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नय पद्धति – अनेकान्त

वक्ता के अभिप्राय को सम्यक प्रकार से जानने की पद्धति दो विभागों में विभक्त है। प्रमाण और नय। प्रमाण से जानी हुई अनन्त धर्मात्मक वस्तु के किसी एक अंश या गुण को मुख्य करके जानने वाले ज्ञान को ‘नय’ कहते है। कोई भी व्यक्ति किसी वस्तु के विषय में अपना अभिप्राय व्यक्त करता है, तो वह वस्तु के किसी एक अंश को लक्षय करके कहता है। तो उस समय उस वस्तु के अन्य गुण एवं अंश उपेक्षित जो जाते है। जब वह मूल द्रव्य का वर्णन करता है तो पर्याय गौण हो जातई है। और पर्याय का कथन करता है ति द्रव्य उपेक्षित रह जाते है। पर यदि वक्ता, लक्षित वस्तु के उपेक्षित गुणों का अपलाप नहीं करे, खण्ड़न नहीं करे तो वह नय सुनय कहलाता है। किन्तु यदि अन्य गुणो का विरोध करे तो वही दुर्नय बन जाता है। यहाँ हम सुनय पर चर्चा करेंगे।
सप्तनय इस प्रकार है:-

1-नैगमनय,2-संग्रहनय,3-व्यवहारनय,4-ॠजुनय,5-शब्दनय,6-समभिरूढनय,7-एवंभूतनय

1-नैगमनय– नैगमनय संकल्प मात्र को पूर्ण कार्य अभिव्यक्त कर देता है। उसके सामान्य और प्रयाय दो भेद होते है। काल की अपेक्षा से भी नैगमनय के तीन भेद, भूत नैगमनय, भविष्य नैगमनय और वर्तमान नैगमनय होते है।विषय के उलझाव से बचने के लिए यहाँ विस्तार में जाना अभी उचित नहीं है। कल उदाहरण दिया ही था कि ‘नैगमनय’ निगम का अर्थ है संकल्प। नैगम नय संकल्प के आधार पर एक अंश स्वीकार कर अर्थघटन करता है। जैसे एक स्थान पर अनेक व्यक्ति बैठे हुए है। वहां कोई व्यक्ति आकर पुछे कि आप में से कल मुंबई कौन जा रहा है? उन में से एक व्यक्ति बोला – “मैं जा रहा हूँ”। वास्तव में वह जा नहीं रहा है, किन्तु जाने के संकल्प मात्र से कहा गया कि ‘जा रहा हूँ’। इस प्रकार संकल्प मात्र को घटित कथन कहने पर भी उसमें सत्य का अंश रहा हुआ है। नैगमनय की अपेक्षा से सत्य है।

भूत नैगमनय – भूतकाल का वर्तमान काल में संकल्प करना जैसे दशहरे के दिन कहना आज रावण मारा गया। जबकि रावण को मारे गए बहुत काल बीत गया। यह भूत नैगमनय की अपेक्षा सत्य है।

भविष्य नैगमनय – जैसे डॉक्टरी पढ रहे विद्यार्थी को भविष्य काल की अपेक्षा से ‘डॉक्टर साहब’ कह देना भविष्य नैगमनय की अपेक्षा से सत्य है।

वर्तमान नैगमनय – जैसे सोने की तैयारी करते हुए कहना कि ‘मैं सो रहा हूँ’ वर्तमान नैगमनय की अपेक्षा से सत्य है।

2-संग्रहनय– संग्रहनय एक शब्द मात्र में एक जाति की अनेक वस्तुओं में एकता या संग्रह लाता है।
जैसे कहीं व्यक्ति प्रातः काल अपने सेवक से कहे- ‘ब्रश लाना तो’ और मात्र ‘ब्रश’ कहने से सेवक ब्रश, पेस्ट, जिव्हा साफ करनें की पट्टी, पानी की बोतल, तौलिया आदि वस्तुएं ला हाजिर करे तो वह सभी दातुन सामग्री की वस्तुएँ ब्रश शब्द में संग्रहित होने से ब्रश कहना संग्रहनय की अपेक्षा सत्य है।

3-व्यवहारनय– संग्रहनय से ग्रहण हुए पदार्थों अथवा तथ्यों का योग्य रिति से पृथकत्व करने वाला अभिप्रायः व्यवहार नय है। संग्रह नय के अर्थ का विशेष रूप से बोध करने के लिए उसका पृथक् करण आवश्यक हो जाता है। हर वस्तु के भेद-प्रभेद करना इस नय का कार्य है यह नय सामान्य की उपेक्षा करके विशेष को ग्रहण करता है।जैसे-ज्वर एक सामान्य रोग है किन्तु मस्तिष्क ज्वर से किसी ज्वर विशेष का बोध होता है।सामान्य एक समूह है जबकि विशेष उसका एक विशिष्ट भाग. सामान्य से विशिष्ट की खोज में निरंतर सूक्ष्मता की आवश्यकता होती है।

4-ॠजुनय – मात्र वर्तमान कालवर्ती प्रयाय को मान्य करने वाले अभिप्रायः को ॠजुनय कहते है। क्योंकि भूतकाल विनिष्ट और भविष्यकाल अनुत्पन्न होने के कारण, केवल वर्तमान कालवर्ती पर्याय को ही ग्रहण करता है। जैसे- वर्तमान में यदि आत्मा सुख अनुभव कर रही हो तो ही यह नय उस आत्मा को सुखी कहेगा। यानि यहाँ क्षण स्थायी पर्याय से सुखी दुखी मान लिया जाता है।
5-शब्दनय– यह नय शब्दप्रधान नय है। पर्यायवाची शब्दों में भी काल,कारक, लिंग, संख्या और उपसर्ग भेद से अर्थ भेद मानना शब्दनय है। जैसे- काल भेद से ‘गंगा थी,गंगा है,गंगा होगी’ इन शब्दों को तीन अर्थ-भेद से स्वीकार करेगा। यदि काल, लिंग, और वचनादि भेद नहीं हो तो यह नय भिन्न अर्थ होने पर भी शब्द के भेद नहीं करता। अर्थात् पर्यायवाची शब्दों का एक ही अर्थ मानता है।
6-समभिरूढनय– यह शब्दनय से भी सूक्ष्म है। शब्दनय जहाँ अनेक पर्यायवाची शब्द का एक ही अर्थ मानता है, उसमें भेद नहीं करता, वहाँ समभिरूढनय पर्यायवाची शब्द के भेद से अर्थ-भेद मानता है। इसके अभिप्रायः से कोई भी दो शब्द, एक अर्थ के वाचक नहीं हो सकते। जैसे- इन्द्र और पुरन्दर पर्यायवाची है फिर भी इनके अर्थ में अन्तर है। ‘इन्द्र’ शब्द से ऐश्वर्यशाली का बोध होता है और ‘पुरन्दर’ शब्द से ‘पुरों अर्थात् नगरों का नाश करने वाला’ ग्रहण होता है। यह नय शब्दों के मूल अर्थ को ग्रहण करता है, प्रचलित अर्थ को नहीं। इस प्रकार अर्थ भिन्नता को मुख्यता देकर समभिरूढनय अपना अभिप्रायः प्रकट करता है।
7-एवंभूतनय– यह नय समभिरूढनय से भी सूक्ष्म है। जिस समय पदार्थों में जो क्रिया होती है, उस समय क्रिया के अनुकूल शब्दों से अर्थ के प्रतिपादन करने को एवंभूत नय कहते है। यह सक्रियता के आधार पर उसी अनुकूल अर्थ पर बल देता है। जैसे- जब इन्द्र नगरों का नाश कर रहा हो तब उसे इन्द्र कहना व्यर्थ है, तब वह पुरन्दर है। जब वह ऐश्वर्य भोग रहा हो उसी समय उसमें इन्द्रत्व है। यथा खाली दूध की भगोली को दूध की भगोली कहना व्यर्थ है। जिस समय उसमें दूध हो उसे दूध की भगोली कहा जा सकता है। इस नय में उपयोग सहित क्रिया ही प्रधान है। यह वस्तु की पूर्णता को ही ग्रहण करता है। वस्तु में एक अंश कमी हो तो इस नय के विषय से बाहर रहती है।
इस प्रकार हर प्रतिक्रिया किसी न किसी नय से अपेक्षित होती है। नय समझ जाने पर हमें यह समझ आ जाता है कि कथन किस अपेक्षा से किया गया है। और हमें वक्ता के अभिप्राय: का निर्णय हो जाता है।
 

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मैं, ज्ञानदत्त पाण्डेय, गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश (भारत) में ग्रामीण जीवन जी रहा हूँ। मुख्य परिचालन प्रबंधक पद से रिटायर रेलवे अफसर। वैसे; ट्रेन के सैलून को छोड़ने के बाद गांव की पगडंडी पर साइकिल से चलने में कठिनाई नहीं हुई। 😊

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