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Tag Archives: अच्छाई-बुराई

बुराई और भलाई

उभरती बुराई ने दबती-सी अच्छाई से कहा, “कुछ भी हो, लाख मतभेद हों, है तो तू मेरी सहेली हो। मुझे अपने सामने तेरा दबना अच्छा नहीं लगता। आ, अलग खड़ी न हो, मुझ में मिल जा, मैं तुझे भी अपने साथ बढ़ा लूंगी, समाज में फैला लूंगी।”

भलाई ने शांति से उत्तर दिया, “तुम्हारी हमदर्दी के लिए धन्यवाद, पर रहना मुझे तुमसे अलग ही है।”

“क्यों?” आश्चर्यभरी अप्रसन्नता से बुराई ने पूछा।

“बात यह है कि मैं तुमसे मिल जाऊं तो फिर मैं कहां रहूंगी, तब तो तुम-ही-तुम होगी सब जगह।” अच्छाई ने और भी शान्त होकर उत्तर दिया।

गुस्से से उफन कर बुराई ने अपनी झाड़ी अच्छाई के चारों ओर जकड़ कर फैला दी और फुंकार कर कहा, “ले, भोग मेरे निमन्त्रण को ठुकराने का नतीजा! अब पड़ी रह मिट्टी में मुंह दुबकाये! दुनिया में तेरे फैलने का अब कोई मार्ग नहीं।”

अच्छाई ने अपने नन्हे अंकुर की आंख से जहाँ भी झांका, उसे बुराई की जकड़बंध झाड़ी के तेज कांटे, भाले के समान तने हुए दिखाई दिए। सचमुच आगे कदम भर सरकाने की भी जगह न थी।

बुराई का अट्टहास चारों ओर गूंज गया। परिस्थितियां निश्चय ही प्रतिकूल थीं। फिर भी पूरे आत्म्-विश्वास से अच्छाई ने कहा, “तुम्हारा फैलाव आजकल बहुत व्यापक है, बहन! जानती हूं इस फैलाव से अपने अस्तित्व को बचाकर मुझे वृद्धि और प्रसार पाने में पूरा संघर्ष करना पड़ेगा, पर तुम यह न भूलना कि कांटे-कांटे के बीच से गुजर कर जब मैं तुम्हारी झाड़ी के ऊपर पहुंचूंगी तो मेरे कोमल फूलों की महक चारों ओर फैल जायगी और सभी की दृष्टि मोहक फूलों पर जमेगी, तब तेरा अस्तित्व ओझल ही रहेगा। अन्ततः यह जानना भी कठिन होगा कि तुम हो कहाँ।”

व्यंग्य की शेखी से इठलाकर बुराई ने कहा, “दिल के बहलाने को यह ख्याल अच्छा है।”

गहन सन्तुलन में अपने को समेटकर अच्छाई ने कहा, “तुम हंसना चाहो, तो जरुर हंसो, मुझे आपत्ति नहीं, पर जीवन के इस सत्य को कृत्रिम हंसी में झुठलाया नहीं जा सकता कि तुम्हारे प्रसार और प्रशंसकों की भी एक सीमा है, क्योंकि उस अति की सीमा तक तुम्हारे पहुंचते-न-पहुंचते तुम्हारे सहायकों और अंगरक्षकों का ही दम घुटने लगता है। जबकि इसके विपरित मेरे फैलाव की कोई सीमा ही प्रकृति ने नहीं बांधी, बुराई बहन!!”

बुराई गंभीर हो गई और उसे लगा कि उसके काँटों की शक्ति स्वयंमेव पहले से कम होती जा रही है और अच्छाई का अंकुर तेजी से वृद्धि पा रहा है।

 

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मैं, ज्ञानदत्त पाण्डेय, गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश (भारत) में ग्रामीण जीवन जी रहा हूँ। मुख्य परिचालन प्रबंधक पद से रिटायर रेलवे अफसर। वैसे; ट्रेन के सैलून को छोड़ने के बाद गांव की पगडंडी पर साइकिल से चलने में कठिनाई नहीं हुई। 😊

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