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Tag Archives: पश्चाताप

अन्ततः पश्चाताप

( मेरे पसंदीदा कवि ‘भृंग’ की एक रचना)
  पश्चाताप

जग के जंजाल बीच, कूद पड़ा आंख मींच,
सपनों को सींच सींच, बे-लगाम हो गया।
जोश में तो होश भूल, खुशियों के झूले झूल,
समय के प्रतिकूल, बे-नकाब हो गया।
सुन के रसीली राग, खेलने लगा हूँ फाग,
बात बात में हूँ आग, मैं अलाम हो गया।
इन्द्रियों के वशीभूत, कैसे होऊं फलीभूत,
करमों की करतूत, मैं गुलाम हो गया।
आँख साख झूठी देवे, कान किये हथलेवे,
मुख निरा मुसकावे, कटि वाम हो गया।
सांस फूलने लगा है, डील झूलने लगा है,
बात भूलने लगा है, पांव जाम हो गया।
प्रभु तेरे द्वार पर, खड़ा एक पांव पर,
जैसे तैसे पार कर, तेरे नाम हो गया।
इन्द्रियों के वशीभूत, “भृंग” कैसे फलीभूत,
कैसी करतूत, तन तामजाम हो गया॥

                                               -कवि भंवरलाल ‘भृंग’

 
8 टिप्पणियां

Posted by on 25/04/2011 में बिना श्रेणी

 

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पश्चाताप

(आज प्रस्तुत है मेरे पसंदीदा कवि ‘भृंग’ की एक रचना)
                पश्चाताप
जग के जंजाल बीच, कूद पड़ा आंख मींच,
            सपनों को सींच सींच, बे-लगाम हो गया।

जोश में तो होश भूल, खुशियों के झूले झूल,

            समय के प्रतिकूल, बे-नकाब हो गया।

सुन के रसीली राग, खेलने लगा हूँ फाग,

            बात बात में हूँ आग, मैं अलाम हो गया।

इन्द्रियों के वशीभूत, कैसे होऊं फलीभूत,

            करमों की करतूत, मैं गुलाम हो गया।

आँख साख झूठी देवे, कान किये हथलेवे,

            मुख निरा मुसकावे, कटि वाम हो गया।

सांस फूलने लगा है, डील झूलने लगा है,

            बात भूलने लगा है, पांव जाम हो गया।

प्रभु तेरे द्वार पर, खड़ा एक पांव पर,

            जैसे तैसे पार कर, तेरे नाम हो गया।

इन्द्रियों के वशीभूत, “भृंग” कैसे फलीभूत,

            कैसी करतूत, तन तामजाम हो गया॥

                                               -कवि भंवरलाल ‘भृंग’

 

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सोते सोते ही निकल गई सारी जिन्दगी

हाथोंहाथ तूं दुख खरीद के, सुख सारे ही खोता।
कर्ज़, फ़र्ज और मर्ज़ बहाने, जीवन बोझा ढोता।
ढोते ढोते ही निकल गई सारी जिन्दगी॥
जन्म लेते ही इस धरती पर, तुने रूदन मचाया।
आंख भी तो खुल ना पाई, भूख भूख चिल्लाया॥
खाते खाते ही निकल गई सारी जिन्दगी॥
बचपन खोया खेल कूद में, योवन पा गुर्राया।
धर्म-कर्म का मर्म न जाने, विषय-भोग मन भाया।
भोगों भोगों में निकल गई सारी जिन्दगी॥
शाम पडे रोज रे बंदे, पाप-पंक नहीँ धोता।
चिंता जब असह्य बने तो, चद्दर तान के सोता।
सोते सोते ही निकल गई सारी जिन्दगी॥
धीरे धीरे आया बुढापा, डगमग डोले काया।
सब के सब रोगों ने देखो, डेरा खूब जमाया।
रोगों रोगों में निकल गई सारी जिन्दगी॥
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