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Category Archives: दुर्लभ

आदर्श जीवन मूल्यों को अपनाना कठिन है

प्रायः लोग कहते है सदाचरण और जीवन मूल्य श्रेयस्कर है किंतु इस मार्ग पर चलना बड़ा कठिन है। नैतिकता धारण करना दुष्कर कार्य है जबकि सच्चाई यह है कि सदाचरण जीवात्मा का मूलभूत स्वभाव है। बस, सुविधा और स्वार्थ पूर्ति के मानस के कारण ही विकार अपनी जगह बना लेते है। यदि उदाहरण के लिए देखें तो सत्यनिष्ठा एक जीवन मूल्य है। हमें सच बोलकर सदा अच्छा महसूस होता है, आत्मिक शान्ति और संतुष्टि का अनुभव होता है, पवित्रता का एहसास होता है और सच बोलना सहज भी लगता है। वहीं जब झूठ का आश्रय लेना पड़े तो मन कचोटता है, गला सूखता है, दिल बैठ सा जाता है। वह इसलिए कि झूठ हमारी सहज स्वभाविक प्रतिक्रिया नहीं होती। सच कठिन हो सकता है, पर प्रकट करते हुए बड़ा सहज महसुस होता है, और परिणाम संतोष प्रदान करता है।  लेकिन सवाल उठता है कि इन पर चलना जब हमारे जीवन का स्वभाव है तो हम इन पर चल क्यों नहीं पाते? विषम परिस्थितियां आते ही डगमगा क्यों जाते हैं? क्यों आसान लगता है अनैतिक हो जाना, क्यों निष्ठावान रहना दुष्कर लगता है? कारण साफ है, क्षणिक सुख और सुविधा की तरफ ढल पडना बहुत ही आसान होता है, जबकि दृढ मनोबल बनाए रखना,  कठिन पुरूषार्थ की मांग करता है।

जिस तरह हीरे में चमकने का प्राकृतिक स्वभाव होने के उपरांत भी वह हमें प्राकृतिक चमकदार प्राप्त नहीं होता।  हीरा स्वयं बहुत ही कठोर पदार्थ होता है। उसे चमकाने के लिए, उससे भी कठोर व तीक्ष्ण औजारों से प्रसंस्करण की आवश्यकता होती है। उसकी आभा उभारने के लिए कटाई-घिसाई का कठिन श्रम करना पडता है। दाग वाला हिस्सा काट कर दूर करना पडता है। उस पर  सुनियोजित और सप्रमाण पहलू बनाने होते है। सभी पहलुओं घिस कर चिकना करने पर ही हीरा अपनी उत्कृष्ट चमक देता है। अगर हीरे में चमक अभिप्रेत है तो उसे कठिन श्रम से गुजरना ही पडेगा। ठीक उसी प्रकार सद्गुण हमारी अंतरात्मा का स्वभाव है, अपनाने कठिन होते ही है। सदाचार हमारे जीवन के लिए हितकर है, श्रेयस्कर है। यदि जीवन को दैदिप्यमान करना है तो कठिन परिश्रम और पुरूषार्थ से गुजरना ही होगा है। यदि सुंदर चरित्र का निर्माण हमारी ज्वलंत इच्छा है तो कटाव धिसाव के कठिन दौर से गुजरना ही होगा। सुहाते तुच्छ स्वार्थ के दाग हटाने होंगे। आचार विचार के प्रत्येक पहलू को नियमबद्ध चिकना बनाना ही होगा। यदि लक्ष्य उत्कृष्ट जीवन है तो स्वभाविक है, उन मूल्यों को प्राप्त करने लिए पुरूषार्थ भी अतिशय कठिन ही होगा।

यदि हम गहनता से विचार करें तो पाएंगे कि जो व्यक्ति अपने जीवन मूल्यों पर अडिग रहता है, निडर होकर जीता है। उसका अंतस आत्मबल से और भी निखर उठता है। जो भी इन मूल्यों को अपनाता हैं, उसे कर्तव्य निष्ठा का एहसास होता है। वह निर्भय होकर अपनी बात कहता है, स्वार्थ अपूर्ती से उपजने वाला भय उसे नहीं होता क्योंकि उसे कोई स्वार्थ ही नहीं होता। वह हर पल स्वयं को सुरक्षित अनुभव करता है। द्वंद्वं से मुक्त रहकर अपना निर्णय लेता है और दुविधा मुक्त हो अपने कार्य का निस्पादन करता है। अगर आप गहराई से समझें तो यही जीवन मूल्य हमारे लिए सुदृढ़ सुरक्षा कवच की तरह काम करते हैं। परिणाम स्वरूप हमें हर परिस्थिति में डट कर सामना करने का प्रबल साहस प्राप्त होता है. हमें लोग सम्मान की दृष्टि से देखते है। जीवन मूल्यों पर डटे रहने से तुच्छ सी इच्छाए, आकांक्षाएँ, अपेक्षाएं अवश्य चुक सकती है, मगर जीवन मूल्यों पर चलकर इच्छाओं और आकांक्षाओं के क्षणिक लाभकारी सुख से लाख गुना श्रेष्ठ  सुख, शांति, संतुष्टि, प्रेम  और स्थायी आदर सहज ही प्राप्त हो जाता है। मानव जीवन के लिए वस्तुतः स्थायी सुख ही श्रेयस्कर है।

 
 
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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर रेलवे अफसर।

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