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Tag Archives: व्यक्तित्व विकास

लोभ

व्यक्तित्व के शत्रु शृंखला के पिछ्ले आलेखों में हमने पढा क्रोध, मान और माया अब प्रस्तुत है अंतिम चौथा शत्रु- “लोभ”

मोह वश दृव्यादि पर मूर्च्छा, ममत्व एवं तृष्णा अर्थात् असंतोष रूप मन के परिणाम को ‘लोभ’ कहते है. लालच, प्रलोभन, तृष्णा, लालसा, असंयम के साथ ही अनियंत्रित एषणा, अभिलाषा, कामना, इच्छा आदि लोभ के ही स्वरूप है. परिग्रह, संग्रहवृत्ति, अदम्य आकांक्षा, कर्पणता, प्रतिस्पर्धा, प्रमाद आदि लोभ के ही भाव है. धन-दृव्य व भौतिक पदार्थों सहित, कामनाओं की प्रप्ति के लिए असंतुष्‍ट रहना लोभवृत्ति है। ‘लोभ’ की दुर्भावना से मनुष्‍य में हमेशा और अधिक पाने की चाहत बनी रहती है।

लोभ वश उनके जीवन के समस्‍त, कार्य, समय, प्रयास, चिन्‍तन, शक्ति और संघर्ष केवल स्‍वयं के हित साधने में ही लगे रहते है. इस तरह लोभ, स्वार्थ को महाबली बना देता है.

आईए देखते है महापुरूषों के सद्वचनों में लोभ का स्वरूप……….

“लोभो व्यसन-मंदिरम्.” (योग-सार) – लोभ अनिष्ट प्रवृतियों का मूल स्थान है.
“लोभ मूलानि पापानि.” (उपदेश माला) – लोभ पाप का मूल है.
“अध्यात्मविदो मूर्च्छाम् परिग्रह वर्णयन्ति निश्चयतः .” (प्रशम-रति) मूर्च्छा भाव (लोभ वृति) ही निश्चय में परिग्रह है ऐसा अध्यात्मविद् कहते है.
“त्याग यह नहीं कि मोटे और खुरदरे वस्त्र पहन लिए जायें और सूखी रोटी खायी जाये, त्याग तो यह है कि अपनी इच्छा अभिलाषा और तृष्णा को जीता जाये।“ – सुफियान सौरी
“अभिलाषा सब दुखों का मूल है।“बुद्ध
“विचित्र बात है कि सुख की अभिलाषा मेरे दुःख का एक अंश है।“ खलील जिब्रान
“जरा रूप को, आशा धैर्य को, मृत्यु प्राण को, क्रोध श्री को, काम लज्जा को हरता है पर अभिमान सब को हरता है।” – विदुर नीति
“क्रोध को क्षमा से, विरोध को अनुरोध से, घृणा को दया से, द्वेष को प्रेम से और हिंसा को अहिंसा की भावना से जीतो।”  – दयानंद सरस्वती

लोभ धैर्य को खा जाता है और व्यक्ति का आगत विपत्तियों पर ध्यान नहीं जाता. यह ईमान का शत्रु है और व्यक्ति को नैतिक बने रहने नहीं देता. लोभ सभी दुष्कर्मों का आश्रय है. यह मनुष्य को सारे बुरे कार्यों में प्रवृत रखता है.

लोभ को अकिंचन भाव अर्थात् अनासक्त भाव से ही जीता जा सकता है.

लोभ को शांत करने का एक मात्र उपाय है “संतोष”

दृष्टांत :  आधा किलो आटा
मधुबिंदु
आसक्ति की मृगतृष्णा

दृष्टव्य :  जिजीविषा और विजिगीषा

निष्फल है बेकार है
शृंगार करो ना !!

“क्षांति से क्रोध को जीतें, मृदुता से अभिमान को जीतें, सरलता से माया को जीतें और संतोष से लोभ को जीतें।” (दशवैकालिक)

चरित्र (व्यक्तित्व) के कषाय रूप चार शत्रुओं (क्रोध,मान,माया,लोभ) की शृंखला सम्पन्न

 

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माया

पिछ्ले आलेखों में पढा “क्रोध” और “मान” पर, अब प्रस्तुत है- “माया“-

मोह वश मन, वचन, काया की कुटिलता द्वारा प्रवंचना अर्थात् कपट, धूर्तता, धोखा व ठगी रूप मन के परिणामों को माया कहते है. माया व्यक्ति का वह प्रस्तुतिकरण है जिसमें व्यक्ति तथ्यों को छद्म प्रकार से रखता है. कुटिलता, प्रवंचना, चालाकी, चापलूसी, वक्रता, छल कपट आदि माया के ही रूप है. साधारण बोलचाल में हम इसे बे-ईमानी कहते है. अपने विचार अपनी वाणी अपने वर्तन के प्रति ईमानदार न रहना माया है. माया का अर्थ प्रचलित धन सम्पत्ति नहीं है, धन सम्पत्ति को यह उपमा धन में माने जाते छद्म, झूठे सुख के कारण मिली है.

माया वश व्यक्ति सत्य का भी प्रस्तुतिकरण इस प्रकार करता है जिससे उसका स्वार्थ सिद्ध हो. माया ऐसा कपट है जो सर्वप्रथम ईमान अथवा निष्ठा को काट देता है. मायावी व्यक्ति कितना भी सत्य समर्थक रहे या सत्य ही प्रस्तुत करे अंततः अविश्वसनीय ही रहता है. तथ्यों को तोडना मरोडना, झासा देकर विश्वसनीय निरूपित करना, कपट है. वह भी माया है जिसमें लाभ दर्शा कर दूसरों के लिए हानी का मार्ग प्रशस्त किया जाता है. दूसरों को भरोसे में रखकर जिम्मेदारी से मुख मोडना भी माया है. हमारे व्यक्तित्व की नैतिक निष्ठा को समाप्त प्रायः करने वाला दुर्गुण ‘माया’ ही है..
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आईए देखते है महापुरूषों के कथनो में माया का यथार्थ……….
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“माया दुर्गति-कारणम्” – (विवेकविलास) – माया दुर्गति का कारण है..
“मायाशिखी प्रचूरदोषकरः क्षणेन्.” – (सुभाषित रत्न संदोह) – माया ऐसी शिखा है को क्षण मात्र में अनेक पाप उत्पन्न कर देती है..
“मायावशेन मनुजो जन-निंदनीयः.” – (सुभाषित रत्न संदोह) -कपटवश मनुष्य जन जन में निंदनीय बनता है..
“यदि तुम मुक्ति चाहते हो तो विषयों को विष के समान समझ कर त्याग दो और क्षमा, ऋजुता (सरलता), दया और पवित्रता इनको अमृत की तरह पी जाओ।” चाणक्यनीति – अध्याय 9
“आदर्श, अनुशासन, मर्यादा, परिश्रम, ईमानदारी तथा उच्च मानवीय मूल्यों के बिना किसी का जीवन महान नहीं बन सकता है।” स्वामी विवेकानंद.
“बुद्धिमत्ता की पुस्तक में ईमानदारी पहला अध्याय है।” थॉमस जैफर्सन
“कोई व्यक्ति सच्चाई, ईमानदारी तथा लोक-हितकारिता के राजपथ पर दृढ़तापूर्वक रहे तो उसे कोई भी बुराई क्षति नहीं पहुंचा सकती।”हरिभाऊ उपाध्याय
“ईमानदारी, खरा आदमी, भलेमानस-यह तीन उपाधि यदि आपको अपने अन्तस्तल से मिलती है तो समझ लीजिए कि आपने जीवन फल प्राप्त कर लिया, स्वर्ग का राज्य अपनी मुट्ठी में ले लिया।” – अज्ञात
“सच्चाई, ईमानदारी, सज्जनता और सौजन्य जैसे गुणों के बिना कोई मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं हो सकता।” – अज्ञात
“अपने सकारात्मक विचारों को ईमानदारी और बिना थके हुए कार्यों में लगाए और आपको सफलता के लिए प्रयास नहीं करना पड़ेगा, अपितु अपरिमित सफलता आपके कदमों में होंगी।” – अज्ञात
“बुद्धि के साथ सरलता, नम्रता तथा विनय के योग से ही सच्चा चरित्र बनता है।” – अज्ञात
“मनुष्य की प्रतिष्ठा ईमानदारी पर ही निर्भर है।” – अज्ञात

वक्रता प्रेम और विश्वास की घातक है. कपट, बे-ईमानी, अर्थात् माया, शील और चरित्र (व्यक्तित्व) का नाश कर देती है. माया करके हमें प्रतीत होता है कि हमने बौद्धिक चातुर्य का प्रदर्शन कर लिया. सौ में से नब्बे बार व्यक्ति मात्र समझदार दिखने के लिए, बेमतलब मायाचार करता है. किंतु इस चातुर्य के खेल में हमारा व्यक्तित्व संदिग्ध बन जाता है. माया एक तरह से बुद्धि को लगा कुटिलता का नशा है.

कपट, अविद्या (अज्ञान) का जनक है. और अपयश का घर. माया हृदय में गडा हुआ वह शल्य है जो निष्ठावान बनने नहीं देता.

माया को आर्जव अर्थात् ऋजुता (सरल भाव) से जीता जा सकता है.

माया को शांत करने का एक मात्र उपाय है ‘सरलता’

दृष्टांत :   मायवी ज्ञान
             सच का भ्रम

दृष्टव्य : नीर क्षीर विवेक
            जीवन का लक्ष्य  

            दृष्टिकोण समन्वय
 

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मान

पिछले अध्याय में आपने व्यक्तित्व के शत्रुओं मे से प्रथम शत्रु क्रोध पर पढा. प्रस्तुत है दूसरा शत्रु “मान“……

मोह वश रिद्धि, सिद्धि, समृद्धि, सुख और जाति आदि पर अहम् बुद्धि रूप मन के परिणाम को “मान” कहते है. मद, अहंकार, घमण्ड, गारव, दर्प, ईगो और ममत्व(मैं) आदि ‘मान’ के ही स्वरूप है. कुल, जाति, बल, रूप, तप, ज्ञान, विद्या, कौशल, लाभ, और ऐश्वर्य पर व्यक्ति ‘मान’ (मद) करता है.

मान वश मनुष्य स्वयं को बडा व दूसरे को तुच्छ समझता है. अहंकार के कारण व्यक्ति दूसरों के गुणों को सहन नहीं करता और उनकी अवहेलना करता है. घमण्ड से ही ‘मैं’ पर घनघोर आसक्ति पैदा होती है. यही दर्प, ईर्ष्या का उत्पादक है. गारव के गुरुतर बोझ से भारी मन, अपने मान की रक्षा के लिए गिर जाता है. प्रशंसा, अभिमान के लिए ताजा चारा है. जहां कहीं भी व्यक्ति का अहंकार सहलाया जाता है गिरकर उसी व्यक्ति की गुलामी को विवश हो जाता है. अभिमान स्वाभिमान को भी टिकने नहीं देता. अहंकार वृति से यश पाने की चाह, मृगतृष्णा ही साबित होती है. दूसरे की लाईन छोटी करने का मत्सर भाव इसी से पैदा होता है.

आईए देखते है महापुरूषों के कथनों में मान (अहंकार) का स्वरूप….

“अहंकारो हि लोकानाम् नाशाय न वृद्ध्ये.”   (तत्वामृत) – अहंकार से केवल लोगों का विनाश होता है, विकास नहीं होता.
“अभिमांकृतं कर्म नैतत् फल्वदुक्यते.”   (महाभारत पर्व-12) – अहंकार युक्त किया गया कार्य कभी शुभ फलद्रुप नहीं हो सकता.
“मा करू धन जन यौवन गर्वम्”.  (शंकराचार्य) – धन-सम्पत्ति, स्वजन और यौवन का गर्व मत करो. क्योंकि यह सब पुण्य प्रताप से ही प्राप्त होता है और पुण्य समाप्त होते ही खत्म हो जाता है.
“लुप्यते मानतः पुंसां विवेकामललोचनाम्.”  (शुभचंद्राचार्य) –  अहंकार से मनुष्य के विवेक रूप निर्मल नेत्र नष्ट हो जाते है.
“चरित्र एक वृक्ष है और मान एक छाया। हम हमेशा छाया की सोचते हैं; लेकिन असलियत तो वृक्ष ही है।”    अब्राहम लिंकन
“बुराई नौका में छिद्र के समान है। वह छोटी हो या बड़ी, एक दिन नौका को डूबो देती है।”    -कालिदास
“समस्त महान ग़लतियों की तह में अभिमान ही होता है।”    -रस्किन
“जिसे होश है वह कभी घमंड नहीं करता।”    –शेख सादी
“जिसे खुद का अभिमान नहीं, रूप का अभिमान नहीं, लाभ का अभिमान नहीं, ज्ञान का अभिमान नहीं, जो सर्व प्रकार के अभिमान को छोड़ चुका है, वही संत है।”    –महावीर स्वामी
“जिस त्‍याग से अभिमान उत्‍पन्‍न होता है, वह त्‍याग नहीं, त्‍याग से शांति मिलनी चाहिए, अंतत: अभिमान का त्‍याग ही सच्‍चा त्‍याग है।”    –विनोबा भावे
“ज्यों-ज्यों अभिमान कम होता है, कीर्ति बढ़ती है।”   –यंग
“अभिमान करना अज्ञानी का लक्षण है।”    (सूत्रकृतांग)
“जिनकी विद्या विवाद के लिए, धन अभिमान के लिए, बुद्धि का प्रकर्ष ठगने के लिए तथा उन्नति संसार के तिरस्कार के लिए है, उनके लिए प्रकाश भी निश्चय ही अंधकार है।”    –क्षेमेन्द्र

विचित्रता तो यह है कि अभिमान से मनुष्य ऊँचा बनना चाहता है किंतु परिणाम सदैव नीचा बनने का आता है. निज बुद्धि का अभिमान ही, शास्त्रों की, सन्तों की बातों को अन्त: करण में टिकने नहीं देता. ‘मान’ भी विवेक को भगा देता है और व्यक्ति को शील सदाचार से गिरा देता है. अभिमान से अंधा बना व्यक्ति अपने अभिमान को बनाए रखने के लिए दूसरों का अपमान पर अपमान किए जाता है और उसे कुछ भी गलत करने का भान नहीं रहता. यह भूल जाता है कि प्रतिपक्ष भी अपने मान को बचाने में पूर्ण संघर्ष करेगा. आत्मचिंतन के अभाव में मान को जानना तो दूर पहचाना तक नहीं जाता. वह कभी स्वाभिमान की ओट में तो कभी बुद्धिमत्ता की ओट में छुप जाता है. मान सभी विकारों में सबसे अधिक प्रभावशाली व दुर्जेय है.

मान को मार्दव अर्थात् मृदुता व कोमल वृति से जीता जा सकता है.

अहंकार को शांत करने का एक मात्र उपाय है ‘विनम्रता’.

दृष्टांत:   दर्पोदय
             अहम् सहलाना
दृष्टव्य:  मन का स्वस्थ पोषण
             विनम्रता
             नम्रता
             दुर्गम पथ सदाचार
             मुक्तक

 

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क्रोध

पिछ्ली पोस्ट में हमने पढा ‘व्यक्तित्व के शत्रु’ चार कषाय है यथा- “क्रोध, मान, माया, लोभ”. अब समझने का प्रयास करते है प्रथम शत्रु “क्रोध” को……

‘मोह’ वश उत्पन्न, मन के आवेशमय परिणाम को ‘क्रोध’ कहते है. क्रोध मानव मन का अनुबंध युक्त स्वभाविक भाव है. मनोज्ञ प्रतिकूलता ही क्रोध का कारण बनती है. अतृप्त इच्छाएँ क्रोध के लिए अनुकूल वातावरण का सर्जन करती है. क्रोधवश मनुष्य किसी की भी बात सहन नहीं करता. प्रतिशोध के बाद ही शांत होने का अभिनय करता है किंतु दुखद यह कि यह चक्र किसी सुख पर समाप्त नहीं होता.

क्रोध कृत्य अकृत्य के विवेक को हर लेता है और तत्काल उसका प्रतिपक्षी अविवेक आकर मनुष्य को अकार्य में प्रवृत कर देता है. कोई कितना भी विवेकशील और सदैव स्वयं को संतुलित व्यक्त करने वाला हो, क्रोध के जरा से आगमन के साथ ही विवेक साथ छोड देता है और व्यक्ति असंतुलित हो जाता हैं। क्रोध सर्वप्रथम अपने स्वामी को जलाता है और बाद में दूसरे को. यह केवल भ्रम है कि क्रोध बहादुरी प्रकट करने में समर्थ है, अन्याय के विरूद्ध दृढ रहने के लिए लेश मात्र भी क्रोध की आवश्यकता नहीं है. क्रोध के मूल में मात्र दूसरों के अहित का भाव है, और यह भाव अपने ही हृदय को प्रतिशोध से संचित कर बोझा भरे रखने के समान है. उत्कृष्ट चरित्र की चाह रखने वालों के लिए क्रोध पूर्णतः त्याज्य है.

आईए देखते है महापुरूषों के कथनो में ‘क्रोध’ का यथार्थ………

“क्रोधो हि शत्रुः प्रथमो नराणाम” (माघ कवि) – मनुष्य का प्रथम शत्रु क्रोध है.
“वैरानुषंगजनकः क्रोध” (प्रशम रति) – क्रोध वैर परम्परा उत्पन्न करने वाला है.
“क्रोधः शमसुखर्गला” (योग शास्त्र) –क्रोध सुख शांति में बाधक है.
“अपकारिणि चेत कोपः कोपे कोपः कथं न ते” (पाराशर संहिता) – हमारा अपकार करनेवाले पर क्रोध उत्पन्न होता है फिर हमारा अपकार करने वाले इस क्रोध पर क्रोध क्यों नहीं आता?
“क्रोध और असहिष्णुता सही समझ के दुश्मन हैं.”महात्मा गाँधी
“क्रोध एक तरह का पागलपन है.”होरेस
“क्रोध मूर्खों के ह्रदय में ही बसता है.”अल्बर्ट आइन्स्टाइन
“क्रोध वह तेज़ाब है जो किसी भी चीज जिसपर वह डाला जाये ,से ज्यादा उस पात्र को अधिक हानि पहुंचा सकता है जिसमे वह रखा है.”मार्क ट्वेन
“क्रोध को पाले रखना गर्म कोयले को किसी और पर फेंकने की नीयत से पकडे रहने के सामान है; इसमें आप ही जलते हैं.”महात्‍मा बुद्ध
“मूर्ख मनुष्य क्रोध को जोर-शोर से प्रकट करता है, किंतु बुद्धिमान शांति से उसे वश में करता है।”बाइबिल
“जब क्रोध आए तो उसके परिणाम पर विचार करो।”कन्फ्यूशियस
“जो मनुष्य क्रोधी पर क्रोध नहीं करता और क्षमा करता है वह अपनी और क्रोध करनेवाले की महासंकट से रक्षा करता है।”वेदव्यास
“क्रोध में मनुष्य अपने मन की बात नहीं कहता, वह केवल दूसरों का दिल दुखाना चाहता है।”प्रेमचंद
“जिस तरह उबलते हुए पानी में हम अपना, प्रतिबिम्‍ब नहीं देख सकते उसी तरह क्रोध की अवस्‍था में यह नहीं समझ पाते कि हमारी भलाई किस बात में है।” महात्‍मा बुद्ध

क्रोध को आश्रय देना, प्रतिशोध लेने की इच्छा रखना अनेक कष्टों का आधार है. जो व्यक्ति इस बुराई को पालते रहते है वे जीवन के सुख और आनंद से वंचित रह जाते है. वे दूसरों के साथ मेल-जोल, प्रेम-प्रतिष्ठा एवं आत्म-संतोष से कोसों दूर रह जाते है. परिणाम स्वरूप वे अनिष्ट संघर्षों और तनावों के आरोह अवरोह में ही जीवन का आनंद मानने लगते है. उसी को कर्म और उसी को पुरूषार्थ मानने के भ्रम में जीवन बिता देते है.

क्रोध को शांति व क्षमा से ही जीता जा सकता है. क्षमा मात्र प्रतिपक्षी के लिए ही नहीं है, स्वयं के हृदय को तनावों और दुर्भावों से क्षमा करके मुक्त करना है. बातों को तुल देने से बचाने के लिए उन बातों को भूला देना खुद पर क्षमा है. आवेश की पद्चाप सुनाई देते ही, क्रोध प्रेरक विचार को क्षमा कर देना, शांति का उपाय है. सम्भावित समस्याओं और कलह के विस्तार को रोकने का उद्यम भी क्षमा है. किसी के दुर्वचन कहने पर क्रोध न करना क्षमा कहलाता है। हमारे भीतर अगर करुणा और क्षमा का झरना निरंतर बहता रहे तो क्रोध की चिंगारी उठते ही शीतलता से शांत हो जाएगी. क्षमाशील भाव को दृढ बनाए बिना अक्रोध की अवस्था पाना दुष्कर है.

क्रोध को शांत करने का एक मात्र उपाय क्षमा ही है.

दृष्टांत : समता
दृष्टव्य : क्रोध
            “क्रोध पर नियंत्रण” 
            क्रोध गठरिया 
            जिजीविषा और विजिगीषा
अगली कडी…… “मान” (अहंकार) 

 

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क्रोध, मान, माया, लोभ…….

पिछली पोस्ट “चार शत्रुओं की पहचान !!” पर आप सभी के शानदार अभिमत मिले. सभी विद्वान मित्रों ने हमारे व्यक्तित्व के शत्रुओं की लगभग यथार्थ पहचान की.

व्यक्तित्व के वह चार शत्रु, मन के चार कषाय भाव है. यथा- क्रोध, मान (मद, अहंकार), माया (छद्म व्यवहार कपट), लोभ (लालच तृष्णा)

काम वस्तुत: उसके विकृत स्वरूप में ही दूषण है. यह अपने सामान्य स्वरूप में विकार नहीं है. एक ब्रह्मचारी के लिए तो काम हर दशा में अनादेय है वहीं, जो एक साथी से वचन बद्ध है या व्रतधारी है, उनके लिए मर्यादित स्वरूप में स्वीकार्य है. वैसे भी काम के प्रति जनसामान्य में सहानुभूति है 🙂 मात्र विकृत स्वरूप से ही वितृष्णा है. अतः इसे सर्वसामान्य कथन के रूप में, व्यक्तित्व का शत्रु नहीं माना जा सकता. तथापि कामविकार को तृष्णा अर्थात लोभ में परिगणित तो माना जाता ही है.

प्रत्येक आत्म के साथ मोह का प्रगाढ बंधन होता है. और ये चार कषाय, मोह से ही सक्रीय होते है. मोह के दो स्वरूप है राग और द्वेष. मोह से ही मन के अनुकूल स्थिति ‘राग’ है और मोह से ही मन के प्रतिकूल स्थिति ‘द्वेष’ है. इन चार कषायों में दो ‘राग’ प्रेरित है और दो ‘द्वेष’ प्रेरित. माया और लोभ राग प्रेरित है तो क्रोध व मान द्वेष प्रेरित. ‘मोह’ से इतना स्रोत सम्बंध होने के उपरांत भी ‘मोह’ इन शत्रुओं का पोषक तो है किंतु सीधा दूषण नहीं है. इसलिए व्यक्तित्व के शत्रुओं के रूप में क्रोध, अहंकार, कपट और लोभ को चिन्हित किया जा सकता है.

निसंदेह अहंकार इन चारों में अधिक प्रभावशाली और दुर्जेय है. किंतु यदि मात्र अहंकार को लक्ष कर, उसे ही साधा जाय और शेष तीनो को खुला छोड दिया जाय तो वे अहंकार को सधने नहीं देते. वस्तुतः यह चारों कषाय एक दूसरे पर निर्भर और एक दूसरे के सहयोगी होने के बाद भी अपने आप में स्वतंत्र दूषण है. इसलिए चारों पर समरूप नियंत्रण आवश्यक है. एक को प्रधानता और दूसरे के प्रति जरा सी लापरवाही, उस एक को साधने के लक्ष्य को सिद्ध होने नहीं देती. कह सकते है यह शत्रुओं का घेरा है, जिस शत्रु को कमजोर समझा जाएगा वह निश्चित ही पिछे से वार करेगा. 🙂 चारों के साथ, समरूप संघर्ष आवश्यक है.

अब बात ईर्ष्या और आलस की तो ईर्ष्या ‘अहंकार’ का ही प्यादा है और आलस ‘लोभ’ का प्यादा. यह दोनो भी, उन चार प्रमुख शत्रुओं के अधीनस्त ही है.

यदि हम गौर से देखेंगे तो स्पष्ट हो जाएगा कि क्रोध, घमण्ड, अविश्वसनीयता, और प्रलोभन हमारे व्यक्तित्व को असरदार बनने नहीं देते. और इन चारों के अधीस्त जो भी दूषण आते है वे भी सभी मिलकर हमें नैतिकता के प्रति टिकने नहीं देते.

ये सभी दूषण, कम या ज्यादा सभी में होते है किंतु इनकी बहुत ही मामूली सी उपस्थिति भी विकारों को प्रोत्साहित करने में समर्थ होती है. इसलिए इनको एक्ट में न आने देना, इन्हे निरंतर निस्क्रीय करते रहना या नियंत्रण स्थापित करना ही व्यक्तित्व के लिए लाभदायक है. यदि हमें अपनी नैतिक प्रतिबद्धता का विकास करना है तो हमें इन कषायों पर विजय हासिल करनी ही पडेगी. इन शत्रुओं से शांति समझौता करना (थोडा बहुत चलाना) निदान नहीं है. इन्हें बलहीन करना ही उपाय है. इनका दमन करना ही एकमात्र समाधान है.

अब आप इन चारों के अधीनस्त दुर्गुणों को उजागर करेंगे तो पोस्ट समृद्ध हो जाएगी….

आप ऐसा कोई संस्कार, सदाचार या नैतिक आचरण बताईए जो इन चारों कषायों को शिथिल किए बिना प्राप्त किया जा सकता है?

इस श्रेणी में अगली पोस्ट ‘क्रोध’ ‘मान’ ‘माया’ ‘लोभ’ प्रत्येक पर स्वतंत्र पोस्ट प्रस्तुत करने का प्रयास होगा.

इस शृंखला मे देखें क्रमशः
1-‘क्रोध’
2-‘मान’
3-‘माया’
4-‘लोभ’

 

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चार शत्रुओं की पहचान !!

नमस्कार!! 

आज चर्चा छेडने का भाव है, व्यक्तित्व विकास के विषय पर.  मुझे प्रतीत होता है हमारे व्यक्तित्व के चार बडे शत्रु है जो हमारे व्यक्तित्व, हमारे चरित्र को सर्वप्रिय बनने नहीं देते. 

मैंने थोडा सा चिंतन किया तो बडा आश्चर्य हुआ कि- विज्ञान – मनोविज्ञान भी इन्हें ही प्रमुख शत्रु मानता है. और गौर किया तो देखा नीति शिक्षा भी इन चारों को अनैतिकता का मूल मानती है. घोर आश्चर्य तो तब हुआ जब दर्शन अध्यात्म भी इन चारों को मानव चरित्र के घोर शत्रु मानता है. और तो और, दंग रह गया जब देखा कि धर्म भी इन चारो को ही पाप प्रेरक कहता रहा.

आगे देखा तो पाया कि छोटे बडे सारे अवगुण इन चार दूषणों के चाकर है. चारों की अपनी अपनी गैंग है. हरेक के अधीन उसकी कक्षा और श्रेणी अनुसार दुर्विचार, दुष्कृत्य कार्यशील है.

क्या आप अनुमान लगा सकते है कि हमारे व्यक्तित्व के या व्यक्ति के चरित्र के यह चार शत्रु कौन है?

आप अपनी अपनी दृष्टि से चार शत्रुओं को उजागर कीजिए, चिन्हित कीजिए, और फिर आप और हम चर्चा विवेचन करते है और इनकी पहचान सुनिश्चित करते है…….

(चर्चा अच्छी जमी तो यह श्रंखला जारी रखेंगे…)
अगली पोस्ट, व्याख्या- क्रोध, मान, माया. लोभ

 

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गहराना

विचार वेदना की गहराई

॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

दृष्टिकोण

दुनिया और ज़िंदगी के अलग-अलग पहलुओं पर हितेन्द्र अनंत की राय

मल्हार Malhar

पुरातत्व, मुद्राशास्त्र, इतिहास, यात्रा आदि पर Archaeology, Numismatics, History, Travel and so on

मानसिक हलचल

मैं, ज्ञानदत्त पाण्डेय, गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश (भारत) में ग्रामीण जीवन जी रहा हूँ। मुख्य परिचालन प्रबंधक पद से रिटायर रेलवे अफसर। वैसे; ट्रेन के सैलून को छोड़ने के बाद गांव की पगडंडी पर साइकिल से चलने में कठिनाई नहीं हुई। 😊

सुज्ञ

चरित्र विकास

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