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Tag Archives: हिंदु धर्म

सनातन भवन

“सनातन धर्म को लेकर अक्सर संशय पैदा किए जाते है कि इसमें न जाने कितने पंथ सम्प्रदाय है, सभी के दर्शन विचार भिन्न भिन्न है जो परस्पर विरोधाभास का सर्जन करते है्। तो दूसरी ओर इसे उदारता या खुलेपन के नाम प्रसंशित कर प्रत्येक विचारधारा को समाहित करने के विशेषण की तरह निरूपित करते है। यह दोनो ही परस्पर विरोधाभासी बयान सनतन धर्म के यथार्थ चरित्र से कोशों दूर है। सनातन धर्म में कितने भी भिन्न भिन्न दर्शन पंथ सम्प्रदाय हो, सनातन धर्म और उसकी सभी शाखाएँ , सनातन के ‘मूल तत्वो और सिद्धांतो ‘ पर प्रतिबद्ध है। विचार और विवेचन पर उदार होने के उपरांत भी अपने आराध्यों  की पूजनीयता पर संदेह स्वीकार नहीं करते। इसी निष्ठा  के बल पर सनातन धर्म  आज भी अपना अस्तित्व बनाए हुए है।”

सनातन एक प्राचीन विशाल और विख्यात भवन है। एक पुरातत्व धरोहर है। इस में अभी तक समग्र भवन का आमूल चूल परिवर्तन नहीं हुआ है बल्कि अपने अपने कमरे को सजाने का कार्य हुआ है, सजाने में भी प्रतिस्पर्धात्मक सज्जा। इस तरह की सज्जा ने मूल तत्वो और सिद्धांतो की नींव को जस का तस रखा, उसमें कोई समझोता नहीं किया। किसी कक्ष ने पुरातत्व को समझा तो उसने जीर्णोद्धार करते हुए पुनः पुरातन साज सज्जा में बनाया। तो किसी कक्ष ने सुविधा और सरलता को ध्यान में रखते हुए उपयोगी सज्जा प्रदान की। किसी ने अपनी सुविधा तो किसी ने दूसरो की सुविधा को महत्व देते हुए सज्जा को स्वरूप दिया। तो किसी ने सुरक्षा के मद्देनजर भवन को सुरक्षा उपकरणो से सज्जित किया। लेकिन किसी ने भी नींव को कमजोर करने का दुस्साहस नहीं किया। कुछ भौतिकवादीयों नें इसी भवन में तलघर बानाने के लिए तल खोद दिया, इस खुदाई में नींव पर भी आघात हुए पर नींव मजबूत थी, कुछ गम्भीर बिगाड नहीं हुआ। अल्प काल तक भौतिकवादी इसमें रहे किन्तु शीघ्र ही यह तहखाना, वीरान अन्धेरी कोठरी में परिवर्तित हो गया। आज-कल इस तलघर में  कुछ मजदूर, मोहल्ले के सताए लोग और इन दोनो के रहनुमा, रात अंधेरे ताश खेलकर टाईम-पास करते है। बहुत पहले कुछ लोगों ने इसके मझले बढा दिए थे, टॉप पर उन्होने हवादार खिडकियां, प्रकाश के लिए खूबसूरत बाल्कनी से कक्ष सजा दिए थे, इनके द्वारा किए गए अतिरिक्त निर्माण से भी सनातन भवन की नींव को कोई खतरा नहीं था। समय समय कभी इसकी या कभी उसकी सजावटें बढती घट्ती रहती, नए युग में नया दौर आया, भवन के बाहरी रंग-रोगन का प्रस्ताव आता और पास भी होता, कुछ पुरातन धरोहरवादीयों ने दबी जुबां से विरोध भी किया कि इससे भवन की पुरातत्व पहचान विकृत हो जाएगी किन्तु नींव को कोई खतरा न देख, चुप लगा गए। इस तरह आन्तरिक और बाहरी सजावटें निरन्तर बदलती रही पर भवन की नींव मजबूत थी हर नवनिर्माण सह गई। किन्तु अब इस आधुनिक काल में प्रगतिशील निवासी अजीब प्रस्ताव लाने लगे है। आजकल सुन्दर कंगूरों का फैशन चल पड़ा है, और वे नींव में लगे बेशकीमती पत्थरो को निकाल कर उससे भवन के कंगूरे अलंकृत करना चाहते है। किन्तु नई फैशन का मोह ऐसा है कि दूरदृष्टि कुंठित हो चली है। नींव जिस पर भवन टिका हुआ है, और भवन जिस पर इनका ही अस्तित्व आश्रय लिए हुए है।

पास में ही कोई ऐसा ही वैभवशाली भवन बनाने की महत्वाकांक्षा लिए हुए है। वह ऐसा ही सुदृढ भवन बनाना चाहता है। वह स्ट्रक्चर तो अपनी पसंद का रखना चाहता है किन्तु नींव सनातन भवन जैसी बनाना चाह्ता है। वह अपनी भूमि से सूरंग खोद कर बार बार इसकी नींव देखता है इसी सुंरग खुदाई से सनातन भवन में हल्का सा कम्पन महसुस होता है लेकिन यह पडौसी आज तक नहीं जान पाया कि इसकी नींव किन कारणो से मजबूत है। उसकी समस्या यह है कि इस नीव और अपने स्ट्रक्चर के वास्तु की इन्जिनियरिंग का मेल नहीं बैठ रहा। निर्माण काल में बिगडे सम्बंधो से आज भी सनातन भवन और इनके बीच झगडे आम है।

दूसरी तरफ के पडौसी के पास सनातन भवन का पूरा नक्शा, निर्माण कला का इतिहास और रिपोर्ट्स उपलब्ध है जो कभी वह इस भवन से चुरा ले गया था। यह ज्यादा समझदार है, अपनी इस जानकारी का ढिंढोरा नहीं पीटता, उसने सनातन भवन की नींव के लिए बने विराट प्लेटफार्म का उपयोग, अपनी नींवें ठहराने के लिए किया। परिणामस्वरूप सनातन भवन का एक अंश झुकाव इस भवन की ओर हो गया, जो देखने पर नज़र नहीं आता। अपने स्ट्रक्चर में जरा सा अनुकूल परिवर्तन कर भवन खडा कर ही लिया है। शान्त रहता है और दबे पांव लक्ष्य की ओर बढ़ता है, इस तरह स्वयं के भवन को सुदृढ करता रहता है।

इन दोनो पडौसियों ने अपनी इमारत पर लिख रखा है ‘अपने पडौसी से प्रेम करो’ जिसकी पूरा शहर सराहना करता है। किन्तु सनातन भवन ने लिख रखा है ‘पूरे शहर को अपना परिवार समझो’ पर पता नहीं शहर इस तख्ती की तरफ आंख उठा कर नहीं देखता, शायद ईर्ष्या वश श्रेय देना नहीं चाहता।

 
55 टिप्पणियां

Posted by on 06/03/2013 में बिना श्रेणी

 

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मैं, ज्ञानदत्त पाण्डेय, गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश (भारत) में ग्रामीण जीवन जी रहा हूँ। मुख्य परिचालन प्रबंधक पद से रिटायर रेलवे अफसर। वैसे; ट्रेन के सैलून को छोड़ने के बाद गांव की पगडंडी पर साइकिल से चलने में कठिनाई नहीं हुई। 😊

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