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Monthly Archives: जुलाई 2010

॥व्यर्थ वाद विवाद॥

विचारधाराओं पर वर्तमान में उपस्थित वाद विवाद को समर्पित दोहांजली।

व्यर्थ वाद विवाद………

बौधिक उलझे तर्क में, कर कर वाद विवाद।
धर्म तत्व जाने नहिं, करे समय बर्बाद॥1॥

सद्भाग्य को स्वश्रम कहे, दुर्भाग्य पर विवाद ।
कर्मफ़ल जाने नहिं, व्यर्थ तर्क सम्वाद ॥2॥

कल तक जो बोते रहे, काट रहे है लोग ।
कर्मों के अनुरूप ही, भुगत रहे हैं भोग ॥3॥

कर्मों के मत पुछ रे, कैसे कैसे योग ।
भ्रांति कि हम भोग रहे, पर हमें भोगते भोग ॥4॥

ज्ञान बिना सब विफ़ल है, तन मन वाणी योग।
ज्ञान सहित आराधना, अक्षय सुख संयोग॥5॥
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13 टिप्पणियाँ

Posted by on 29/07/2010 in बिना श्रेणी

 

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व्यर्थ वाद विवाद, निर्थक तर्क संवाद॥

(विचारधाराओं पर वर्तमान में उपस्थित वाद विवाद को समर्पित दोहांजली।)

॥व्यर्थ वाद विवाद॥


बौधिक उलझे तर्क में, करकर वाद विवाद।
धर्म तत्व जाने नहीं, करे समय बर्बाद॥1

सद्भाग्य को स्वश्रम कहे, दुर्भाग्य पर विवाद ।
कर्मफ़ल जाने नहिं, व्यर्थ तर्क सम्वाद ॥2

कल तक जो बोते रहे, काट रहे है लोग ।
कर्मों के अनुरूप ही, भुगत रहे हैं भोग ॥3

कर्मों के मत पुछ रे, कैसे कैसे योग ।
भ्रांति कि हम भोग रहे, पर हमें भोगते भोग ॥4

ज्ञान बिना सब विफ़ल है, तन मन वाणी योग।
ज्ञान सहित आराधना, अक्षय सुख संयोग॥5

 
20 टिप्पणियाँ

Posted by on 29/07/2010 in बिना श्रेणी

 

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॥शृंगार॥

सिर का शृंगार तभी है, जब सत्य समक्ष नतमस्तक हो।
भाल का शृंगार तभी है, जब यश दीन दुखी के मुख हो॥
नयनों का शृंगार तभी है, जब वह करूणा से सज़ल हो।
नाक का शृंगार तभी है, जब वह परोपकार से उत्तंग हो॥
कान का शृंगार तभी है, जब वह आलोचना सुश्रुत हो।
होठो का शृंगार तभी है, हिले तो मधूर वचन प्रकट हो॥
गले का शृंगार तभी है, जब विनय पूर्ण नम जाय।
सीने का शृंगार तभी है, जिसमें आत्मगौरव बस जाय॥
हाथों का शृंगार तभी है, पीडित सहायता में बढ जाए।
हथेली का शृंगार तभी है, मिलन पर प्रेम को पढ जाए॥
कमर का शृंगार तभी है, जब बल मर्यादा से खाए।
पैरों का शृंगार तभी है, तत्क्षण मदद में उठ जाए॥
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6 टिप्पणियाँ

Posted by on 27/07/2010 in बिना श्रेणी

 

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॥भोग-उपभोग॥

हानि न विष से हो सकी, जब तक किया न पान ।
पर क्रोध के उदय मात्र से,  भ्रष्ट हो गया ज्ञान ॥1॥
सुलग रहा  संसार यह,  जैसे वन की आग ।
फ़िर भी मनुज लगा रहा?, इच्छओं के बाग ॥2॥
साझा-निधि जग मानकर, यथा योग्य ही भोग ।
परिग्रह परिमाण कर,  जीवन एक सुयोग ॥3॥
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2 टिप्पणियाँ

Posted by on 27/07/2010 in बिना श्रेणी

 

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शृंगार करो ना …

सिर का शृंगार तभी है, जब सत्य समक्ष नतमस्तक हो।
भाल का शृंगार तभी है, जब यश दीन दुखी के मुख हो॥
नयनों का शृंगार तभी है, जब वह करूणा से सज़ल हो।
नाक का शृंगार तभी है, जब वह परोपकार से उत्तंग हो॥
कान का शृंगार तभी है, जब वह आलोचना सुश्रुत हो।
होठो का शृंगार तभी है, हिले तो मधूर वचन प्रकट हो॥
गले का शृंगार तभी है, जब विनय पूर्ण नम जाय।
सीने का शृंगार तभी है, जिसमें आत्मगौरव बस जाय॥
हाथों का शृंगार तभी है, पीडित सहायता में बढ जाए।
हथेली का शृंगार तभी है, मिलन पर प्रेम को पढ जाए॥
कमर का शृंगार तभी है, जब बल मर्यादा से खाए।
पैरों का शृंगार तभी है, तत्क्षण मदद में उठ जाए॥

 

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भोग-उपभोग

हानि न विष से हो सकी, जब तक किया न पान ।

पर क्रोध के उदय मात्र से,  भ्रष्ट हो गया ज्ञान ॥1॥

सुलग रहा  संसार यह,  जैसे वन की आग ।
फ़िर भी मनुज लगा रहा?, इच्छओं के बाग ॥2॥

साझा-निधि जग मानकर, यथा योग्य ही भोग ।
परिग्रह परिमाण कर,  जीवन एक सुयोग ॥3॥
 

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॥सत्य क्षमा ॥

चलिये चल कर देखिये, सच का दामन थाम ।
साहस का यह काम है, किन्तु सुखद परिणाम ॥1॥

धर्म तत्व में मूढता, संसार तर्क में शूर ।
दुखदायक कारकों पर!, गारव और गरूर? ॥2॥

क्षमा भाव वरदान है, वैर भाव ही शाप ।
परोपकार बस पुण्य है, पर पीडन ही पाप ॥3॥
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3 टिप्पणियाँ

Posted by on 26/07/2010 in बिना श्रेणी

 

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गहराना

विचार वेदना की गहराई

॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

तिरछी नजरिया

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर रेलवे अफसर।

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