RSS

Category Archives: मान

अहंकार

एक संन्यासी एक राजा के पास पहुंचा। राजा ने उसका खूब आदर-सत्कार किया। संन्यासी कुछ दिन वहीं रूक गया। राजा ने उससे कई विषयों पर चर्चा की और अपनी जिज्ञासा सामने रखी। संन्यासी ने विस्तार से उनका उत्तर दिया। जाते समय संन्यासी ने राजा से अपने लिए उपहार मांगा। राजा ने एक पल सोचा और कहा, “जो कुछ भी खजाने में है, आप ले सकते हैं।” संन्यासी ने उत्तर दिया, “लेकिन खजाना तुम्हारी संपत्ति नहीं है, वह तो राज्य का है और तुम मात्र उसके संरक्षक हो।” राजा बोले, “महल ले लीजिए।” इस पर संन्यासी ने कहा, “यह भी तो प्रजा का है।”

राजा ने हथियार डालते हुए कहा, “तो महाराज आप ही बताएं कि ऐसा क्या है जो मेरा हो और आपको देने लायक हो?” संन्यासी ने उत्तर दिया, “हे राजा, यदि तुम सच में मुझे कुछ देना चाहते हो, तो अपना अहं दे दो। अहंकार पराजय का द्वार है। यह यश का नाश करता है। अहंकार का फल क्रोध है। अहंकार में व्यक्ति अपने को दूसरों से श्रेष्ठ समझता है। वह जिस किसी को अपने से सुखी-संपन्न देखता है, ईर्ष्या कर बैठता है। हम अपनी कल्पना में पूरे संसार से अलग हो जाते हैं।

“ॠजुता, मृदुता और सहिष्णुता हमें यह विचार देती है कि हम पूर्ण स्वतंत्र एक द्वीप की भांति हैं। हम न किसी से अलग हैं और न स्वतंत्र। यहां सभी एक-दूसरे पर निर्भर रहते हुए, सह-अस्तित्व और सहभागिता में जीते हैं।”

राजा संन्यासी का आशय समझ गए और उसने वचन दिया कि वह अपने भीतर से अहंकार को निकाल कर रहेगा।

“जिनकी विद्या विवाद के लिए, धन अभिमान के लिए, बुद्धि का प्रकर्ष ठगने के लिए तथा उन्नति संसार के तिरस्कार के लिए है, उनके लिए प्रकाश भी निश्चय ही अंधकार है।” -क्षेमेन्द्र

अभिमान वश मनुष्य स्वयं को बडा व दूसरे को तुच्छ समझता है। अहंकार के कारण व्यक्ति दूसरों के गुणों को सहन नहीं करता और उनकी अवहेलना करता है। किंतु दुर्भाग्य से अभिमान कभी भी स्वाभिमान को टिकने नहीं देता, जहां कहीं भी उसका अहंकार सहलाया जाता है, गिरकर उसी व्यक्ति की गुलामी में आसक्त हो जाता है। अहंकार वृति से यश पाने की चाह, मृगतृष्णा ही साबित होती है। अभिमान के प्रयोग से मनुष्य ऊँचा बनने का प्रयास तो करता है किंतु परिणाम सदैव नीचा बनने का ही आता है। निज बुद्धि का अभिमान ही, अन्यत्र ज्ञान की बातों को मस्तिष्क में प्रवेश करने नहीं देता।

अभिमानी व्यक्ति उपेक्षणीय बातों को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर, निरर्थक श्रम से अन्तत: कलह ही उत्पन्न करता हैं। ऐसे व्यक्ति को सबसे ज्यादा आनंद दूसरे के अहंकार को चोट पहुँचाने में आता है और तीव्र क्रोध अपने अहंकार पर चोट लगने से होता है।

समृद्धि का घमण्ड, ऐश्वर्य का घमण्ड, ज्ञान का घमण्ड उसी क्षेत्र के यश को नष्ट कर देता है.

अन्य सूत्र :-
दर्पोदय
ज्ञान का अभिमान
अहमकाना ज्ञान प्रदर्शन
दंभ व्यक्ति को मूढ़ बना देता है।
मानकषाय

 
 
गहराना

विचार वेदना की गहराई

॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

तिरछी नजरिया

हितेन्द्र अनंत का दृष्टिकोण

मल्हार Malhar

पुरातत्व, मुद्राशास्त्र, इतिहास, यात्रा आदि पर Archaeology, Numismatics, History, Travel and so on

मानसिक हलचल

मैं, ज्ञानदत्त पाण्डेय, गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश (भारत) में ग्रामीण जीवन जी रहा हूँ। मुख्य परिचालन प्रबंधक पद से रिटायर रेलवे अफसर। वैसे; ट्रेन के सैलून को छोड़ने के बाद गांव की पगडंडी पर साइकिल से चलने में कठिनाई नहीं हुई। 😊

सुज्ञ

चरित्र विकास

WordPress.com

WordPress.com is the best place for your personal blog or business site.

हिंदीज़ेन : HindiZen

जीवन में सफलता, समृद्धि, संतुष्टि और शांति स्थापित करने के मंत्र और ज्ञान-विज्ञान की जानकारी

WordPress.com News

The latest news on WordPress.com and the WordPress community.