ बुरा करने वाले को क्षमा कर दे।
  • मूर्ख   : कुछ भी करो, या कहो क्रोध ही न करे।
  • कडका : जलसेदार गैरजरूरी खर्च न कर सके।
  • जिद्दी  : अपने गुणों पर सिद्दत से अड़ा रहे।
क्या कहा, आज के सतयुग में ये बदमाशियाँ मिलना दुष्कर है?
चलो शर्तों को कुछ ढीला करते है, जो इन पर चल न पाये, पर बनना तो ऐसा ही चाहते है, अर्थार्त : जिनकी वैचारिक अवधारणा तो यही हो।
मित्रता की अपेक्षा से हाथ बढाया है, कृप्या टिप्पणी से अपना मत अवश्य प्रकाशित करें……
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सोते सोते ही निकल गई सारी जिन्दगी

हाथोंहाथ तूं दुख खरीद के, सुख सारे ही खोता।
कर्ज़, फ़र्ज और मर्ज़ बहाने, जीवन बोझा ढोता।
ढोते ढोते ही निकल गई सारी जिन्दगी॥
शाम पडे बंदे रे तूं, रोज के पाप न धोता।
चिंता जब असह्य बने तो, चद्दर तान के सोता।
सोते सोते ही निकल गई सारी जिन्दगी॥
जन्म लेते ही इस धरती पर, तुने रूदन मचाया।
आंख अभी तो खुल ना पाई, भूख भूख चिल्लाया॥
खाते खाते ही निकल गई सारी जिन्दगी॥
बचपन खोया खेल कूद में, योवन पा गुर्राया।
धर्म-कर्म का मर्म न जाने, विषय-भोग मन भाया।
भोगों भोगों में निकल गई सारी जिन्दगी॥
धीरे धीरे आया बुढापा, डगमग डोले काया।
सब के सब रोगों ने देखो, डेरा खूब जमाया।
रोगों रोगों में निकल गई सारी जिन्दगी॥
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उँचा खानदान

खाते है जहाँ गम सभी, नहिं जहाँ पर क्लेश।

निर्मल गंगा बह रही, प्रेम की  जहाँ विशेष॥

हिं व्यसन-वृति कोई, खान-पान विवेक।
सोए-जागे समय पर, करे कमाई नेक॥

दाता जिस घर में सभी, निंदक नहिं नर-नार।
अतिथि का आदर करे, सात्विक सद्व्यवहार॥

मन गुणीजनों को करे, दुखीजन के दुख दूर।
स्वावलम्बन समृद्धि धरे, हर्षित रहे भरपूर॥
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कैसे कैसे कसाई है जग में

  • बकरकसाई:  बकरे आदि जीवहिंसा करने वाला।
  • तकरकसाई:  खोटा माप-तोल करने वाला।
  • लकरकसाई:  वृक्ष वन आदि काटने वाला
  • कलमकसाई: लेखन से अन्य को पीडा पहूँचाने वाला।
  • क्रोधकसाई:  द्वेष, क्रोध से दूसरों को दुखित करने वाला।
  • अहंकसाई:   अहंकार से दूसरो को हेय,तुच्छ समझने वाला।
  • मायाकसाई:  ठगी व कपट से अन्याय करने वाला।
  • लोभकसाई:  स्वार्थवश लालच करने वाला।

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कैसे कैसे कसाई है जग में

  • बकरकसाई:  बकरे आदि जीवहिंसा करने वाला।
  • तकरकसाई:  खोटा माप-तोल करने वाला।
  • लकरकसाई:  वृक्ष वन आदि काटने वाला
  • कलमकसाई: लेखन से अन्य को पीडा पहूँचाने वाला।
  • क्रोधकसाई:  द्वेष, क्रोध से दूसरों को दुखित करने वाला।
  • अहंकसाई:   अहंकार से दूसरो को हेय,तुच्छ समझने वाला।
  • मायाकसाई:  ठगी व कपट से अन्याय करने वाला।
  • लोभकसाई:  स्वार्थवश लालच करने वाला।

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श्रेष्ठ खानदान है हमारा………

खाते है जहाँ गम सभी, नहिं जहाँ पर क्लेश।

निर्मल गंगा बह रही, प्रेम की  जहाँ विशेष॥

हिं व्यसन-वृति कोई, खान-पान विवेक।
सोए-जागे समय पर, करे कमाई नेक॥

दाता जिस घर में सभी, निंदक नहिं नर-नार।
अतिथि का आदर करे, सात्विक सद्व्यवहार॥

मन गुणीजनों को करे, दुखीजन के दुख दूर।
स्वावलम्बन समृद्धि धरे, हर्षित रहे भरपूर॥
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सोते सोते ही निकल गई सारी जिन्दगी

हाथोंहाथ तूं दुख खरीद के, सुख सारे ही खोता।
कर्ज़, फ़र्ज और मर्ज़ बहाने, जीवन बोझा ढोता।
ढोते ढोते ही निकल गई सारी जिन्दगी॥
जन्म लेते ही इस धरती पर, तुने रूदन मचाया।
आंख भी तो खुल ना पाई, भूख भूख चिल्लाया॥
खाते खाते ही निकल गई सारी जिन्दगी॥
बचपन खोया खेल कूद में, योवन पा गुर्राया।
धर्म-कर्म का मर्म न जाने, विषय-भोग मन भाया।
भोगों भोगों में निकल गई सारी जिन्दगी॥
शाम पडे रोज रे बंदे, पाप-पंक नहीँ धोता।
चिंता जब असह्य बने तो, चद्दर तान के सोता।
सोते सोते ही निकल गई सारी जिन्दगी॥
धीरे धीरे आया बुढापा, डगमग डोले काया।
सब के सब रोगों ने देखो, डेरा खूब जमाया।
रोगों रोगों में निकल गई सारी जिन्दगी॥
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गहराना

विचार वेदना की गहराई

॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

तिरछी नजरिया

हितेन्द्र अनंत का दृष्टिकोण

मल्हार Malhar

पुरातत्व, मुद्राशास्त्र, इतिहास, यात्रा आदि पर Archaeology, Numismatics, History, Travel and so on

मानसिक हलचल

ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर रेलवे अफसर।

सुज्ञ

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