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Tag Archives: सदाचरण

दंभी लेखक

किसी लेखक का वैराग्य विषयक ग्रंथ पढकर, एक राजा को संसार के प्रति वैराग्य उत्पन्न हुआ. ग्रंथ में व्यक्त, मिमांसा युक्त वैराग्य विचारों से प्रभावित हो राजा ने सोचा, ऐसे उत्तम चिंतक ग्रंथकर्ता का जीवन विराग से ओत प्रोत होगा. उसे प्रत्यक्ष देखने की अभिलाषा से राजा नें उसके गांव जाकर मिलने का निश्चिय किया.

गांव पहुँच कर, बहुत खोजने पर लेखक का घर मिला. घर में घुसते ही राजा ने तीन बच्चों के साथ ममत्व भरी क्रिडा करते व पत्नि के साथ प्रेमालाप करते लेखक को देखा. राजा को बडा आश्चर्य हुआ. निराश हो सोचने लगा –“कैसा दंभी व्यक्ति निकला?” राजा को आया देखकर, लेखक ने उनका सत्कार किया. राजा ने अपने आने का अभिप्राय लेखक को समझाया. लेखक ने राजा से शांत होने की प्रार्थना की और उचित आतिथ्य निभाया.

भोजन से निवृत होकर, लेखक व राजा नगर-भ्रमण के लिए निकल पडे. बाज़ार से गुजरते हुए उनकी नजर एक तलवार बनाने वाले की दुकान पर पडी. राजा को दुकान पर ले जाकर, लेखक नें दुकानदार से सर्वश्रेष्ठ तलवार दिखाने को कहा. कारीगर ने तेज धार तलवार दिखाते हुए कहा- “यह हमारा सर्वश्रेष्ट निर्माण है. जो एक ही वार में दो टुकडे करने का सामर्थ्य रखती है.” राजा के साथ खडे, तलवार देखते हुए लेखक ने मिस्त्री से कहा, “ भाई इतनी शक्तिशाली तलवार बनाते हो, इसे लेकर तुम स्वयं युद्ध के मैदान में शत्रुओं पर टूट क्यों नहीं पडते?” हँसते हुए मिस्त्री ने कहा – “ हमारा कार्य तलवारें गढना है; युद्ध करने का काम तो यौद्धाओं का है.

लेखक ने राजा से कहा- “ राजन् , सुना आपने?, “ठीक उसी प्रकार, मेरा कर्म लेखन का है, मूल्यवान विचार गढने का है. वैराग्य के साहस भरे मार्ग पर चलने का काम तो, आप जैसे शूरवीरों का है.” महाराज, आपके दरबार में भी वीर-रस के महान् कवि होंगे, किंतु जब भी युद्ध छिडता है,क्या वे वीर-रस के कवि, जोश से अग्रिम मोर्चे पर लडने निकल पडते है? वे सभी वीर रस में शौर्य व युद्ध कौशल का बखान करते है, पर सभी वीरता पूर्वक युद्ध में कूद नहीं पडते, सभी के द्वारा सैन्य कर्म न होने के उपरांत भी, आपकी राज-सभा में उन सभी को सर्वोच्छ सम्मान हासिल है. पता है क्यों? वह इसलिए कि आपके योद्धाओं में वे अपूर्व साहस भरते है, जोश भरते है. शौर्य पोषक के रूप में उनका विशिष्ट स्थान हमेशा महत्वपूर्ण बना रहता है.

कथनी करनी का समरूप होना जरूरी है, किंतु इस सिद्धांत को सतही सोच से नहीं देखा जाना चाहिए. यहाँ अपेक्षा भेद से सम्यक सोच जरूरी है, कथनी रूप स्वर्ग की अभिलाषा रखने की पैरवी करते उपदेशक को, स्वर्ग जाने के  करनी करने के बाद ही उपदेश की कथनी करने का कहा जाय तो, उसके चले जाने के बाद भला मार्ग कौन दर्शाएगा? वस्तुतः कथनी करनी में विरोधाभास वह कहलाता है, जब वक्ता या लेखक जो भी विचार प्रस्तुत करता है, उन विचारों पर उसकी खुद की आस्था ही न हो.  लेकिन किन्ही कारणो से लेखक, वक्ता, चिंतक  का उस विचार पर चलने में सामर्थ्य व शक्ति की विवशताएँ हो, किंतु फिर भी उस विचार पर उसकी दृढ आस्था हो तो यह कथनी और करनी का अंतर नहीं है. कथनी कर के वे प्रेरक भी इतने ही सम्मानीय है, जितना कोई समर्थ उस मार्ग पर ‘चल’ कर सम्माननीय माना जाता है.

श्रेष्ठ विचार, श्रेष्ठ कर्मों के बीज होते है. वे बीज श्रेष्ठ कर्म उत्पादन के पोषण से भरे होते है. और निश्चित ही फलदायी होते है. उत्तम विचारों का प्रसार सदैव प्रेरणादायी ही होता है. भले यह प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर न हो, किंतु विचारों का संचरण, परिवर्तन लाने में सक्षम होता है. इसलिए चिंतकों के अवदान को जरा सा भी कम करके नहीं आंका जा सकता. वे विचार ही यथार्थ में श्रेष्ठ कर्मों के प्रस्तावक, आधार और स्थापक होते है.

 

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इस जीवन में, उस जीवन में

मृत्यु के बाद जीवन है या नहीँ, स्वर्ग नरक है या नहीं, कर्मफल है या नहीं, पूर्वजन्म पुनर्जन्म है या नहीं और अगर है तो जन्म-मरण से मुक्ति है या नहीँ. ये प्रश्न उन्हें अधिक सालते है जो दिखावा तो सद्कर्म का करते है किंतु उनकी अंतरआत्मा में संशय बना रहता है कि इस तरह के छद्म सद्कर्मों से कर्मफल प्रभावित होते भी होंगे या नहीं. खुदा ना करे ऐसा कोई न्यायाधीश न्यायालय या न्याय व्यवस्था हो जो झूठ मुठ के स्वार्थी छद्म सदाचारों का दूध का दूध और पानी का पानी कर दे?

आस्तिक हो या नास्तिक, जिन्हें अपने विचारों पर संदेह रहित निष्ठा है, किंतु कर्म उनका निष्काम व यथार्थ सदाचरण है, स्वार्थवश शिष्टाचारों का पखण्ड नहीं है, भरमाने की धूर्तता नहीं है तो उसके दोनो हाथ में लड्डू है. यदि यही मात्र जीवन है तो वह सदाचार व त्यागमय व्यक्तित्व के कारण इस भव में प्रशंसित और पूर्ण संतुष्ट जीवन जी लेते है. और अगर जीवन के बाद भी जीवन है तो उन्ही त्यागमय सदाचारों के प्रतिफल में सुफल सुनिश्चित कर लेते है. जिसे कर्मफल ( बुरे का नतीजा बुरा, भले का नतीजा भला) में विश्वास है, चाहे इस जन्म में हो या अगले जन्म में, किसी भी दशा में चिंतित होने की क्या आवश्यकता हो सकती है?

जो यह मानते है कि खाओ पीओ और मौज करो, यही जीवन है, उनके लिए अवश्य समस्या है. जिनका ‘मिलेगा नहीं दुबारा’ मानकर मनमौज और जलसे करना ही लक्ष्य है तो दोनो ही स्थिति में उनका ठगे जाना पक्का है. क्योंकि सद्कर्म पूर्णरूप से त्याग और आत्मसंयम में बसा हुआ है, और उसी स्थिति मेँ यथार्थ सदाचरण हो पाता है. जैसे अर्थ शास्त्र का नियम है कि यदि लाभ के रूप में हमारी जेब में एक रूपया आता है तो कहीं ना कहीं किसी की जेब से एक रूपया जाता ही है, कोई तो हानि उठाता ही है. भौतिक आनंद का भी बिलकुल वैसा ही है, जब हम अपने जीवन के लिए भौतिक आनंद उठाते है तो उसकी प्रतिक्रिया में कहीं न कहीं, कोई न कोई भौतिक कष्ट उठा ही रहा होता है. चाहे हमारी जानकारी में आए या न आए. लेकिन आत्मिक आनंद के साथ ऐसा नहीं है. क्योंकि आत्मिक आनंद, त्याग-संयम व संतोष से उपार्जित किया गया होता है.

यह यथोचित ही है कि इस जीवन को ऐसे जीना है, जैसे दुबारा नहीं मिलने वाला. वह इसलिए कि मनुष्य जन्म दुर्लभ है, बार बार नहीं मिलता. किंतु इस जीवन की समाप्ति भी निश्चित है. मृत्यु अटल सत्य है. इसलिए जीते हुए भी इस सत्य की सतत स्मृति जरूरी है क्योंकि यह स्मृति ही सार्थक, निस्वार्थ, त्यागमय, संयमित सदाचरण का मार्ग प्रशस्त करती है. जिसका लाभ दोनो ही कंडिशन में सुखद रूप से सुरक्षित है.

जीवन का लक्ष्य
मृत्यु स्मृति

 

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शिष्टाचार

पाश्चात्य देशों में जो ‘शिष्टाचार’ बहुप्रशंसित है। वह ‘शिष्टाचा’र वस्तुतः भारतीय अहिंसक जीवन मूल्यों की खुरचन मात्र है। भारतीय अहिंसक मूल्यों में नैतिकता पर जोरदार भार दिया गया है। पाश्चात्य शिष्टाचार उन्ही नैतिक आचारों के केवल अंश है। पश्चिम ने सभ्यता और विकास के अपने सफर में यह शिष्टाचार, भारतीय अहिंसा के सिद्धांत से ही तो ग्रहण किए है। उनके लिये जितना भी अहिंसा का पालन  “सुविधाजनक” था, इतना अपना लिया। जो दूभर था छोड दिया। परिणाम स्वरूप, उनका वह सहज अहिंसक आचरण,  शिष्टाचार के स्वरूप में स्थापित हो गया।

जबकि भारत में यह अहिंसा पालन और नैतिक आचरण किताबों में कैद और उपदेशों तक सीमित हो गया। क्योंकि पालन बड़ा कठीन था और मानवीय स्वभाव सदैव से सरलतागामी और सुविधाभोगी रहा है। हमें अहिंसा कठिन तप लगने लगी और नैतिकता दुष्कर और दूरह। नैतिक निष्ठा से दूर होकर हम, उस पतन की ओर ढ़लने लगे जो हमें बिना किसी विशेष परिश्रम के, सुखदायक स्थिति में रखता था। इस प्रकार सुविधाभोगी मानस से नैतिक आचरण तो गया ही गया, उसके अंश स्वरूप का शिष्टाचार भी हमारे जीवन से तिरोहित हो गया।

वस्तुतः सदाचरण हमारे जीवन को मंगलमय रखता है। शान्ति फैलाता है और जीवन संघर्ष के कितने ही तनावों से मुक्त रखता है, इसलिए कल्याणकारी है। इसका पालन कठिन है, लेकिन इस गुण के लाभ देखकर इसके प्रति आकर्षण हमेशा ही बना रहता है। इसी कारण पाश्चात्य शिष्टाचार के प्रति हमें अहोभाव होता है। किन्तु सदाचार का मूल ‘अहिंसा’ जो हमारी भारतीय संस्कृति का सुदृढ़ आधार था, हम विस्मृत कर बैठे। हम इतने सुविधाभोगी हो गए कि अहिंसा का विचार भी हमें अव्यवहारिक और अति समान प्रतीत होता है, जबकि शिष्टाचार के प्रति चाहने मात्र को आकर्षण बना रहता है। इसलिए हमें लगता है कि अगर पश्चिम से शिष्टाचार के गुर सीख लिए तो भयो भयो।

अहिंसा गंगोत्री है, सदाचरण और नैतिक आचरण की। उसके प्रबल प्रवाह से घबराकर हमने उसे मुख पर ही बांध दिया है, फिर भी उससे निकलती सदाचार की स्वच्छ धाराएँ है किन्तु उसे भी हमने गंदला कर दिया है। उन्ही धाराओं से अंश रूप भरा शिष्टाचार रूपी छोटी बोतल का पानी हमें सुहाने लगा है।

श्रेष्ठ संस्कृति पर मात्र गर्व लेने से कुछ नहीं होगा। जो गर्विला खजाना था वह तो कबका गर्त में गढ़ चुका है। पुनः श्रम कर खोद निकालना होगा, व्यर्थ धूल कचरा झाड़ना होगा। और दृढ मनोबल से उसे चलन में लाना होगा। कठिनाईयां तो असंख्य आएगी, पहले पहल तो शायद कीमत भी पूरी न मिले। लेकिन अन्ततः सतत उपयोग से आचार-स्मृद्धि आएगी ही। तब उस श्रेष्ठ आचार समृद्धि पर अवश्य गर्व लिया जा सकता है।

हम, पोलिश कर चमकाए गए एक दो ओंस के हीरे पर मोहित हो रहे है जबकि हमारे पास हीरे की पूरी खदान मौजूद है, बस हम उसके अस्तित्व और उपादेयता से अनभिज्ञ है। हमें परख ही नहीं है।

अब अहिंसा और नैतिकता से मुंह बिचकाना छोडिये, वह निधि है, वह हमारी जड़ें है। यह कभी भी गुजरे जमाने की बात नहीं हो सकती। उलट अहिंसा तो सभ्यता, विकास, शान्ति और चिरस्थायी सुख का मेरूदंड़ है।

 

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जीवन-मूल्य, सदाचरण

युग चाहे कोई भी हो, सदैव जीवन-मूल्य ही इन्सान को सभ्य सुसंस्कृत बनाते है।  जीवन मूल्य ही हमें प्राणी से इन्सान बनाते है। जीवन मूल्य ही हमें शान्ति और संतुष्टि से जीवन जीने का आधार प्रदान करते है। किन्तु हमारे बरसों के जमे जमाए उटपटांग आचार विचार के कारण जीवन में सार्थक जीवन मूल्यो को स्थापित करना अत्यंत कष्टकर होता है।
हम इतने सहज व सुविधाभोगी होते है कि सदाचार अपनानें हमें कठिन ही नहीं दुष्कर प्रतीत होते है। तब हम घोषणा ही कर देते है कि साधारण से जीवन में ऐसे सत्कर्मों को अपनाना असम्भव है। फिर शुरू हो जाते है हमारे बहाने …
‘आज के कलयुग में भला यह सम्भव है?’ या ‘तब तो फिर जीना ही छोड दें’। ‘आज कौन है जो यह सब निभा सकता है?’, इन सदाचार को अंगीकार कर कोई जिन्दा ही नहीं रह सकता।
कोई सदाचारी मिल भी जाय तो हमारे मन में संशय उत्पन्न होता है। यदि उस संशय का समाधान हो जाय तब भी उसे संदिग्ध साबित करने का हमारा प्रयास प्रबल हो जाता है। हम अपनी बुराईयों को सदैव ढककर ही रखना चाहते है। जो थोड़ी सी अच्छाईयां हो तो उसे तिल का ताड़ बनाकर प्रस्तुत करते है। किसी अन्य में हमें हमसे अधिक अच्छाईयां दिखाई दे तो बर्दास्त नहीं होती और हम उसे झूठा करार दे देते है।
बुराईयां ढलान का मार्ग होती है जबकि अच्छाईयां चढाई का कठिन मार्ग। इसलिए बुराई की तरफ ढल जाना सहज सरल आसान होता है जबकि अच्छाई की तरफ बढना अति कठिन श्रमयुक्त पुरूषार्थ।
मुश्किल यह है कि अच्छा कहलाने का श्रेय सभी लेना चाहते है पर जब कठिन श्रम की बात आती है तो हम शोर्ट-कट ढूँढते है। किन्तुसदाचार और गुणवर्धन के श्रम का कोई शोर्ट-कट विकल्प नहीं होता। यही वह कारण हैं जब हमारे सम्मुख सद्विचार आते है तो अतिशय लुभावने प्रतीत होने पर भी तत्काल मुंह से निकल पडता है ‘इस पर चलना बड़ा कठिन है’।
यह हमारे सुविधाभोगी मानस की ही प्रतिक्रिया होती है। हम कठिन प्रक्रिया से गुजरना ही नहीं चाहते। जबकि मानव में आत्मविश्वास और मनोबल  की अनंत शक्तियां विद्यमान होती है। प्रमादवश वह उनका उपयोग नहीं करता। जबकि जरूरत मात्र जीवन-मूल्यों को स्वीकार करने के लिए इस मन को जगाने भर की होती है। मनोबल यदि एकबार जग गया तो कैसे भी दुष्कर गुण हो अंगीकार करना सरल ही नहीं मजेदार भी बनता चला जाता है। सारी कठिनाईयां परिवर्तित होकर हमारी ज्वलंत इच्छाओं में तब्दिल हो जाती है। यह मनेच्छा उत्तरोत्तर उँचाई सर करने की मानसिक उर्ज़ा देती रहती है।

जैसे एड्वेन्चर का रोमांच हमें दुर्गम रास्ते और शिखर सर करवा देता है। यदि यही तीव्रेच्छा सद्गुण अंगीकार करने में प्रयुक्त की जाय तो जीवन को मूल्यवान बनाना कोई असम्भव भी नहीं। मैं तो मानता हूँ, आप क्या कहते है?

 
8 टिप्पणियां

Posted by on 12/06/2011 में बिना श्रेणी

 

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मैं, ज्ञानदत्त पाण्डेय गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश (भारत) में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर रेलवे अफसर।

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