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मान

07 मई
पिछले अध्याय में आपने व्यक्तित्व के शत्रुओं मे से प्रथम शत्रु क्रोध पर पढा. प्रस्तुत है दूसरा शत्रु “मान“……

मोह वश रिद्धि, सिद्धि, समृद्धि, सुख और जाति आदि पर अहम् बुद्धि रूप मन के परिणाम को “मान” कहते है. मद, अहंकार, घमण्ड, गारव, दर्प, ईगो और ममत्व(मैं) आदि ‘मान’ के ही स्वरूप है. कुल, जाति, बल, रूप, तप, ज्ञान, विद्या, कौशल, लाभ, और ऐश्वर्य पर व्यक्ति ‘मान’ (मद) करता है.

मान वश मनुष्य स्वयं को बडा व दूसरे को तुच्छ समझता है. अहंकार के कारण व्यक्ति दूसरों के गुणों को सहन नहीं करता और उनकी अवहेलना करता है. घमण्ड से ही ‘मैं’ पर घनघोर आसक्ति पैदा होती है. यही दर्प, ईर्ष्या का उत्पादक है. गारव के गुरुतर बोझ से भारी मन, अपने मान की रक्षा के लिए गिर जाता है. प्रशंसा, अभिमान के लिए ताजा चारा है. जहां कहीं भी व्यक्ति का अहंकार सहलाया जाता है गिरकर उसी व्यक्ति की गुलामी को विवश हो जाता है. अभिमान स्वाभिमान को भी टिकने नहीं देता. अहंकार वृति से यश पाने की चाह, मृगतृष्णा ही साबित होती है. दूसरे की लाईन छोटी करने का मत्सर भाव इसी से पैदा होता है.

आईए देखते है महापुरूषों के कथनों में मान (अहंकार) का स्वरूप….

“अहंकारो हि लोकानाम् नाशाय न वृद्ध्ये.”   (तत्वामृत) – अहंकार से केवल लोगों का विनाश होता है, विकास नहीं होता.
“अभिमांकृतं कर्म नैतत् फल्वदुक्यते.”   (महाभारत पर्व-12) – अहंकार युक्त किया गया कार्य कभी शुभ फलद्रुप नहीं हो सकता.
“मा करू धन जन यौवन गर्वम्”.  (शंकराचार्य) – धन-सम्पत्ति, स्वजन और यौवन का गर्व मत करो. क्योंकि यह सब पुण्य प्रताप से ही प्राप्त होता है और पुण्य समाप्त होते ही खत्म हो जाता है.
“लुप्यते मानतः पुंसां विवेकामललोचनाम्.”  (शुभचंद्राचार्य) –  अहंकार से मनुष्य के विवेक रूप निर्मल नेत्र नष्ट हो जाते है.
“चरित्र एक वृक्ष है और मान एक छाया। हम हमेशा छाया की सोचते हैं; लेकिन असलियत तो वृक्ष ही है।”    अब्राहम लिंकन
“बुराई नौका में छिद्र के समान है। वह छोटी हो या बड़ी, एक दिन नौका को डूबो देती है।”    -कालिदास
“समस्त महान ग़लतियों की तह में अभिमान ही होता है।”    -रस्किन
“जिसे होश है वह कभी घमंड नहीं करता।”    –शेख सादी
“जिसे खुद का अभिमान नहीं, रूप का अभिमान नहीं, लाभ का अभिमान नहीं, ज्ञान का अभिमान नहीं, जो सर्व प्रकार के अभिमान को छोड़ चुका है, वही संत है।”    –महावीर स्वामी
“जिस त्‍याग से अभिमान उत्‍पन्‍न होता है, वह त्‍याग नहीं, त्‍याग से शांति मिलनी चाहिए, अंतत: अभिमान का त्‍याग ही सच्‍चा त्‍याग है।”    –विनोबा भावे
“ज्यों-ज्यों अभिमान कम होता है, कीर्ति बढ़ती है।”   –यंग
“अभिमान करना अज्ञानी का लक्षण है।”    (सूत्रकृतांग)
“जिनकी विद्या विवाद के लिए, धन अभिमान के लिए, बुद्धि का प्रकर्ष ठगने के लिए तथा उन्नति संसार के तिरस्कार के लिए है, उनके लिए प्रकाश भी निश्चय ही अंधकार है।”    –क्षेमेन्द्र

विचित्रता तो यह है कि अभिमान से मनुष्य ऊँचा बनना चाहता है किंतु परिणाम सदैव नीचा बनने का आता है. निज बुद्धि का अभिमान ही, शास्त्रों की, सन्तों की बातों को अन्त: करण में टिकने नहीं देता. ‘मान’ भी विवेक को भगा देता है और व्यक्ति को शील सदाचार से गिरा देता है. अभिमान से अंधा बना व्यक्ति अपने अभिमान को बनाए रखने के लिए दूसरों का अपमान पर अपमान किए जाता है और उसे कुछ भी गलत करने का भान नहीं रहता. यह भूल जाता है कि प्रतिपक्ष भी अपने मान को बचाने में पूर्ण संघर्ष करेगा. आत्मचिंतन के अभाव में मान को जानना तो दूर पहचाना तक नहीं जाता. वह कभी स्वाभिमान की ओट में तो कभी बुद्धिमत्ता की ओट में छुप जाता है. मान सभी विकारों में सबसे अधिक प्रभावशाली व दुर्जेय है.

मान को मार्दव अर्थात् मृदुता व कोमल वृति से जीता जा सकता है.

अहंकार को शांत करने का एक मात्र उपाय है ‘विनम्रता’.

दृष्टांत:   दर्पोदय
             अहम् सहलाना
दृष्टव्य:  मन का स्वस्थ पोषण
             विनम्रता
             नम्रता
             दुर्गम पथ सदाचार
             मुक्तक

 

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17 responses to “मान

  1. Anurag Sharma

    07/05/2013 at 8:55 अपराह्न

    इस शृंखला के लिए साधुवाद! लगता है कि मान नशे की तरह है। तोष के लिये मान-पान होता है और फिर उसपर निर्भरता बढ़ती जाती है। अपमान होने (या समझने) पर अहं आहात होता है और क्रोध आता है

     
  2. कालीपद प्रसाद

    07/05/2013 at 9:51 अपराह्न

    बहुत सुन्दर सूक्तियां का समावेश ,बहुत सुन्दर प्रस्तुति

     
  3. Aziz Jaunpuri

    07/05/2013 at 9:52 अपराह्न

    sundar shrinkhla

     
  4. डॉ. मोनिका शर्मा

    07/05/2013 at 10:37 अपराह्न

    सार्थक चिंतन ….. ये बातें जीवन की दिशा तय करती हैं

     
  5. सतीश सक्सेना

    07/05/2013 at 11:46 अपराह्न

    सच कहा आपने ..मगर लोगों के पास मनन का समय कहाँ है ??

     
  6. jyoti khare

    08/05/2013 at 12:05 पूर्वाह्न

    जीवन दर्शन को व्यक्त करतासार्थक और सुंदर आलेख बधाई

     
  7. धीरेन्द्र सिंह भदौरिया

    08/05/2013 at 12:57 पूर्वाह्न

    बहुत सुंदर आलेख ,,,RECENT POST: नूतनता और उर्वरा,

     
  8. भारतीय नागरिक - Indian Citizen

    08/05/2013 at 8:23 पूर्वाह्न

    जी हां बहुत अच्छी तरह से समझाया है आपने.

     
  9. निहार रंजन

    08/05/2013 at 8:47 पूर्वाह्न

    बहुत अच्छे पोस्ट पढने को मिले हैं इस श्रृंखला में .

     
  10. Rajendra Kumar

    08/05/2013 at 9:16 पूर्वाह्न

    बहुत ही सार्थक चिंतन ,बहुउपयोगी आलेख.

     
  11. दिगम्बर नासवा

    08/05/2013 at 12:34 अपराह्न

    साधुवाद … मान का अंतर स्पष्ट करती पोस्ट … मान नीचे की और ही ले जाता है …उद्धव और गोपियों का वार्तालाप याद आ गया "मान" की व्याख्या पढते हुए …

     
  12. Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता

    08/05/2013 at 1:36 अपराह्न

    wonderful article| thanks🙂

     
  13. मैं और मेरा परिवेश

    08/05/2013 at 9:41 अपराह्न

    अहंकार पर कितनी अच्छी सामग्री आपने हमें दी, आभार।

     
  14. Kailash Sharma

    08/05/2013 at 11:16 अपराह्न

    बहुत सारगर्भित प्रस्तुति…

     
  15. वाणी गीत

    09/05/2013 at 8:32 पूर्वाह्न

    स्वाभिमान और अभिमान के बीच बारीक लकीर है . स्वाभिमान को जागृत होना और अभिमान को सुशुप्त रहना है या रहना ही नहीं है .

     
  16. संजय अनेजा

    09/05/2013 at 11:55 पूर्वाह्न

    मान रखना और अभिमान से बचना दोनों बहुत जरूरी हैं लेकिन कब इनके बीच की सीमा हम लांघ लेते हैं, पता ही नहीं चलता।

     
  17. अल्पना वर्मा

    11/05/2013 at 4:59 अपराह्न

    अभिमान से व्यक्ति को होने वाली हानि तथा बचाव कैसे करें ..सभी कुछ इस लेख में मिला.आभार.

     

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं यह ब्लॉग लिखने के अलावा गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। रेलवे से ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर्ड अफसर।

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