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हिंसा-प्रतिहिंसा से संतोषप्रद निर्णायक समाधान असंभव है।

आज जगत में हिंसा और प्रतिहिंसा का बोलबाला है। इसका प्रमुख कारण है लोगों में अधैर्य, असहनशीलता और आक्रोश की बढ़ती दर। सुखी सम्पन्न बनने की प्रतिस्पर्धा हो या सुरक्षित जीवन यापन का संघर्ष, व्यक्ति प्रतिक्षण तनाव में जीता है। यह तनाव ही उसे आवेश और अधैर्य की ओर ले जाता है। संतुष्ट और सुखी जीवन, अहिंसक जीवन मूल्यों से ही उपार्जित किया जा सकता है। किन्तु व्यक्ति के सहनशीलता और सब्र की सोच तथा भाव परित्यक्त हो चुके होते है। अन्तत: सुख के सरल मार्ग को छोड व्यक्ति अनावश्यक संघर्ष को ही जीवट मान इठलाता है।

अन्याय का जवाब हिंसा से दिया जाना सहज सामान्य प्रवृत्ति है किन्तु निराकरण पूर्णतया निष्फल ही होता है। आवेश आक्रोश से हमारे अपने मित्र तक हमसे सहमत नहीं होते तो फिर जो अन्यायी है, अवरोधक है वे हमारे आवेश, आक्रोश व प्रतिहिंसा से कैसे सुधर सकते है। अधैर्य-असहनशीलता हमेशा आक्रोश को जन्म देती है और आक्रोश हिंसा को, हिंसा प्रतिशोध को, और प्रतिशोध सहित दो तरफा आतंक को, क्योंकि व्यक्ति अपने प्रति हिंसा के भय की प्रतिक्रिया में भी आतंक फैलाता है। प्रतिशोध और आतंक पुनः हिंसा को जन्म देते है। इस प्रकार हिंसा प्रतिहिंसा एक दुश्चक्र की तरह स्थापित हो जाती है।

मानव सहित जीव मात्र का उद्देश्य है सुखी व संतुष्ट बनना। किन्तु उसे पाने का मार्ग हमने उलटा अपना रखा है। यह असफलता पर समाप्त होने वाला मिथ्या मार्ग है, दूसरों का दमन कभी भी सुखी व संतुष्ट बनने का समाधानकारी मार्ग नहीं हो सकता। आक्रोश व प्रति-अन्याय निदान नहीं है। सुखी तो सभी बनना चाहते है लेकिन सभी को संदेह है कि दूसरे उसे सुखी व संतुष्ट नहीं बनने देंगे अतः सभी दूसरों को आतंकित कर अपने सुखों को सुरक्षित करने के मिथ्या प्रयत्न में लगे हुए है। यदि दमन ही करना है तो दूसरों का दमन नहीं अपनी वृतियों दमन करना होगा, अपने क्रोध, अहंकार, कपट, और लोभ का दमन कर क्षमा, नम्रता सरलता और संतोष को अपनाना होगा। समता, सहनशीलता, धैर्य और विवेक को स्थान देना होगा।

हमें अनुभव हो सकता है कि ऐसे जीवन मूल्य कहां सफल होते है, किन्तु सफलता के निहितार्थ तुच्छ से स्वतः उत्कृष्ट हो जाते है। सभी को यही लगता है कि अपनी ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा तो अपने लिए जरूरी साधन है किन्तु दूसरों की ईर्ष्या प्रतिस्पर्धा हमारे सुखों का अतिक्रमण है। सही मार्ग तो यह है कि इस धारणा को बल प्रदान किया जाय कि दूसरे सुखी व संतुष्ट होंगे तो संतुष्ट लोग हमारे सुखों पर कभी अतिक्रमण नहीं करेंगे और सुख सभी के लिए सहज प्राप्य रहेंगे। अन्यथा जरा से सुख को लभ्य बनाने के संघर्ष में अनेक गुना प्रतिस्पर्धा अनेक गुना संघर्ष और उस सुख भोग से भी लम्बा काल संघर्ष में व्यर्थ हो जाएगा। उसके बाद सुख पाया भी (जो कि असम्भव होगा) तो उसमें आनन्द कहाँ शेष बचेगा?

इसलिए इस छोटे से जीवन को अनावश्यक संघर्ष, प्रतिस्पर्धा, उठापटक में अपव्यय होने से बचाना होगा। उसका एक ही तरीका है संतोष में व्याप्त सुख को पहचानना और उसका आस्वादन करना। हिंसा प्रतिहिंसा के दुश्चक्र को समाप्त करना और अहिंसक जीवन मूल्यों को सार्थक सफलता के रूप में पहचानना होगा।

 

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मैं, ज्ञानदत्त पाण्डेय, गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश (भारत) में ग्रामीण जीवन जी रहा हूँ। मुख्य परिचालन प्रबंधक पद से रिटायर रेलवे अफसर। वैसे; ट्रेन के सैलून को छोड़ने के बाद गांव की पगडंडी पर साइकिल से चलने में कठिनाई नहीं हुई। 😊

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