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Tag Archives: धर्म

धर्म का स्वरूप

न, सम्पत्ति, सुख-सुविधा और कीर्ती  प्राप्त करनें के बाद भी जीवन में असंतोष की प्यास शेष रह जाती है। कारण कि जीवन में शान्ति नहीं सधती। और आत्म का हित शान्ति में स्थित है। आत्मिक दृष्टि से सदाचरण ही शान्ति का एक मात्र उपाय है।
धर्माचरण अपने शुद्ध रूप में सदाचरण ही है। धर्म की परिभाषा है ‘वत्थुसहावो धम्मो ’ अर्थात् वस्तु का ‘स्वभाव’ ही धर्म है। स्वभाव शब्द में भी बल ‘स्व’ पर है ‘स्व’ के भाव को स्वभाव कहते है। यदि हमारा स्वभाव ही धर्म है तो प्रश्न उठता है, हमारा स्वभाव क्या है? हम निश दिन झूठ बोलते है, कपट करते है, येन केन धन कमाने में ही लगे रहते है अथवा आपस में लड़ते रहते है, क्या यह हमारा स्वभाव है? हम क्रोध करते है, लोभ करते है, हिंसा करते है, क्या यह हमारा स्वभाव है? वास्तव में यह हमारा स्वभाव नहीं है। क्योंकि प्रायः हम सच बोलते है मात्र लोभ या भयवश झूठ बोलते है। यदि हम दिन भर क्रोध करें तो जिंदा नहीं रह सकते। थोडी देर बाद जब क्रोध शान्त हो जाता है, तब हम कहते है कि हम सामान्य हो गए। अतः हमारी सामान्य दशा क्रोध नहीं, शान्त रहना है। क्रोध विभाव दशा है और शान्त रहना स्वभाव दशा है। अशान्ति पैदा करने वाले सभी आवेग-आवेश हमारी विभाव दशा है। शान्तचित सदाचार में रत रहना ही हमारा स्वभाव है। और ‘स्वभाव’ में रहना ही हमारा धर्म है।
धर्म की यह भी परिभाषा है – धारयेति इति धर्मः  अथवा यतस्य धार्यती सः धर्मेणं ”  धारण करने योग्य धर्म है। यह भी स्वभाव अपेक्षा से ही है। सदाचार रूप ‘स्वभाव’ को धारण करना ही धर्म है। इसिलिए यह निर्देश है कि स्वभाव में स्थिर रहो। यही तो धर्म है। और हमारा शाश्वत स्वभाव, सदाचरण ही है। क्योंकि लक्षित शान्ति ही है।
धृति: क्षमा दमो स्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रह: ।   
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम् ।  
– धर्म के यह दस लक्षण स्पष्ठ रूप से सदाचरण के ही स्वभाविक लक्षण है।

 ‘स्व’ भाव अपने आप में आत्मस्वभाव के अर्थ में है। और वह स्वयं में व्यापक अर्थ लिए हुए है।

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3 टिप्पणियां

Posted by on 29/07/2011 में बिना श्रेणी

 

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धर्म पर छद्मावरण

कुछ ने अपने तुच्छ लाभ के लिये तो कुछ ने मोहवश,मात्र धर्म के महिमामंडन के लिये, जाने-अनजाने में कईं कुरितियों का प्रक्षेप कर दिया। पहले तो वे कुरितियां प्रतीक रूप में आई व धीरे धीरे वे रुढ कर्म-कांड बन गई। और धर्म का ही आभास देने लगी। शुद्ध धर्म पर अशुद्ध आवरण बन छा गई और अन्ततः वे धर्म के मूल सिद्धान्तों के विरुद्ध विरोधाभास बनकर प्रकट हुई।
जगत के मानव हितार्थ प्रकाशित सरल सुबोध धर्म को, इन कुरितियों के छद्मावरण ने दुर्बोध दुष्कर बना दिया। और धर्मद्वेषियों को हथियार दे दिया।
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क्या हम कृतघ्न रहना चाह्ते है……

क्यों न गर्व करें, इस देवरमणभूमि पर जिस के  कण कण में अहिंसा व्याप्त है,जहां आकर हिंसाप्रधान संस्कृतियाँ भी स्वयं में दया,करूणा व शांति खोज कर उद्धत करने लगती है।जिस पर कितने भी कुसास्कृतिक आक्रमण हुए पर वह अपनी अहिंसा रूपी जडों से पुनः पल्लवित होकर, गुणों को पुनः उपार्जित कर समृद्ध बन जाती है।
क्यों न गर्व करें, इस आर्यभूमि में प्रकटे धर्मों पर,जिनका यहाँ प्रवर्तन हुआ और सहज पल्ल्वित हुए। वे कल भी सुमार्ग दर्शक थे और आज भी अपनी दिव्य उर्जा से सुमार्ग प्रकाशित बन,मानव को इस दुनिया का श्रेष्ठ, सभ्य और सत्कर्मी मनुष्य बनाए हुए है।
क्यों न गर्व करें, उन धर्म-शास्त्रों पर, जिनमें आज भी जगत के सर्वश्रेष्ठ सद्गुण निष्पन्न करने की शाक्ति है। वे आज भी मानव को सभ्य सुसंस्कृत बनाने का सामर्थ्य रखते है। जो प्रकृति के सद्भावपूर्ण उपयोग का मार्गदर्शन करते है,जो मात्र मानव हित ही नहिं बल्कि समस्त जगत की जीवसृष्टि के अनुकूल जीवन-दर्शन को प्रकाशित करते है।
क्यों न गर्व करें, उन सुधारक महापुरूषों पर, जिनकी प्रखर विचारधारा व सत्यपरख नें समय समय धर्म, समाज और संस्कृति में घुस आई विकृतियों को दूर करने के प्रयास किये। कुरितियां दर्शा कर उन्हे दूर कर, हमारे ज्ञान, दर्शन व आचरण को शुद्ध करते रहे।
सत्य धर्म सदैव हमें सद्गुण सुसंस्कार और सभ्य-जीवन की प्रेरणा देते रहे हैं। असंयम (बुराईयों) के प्रति हमारे अंतरमन में अरूचि अरति पैदा करते रहे हैं। आज हम जो भी सभ्य होने का श्रेय ले रहे है, इन्ही सद्विचारों की देन है। धर्म के प्रति मै तो सदैव कृतज्ञ रहुंगा।
दीपावली की शुभकामनाओं से पहले, देश, धर्म, समाज और संस्कारों के प्रति आभार प्रेषित करना मेरा कर्तव्य है।
उतरोत्तर, मनुष्यजन्म, आर्यक्षेत्र और धर्मश्रवण दुर्लभ है, मै तो कृतज्ञ हूँ, आप………?

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नम्रता

भवन्ति नम्रास्तरवः फ़लोदगमैर्नवाम्बुभिर्भूमिविलम्बिनो घना:।
अनुद्धता  सत्पुरुषा: समृद्धिभिः  स्वभाव एवैष परोपकारिणम्॥
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– जैसे फ़ल लगने पर वृक्ष नम्र हो जाते है,जल से भरे मेघ भूमि की ओर झुक जाते है, उसी प्रकार सत्पुरुष  समृद्धि पाकर नम्र हो जाते है, परोपकारियों का स्वभाव ही ऐसा होता है।
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सर्वधर्म समान?

अक्सर मैने देखा कि बुद्धिजीवी लोग धर्म पर चर्चा मात्र से कतराते हैं। कोइ सज्जन तो सोचते है, क्यों पंगा लें, तो कोई इसलिये कि यह सम्वेदनशील मामला है। कुछ लोगों का मत है,क्यों फ़ाल्तू की बहस करना या फ़साद खडा करना। कुछ बन्धु धर्म-चर्चा के नाम पर धर्म-प्रचार में लीन हैं,तो अन्य सज्जन उनके कुप्रचार के खन्डन से ही नहिं उभर पाते। एक मत अधर्मिओं का हैं कि वे धर्म को अफिम मान, स्वयंभू नास्तिकता की ओट लेकर, धर्म की पीठ पर वार करने से नहिं चुकते। तो कुछ छोटी- छोटी टिप्पणियों से ही भडास निकाल लेते है।
धर्म ने आदि काल से हमारे जीवन को प्रभवित किया है,हमारी समाज व्यवस्था को नियन्त्रित किया है,फ़िर क्यों न हम इस पर खुलकर चर्चा करें।
धर्म का शाब्दिक अर्थ है स्वभाव, स्व+भाव,स्वयं का आत्म-स्वभाव, अपनी आत्मा के स्वभाव में स्थिर होना, आत्मा का मूल स्वभाव अच्छा है,अतः अच्छे गुणों में रहना। धर्मों को वस्तुतः मार्ग या दर्शन कहना उचित है। दर्शनों ने मानव के व्यवहार को सुनिश्चित करने एवं समाज व्यवस्था को नियंन्त्रित करने के लिये कुछ नियम बनाए, उसे ही हम धर्म कहते है। यह स्वानुशासन हैं जिसमें स्वयं को संयमित रखकर नियन्त्रित करना होता है।
याद रहे अच्छाई बुराई का फ़र्क और सभ्यता इन्ही दर्शनों (धर्मों) की देन है अन्यथा हम किसी का अहित करके भी न समज़ पाते कि हमने बुरा किया। हमारी शब्दावली में व्याभिचार, बलात्कार, जुठ, चोरी, हिंसा आदि शब्दों के मायने ही न होते।
मानव मात्र को किसी भी अनुशासन में रहना अच्छा नहिं लगता, इसिलिये धर्म की बातों(नियमों) को हम अपने जिवन में अनावश्यक हस्तक्षेप मानते है। और हमारी इस मान्यता को दृढ करते है,वे अधकचरे ज्ञान के पोन्गापन्डित,जो ग्रन्थों से चार बातें पढकर उसका (पूर्वाग्रहयुक्त)मनमाना अर्थ कर भोले श्रद्धालुओं के लिये नियमावली गढते हैं। इन ज्ञानपंगुओं ने सुखकर धर्म को दुष्कर बना दिया हैं। हमारे पास बुद्धि होते हुए भी हमे जडवत रहने को अभिशप्त कर दिया हैं।
सर्वधर्म समान?
क्या कुदरत ने हमें सोचने समजने की शक्ति नहिं दी है? क्यों मानें हम सभी को समान? हमारे पास तर्कबुद्धि हैं,हम परिक्षण करने में सक्षम हैं,निर्णय लेने में समर्थ हैं। फ़िर कैसे बिना परखे कह दें कि सभी धर्म समान है। मानव है, कोई कोल्हू के बैल नहीं। हीरे और कोयले में अन्तर होता है, भले आप हमे मतिभृष्ट करने हेतू कह दें, दोनो ही कार्बन तत्व के बने है,पर हमें दोनों के उपयोग और कीमत की जानकारी हैं।
हां आपका आग्रह इसलिये है,कि धर्मो का मामला है,क्यों फ़साद खडा करना,हमारा दिल विशाल होना चाहिये। तो ठिक है, सर्वधर्म सद्भाव (द्वेषरहित), लेकिन सर्वधर्म सम्भाव या सर्वधर्म समान नहिं।।_______________________________________________________________________

 
 

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मैं, ज्ञानदत्त पाण्डेय, गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश (भारत) में ग्रामीण जीवन जी रहा हूँ। मुख्य परिचालन प्रबंधक पद से रिटायर रेलवे अफसर। वैसे; ट्रेन के सैलून को छोड़ने के बाद गांव की पगडंडी पर साइकिल से चलने में कठिनाई नहीं हुई। 😊

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