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Tag Archives: आस्तिक

नास्तिकता है क्या?

व्यक्तिगत तृष्णाओं से लुब्ध व्यक्ति, समाज से विद्रोह करता है। और तात्कालिक अनुकूलताओं के वशीभूत, स्वेच्छा से स्वछंदता अपनाता है, समूह से स्वतंत्रता पसंद करता है। किन्तु समय के साथ जब समाज में सामुहिक मेल-मिलाप के अवसर आते है, जिसमे धर्मोत्सव मुख्य होते है। तब वही स्वछन्द व्यक्ति उस एकता और समुहिकता का द्वेषी बन जाता है। उसे लगता है, जिस सामुहिक प्रमोद से वह वंचित है, उसका आधार धर्म ही है, वह धर्म से वितृष्णा करता है। वह उसमें निराधार अंधविश्वास ढूंढता है, निर्दोष प्रथाओं को भी कुरितियों में खपाता है और मतभेदों व विवादों के लिये धर्म को जिम्मेदार ठहराता है। नास्तिकता के मुख्यतः यही कारण  होते है।
लक्षण:
स्वयं नास्तिक होते हुए भी आस्तिकों की मूर्खता पर चिंता जताता है।
स्वयं नास्तिक माने जाने के अपराध-बोध में जीता है।लोगों द्वारा प्रताडना के हीनबोध का शिकार रहता है।ईश्वर के अस्तित्व से इन्कार करते हुए भी उससे प्रतिद्वंधता रखता है और ईश्वर को भांडता रहता है। इसी बहाने उसके चिंतन में ईश्वर और धर्म विद्यमान रहता है, इस प्रकार वह अप्रत्यक्ष नास्तित्व में भी अस्तित्व सिद्ध करता रहता है।
कोई भी नास्तिक इस प्रश्न का जवाब नहीं देता—
आप भले ईश्वर को न मानो,धर्म-शास्त्रों से गुण अपनानें में क्या बाधा है?
 
13 टिप्पणियां

Posted by on 20/02/2011 में बिना श्रेणी

 

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