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चार अखंड़ मोती

20 जुलाई
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प्रशंसा

  • प्रशंसा मानव स्वभाव की एक ऐसी कमजोरी है कि जिससे बड़े बड़े ज्ञानी भी नहीं बच पाते। निंदा की आंच भी जिसे पिघला नहीं पाती, प्रशंसा की ठंड़क उसे छार-छार कर देती है।
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कषाय

  • ब तक क्रोध, मान, माया और लोभ रूपी कषाय से छूटकारा नहीं होता, तब तक दुखों से मुक्ति सम्भव ही नहीं।
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सदभावना

  • दभावना, विषय-कषाय से विरक्त और समभाव में अनुरक्त रखती है। विपत्तियों में समता और सम्पत्तियों में विनम्रता प्रदान करती है।
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समाधि

  • पूर्ण विवेक से निर्णय करने के उपरांत भी यदि परिणाम प्रतिकूल आ जाय ऐसी विपरित परिस्थिति में भी उसका विरोध करने के बजाय यदि मन को समझाना आ जाय तो समाधि सम्भव है।
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7 टिप्पणियाँ

Posted by on 20/07/2011 in बिना श्रेणी

 

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7 responses to “चार अखंड़ मोती

  1. रश्मि प्रभा...

    20/07/2011 at 7:15 अपराह्न

    anmol moti

     
  2. अनामिका की सदायें ......

    20/07/2011 at 7:44 अपराह्न

    jab pahle 3 motiyon ko aatmsaat kar lenge to chautha moti apna roop khud-b-khud le lega.sunder sanmarg ki or le jati kriti.

     
  3. कुश्वंश

    21/07/2011 at 7:12 पूर्वाह्न

    seep se nikle moti jo anmol hai preraaak bhi

     
  4. सञ्जय झा

    21/07/2011 at 10:19 पूर्वाह्न

    kya marm ki baat kah dete hain aap………pranam.

     
  5. रंजना

    21/07/2011 at 6:26 अपराह्न

    अनमोल चिंतन मोती….

     
  6. Navin C. Chaturvedi

    21/07/2011 at 9:36 अपराह्न

    ज्ञान पूर्ण बातें ऐसे ही बांटते रहें हमारे साथ

     
  7. सुज्ञ

    26/07/2012 at 3:59 अपराह्न

    Reblogged this on सुज्ञ.

     

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