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अपक्व सामग्री से ही पकवान बनता है.

13 जुलाई

एक लड़की अपनी माँ के पास आकर अपनी परेशानियों का रोना रो रही थी।

वो परीक्षा में फेल हो गई थी। सहेली से झगड़ा हो गया। मनपसंद ड्रेस प्रैस कर रही थी वो जल गई। रोते हुए बोली, “मम्मी, देखो ना, मेरी जिन्दगी के साथ सब कुछ उलटा – पुल्टा हो रहा है।”

माँ ने मुस्कराते हुए कहा, यह उदासी और रोना छोड़ो, चलो मेरे साथ रसोई में, “तुम्हें आज तुम्हारी मनपसंद दाल कचोडियां खिलाती हूँ।”

लड़की का रोना बंद हो गया और हंसते हुये बोली,”दाल कचोडियां तो मेरा प्रिय व्यंजन है। कितनी देर में बनेगी?”, कन्या ने चहकते हुए पूछा।

माँ ने सबसे पहले मैदे का डिब्बा उठाया और प्यार से कहा, “ले पहले मैदा खा ले।” लड़की मुंह बनाते हुए बोली, “इसे कोई खाता है भला।” माँ ने फिर मुस्कराते हुये कहा, “तो ले सौ ग्राम दाल ही खा ले।” फिर नमक और मिर्च मसाले का डिब्बा दिखाया और कहा, “लो इसका भी स्वाद चख लो।”

“माँ!! आज तुम्हें क्या हो गया है? जो मुझे इस तरह की चीजें खाने को दे रही हो?”

माँ ने बड़े प्यार और शांति से जवाब दिया, “बेटा!! कचोडियां इन सभी अरूचक चीजों से ही बनती है और ये सभी वस्तुएं मिल कर, पक कर ही कचोडी को स्वादिष्ट बनाती हैं। अपक्व सामग्री के समायोजन से ही पकवान बनता है। मैं तुम्हें बताना चाह रही थी कि “जिंदगी का पकवान” भी इसी प्रकार की अप्रिय घटनाओं से परिपक्व बनता है।

फेल हो गई हो तो इसे चुनौती समझो और मेहनत करके पास हो जाओ।

सहेली से झगड़ा हो गया है तो अपना व्यवहार इतना मीठा बनाओ कि फिर कभी किसी से झगड़ा न हो।

यदि मानसिक तनाव के कारण “ड्रेस” जल गई तो सदैव ध्यान रखो कि मन की हर स्थिति परिस्थिति में अविचलित रहो।

बिगड़े मन से काम भी तो बिगड़ेंगे। कार्यकुशल बनने के लिए मन के चिंतन को विवेक-कुशल बनाना अनिवार्य है।

कच्चे अनुभवों के बूते पर ही जीवन चरित्र परिष्कृत और परिपक्व बनता है। जीवन के उतार चढाव ही संघर्ष को उर्जा प्रदान करते है। एक बुरा अनुभव आगामी कितने ही बुरे अनुभवों से बचाता है। गलतियां विवेक को सजग रखती है।  बुरे अनुभवों से मायूस होकर बैठना प्रयत्न के पहले ही हार मानने के समान है। हमेशा दूरह मार्ग ही, दुर्गम लक्ष्य का संधान करवाता है।

 

25 responses to “अपक्व सामग्री से ही पकवान बनता है.

  1. ताऊ रामपुरिया

    13/07/2013 at 7:54 अपराह्न

    बहुत सुंदर और उपयोगी सीख, आभार.रामराम.

     
  2. प्रवीण पाण्डेय

    13/07/2013 at 7:55 अपराह्न

    सच्ची और अच्छी सीख, पूरा और ढंग से जीना सीखना होगा।

     
  3. अरुन शर्मा 'अनन्त'

    13/07/2013 at 8:44 अपराह्न

    आपकी यह रचना कल रविवार (14 -07-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंककी गई है कृपया पधारें.

     
  4. Ankur Jain

    13/07/2013 at 9:18 अपराह्न

    बहुत ही सुंदर सीख देती कथा है..आभार आपका।।

     
  5. डॉ. मोनिका शर्मा

    13/07/2013 at 9:23 अपराह्न

    मन को सचेत करती पोस्ट …..हर अनुभव एक थांती बने ..

     
  6. धीरेन्द्र सिंह भदौरिया

    13/07/2013 at 10:12 अपराह्न

    बहुत खूब,सुंदर प्रेरक सीख देती पोस्ट ,,,RECENT POST : अपनी पहचान

     
  7. शिखा कौशिक

    13/07/2013 at 10:23 अपराह्न

    bahut prerak katha .aabhar

     
  8. सतीश सक्सेना

    13/07/2013 at 10:27 अपराह्न

    सही बात ..

     
  9. Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता

    13/07/2013 at 11:03 अपराह्न

    prerak kahani. thanks🙂

     
  10. पूरण खण्डेलवाल

    13/07/2013 at 11:07 अपराह्न

    प्रेरणादायक कहानी !!

     
  11. संजय अनेजा

    14/07/2013 at 12:17 पूर्वाह्न

    "जिंदगी का पकवान" भी इसी प्रकार की अप्रिय घटनाओं से परिपक्व बनता है -अप्रिय से प्रिय तक की यात्रा कठिन जरूर है लेकिन सार्थक।

     
  12. संगीता स्वरुप ( गीत )

    14/07/2013 at 12:25 पूर्वाह्न

    कार्यकुशल बनने के लिए मन के चिंतन को विवेक-कुशल बनाना अनिवार्य है।बहुत अच्छी सीख देती प्रेरक कथा ।

     
  13. Anurag Sharma

    14/07/2013 at 4:01 पूर्वाह्न

    शिक्षाप्रद कथा, आभार!

     
  14. वाणी गीत

    14/07/2013 at 7:14 पूर्वाह्न

    करत करत अभ्यास के …कोशिश जारी रहे बस ….उद्देश्यपरक कथा !!

     
  15. manoj jaiswal

    14/07/2013 at 11:51 पूर्वाह्न

    बहुत सुंदर और उपयोगी सीख सुज्ञ जी,अच्छी सीख देती प्रेरक कथा।

     
  16. राजेंद्र कुमार

    14/07/2013 at 12:13 अपराह्न

    बहुत ही सुंदर सीख देती कथा है..आभार

     
  17. Alpana Verma

    14/07/2013 at 12:19 अपराह्न

    गलतियां विवेक को सजग रखती है। बहुत सही सीख देती हुई कहानी.आभार.

     
  18. सुज्ञ

    14/07/2013 at 1:21 अपराह्न

    अरून जी, आपका बहुत बहुत आभार!!

     
  19. दिगम्बर नासवा

    14/07/2013 at 2:37 अपराह्न

    बहुत उपयोगी बात कही है आपने इस घटना के माध्यम से …जीब्वन की कुंजी है ये …

     
  20. डॉ टी एस दराल

    14/07/2013 at 7:11 अपराह्न

    एक ही बोध कथा में अनेक सीख। उत्तम विचार।

     
  21. अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com)

    14/07/2013 at 8:33 अपराह्न

    जीवन को सँवारने के लिये सार्थक संदेश……..

     
  22. के. सी. मईड़ा

    15/07/2013 at 2:26 अपराह्न

    बहुत सुन्दर तरीके से अभिव्यक्ति…व्यक्ति जीतना अपनी गलतियों से सीखता है उतना दुसरी चीज से नहीं सीख सकता ….बधाई..

     
  23. सदा

    17/07/2013 at 12:53 अपराह्न

    कार्यकुशल बनने के लिए मन के चिंतन को विवेक-कुशल बनाना अनिवार्य है।यह सीख देती प्रस्‍तुति बहुत ही अच्‍छी लगी .. प्रेरणात्‍मक प्रस्‍तुति

     
  24. jyoti khare

    17/07/2013 at 1:43 अपराह्न

    जीवन में सलीका और कार्यशैली सिखाती बेहतरीन रचनासुंदर कथा कौशलसादर

     
  25. देवेन्द्र पाण्डेय

    25/07/2013 at 4:29 अपराह्न

    बहुत सुंदर।

     

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं यह ब्लॉग लिखने के अलावा गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। रेलवे से ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर्ड अफसर।

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