RSS

Tag Archives: नास्तिक

नास्तिक के लिए सदाचार निष्प्रयोजन

हमारे में सभी सद्गुण भय से ही स्थापित होते है। पापभीरुता ही हमारे अन्तरमन का अनुशासन है। कोई भी अनुशासन भय केन्दित ही होगा। भय प्रत्येक जीव की प्राकृतिक संज्ञा है। ‘ईश्वर-आस्तिक’ को ईश्वर के नाराज़ होनें का भय रहता है। ‘कर्म-सिद्धान्त-आस्तिक’ को बुरे प्रतिफल मिलने का भय, और नास्तिक को बुरा व्यक्तित्व कहलाने का भय रहता ही है। इसी भय से ही सभी सदाचारी बनना और बने रहना उचित मानते है। आस्तिको को ईश्वर और कर्म-फल का आधार रहता है। उन्हें सदाचार की प्रसंसा और प्रतिफल अगर त्वरित नहीं भी मिलते तो आस्तिक सब्र कर लेता है। और निर्णायक दिन या अगले जन्म का इन्तजार कर लेता है। इसके विपरित भौतिकवादी नास्तिक, सदाचार के प्रतिफल में अनुकूल परिणाम न मिलने पर अधीर होकर सदाचार से पल्ला झाड़ लेता है। अर्थात्, सदाचार पर टिके रहने को उसके पास पर्याप्त आधार नहीं होता। उसी अपेक्षा से यह कथन सटीक है कि “नास्तिकी सदाचार के पैर ही नहीं होते”

सदाचार हमेशा घोर पुरूषार्थ, सहनशीलता और धैर्य मांगता है। प्रतिकूल स्थिति में भी पूर्ण समता भाव चाहिए। कईं बार उपकार का बदला अपकार से भी मिलता है। कईं बार सदाचारी कायर मान लिया जाता है, तो कभी डरपोक भी। अधिकांश मामलों में तो सदाचारी के शत्रुओं की संख्या भी बढ जाती है। कभी अपकीर्ती भी आरोपित कर दी जाती है। इस मार्ग पर चलना तलवार की धार पर चलनें के समान है, और डटे रहना लोहे के चने चबाने जैसा।
कर्म-फल पर विश्वास करता हुआ आस्तिक इस विश्वास के साथ अटल रहता है कि ‘देर-सबेर मुझे अच्छे कर्मों का प्रतिफल अच्छा ही मिलना है’। आज नहीं तो कल, इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में। मै अपने सब्र की डोर न छोडूं। वह इसी आशा पर दृढता से सुकृत निभाता चला जाता है। और इसी आत्मबल के आधार पर सदाचार निभ भी जाते है।

वहीं थोड़ी सी भी प्रतिकूल परिस्थिति आने पर, अधिसंख्य लोगों को स्वार्थ में सफल होते देखकर, नास्तिक के सब्र का बांध टूट जाता है। जब भी बह भलाई का बदला बुराई से मिलता देखता है, उसके भौतिक नियमों में खलबली मच जाती है। वह यह निश्चित कर लेता है कि  सदाचार का बदला सदैव बुरा ही मिलता है। फिर वह ही क्यों अनावश्यक सदाचार निभाकर दुख पीड़ा और प्रतीक्षा मोल ले? धर्मग्रंथों से मिलने वाली उर्ज़ा के अभाव में, ‘नास्तिक-सदाचार’ लम्बी दौड नहीं दौड सकता। आधार रहित ‘नास्तिक-सदाचार’  पैर रहित अर्थात निराधार से होते है। कोई मजबूत मनोबल युक्त नास्तिक दृढ भी रह जाय जो कि सम्भव है, किन्तु यह अपवाद है। और यह ध्रुव सत्य है कि बिना कारण कोई कर्म नहीं होता। पुरूषार्थ के लिए भी हमें पर्याप्त नैतिक बल प्रेरणा चाहिए।

 
5 टिप्पणियां

Posted by on 02/07/2011 में बिना श्रेणी

 

टैग: , , , , ,

नास्तिकता है क्या?

व्यक्तिगत तृष्णाओं से लुब्ध व्यक्ति, समाज से विद्रोह करता है। और तात्कालिक अनुकूलताओं के वशीभूत, स्वेच्छा से स्वछंदता अपनाता है, समूह से स्वतंत्रता पसंद करता है। किन्तु समय के साथ जब समाज में सामुहिक मेल-मिलाप के अवसर आते है, जिसमे धर्मोत्सव मुख्य होते है। तब वही स्वछन्द व्यक्ति उस एकता और समुहिकता का द्वेषी बन जाता है। उसे लगता है, जिस सामुहिक प्रमोद से वह वंचित है, उसका आधार धर्म ही है, वह धर्म से वितृष्णा करता है। वह उसमें निराधार अंधविश्वास ढूंढता है, निर्दोष प्रथाओं को भी कुरितियों में खपाता है और मतभेदों व विवादों के लिये धर्म को जिम्मेदार ठहराता है। नास्तिकता के मुख्यतः यही कारण  होते है।
लक्षण:
स्वयं नास्तिक होते हुए भी आस्तिकों की मूर्खता पर चिंता जताता है।
स्वयं नास्तिक माने जाने के अपराध-बोध में जीता है।लोगों द्वारा प्रताडना के हीनबोध का शिकार रहता है।ईश्वर के अस्तित्व से इन्कार करते हुए भी उससे प्रतिद्वंधता रखता है और ईश्वर को भांडता रहता है। इसी बहाने उसके चिंतन में ईश्वर और धर्म विद्यमान रहता है, इस प्रकार वह अप्रत्यक्ष नास्तित्व में भी अस्तित्व सिद्ध करता रहता है।
कोई भी नास्तिक इस प्रश्न का जवाब नहीं देता—
आप भले ईश्वर को न मानो,धर्म-शास्त्रों से गुण अपनानें में क्या बाधा है?
 
13 टिप्पणियां

Posted by on 20/02/2011 में बिना श्रेणी

 

टैग: , , , ,

नास्तिकता (धर्म- द्वेष) के कारण

व्यक्तिगत तृष्णाओं में लुब्ध व्यक्ति, समाज से विद्रोह करता है। और तात्कालिक अनुकूलताओं के वशीभूत, स्वेच्छा से स्वछंदता अपनाता है, समूह से स्वतंत्रता पसंद करता है। किन्तु समय के साथ जब समाज में सामुहिक मेलमिलाप के अवसर आते है, जिसमे धर्मोत्सव मुख्य होते है। तब वही स्वछन्द व्यक्ति उस एकता और समुहिकता से कुढ़कर द्वेषी बन जाता है। उसे लगता है, जिस सामुहिक प्रमोद से वह वंचित है, उसका आधार स्रोत यह धर्म ही है, वह धर्म से वितृष्णा करता है। वह उसमें निराधार अंधविश्वास ढूंढता है, निर्दोष प्रथाओं को भी कुरितियों में खपाता है और मतभेदों व विवादों के लिये धर्म को जिम्मेदार ठहराता है। ‘नास्तिकता’ के मुख्यतः यही कारण  होते है।

_________________________________________
 

टैग: , ,

 
गहराना

विचार वेदना की गहराई

॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

दृष्टिकोण

दुनिया और ज़िंदगी के अलग-अलग पहलुओं पर हितेन्द्र अनंत की राय

मल्हार Malhar

पुरातत्व, मुद्राशास्त्र, इतिहास, यात्रा आदि पर Archaeology, Numismatics, History, Travel and so on

मानसिक हलचल

मैं, ज्ञानदत्त पाण्डेय, गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश (भारत) में ग्रामीण जीवन जी रहा हूँ। मुख्य परिचालन प्रबंधक पद से रिटायर रेलवे अफसर। वैसे; ट्रेन के सैलून को छोड़ने के बाद गांव की पगडंडी पर साइकिल से चलने में कठिनाई नहीं हुई। 😊

सुज्ञ

चरित्र विकास

WordPress.com

WordPress.com is the best place for your personal blog or business site.

हिंदीज़ेन : HindiZen

जीवन में सफलता, समृद्धि, संतुष्टि और शांति स्थापित करने के मंत्र और ज्ञान-विज्ञान की जानकारी

WordPress.com News

The latest news on WordPress.com and the WordPress community.