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Tag Archives: उदात्त दृष्टि

माली : सम्यक निष्ठा

उपवन में नए सुन्दर सलौने पौधे को आया पाकर एक पुराना पौधा उदास हो जाता है। गहरा निश्वास छोड़ते हुए कहता है, “अब हमें कोई नहीं पूछेगा अब हमारे प्रेम के दिन लद गए, हमारी देखभाल भी न होगी।“

युवा पौधे को इस तरह बिसूरते देख पास खड़े अनुभवी प्रौढ़ पेड़ ने कहा, “इस तरह विलाप-प्रलाप उचित नहीं हैं ।और  न ही नए  पौधे से ईर्ष्या करना योग्य  है।“

युवा पौधा आहत स्वर में बोला, “तात! पहले माली हमारा कितना ध्यान रखता था, हमें कितना प्यार करता था। अब वह अपना सारा दुलार उस  नन्हे पौधे को दे रहा है। उसी के साथ मगन रहता है, हमारी तरफ तो आँख उठाकर भी नहीं देखता।“

प्रौढ़ पेड़ ने समझाते हुए कहा, “वत्स! तुम गलत सोच रहे हो, बागवान सभी को समान स्नेह करता है। वह अनुभवी है, उसे पता है कब किसे अधिक ध्यान की आवश्यकता है। वह अच्छे से जानता है, किसे देखभाल की ज्यादा जरूरत है और किसे कम।“

युवा पौधा अब भी नाराज़ था, बोला- “नहीं तात! माली के मन पक्षपात हो गया है, नन्हे की कोमल कोपलों से उसका मोह अधिक है। वह सब को एक नज़र से नहीं देखता।“

अनुभवी पेड़ ने गम्भीरता से कहा- “नहीं, वत्स! ऐसा कहकर तुम माली के असीम प्यार व अवदान का अपमान कर रहे हो। याद करो! बागवान हमारा कितना ध्यान रखता था। उसके प्यार दुलार के कारण ही आज हम पल्ल्वित, पोषित, बड़े हुए है। हरे भरे और तने खड़े है। उसी के अथक परिश्रम से आज हम इस योग्य है कि हमें विशेष तवज्जो की जरूरत नहीं रही। तुम्हें माली की नजर में वात्सल्य न दिखे, किन्तु हम लोगों को सफलता से सबल बना देने का गौरव, उसकी आँखो में महसुस कर सकते हो। वत्स! अगर माली का संरक्षण व सुरक्षा हमें न मिलती तो शायद बचपन में ही पशु-पक्षी हमारा निवाला बना चुके होते या नटखट बच्चे हमें नोंच डालते। हम तो नादान थे, पोषण पानी की हमें कहां सुध-बुध थी, होती तो भी कहां हमारे पैर थे जो भोजन पानी खोज लाते? हम तो जन्मजात मुक है, क्षुधा-तृषा बोलकर व्यक्त भी नहीं कर सकते। वह माली ही था जिसने बिना कहे ही हमारी भूख-प्यास को पहचाना और तृप्त किया। उस पालक के असीम उपकार को हम कैसे भूल सकते है।“

युवा पौधा भावुक हो उठा- “तात! आपने मेरी आँखे खोल दी। मैं सम्वेदनाशून्य हो गया था। आपने यथार्थ दृष्टि प्रदान की है। ईर्ष्या के अगन में भान भूलकर अपने ही निर्माता-पालक का अपमान कर बैठा। मुझे माफ कर दो।“

युवा पौधा प्रायश्चित का उपाय सोचने लगा, अगले ही मौसम में फल आते ही वह झुक कर माली के चरण छू लेगा। दोनो ने माली को कृतज्ञ नजरों से देखा और श्रद्धा से सिर झुका दिया।

 

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उदार मानस, उदात्त दृष्टि

पुराने जमाने की बात है। ग्रीस देश के स्पार्टा राज्य में पिडार्टस नाम का एक नौजवान रहता था। वह उच्च शिक्षा प्राप्त कर विशिष्ट विद्वान बन गया था।

एक बार उसे पता चला कि राज्य में तीन सौ जगहें खाली हैं। वह नौकरी की तलाश में था ही। इसलिए उसने तुरन्त अर्जी भेज दी।लेकिन जब नतीजा निकला तो मालूम पड़ा कि पिडार्टस को नौकरी के लिए नहीं चुना गया था।

जब उसके मित्रों को इसका पता लगा तो उन्होंने सोचा कि इससे पिडार्टस बहुत दुखी हो गया होगा, इसलिए वे सब मिलकर उसे आश्वासन देने उसके घर पहुंचे।

पिडार्टस ने मित्रों की बात सुनी और हंसते-हंसते कहने लगा, “मित्रों, इसमें दुखी होने की क्या बात है? मुझे तो यह जानकर आनन्द हुआ है कि अपने राज्य में मुझसे अधिक योग्यता वाले तीन सौ युवा हैं।”

उदात्त दृष्टि जीवन में प्रसन्नता की कुँजी है। 
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हिन्दी ब्लॉगजगत की उन्नति एक दूसरे के विकास में सहभागिता से ही सम्भव है। ” together we progress ” सूत्र ही सार्थ है। यश-कीर्ती की उपलब्धि भले न्यायसंगत न हो, ‘टांग खींचाई’ तो निर्थक और स्वयं अपने ही पांवो पर कुल्हाड़ी के समान है। सभी की सफलता के प्रति उदात्त भावना ही सामुहिक रूप से सभी की सफलता है। विकास सदैव सहयोग में ही निहित है।

‘परिकल्पना सम्मान’ से सम्मानित सभी ब्लॉगर/चिट्ठाकारों को बधाई!!

हिन्दी ब्लॉगजगत की विकास भावना के लिए आयोजकों को भी बधाई!!

 

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विचार प्रबन्धन

आज कल लोग ब्लॉगिंग में बड़े आहत होते से दिख रहे है। जरा सी विपरित प्रतिक्रिया आते ही संयम छोड़ देते है अपने निकट मित्र का विरोधी मंतव्य भी सहज स्वीकार नहीं कर पाते और दुखी हृदय से पलायन सा रूख अपना लेते है।

मुझे आश्चर्य होता है कि जब हमनें ब्लॉग रूपी ‘खुला प्रतिक्रियात्मक मंच’ चुना है तो अब परस्पर विपरित विचारों से क्षोभ क्यों? यह मंच ही विचारों के आदान प्रदान का है। मात्र जानकारी अथवा सूचनाएं ही संग्रह करने का नहीं। आपकी कोई भी विचारधारा इतनी सुदृढ नहीं हो सकती कि उस पर प्रतितर्क ही न आए। कई विचार परम-सत्य हो सकते है पर हमारी यह योग्यता नहीं कि हम पूर्णरूपेण जान सकें कि हमने जो प्रस्तुत किया वह अन्तिम सत्य है और उसको संशय में नहीं डाला जा सकता।

अधिकांश हम कहते तो इसे विचारो का आदान प्रदान है पर वस्तुतः हम अपनी पूर्वाग्रंथियों को अन्य के समर्थक विचारों से पुष्ठ करनें का प्रयास कर रहे होते है। उन ग्रंथियों को खोलनें या विचलित भी होनें देने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। हमारा पूर्वाग्रंथी प्रलोभन इतना गाढ होता है कि वह न जाने कब अहंकार का रूप धर लेता है। इसी दशा में अपने विचारों के विपरित प्रतिक्रिया पाकर आवेशित हो उठता है। और सारा आदान-प्रदान वहीं धरा रह जाता है। जबकि होना तो यह चाहिए कि आदान प्रदान के बाद हमारे विचार परिष्कृत हो। विरोध जो तर्कसंगत हो, हमारी विचारधारा उसे आत्मसात कर स्वयं को परिशुद्ध करले। क्योंकि यही विकास का आवश्यक अंग है। अनवरत सुधार।

यदि आपका निष्कर्ष सच्चाई के करीब है फिर भी कोई निर्थक कुतर्क रखता है तो आवेश में आने की जगह युक्तियुक्त निराकरण प्रस्तुत करना चाहिए, आपके विषय-विवेचन में सच्चाई है तो तर्कसंगत उत्तर देनें में आपको कोई बाधा नहीं आएगी। तथापि कोई जड़तावश सच्चाई स्वीकार न भी करे तो आपको क्यों जबरन उसे सहमत करना है? यह उनका अपना निर्णय है कि वे अपने विचारों को समृद्ध करे,परिष्कृत करे, स्थिर करे अथवा दृढ्ता से चिपके रहें।

मैं तो मानता हूँ, विचारों के आदान-प्रदान में भी वचन-व्यवहार विवेक और अनवरत विचारों को शुद्ध समृद्ध करने की ज्वलंत इच्छा तो होनी ही चाहिए, आपके क्या विचार है?
 

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मात्र सच्चा दान ही नहीं, दान का महिमा वर्धन भी जरूरी

दान की महिमा महत्वपूर्ण है, इस्लाम में जक़ात फ़र्ज़ है तो हिन्दुत्व में पुण्यकर्म। बुद्धिजीवी इसे कहते हैं जरूरतमंद की मदद!!

इस बात को सभी मानते है कि दान देकर जताना नहिं चाहिए, दाएं हाथ से दो तो बाएं हाथ को खबर भी न हो। दान देकर शुक्रगुजारी की अपेक्षा भी निर्थक है। लेकिन दाता भले न चाहे, लेने वाले को अहसान फ़रामोश तो न होना चाहिए, जब वह अहसानफ़रामोश बनता है तो, न केवल दाता का दान देने का हौसला पस्त होता है, बल्कि दान का महत्व भी घट जाता है।

जैसे नमाज जक़ात आदि हम पर फ़र्ज़ है,और जब हम इन्हें अदा कर रहे हो, तब उसे महिमामय बनाकर पेश करते है,क्यो? क्योकि उसे देखकर अन्य लोग भी प्रोत्साहित हो। और ऐसे फ़र्ज़वान की प्रशंसा भी करते है,ताकि उसका व अन्य का हौसला बुलंद रहे। भले उसका फ़र्ज़ था, पर मालिक ने उसे मुक़रर तो किया है, अपनी रहमतों के लिये। साथ ही इन अच्छे कार्यो में कोई बाधक बनता है, दान के महत्व को खण्डित करने का प्रयास करता है वह भी दोष का भागी बनता है। ईष्या व द्वेष ग्रसित होकर जो पुण्य कर्म को छोटा व निरुत्साहित करता है,वह भी गुनाह है।मालिक की आज्ञानुसार नेकीओं के प्रसार को अवरूद्ध करना नाफ़र्मानी है।

पानी बढे जो नाव में, घर में बढे जो दाम।
दोनों हाथ उडेलिये, यही अक़्ल का काम॥

 
21 टिप्पणियां

Posted by on 09/07/2010 में बिना श्रेणी

 

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गहराना

विचार वेदना की गहराई

॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

तिरछी नजरिया

हितेन्द्र अनंत का दृष्टिकोण

मल्हार Malhar

पुरातत्व, मुद्राशास्त्र, इतिहास, यात्रा आदि पर Archaeology, Numismatics, History, Travel and so on

मानसिक हलचल

मैं, ज्ञानदत्त पाण्डेय, गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश (भारत) में ग्रामीण जीवन जी रहा हूँ। मुख्य परिचालन प्रबंधक पद से रिटायर रेलवे अफसर। वैसे; ट्रेन के सैलून को छोड़ने के बाद गांव की पगडंडी पर साइकिल से चलने में कठिनाई नहीं हुई। 😊

सुज्ञ

चरित्र विकास

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