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Tag Archives: धर्मनिरपेक्षता

सर्वधर्म समान?

अक्सर मैने देखा कि बुद्धिजीवी लोग धर्म पर चर्चा मात्र से कतराते हैं। कोइ सज्जन तो सोचते है, क्यों पंगा लें, तो कोई इसलिये कि यह सम्वेदनशील मामला है। कुछ लोगों का मत है,क्यों फ़ाल्तू की बहस करना या फ़साद खडा करना। कुछ बन्धु धर्म-चर्चा के नाम पर धर्म-प्रचार में लीन हैं,तो अन्य सज्जन उनके कुप्रचार के खन्डन से ही नहिं उभर पाते। एक मत अधर्मिओं का हैं कि वे धर्म को अफिम मान, स्वयंभू नास्तिकता की ओट लेकर, धर्म की पीठ पर वार करने से नहिं चुकते। तो कुछ छोटी- छोटी टिप्पणियों से ही भडास निकाल लेते है।
धर्म ने आदि काल से हमारे जीवन को प्रभवित किया है,हमारी समाज व्यवस्था को नियन्त्रित किया है,फ़िर क्यों न हम इस पर खुलकर चर्चा करें।
धर्म का शाब्दिक अर्थ है स्वभाव, स्व+भाव,स्वयं का आत्म-स्वभाव, अपनी आत्मा के स्वभाव में स्थिर होना, आत्मा का मूल स्वभाव अच्छा है,अतः अच्छे गुणों में रहना। धर्मों को वस्तुतः मार्ग या दर्शन कहना उचित है। दर्शनों ने मानव के व्यवहार को सुनिश्चित करने एवं समाज व्यवस्था को नियंन्त्रित करने के लिये कुछ नियम बनाए, उसे ही हम धर्म कहते है। यह स्वानुशासन हैं जिसमें स्वयं को संयमित रखकर नियन्त्रित करना होता है।
याद रहे अच्छाई बुराई का फ़र्क और सभ्यता इन्ही दर्शनों (धर्मों) की देन है अन्यथा हम किसी का अहित करके भी न समज़ पाते कि हमने बुरा किया। हमारी शब्दावली में व्याभिचार, बलात्कार, जुठ, चोरी, हिंसा आदि शब्दों के मायने ही न होते।
मानव मात्र को किसी भी अनुशासन में रहना अच्छा नहिं लगता, इसिलिये धर्म की बातों(नियमों) को हम अपने जिवन में अनावश्यक हस्तक्षेप मानते है। और हमारी इस मान्यता को दृढ करते है,वे अधकचरे ज्ञान के पोन्गापन्डित,जो ग्रन्थों से चार बातें पढकर उसका (पूर्वाग्रहयुक्त)मनमाना अर्थ कर भोले श्रद्धालुओं के लिये नियमावली गढते हैं। इन ज्ञानपंगुओं ने सुखकर धर्म को दुष्कर बना दिया हैं। हमारे पास बुद्धि होते हुए भी हमे जडवत रहने को अभिशप्त कर दिया हैं।
सर्वधर्म समान?
क्या कुदरत ने हमें सोचने समजने की शक्ति नहिं दी है? क्यों मानें हम सभी को समान? हमारे पास तर्कबुद्धि हैं,हम परिक्षण करने में सक्षम हैं,निर्णय लेने में समर्थ हैं। फ़िर कैसे बिना परखे कह दें कि सभी धर्म समान है। मानव है, कोई कोल्हू के बैल नहीं। हीरे और कोयले में अन्तर होता है, भले आप हमे मतिभृष्ट करने हेतू कह दें, दोनो ही कार्बन तत्व के बने है,पर हमें दोनों के उपयोग और कीमत की जानकारी हैं।
हां आपका आग्रह इसलिये है,कि धर्मो का मामला है,क्यों फ़साद खडा करना,हमारा दिल विशाल होना चाहिये। तो ठिक है, सर्वधर्म सद्भाव (द्वेषरहित), लेकिन सर्वधर्म सम्भाव या सर्वधर्म समान नहिं।।_______________________________________________________________________

 
 

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