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Tag Archives: करूणा

कलियाँ खिलती है सावन में, पतझड़ में खिलो तो हम जानें॥

अनुकूल हवा में जग चलता, प्रतिकूल चलो तो हम जानें।
कलियाँ खिलती है सावन में, पतझड़ में खिलो तो हम जानें॥
तृप्तों को भोज दिया करते, मित्रों को जिमाना तुम जानो।
अनजानी भूख की चिंता में, भोजन त्यागो तो हम जानें॥
इस हंसती गाती दुनिया में, मदमस्त बसना तुम जानो।
मधु की मनुहारें मिलने पे, तुम गरल पियो तो हम जानें॥
मनमौजी बनकर जग रमता, संयम में रहना कठिन महा।
जो पानें में जीवन बीता, उसे भेंट चढाओ तो हम जानें॥
दमन तुम्हारा जग चाहता, और जगत हिलाना तुम जानो।
है लगन सभी की चढने में, स्कंध बढाओ तो हम जानें॥
इन लहरों का रुख देख-देख, जग की पतवार चला करती।
झंझावात भरे तूफानों में, तरणि को तिराओ तो हम जानें॥
अनुकूल हवा में जग चलता, प्रतिकूल चलो तो हम जानें।
कलियाँ खिलती है सावन में, पतझड़ में खिलो तो हम जानें॥
 
10 टिप्पणियां

Posted by on 01/02/2011 में बिना श्रेणी

 

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ब्लॉग मैं लिखता हूँ इस अभिव्यक्ति के लिए…………

(1) 
 
है सभ्यता की मांग शिक्षा संस्कार की।
विवेक से पाई यह विद्या पुरस्कार सी।
अश्लील दृश्य देखे मेरे देश की पीढी।
गर्त भी इनको लगती विकास की सीढी।
नवपीढी कहीं कपडों से कंगली न हो जाय।
और नाच इनका कहीं जंगली हो जाय।
इसलिये मैं लिखता नूतन शक्ति के लिए।
ब्लॉग मैं लिखता हूँ इस अभिव्यक्ति के लिए॥
(2)
आभिव्यक्ति का अक्षर अनुशासन है हिन्दी।
सहज सरल समझ का संभाषण है हिन्दी।
समभाषायी छत्र में सबको एक करती है।
कई लोगों के भारती अब तो पेट भरती है।
प्रलोभन में हिन्दी का कहीं हास होजाए।
और मेरी मातृ वाणी का उपहास हो जाय।
इसलिए मैं लिखता मेरी भाषा के लिए।
ब्लॉग मैं लिखता हूँ इस अभिलाषा के लिए॥
 (3)
मानव है तो मानवता की कद्र कुछ कीजिए।
अभावग्रस्त बंधुओ पर थोडा ध्यान दीजिए।
जो सुबह खाते और शाम भूखे सोते है
पानी की जगह अक्सर आंसू पीते है।
आंसू उनके उमडता सैलाब हो न जाए।
और देश के बेटे कहीं यूं तेज़ाब हो न जाए।
इसलिए मैं लिखता अन्तिम दीन के लिए।
ब्लॉग मैं लिखता हूँ इस यकीन के लिए॥
 (4)
निरीह जीवहिंसा में जिनको शर्म नहीं है।
बदनीयत के सब बहाने, सच्चा कर्म नहीं है।
यूँ भूख स्वाद की कुतर्की में मर्म नहीं है।
‘जो मिले वह खाओ’ सच्चा धर्म नहीं है।
दिलों से दया भाव कहीं नष्ट हो न जाए।
सभ्यता विकास आदिम भ्रष्ट हो न जाए।
इसलिये मैं लिखता सम्वेदना मार्ग के लिए।
ब्लॉग मैं लिखता हूँ दु:चिंतन त्याग के लिए।
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5 टिप्पणियां

Posted by on 13/12/2010 में बिना श्रेणी

 

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शाकाहार, निशंक अहिंसा को बढाता है।

शाकाहार और अहिंसा एक दूसरे की पूरक है। 


क्या हिन्दू मत में शाकाहार अन्य धर्मों से प्रभावित  है?

नहीं, वैदिक मत प्रारम्भ से ही शाकाहारी रहा है,वेदों में माँसाहार के वर्णन निति वाक्य नहीं है।उस काल में कोई करते हों उसका वर्णन मात्र है, उपदेश तो उससे दूरी का ही दिया गया है। और जैन-मार्ग से प्रभावित होने का प्रश्न ही नहीं उठता। अहिंसा परमो धर्मः वेदों का निति वाक्य है। हां यज्ञकर्म में आ गई पशुबलि का विरोध अवश्य जैन मत नें किया, पर अगर प्रभावित होना होता तो अन्य सिद्धांतों पर भी उसका प्रभाव स्पष्ठ नजर आता। फिर भी अगर जैनों के संसर्ग से हिन्दुओं में अहिंसा प्रगाढ हुई है, तो बुरा भी क्या है? गलत मात्र इसलिये कि अहिंसा, आपके मांसाहारी प्रयोजन को सिद्ध होने नहीं देती। अहिंसा और शाकाहार का चोली दामन का साथ है।


क्या, पेड़ पौधों में भी जीवन है,और उन्हें भी पीड़ा होती है,यह हम नहीं जानते  थे ?

किन लोगों का अतीत में ऐसा मानना था? ऐसे ‘ज़ाहिल’ कोन थे? आर्यावर्त में तो सभ्यता युगारम्भ में ही पुख्त हो चुकी थी। आर्य सभ्यता तो न केवल वनस्पति में बल्कि पृथ्वी, वायु, जल और अग्नी में भी जीवन को प्रमाणित कर चुकी थी।और विज्ञान को अभी भी इन निष्कर्षों पर पहुंचना बाकी है। किसने तर्क दे दिया कि वनस्पति को पीडा नहीं होती? पीड़ा तो अवश्यंभावी है,अगर जीवन है तो पीड़ा तो होगी ही। उन्हे तो छूने मात्र से मरणान्तक पीडा होती है।

क्या दो इन्द्रियों से वंचित प्राणी की हत्या कम अपराध है? !!

यह किसने कह दिया?, जीव मात्र की हत्या पाप है, यहाँ सच्चाई से पाप को पाप स्वीकार करने का माद्दा है, फिर चाहे हम स्वयं ही उसमें रत क्यों न हो। स्वीकार करेंगे तभी त्याग की मानसिकता बनेगी। उद्दंडता से पाप को ही धर्म बताना तो उल्टा घोर महापाप है, कुतर्कों से पाप को धर्म साबित करना तो महा दुष्कर्म। किसी ‘पंचेन्द्रिय’ प्राणी में, एक दो या तीन इन्द्रिय कम होने मात्र से, वह चौरेन्द्रिय,तेइन्द्रिय,या बेइन्द्रिय नहीं कहा जाता,वह रहेगा तो पंचेन्द्रिय ही, वह विकलांग (अपूर्ण इन्द्रिय) कहा जायेगा। इन्द्रिय अपूर्णता के आधार पर कोई जीव श्रेणी नहीं है। विकलेन्द्रिय के प्रति सहानुभुति तो  ज्यादा ही होगी। और दया करूणा तो प्रत्येक जीव के प्रति होनी ही चाहिए। इस संसकृति में अभयदान दिया जाता है, न्यायाधीष बनकर सजा देना नही। सजा को कर्मों पर छोड़ा गया है।क्षमा को यहां वीरों का गहना कहा जाता है, भारतीय संसकृति को यूँ ही उदार व सहिष्णु उपमाएँ नहीं मिली।
पीड़ाएँ  इन्द्रिय  माध्यम से अनुभूत की जाती है जिस जीव के जितनी अधिक इन्द्रिय होगी उसे पीड़ा अधिक अनुभूत होगी।

हिंसा तो वनस्पति के आहार में भी है ही, पर विवेक यह कहता है, जितना हिंसा से बचा जाये, बचना चाहिये। क्या आपने कभी गेहूं के दाने को मांस की तरह सडते कीडे पडते देखा है? मांस मात्र एक जीव ही नहीं,उसकी सड़न प्रकृति के कारण अनन्त जीवों की हिंसा का कारण बनता है।
जैन गृहस्थ, जैसे जैसे त्याग में समर्थ होते जाते है, वैसे वैसे, क्षमतानुसार शाकाहार में भी, अधिक हिंसाजन्य पदार्थो का त्याग करते जाते है। वे कन्दमूल के बाद हरी पत्तेदार सब्जीयों आदि का भी त्याग करते है, वह उसमें उपस्थित अधिसंख्य जीवों की हिंसा के कारण। 

मांस न केवल क्रूरता की उपज है, बल्कि मांस में सडन गलन की प्रक्रिया तेज  गति से होती है। परिणाम स्वरूप जीवोत्पत्ति तीव्र व अधिक होती है। इतना ही नहीं, पकने के बाद भी उसमे जीवों की उत्पत्ति की प्रक्रिया निरन्तर जारी रह्ती है। और भी कई कारण है, माँसाहार में अधिक हिंसा के, जो सुविज्ञ पाठक हैं, वे तो बे-तर्क भी भलीभांति समझ सकते है। और कुतर्कों का कोई ईलाज नहीं।
जो लोग शान्ति का (बे-शर्त) सन्देश तक पूरी मानवता (काफ़िर समेत) को, पूरी इमानदारी से नहीं पहुँचा सकते, वे जानवरों तक दया का सन्देश कैसे पहुँचा पायेंगे? ‘सुक्ष्म अहिंसा का सन्देश’ तो उनके लिए, बहुत दूर की कौडी है।
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मैं, ज्ञानदत्त पाण्डेय, गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश (भारत) में ग्रामीण जीवन जी रहा हूँ। मुख्य परिचालन प्रबंधक पद से रिटायर रेलवे अफसर। वैसे; ट्रेन के सैलून को छोड़ने के बाद गांव की पगडंडी पर साइकिल से चलने में कठिनाई नहीं हुई। 😊

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