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Tag Archives: दोहे

निष्फल है,निस्सार है॥

ज्ञान के बिना क्रिया।
दर्शन के बिना प्रदर्शन।
श्रद्धा के बिना तर्क।
आचार के बिना प्रचार।
नैतिकता के बिना धार्मिकता।
समता के बिना साधना।
दान के बिना धन।
शील के बिना शृंगार।
अंक के बिना शून्य सम।
निष्फल है,निस्सार है॥
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निर्मल-संदेश

सेवा और समर्पण का कोई दाम नहीं है।
मानव तन होने से कोई इन्सान नहीं है।
नाम प्रतिष्ठा की चाहत छोडो यारों,
बड़बोलो का यहां अब काम नहीं है।
                  ***
बिना काम के यहाँ बस नाम चाहिए।
सेवा के बदले भी यहाँ इनाम चाहिए।
श्रम उठाकर भेजा यहाँ कौन खपाए?
मुफ़्त में ही सभी को दाम चाहिए॥
                  ***
आलोक सूर्य का देखो, पर जलन को मत भूलो।
चन्द्र पूनम का देखो, पर ग्रहण को मत भूलो।
किसी आलोचना पर होता तुम्हे खेद क्योंकर,

दाग सदा उजले पर लगे, इस चलन को मत भूलो॥

                  ***

 
3 टिप्पणियां

Posted by on 13/01/2011 में बिना श्रेणी

 

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सार्थक पुरूषार्थ

जो सोते है उनकी किस्मत भी सोती है
श्रम से ही तो कल्पना साकार होती है
बंद कर बैठे रहे जो सारी खिड़कियां
भरी दोपहर उन घरो में रात होती है
रोशनी मांगने से उधार नहीं मिलती।
बैठे रहने से जीत या हार नहीं मिलती।
असफलताओ से  निराश क्या होना?
पतझड के आए बिन बहार नहीं खिलती।
सपनो में खोना, छूना परछाई होता है।
पुरूषार्थ भरा जीवन ही सच्चाई होता है।
सोते हुओं की नाप लो तुम मात्र लम्बाई,
जगे हुओं का नाप सदैव उँचाई होता है॥

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4 टिप्पणियां

Posted by on 12/01/2011 में बिना श्रेणी

 

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संतोष………

मनुज जोश बेकार है, अगर संग नहिं होश ।
मात्र कोष से लाभ क्या, अगर नहिं संतोष ॥1॥

दाम बिना निर्धन दुःखी, तृष्णावश धनवान ।
कहु न सुख संसार में, सब जग देख्यो छान ॥2॥

धन संचय यदि लक्ष्य है, यश मिलना अति दूर।
यश – कामी को चाहिये, त्याग शक्ति भरपूर ॥3॥
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॥व्यर्थ वाद विवाद॥

विचारधाराओं पर वर्तमान में उपस्थित वाद विवाद को समर्पित दोहांजली।

व्यर्थ वाद विवाद………

बौधिक उलझे तर्क में, कर कर वाद विवाद।
धर्म तत्व जाने नहिं, करे समय बर्बाद॥1॥

सद्भाग्य को स्वश्रम कहे, दुर्भाग्य पर विवाद ।
कर्मफ़ल जाने नहिं, व्यर्थ तर्क सम्वाद ॥2॥

कल तक जो बोते रहे, काट रहे है लोग ।
कर्मों के अनुरूप ही, भुगत रहे हैं भोग ॥3॥

कर्मों के मत पुछ रे, कैसे कैसे योग ।
भ्रांति कि हम भोग रहे, पर हमें भोगते भोग ॥4॥

ज्ञान बिना सब विफ़ल है, तन मन वाणी योग।
ज्ञान सहित आराधना, अक्षय सुख संयोग॥5॥
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13 टिप्पणियां

Posted by on 29/07/2010 में बिना श्रेणी

 

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व्यर्थ वाद विवाद, निर्थक तर्क संवाद॥

(विचारधाराओं पर वर्तमान में उपस्थित वाद विवाद को समर्पित दोहांजली।)

॥व्यर्थ वाद विवाद॥


बौधिक उलझे तर्क में, करकर वाद विवाद।
धर्म तत्व जाने नहीं, करे समय बर्बाद॥1

सद्भाग्य को स्वश्रम कहे, दुर्भाग्य पर विवाद ।
कर्मफ़ल जाने नहिं, व्यर्थ तर्क सम्वाद ॥2

कल तक जो बोते रहे, काट रहे है लोग ।
कर्मों के अनुरूप ही, भुगत रहे हैं भोग ॥3

कर्मों के मत पुछ रे, कैसे कैसे योग ।
भ्रांति कि हम भोग रहे, पर हमें भोगते भोग ॥4

ज्ञान बिना सब विफ़ल है, तन मन वाणी योग।
ज्ञान सहित आराधना, अक्षय सुख संयोग॥5

 
20 टिप्पणियां

Posted by on 29/07/2010 में बिना श्रेणी

 

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॥शृंगार॥

सिर का शृंगार तभी है, जब सत्य समक्ष नतमस्तक हो।
भाल का शृंगार तभी है, जब यश दीन दुखी के मुख हो॥
नयनों का शृंगार तभी है, जब वह करूणा से सज़ल हो।
नाक का शृंगार तभी है, जब वह परोपकार से उत्तंग हो॥
कान का शृंगार तभी है, जब वह आलोचना सुश्रुत हो।
होठो का शृंगार तभी है, हिले तो मधूर वचन प्रकट हो॥
गले का शृंगार तभी है, जब विनय पूर्ण नम जाय।
सीने का शृंगार तभी है, जिसमें आत्मगौरव बस जाय॥
हाथों का शृंगार तभी है, पीडित सहायता में बढ जाए।
हथेली का शृंगार तभी है, मिलन पर प्रेम को पढ जाए॥
कमर का शृंगार तभी है, जब बल मर्यादा से खाए।
पैरों का शृंगार तभी है, तत्क्षण मदद में उठ जाए॥
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6 टिप्पणियां

Posted by on 27/07/2010 में बिना श्रेणी

 

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॥भोग-उपभोग॥

हानि न विष से हो सकी, जब तक किया न पान ।
पर क्रोध के उदय मात्र से,  भ्रष्ट हो गया ज्ञान ॥1॥
सुलग रहा  संसार यह,  जैसे वन की आग ।
फ़िर भी मनुज लगा रहा?, इच्छओं के बाग ॥2॥
साझा-निधि जग मानकर, यथा योग्य ही भोग ।
परिग्रह परिमाण कर,  जीवन एक सुयोग ॥3॥
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2 टिप्पणियां

Posted by on 27/07/2010 में बिना श्रेणी

 

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भोग-उपभोग

हानि न विष से हो सकी, जब तक किया न पान ।

पर क्रोध के उदय मात्र से,  भ्रष्ट हो गया ज्ञान ॥1॥

सुलग रहा  संसार यह,  जैसे वन की आग ।
फ़िर भी मनुज लगा रहा?, इच्छओं के बाग ॥2॥

साझा-निधि जग मानकर, यथा योग्य ही भोग ।
परिग्रह परिमाण कर,  जीवन एक सुयोग ॥3॥
 

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॥सत्य क्षमा ॥

चलिये चल कर देखिये, सच का दामन थाम ।
साहस का यह काम है, किन्तु सुखद परिणाम ॥1॥

धर्म तत्व में मूढता, संसार तर्क में शूर ।
दुखदायक कारकों पर!, गारव और गरूर? ॥2॥

क्षमा भाव वरदान है, वैर भाव ही शाप ।
परोपकार बस पुण्य है, पर पीडन ही पाप ॥3॥
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Posted by on 26/07/2010 में बिना श्रेणी

 

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गहराना

विचार वेदना की गहराई

॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

दृष्टिकोण

दुनिया और ज़िंदगी के अलग-अलग पहलुओं पर हितेन्द्र अनंत की राय

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मैं, ज्ञानदत्त पाण्डेय, गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश (भारत) में ग्रामीण जीवन जी रहा हूँ। मुख्य परिचालन प्रबंधक पद से रिटायर रेलवे अफसर। वैसे; ट्रेन के सैलून को छोड़ने के बाद गांव की पगडंडी पर साइकिल से चलने में कठिनाई नहीं हुई। 😊

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