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Tag Archives: कविता

समभावों से कष्ट सहूँ बस, मुझ में ऐसी शक्ति दो॥

(निराशा, विषाद, अश्रद्धा के बीच जीवट अभिव्यक्ति : प्रार्थना)

॥समभावों से कष्ट सहूँ बस, मुझ में ऐसी शक्ति दो॥

आत्मश्रद्धा से भर जाऊँ, प्रभुवर ऐसी भक्ति दो।
समभावों से कष्ट सहूँ बस, मुझ में ऐसी शक्ति दो॥

कईं जन्मों के कृतकर्म ही, आज उदय में आये है।
कष्टो का कुछ पार नहीं, मुझ पर सारे मंडराए है।
डिगे न मन मेरा समता से, चरणो में अनुरक्ति दो।
समभावों से कष्ट सहूँ बस, मुझ में ऐसी शक्ति दो॥

कायिक दर्द भले बढ जाय, किन्तु मुझ में क्षोभ न हो।
रोम रोम पीड़ित हो मेरा, किंचित मन विक्षोभ न हो।
दीन-भाव नहीं आवे मन में, ऐसी शुभ अभिव्यक्ति दो।
समभावों से कष्ट सहूँ बस, मुझ में ऐसी शक्ति दो॥

दुरूह वेदना भले सताए, जीवट अपना ना छोडूँ।
जीवन की अन्तिम सांसो तक, अपनी समता ना छोडूँ।
रोने से ना कष्ट मिटे, यह पावन चिंतन शक्ति दो।
समभावों से कष्ट सहूँ बस, मुझ में ऐसी शक्ति दो॥

 
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Posted by on 05/05/2011 में बिना श्रेणी

 

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अन्ततः पश्चाताप

( मेरे पसंदीदा कवि ‘भृंग’ की एक रचना)
  पश्चाताप

जग के जंजाल बीच, कूद पड़ा आंख मींच,
सपनों को सींच सींच, बे-लगाम हो गया।
जोश में तो होश भूल, खुशियों के झूले झूल,
समय के प्रतिकूल, बे-नकाब हो गया।
सुन के रसीली राग, खेलने लगा हूँ फाग,
बात बात में हूँ आग, मैं अलाम हो गया।
इन्द्रियों के वशीभूत, कैसे होऊं फलीभूत,
करमों की करतूत, मैं गुलाम हो गया।
आँख साख झूठी देवे, कान किये हथलेवे,
मुख निरा मुसकावे, कटि वाम हो गया।
सांस फूलने लगा है, डील झूलने लगा है,
बात भूलने लगा है, पांव जाम हो गया।
प्रभु तेरे द्वार पर, खड़ा एक पांव पर,
जैसे तैसे पार कर, तेरे नाम हो गया।
इन्द्रियों के वशीभूत, “भृंग” कैसे फलीभूत,
कैसी करतूत, तन तामजाम हो गया॥

                                               -कवि भंवरलाल ‘भृंग’

 
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Posted by on 25/04/2011 में बिना श्रेणी

 

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पश्चाताप

(आज प्रस्तुत है मेरे पसंदीदा कवि ‘भृंग’ की एक रचना)
                पश्चाताप
जग के जंजाल बीच, कूद पड़ा आंख मींच,
            सपनों को सींच सींच, बे-लगाम हो गया।

जोश में तो होश भूल, खुशियों के झूले झूल,

            समय के प्रतिकूल, बे-नकाब हो गया।

सुन के रसीली राग, खेलने लगा हूँ फाग,

            बात बात में हूँ आग, मैं अलाम हो गया।

इन्द्रियों के वशीभूत, कैसे होऊं फलीभूत,

            करमों की करतूत, मैं गुलाम हो गया।

आँख साख झूठी देवे, कान किये हथलेवे,

            मुख निरा मुसकावे, कटि वाम हो गया।

सांस फूलने लगा है, डील झूलने लगा है,

            बात भूलने लगा है, पांव जाम हो गया।

प्रभु तेरे द्वार पर, खड़ा एक पांव पर,

            जैसे तैसे पार कर, तेरे नाम हो गया।

इन्द्रियों के वशीभूत, “भृंग” कैसे फलीभूत,

            कैसी करतूत, तन तामजाम हो गया॥

                                               -कवि भंवरलाल ‘भृंग’

 

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प्रार्थना : बुद्ध वीर जिन हरि हर ब्रह्मा, या उनको स्वाधीन कहो।

जिसने राग द्वेष सब जीते, और सर्वजग जान लिया।
सब जीवों को मोक्ष मार्ग का, निस्पृह हो उपदेश दिया।
बुद्ध वीर जिन हरि हर ब्रह्मा, या उनको स्वाधीन कहो।
गुणानुवाद से प्रेरित होकर, सद् चित उन में लीन रहो॥

विषयों से निरपेक्ष है जो, साम्यभाव मन रखते है।
स्व-पर के हित साधन में जो निशदिन तत्पर रहते है।
स्वार्थ त्याग की कठिन तपस्या,बिना खेद जो करते है।
ऐसे ज्ञानी संत जगत् के, दुख समूह का हरते है॥

सदा रहे सत्संग गुणी का, गुणों पर मैं आसक्त रहूँ।
उनके जैसी चर्या में ही, आत्म-चित अनुरक्त रहूँ।
सताऊँ न किसी जीव को, झूठ कभी ना जिया करूँ।
परधन वनिता पर न लुभाऊँ, संतोषामृत पिया करूँ॥

अहंकार का भाव न रखूं, नहीं किसी पर क्रोध करूँ।
देख दूसरों की बढती को, कभी न ईर्ष्या द्वेष धरूँ।
रहे भावना ऐसी मेरी, सत्य सरल व्यवहार करूँ।
बने वहाँ तक इस जीवन में औरों का उपकार करूँ॥

मैत्री भाव जगत् में मेरा, सब जीवों से नित्य रहे
दीन दुखी जीवों पर मेरे, उर से करूणा स्रोत बहे
दुर्जन क्रूर कुमार्ग रतों पर, क्षोभ नहीं मुझको आए।
साम्यभाव रखूँ मैं उनपर, ऐसी परिणिति हो जाए॥

कोई बुरा कहे या अच्छा, लक्ष्मी आए या जाए।
सौ वर्ष जीऊँ या फिर, मृत्यु आज ही आ जाए।
अथवा कोई कैसा भी भय, या लालच देने आए।
किंचित न्यायमार्ग से मेरा, मन विचलित न हो पाए॥

होकर सुख में मग्न न फूलें, दुख में कभी न घबराएँ।
पर्वत नदी श्मशान भयानक, अटवी से न भय खाएँ।
रहें अडोल अकम्प निरंतर, यह मन दृढतर बन जाए।
इष्ट वियोग अनिष्ट योग में, सहनशीलता दिखलाएँ॥

इति भीति न व्यापे जग में, सत्य धर्म बस हुआ करे।
धर्मनिष्ट बन राजतंत्र भी, न्याय प्रजा का किया करे।
महामारी दुर्भिक्ष न फैले, प्रजा शान्ति से जिया करे।
नैतिकता सहयोग सभी बस, देशोन्नति में दिया करे॥

सुखी रहे सब जीव जगत के, कोई कभी न घबरावे।
जिए कृतज्ञ होकर यह जीवन, प्रकृति द्रोह न उर आवे।
वैर पाप अभिमान छोड जग, नित्य नये मंगल गावे।
ज्ञान चरित्र उन्नत कर अपना, मनुष्य जन्म सफल पावे।।

 

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कलियाँ खिलती है सावन में, पतझड़ में खिलो तो हम जानें॥

अनुकूल हवा में जग चलता, प्रतिकूल चलो तो हम जानें।
कलियाँ खिलती है सावन में, पतझड़ में खिलो तो हम जानें॥
तृप्तों को भोज दिया करते, मित्रों को जिमाना तुम जानो।
अनजानी भूख की चिंता में, भोजन त्यागो तो हम जानें॥
इस हंसती गाती दुनिया में, मदमस्त बसना तुम जानो।
मधु की मनुहारें मिलने पे, तुम गरल पियो तो हम जानें॥
मनमौजी बनकर जग रमता, संयम में रहना कठिन महा।
जो पानें में जीवन बीता, उसे भेंट चढाओ तो हम जानें॥
दमन तुम्हारा जग चाहता, और जगत हिलाना तुम जानो।
है लगन सभी की चढने में, स्कंध बढाओ तो हम जानें॥
इन लहरों का रुख देख-देख, जग की पतवार चला करती।
झंझावात भरे तूफानों में, तरणि को तिराओ तो हम जानें॥
अनुकूल हवा में जग चलता, प्रतिकूल चलो तो हम जानें।
कलियाँ खिलती है सावन में, पतझड़ में खिलो तो हम जानें॥
 
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Posted by on 01/02/2011 में बिना श्रेणी

 

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कौन सी सुबह जलाओगे तमन्नाओं का चराग़………?

‘वक्त’ पर कुछ संकलन से………
जब वक्त ही न रहा पास तो फिर क्या होगा?
लुट गई दौलते अहसास तो फिर क्या होगा?
कौन सी सुबह जलाओगे तमन्नाओं का चराग़?
शाम से ही टूट गई आस तो फिर क्या होगा?
सांस लेना ही केवल जिन्दगानी नहीं है।
उस बीस साल की उम्र का नाम जवानी नहीं है।
ज्योत बन जीना घड़ी भर का भी सार्थक,
जल के दे उजाला उस दीप का सानी नहीं है।
 

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जब वक्त ही न रहा पास तो फिर क्या होगा?

‘वक्त’ पर कुछ संकलन से………
जब वक्त ही न रहा पास तो फिर क्या होगा?
लुट गई दौलते अहसास तो फिर क्या होगा?
कौन सी सुबह जलाओगे तमन्नाओं का चराग़?
शाम से ही टूट गई आस तो फिर क्या होगा?
सांस लेना ही केवल जिन्दगानी नहीं है।
उस बीस साल की उम्र का नाम जवानी नहीं है।
ज्योत बन जीना घड़ी भर का भी सार्थक,
जल के दे उजाला उस दीप का सानी नहीं है।
 
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Posted by on 25/01/2011 में बिना श्रेणी

 

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आज कल के चक्कर में ही, मानव जाता व्यर्थ छला॥

आज नहीं मैं कल कर लूंगा, जीवन में कोई काम भला।
आज कल के चक्कर में ही, मानव जाता व्यर्थ छला॥
इक दो पल नहीं लक्ष-कोटि नहीं, अरब खरब पल बीत गये।
अति विशाल सागर के जैसे, कोटि कोटि घट रीत गये।
पर्वत जैसा बलशाली भी, इक दिन ओले जैसा गला।
आज कल के चक्कर में ही, मानव जाता व्यर्थ छला॥
आज करे सो कर ले रे बंधु, कल की पक्की आश नहीं।
जीवन बहता तीव्र पवन सा, पलभर का विश्वास नहीं।
मौत के दांव के आगे किसी की, चलती नहीं है कोई कला।
आज कल के चक्कर में ही, मानव जाता व्यर्थ छला॥
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सज्ज्न बोलो दुर्गम पथ पर, तुम न चलोगे कौन चलेगा?

साधक बोलो दुर्गम पथ पर, तुम न चलोगे कौन चलेगा?
कदम कदम पर बिछे हुए है, तीखे तीखे कंकर कंटक।
मूढ मिथ्या व मायाचारी, फिरते यहाँ हैं वक्र वंचक॥
पर इन बाधाओ को बंधु, तुम न दलोगे कौन दलेगा?
सूरज कब का डूब चला है, रह गया अज्ञान अकेला।
चहुं ओर घोर तिमिर है, और निकट तूफानी बेला॥
किन्तु इस रजनी में दीपक, तुम न जलोगे कौन जलेगा?
नीलाम्बर में सघन घन का, दूर दूर आसार नहीं है।
उष्ण पवन है तप्त धरा है, कोई भी उपचार नहीं है॥
इस विकट वेला में तरूवर, तुम न फलोगे कौन फलेगा?
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Posted by on 19/01/2011 में बिना श्रेणी

 

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निर्मल-संदेश

सेवा और समर्पण का कोई दाम नहीं है।
मानव तन होने से कोई इन्सान नहीं है।
नाम प्रतिष्ठा की चाहत छोडो यारों,
बड़बोलो का यहां अब काम नहीं है।
                  ***
बिना काम के यहाँ बस नाम चाहिए।
सेवा के बदले भी यहाँ इनाम चाहिए।
श्रम उठाकर भेजा यहाँ कौन खपाए?
मुफ़्त में ही सभी को दाम चाहिए॥
                  ***
आलोक सूर्य का देखो, पर जलन को मत भूलो।
चन्द्र पूनम का देखो, पर ग्रहण को मत भूलो।
किसी आलोचना पर होता तुम्हे खेद क्योंकर,

दाग सदा उजले पर लगे, इस चलन को मत भूलो॥

                  ***

 
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Posted by on 13/01/2011 में बिना श्रेणी

 

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गहराना

विचार वेदना की गहराई

॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

दृष्टिकोण

दुनिया और ज़िंदगी के अलग-अलग पहलुओं पर हितेन्द्र अनंत की राय

मल्हार Malhar

पुरातत्व, मुद्राशास्त्र, इतिहास, यात्रा आदि पर Archaeology, Numismatics, History, Travel and so on

मानसिक हलचल

मैं, ज्ञानदत्त पाण्डेय, गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश (भारत) में ग्रामीण जीवन जी रहा हूँ। मुख्य परिचालन प्रबंधक पद से रिटायर रेलवे अफसर। वैसे; ट्रेन के सैलून को छोड़ने के बाद गांव की पगडंडी पर साइकिल से चलने में कठिनाई नहीं हुई। 😊

सुज्ञ

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