RSS

बहिर्मुखी दृष्टि

13 जून

किसी गाँव में एक बुढ़िया रात के अँधेरे में अपनी झोपडी के बहार कुछ खोज रही थी। तभी गाँव के ही एक व्यक्ति की नजर उस पर पड़ी , “अम्मा! इतनी रात में रोड लाइट के नीचे क्या ढूंढ रही हो ?”, व्यक्ति ने पूछा। “कुछ नहीं! मेरी सूई गुम हो गयी है, बस वही खोज रही हूँ।”, बुढ़िया ने उत्तर दिया।

फिर क्या था, वो व्यक्ति भी महिला की मदद में जुट गया और सूई खोजने लगा। कुछ देर में और भी लोग इस खोज अभियान में शामिल हो गए और देखते- देखते लगभग पूरा गाँव ही इकठ्ठा होकर, सूई की खोज में लग गया। सभी बड़े ध्यान से सूई ढूँढने में लगे हुए थे कि तभी किसी ने बुढ़िया से पूछा ,”अरे अम्मा ! ज़रा ये तो बताओ कि सूई गिरी कहाँ थी?”

“बेटा , सूई तो झोपड़ी के अन्दर गिरी थी।”, बुढ़िया ने ज़वाब दिया। ये सुनते ही सभी बड़े क्रोधित हो गए। भीड़ में से किसी ने ऊँची आवाज में कहा, “कमाल करती हो अम्मा ,हम इतनी देर से सूई यहाँ ढूंढ रहे हैं जबकि सूई अन्दर झोपड़े में गिरी थी, आखिर सूई वहां खोजने की बजाए, यहाँ बाहर क्यों खोज रही हो ?” बुढ़िया बोली, ” झोपडी में तो धुप्प अंधेरा था, यहाँ रोड लाइट का उजाला जो है, इसलिए।”

मित्रों, हमारी दशा भी इस बुढिया के समान है। हमारे चित्त की शान्ति, मन का आनन्द तो हमारे हृदय में ही कहीं खो गया है, उसे भीतर आत्म-अवलोकन के द्वारा खोजने का प्रयास होना चाहिए। वह श्रम तो हम करते नहीं, क्योंकि वहाँ सहजता से कुछ भी नजर नहीं आता, बस बाहर की भौतिक चकाचौंध में हमें सुख और आनन्द मिल जाने का भ्रम लगा रहता है। शायद ऐसा इसलिए है कि अन्तर में झांकना बडा कठिन कार्य है, वहां तो हमें अंधकार प्रतीत होता है, और चकाचौंध में सुख खोजना बडा सहज ही सुविधाजनक लगता है। किन्तु यथार्थ तो यह है कि आनन्द जहां गुम हुआ है उसे मात्र वहीं से ही पुनः प्राप्त किया जा सकता है।

आनन्द अन्तर्मन में ही छुपा होता है। बाहरी संयोगों का सुख, केवल और केवल मृगतृष्णा है। यदि हृदय प्रफुल्लित नहीं तो कोई भी बाहरी सुख-सुविधा हमें प्रसन्न करने में समर्थ नहीं। और यदि मन प्रसन्न है, संतुष्ट है तो कोई भी दुविधा हमें दुखी नहीं कर सकती।

 

टैग: , , , , ,

19 responses to “बहिर्मुखी दृष्टि

  1. Anupama Tripathi

    13/06/2013 at 8:33 अपराह्न

    सार्थक सुन्दर विचार …आभार …

     
  2. Kailash Sharma

    13/06/2013 at 8:48 अपराह्न

    बहुत प्रेरक कथा…

     
  3. प्रवीण पाण्डेय

    13/06/2013 at 8:51 अपराह्न

    सच बात है..सुन्दर कथा।

     
  4. Anurag Sharma

    13/06/2013 at 9:01 अपराह्न

    हार्दिक आभार! सार्वभौमिक कथा। प्रकाश का ऐसा आशावान प्रयोग जीवन के हर क्षेत्र में देखा है (बेशक सुई कभी न दिखी हो)

     
  5. प्रसन्न वदन चतुर्वेदी

    13/06/2013 at 9:04 अपराह्न

    उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति…बहुत बहुत बधाई…@मेरी बेटी शाम्भवी का कविता-पाठ

     
  6. ताऊ रामपुरिया

    13/06/2013 at 9:32 अपराह्न

    कथा अपने आप में परिपूर्ण है, इसका सार भी स्पष्ट है सुज्ञ जी, पर आजकल बात इससे आगे बढ गई है.यहां कम से कम बुढिया को तो ये मालुम है कि सूई अंदर गिरी है पर अंदर (मन)अंधेरा है, फ़िर झूंठ मूंठ ही सही, सूई (प्रभु)को खोजने के प्रयत्न में तो लगी है, शायद है ढूंढते ढूंढ्ते कभी बाहर से अंदर भी पहुंच जाये. बाकी खोजने वाले संगी साथी तो बुढिया से भी गये गुजरे हैं, बस नकल में लगे हैं.पर असली समस्या आजकल यह खडी हो गई है कि आजकल बुढिया को भी नही मालूम कि सूई बाहर गिरी की अंदर? या कि कहीं गिरी भी है? बस लोक दिखावन के लिये राम राम…राम जपने में लगी है. तो बताईये इस स्थिति कोई सयाना गुरू भी क्या कर लेगा? हम इतने विराट भौतिक जंजालों में उलझ चुके हैं कि हमें सूई की कोई चिंता ही नही है, कि सूई गिर चुकी है? घर में सूई का कोई महत्व भी है या नही? नही हमें कोई फ़िक्र नही है. वर्तमान में हम अपने लिये सूई का महत्व ही खो चुके हैं, बुढिया कम से कम नकली तरीके से हरि भजन करके काम में लगी तो थी, आजकल कोई सूई को ढूंढने का प्रयत्न तो दूर बल्कि सूई का ख्याल ही नही करता, बहुत ही प्रेरक कथा, आभार.रामराम.

     
  7. सतीश सक्सेना

    13/06/2013 at 11:10 अपराह्न

    हम भी पता नहीं कब से खोज रहे हैं बाहर…

     
  8. संगीता स्वरुप ( गीत )

    13/06/2013 at 11:53 अपराह्न

    विचारणीय पोस्ट ….

     
  9. sadhana vaid

    14/06/2013 at 12:37 पूर्वाह्न

    हर भ्रमित इंसान को सार्थक सन्देश देती एक प्रेरक कथा ! आभार आपका इतनी खूबसूरत प्रस्तुति के लिये !

     
  10. महेन्द्र श्रीवास्तव

    14/06/2013 at 9:11 पूर्वाह्न

    क्या बात, बहुत बढिया

     
  11. वाणी गीत

    14/06/2013 at 11:12 पूर्वाह्न

    क्या बात !

     
  12. वाणी गीत

    14/06/2013 at 11:13 पूर्वाह्न

    सच में , पहले पता तो हो कि कुछ खो गया है !!प्रेरक !

     
  13. के. सी. मईड़ा

    14/06/2013 at 1:46 अपराह्न

    अच्छी सीख देती कहानी…

     
  14. डॉ टी एस दराल

    14/06/2013 at 8:29 अपराह्न

    सही कहा है। अन्दर झाँकने की ज़रुरत है।

     
  15. vandana gupta

    14/06/2013 at 8:45 अपराह्न

    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(15-6-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।सूचनार्थ!

     
  16. सुज्ञ

    14/06/2013 at 10:07 अपराह्न

    आभार,वंदना जी.

     
  17. jyoti khare

    15/06/2013 at 12:15 पूर्वाह्न

    सार्थक और प्रेरक लघु कथावाकई हम दिशा और दशा से भटक गये हैंउत्कृष्ट प्रस्तुतिबधाईआग्रह है- पापा ———

     
  18. धीरेन्द्र सिंह भदौरिया

    17/06/2013 at 2:52 अपराह्न

    बहुत सुंदर प्रेरक प्रस्तुति,,,RECENT POST: जिन्दगी,

     
  19. Alpana Verma

    24/06/2013 at 9:53 अपराह्न

    यही तो हो रहा है आजकल!इसीलिये पहले समय की अपेक्षा कहीं अधिक अशांति और अधर्म है.

     

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

 
गहराना

विचार वेदना की गहराई

॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

तिरछी नजरिया

हितेन्द्र अनंत का दृष्टिकोण

मल्हार Malhar

पुरातत्व, मुद्राशास्त्र, इतिहास, यात्रा आदि पर Archaeology, Numismatics, History, Travel and so on

मानसिक हलचल

ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं यह ब्लॉग लिखने के अलावा गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। रेलवे से ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर्ड अफसर।

सुज्ञ

चरित्र विकास

Support

WordPress.com Support

Hindizen - हिंदीज़ेन

Hindizen - हिंदीज़ेन : Best Hindi Motivational Stories, Anecdotes, Articles...

The WordPress.com Blog

The latest news on WordPress.com and the WordPress community.

%d bloggers like this: