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आभार, हिंदी ब्लॉग जगत……..

28 अप्रैल

ब्लॉग जगत में आते ही एक अभिलाषा बनी कि नैतिक जीवन मूल्यों का प्रसार करूँ. लेकिन डरता था पता नहीं प्रगतिशील लोग इसे किस तरह लेंगे. आज के आधुनिक युग में पुरातन जीवन मूल्यों और आदर्श की बात करना परिहास का कारण बन सकता था. लेकिन हिंदी ब्लॉगजगत के मित्रों ने मेरे विचारों को हाथो हाथ लिया. मात्र अनुकूलता की अपेक्षा थी किंतु यहाँ तो मेरी योग्यता से भी कईँ गुना अधिक, आदर व सम्मान मिला, और वो भी अल्पकाल में ही.

इतना ही नहीं, मित्रों के ब्लॉग-पोस्ट पर जा जाकर उनके विचारों के विरुद्ध तीव्र प्रतिघात दिए. जहाँ कहीं भी अजानते ही जीवन- मूल्यों को ठेस पहूँचने का अंदेशा होता, वहाँ चर्चा मेरे लिए अपरिहार्य बन जाती थी. मित्र ऐसी बहस से आहत अवश्य हुए, किंतु उन्होने अपना प्रतिपक्ष रखते हुए भी, समता भाव से मेरे प्रति स्नेह बनाए रखा.

कुल मिलाकर कहुँ तो हिंदी ब्लॉगजगत से मुझे अभिन्न आदर सम्मान मिला. आज मेरे “सुज्ञ” ब्लॉग को तीन वर्ष पूर्ण हुए. इतना काल आप सभी के अपूर्व स्नेह के बूते सम्पन्न किया. सत्कार भूख ने इस प्रमोद को नशा सा बना दिया. तीन वर्ष का समय कब सरक गया, पता भी न चला. यह स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं कि काफी सारा समय जो व्यवसाय या परिवार का था, मैंने यहां उडेल दिया. किंतु मन की शांति भी तो आवश्यक है, यहाँ नहीं तो मैं अपनी रूचियां और रंजन कहीं अन्यत्र प्रतिपूर्ण करता. फिर इस रूचिप्रद कार्य को कुछ समय देना सालता नहीं है. वस्तुतः इस प्रमोद ने मुझे कितने ही तनावो से उबारा है और बहुत से कठिन समय में सहारा बना है. मैं कृतज्ञ हूँ आप सभी के भरपूर स्नेह के लिए.

सभी ब्लॉगर बंधु और पाठक मित्रों का हृदय से कोटि कोटि  आभार

 

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87 responses to “आभार, हिंदी ब्लॉग जगत……..

  1. yashoda agrawal

    28/04/2013 at 2:16 अपराह्न

    अशेष बधाइयाँ …..आपका लेखन काबिले तारीफ हैएक जिज्ञासा है मन में….हम जो देखते..सुनते और पढ़ते हैंकई विचार मन में आते हैंसोचते हैं कि लिख डालें….जब लिखने बैठते हैं तोसब भूल जाते हैं…ऐसा क्यों…..सादर

     
  2. yashoda agrawal

    28/04/2013 at 2:19 अपराह्न

    आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 01/05/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

     
  3. शिवम् मिश्रा

    28/04/2013 at 2:21 अपराह्न

    हुज़ूर … अभी तो यह सिर्फ शुरुआत है … ;)हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनायें स्वीकार करें !

     
  4. एक बेहद साधारण पाठक

    28/04/2013 at 2:33 अपराह्न

    मैंने तो आज ही ध्यान दिया कि तीन साल पूरे हो गये .. ध्यान जाता भी कैसे …..इस ब्लॉग पर हर पोस्ट एक नयी ताजगी के साथ जो आती है .. मैं आपका ह्रदय से आभारी हूँ की आप हम लोगों के साथ लाइफ़ के ये अनमोल फंडे शेयर कर रहे हैं

     
  5. Kunwar Kusumesh

    28/04/2013 at 2:37 अपराह्न

    ब्लॉग के तीन वर्ष पूर्ण करने की हार्दिक बधाई।आपका लेखन सदैव मानवतावादी सोंच से लबरेज़ रहता है,यही समय की माँग भी है।

     
  6. चला बिहारी ब्लॉगर बनने

    28/04/2013 at 2:37 अपराह्न

    लगभग शुरू से ही आपके साथ जुड़ा रहा.. आपकी पोस्ट एक सार्थक ऊर्जा का संचार करती थी और करती है… आपसे प्रेरणा मिली, रूपान्तरण हुआ और बहुत सी बातें मैंने भी सार्थक ढंग से आपसे बांटीं.. एक अलग स्थान बनाते हुए ब्लॉग जगत के आकाश पर ध्रुव की तरह अडिग बने रहे!!आपकी यह यात्रा यूं ही अग्रसर होती रहे यही हमारी मंगलकामना है!!

     
  7. Mahaveer Jain

    28/04/2013 at 2:48 अपराह्न

    आदरणीय भाईसाहब सादर जय जिनेद्र ब्लॉग जगत में आपकी उपस्थिति एवं तीन वर्ष का यह कार्यकाल जीवन के मूल उद्देश्य नैतिकता को समर्पित रहा आप इसमें सफल रहे इसके लिए हार्दिक मंगल भावनाए एवं बधाई . चुकी आपकी लेखनी उच्च कोठी की है एवं एक एक शब्द में आप प्राण की प्रतिष्ठा करते है जिससे शब्द बोल उठते है और व्यक्ति एवं समाज को प्रेरित करते है नैतिकता एवं आध्यात्मिकता की और . सुज्ञ जी यह मेरे लिए ही नही अपितु पुरे हिंदी ब्लॉग जगत के लिए गौरव एवं सम्मान की बात है की हमारे बीच आप जैसा साहित्यक एवं सरस्वती पुत्र मौजूद है जिसे हम हर समय कुछ अविवादित नया सीखते है और सदैव अपेक्षारत रहते है की सुज्ञ जी आज नया क्या लिख रहे है जिससे हम कुछ प्राप्त कर सके . आपकी लेखनी में जादू है और आकर्षण भी साथ ही साथ जीवन के अहम मुल्य नैतिकता का विजन …. यह सभी बाते आपको एवं आपकी लेखनी को जन-जन के दिल को छुने के लिए प्रायप्त है . आपका अपना महावीर जैन "भारती"प्रधान सम्पादक जैन तेरापंथ न्यूज ब्योरो मुंबई

     
  8. धीरेन्द्र सिंह भदौरिया

    28/04/2013 at 3:05 अपराह्न

    ब्लोगिंग के तीन वर्ष पूर्ण करने की बहुत२ हार्दिक बधाई।!!!सुज्ञ जी.. Recent post: तुम्हारा चेहरा ,

     
  9. देवेन्द्र पाण्डेय

    28/04/2013 at 3:16 अपराह्न

    बधाई हो..

     
  10. देवेन्द्र पाण्डेय

    28/04/2013 at 3:16 अपराह्न

    आपसे जुड़ना एक सुखद अनुभव रहा।

     
  11. vandana gupta

    28/04/2013 at 3:31 अपराह्न

    ब्लॉग के तीन वर्ष पूर्ण करने की हार्दिक बधाई।

     
  12. प्रवीण पाण्डेय

    28/04/2013 at 3:35 अपराह्न

    ढेरों शुभकामनायें..आप ऐसे ही लिखते रहें।

     
  13. Neetu Singhal

    28/04/2013 at 3:43 अपराह्न

    क्योंकि हम समय का आदर नहीं करते…..

     
  14. Neetu Singhal

    28/04/2013 at 3:44 अपराह्न

    "यदि हम पुरातन से परिचित न हो, तो हमें आधुनिकता को पहचानने में कठिनाई होगी….."

     
  15. संतोष त्रिवेदी

    28/04/2013 at 4:15 अपराह्न

    गम्भीर लेखन में कम विकल्प हैं,उनमें भी आप अहम स्थान रखते हैं।..बधाइयाँ🙂

     
  16. Sushil Bakliwal

    28/04/2013 at 4:41 अपराह्न

    यूं ही चलते रहें और जरुरतमंद पाठकों को अपने संकलित ज्ञान से समृद्ध करते रहें । इन्हीं शुभकामनाओं के साथ…

     
  17. संजय अनेजा

    28/04/2013 at 4:42 अपराह्न

    धारा के विपरीत तैरना आसान नहीं है। कई बार अपना पक्ष रखते समय जाने अनजाने कुछ कटुतायें आ भी जाती हैं तो आपको अविचलित ही देखा है। चलते चलिये, शुभकामनायें।

     
  18. सतीश सक्सेना

    28/04/2013 at 4:48 अपराह्न

    सुज्ञ जी , मेरा यह दृढ विश्वास है कि अगर किसी लेखक का व्यवहार जानने के लिए उसकी मात्र 2-३ पोस्ट पढना ही काफी है !हर लेखक अपनी भावना अनुसार ही लिखता है,लेखनी उसका व्यवहार बताने में पूरी तौर पर समक्ष है ! यहाँ कुछ "विद्वजन" बेहद सावधानी से और संयत होकर भी लिखते हैं और उनका असली व्यवहार उनके लेखों से पढना आसान नहीं है मगर लापरवाही अथवा गुस्से में किये गए कमेन्ट अक्सर उनकी असलियत बता देते है ! आप उन व्यक्तियों में से एक हैं जिनको पढ़कर सुकून महसूस होता है..आपकी लेखन यात्रा के लिए मंगल कामनाएं !

     
  19. पूरण खण्डेलवाल

    28/04/2013 at 5:38 अपराह्न

    ब्लॉग लेखन के तीन वर्ष पूर्ण होने पर हार्दिक बधाई !!

     
  20. अल्पना वर्मा

    28/04/2013 at 5:43 अपराह्न

    तीन वर्ष पूरे करने पर बहुत-बहुत बधाई!आप का लिखा पढ़ने में अच्छा लगता है.बहुत सी पोस्ट्स प्रेरक और जीवन मूल्यों का ज्ञान देने वाली हैं.आगे भी ऐसे ही लिखते रहें ..शुभकामनाएँ .आपने अपने ब्लॉग्गिंग के इस समय तक के 'काफिले के हर सदस्य को याद रखा है इस के लिए आप का आभार क्योंकि ब्लॉगजगत वास्तविक दुनिया से अलग नहीं है यहाँ भी लोग 'नज़र'[टिप्पणीकर्ता के रूप में] में न रहो तो भूल जाते हैं या भुला दिए जाते हैं.

     
  21. सुज्ञ

    28/04/2013 at 5:46 अपराह्न

    विस्मृत होने के कईं कारण होते है…..1- जो नीतू जी ने बताया समय का आदर2- जरा से प्रमाद से विषय सामायिक नहीं रह पाता.3- वैचारिक लोगों के चिंतन में कईं विषय एक साथ बसर करते है.4- विचार आता है किंतु स्वयं हमारे ही निर्धारण में वह महत्व नहीं पाता.5- सबसे मुख्य जब विचार आता है नोट कर लेने की सावधानी का प्रयोग नहीं करते6- हमारी प्राथमिकताएं बदलती रहती है.

     
  22. सुज्ञ

    28/04/2013 at 5:48 अपराह्न

    यशोदा जी, आपका आभार, शुभकामनाओं के लिए भी

     
  23. expression

    28/04/2013 at 5:51 अपराह्न

    बधाईयाँ जी बधाइयां……शुभकामनाएं…रचनात्मकता बनी रहे.सादरअनु

     
  24. सुज्ञ

    28/04/2013 at 5:51 अपराह्न

    शिवम् मिश्रा जी, आपका आभार!!शुरुआत में ही आपका साथ है तो मुझे क्या कमी है……

     
  25. सुज्ञ

    28/04/2013 at 5:54 अपराह्न

    गौरव जी, आपके आदर मिश्रित प्रेम का कायल हूँ..आभार तो आपका…..

     
  26. डॉ टी एस दराल

    28/04/2013 at 6:25 अपराह्न

    बहुत बधाई और शुभकामनायें। मन पसंद काम करने से मन को शांति मिलती है। अपनी जिम्मेदारियां तो सब निभाते ही रहते हैं।

     
  27. सुज्ञ

    28/04/2013 at 6:26 अपराह्न

    बधाई के लिए आभार कुसुमेश जी,आपके स्नेह से प्रभावित है जी….

     
  28. सुज्ञ

    28/04/2013 at 6:31 अपराह्न

    सलिल जी, आपकी मंगलकामनाओं का आभार,मित्रवर!!इस तीन साल के पल्लवित पुष्पित होने में आपकी प्रेरणाओं का ही सींचन है.

     
  29. Anurag Sharma

    28/04/2013 at 6:36 अपराह्न

    सच्चाई छुप नहीं सकती •••🙂

     
  30. Anurag Sharma

    28/04/2013 at 6:42 अपराह्न

    तीसरी वर्षगांठ की बधाई और अगणित की शुभकामनाएँ। आपकी उपस्थिति ने हिन्दी ब्लॉगिंग के एक बड़े निर्वात को भरा है ••• जारी रहें

     
  31. सुज्ञ

    28/04/2013 at 6:44 अपराह्न

    महावीर जी.हृदय को प्रमुदित करते मधुर आपके शब्द है, आपकी शुभंकर भावनाओं के लिए आभार!!जो भी जानने समझने विश्लेषित करने की विधि का विकास कर पाया, वह सब जैन-दर्शन के अनेकांत का अवदान है. सम्यकदृष्टि से प्राप्त विवेक का जन्म जन्मांतर ऋणी रहूँगा. यही प्रयास रहेगा कि सम्यक नैतिकता की जीवन शैली पर सभी का आरोहण हो!! सादर जयजिनेंद्र!!

     
  32. सुज्ञ

    28/04/2013 at 7:08 अपराह्न

    धीरेन्द्र सिंह जी, आपका बहुत शुक्रिया!!

     
  33. सुज्ञ

    28/04/2013 at 7:09 अपराह्न

    आभार देवेंद्र जी

     
  34. सुज्ञ

    28/04/2013 at 7:13 अपराह्न

    आपसे जुडे रहना मेरे लिए सुखद और गौरवमय!!

     
  35. सुज्ञ

    28/04/2013 at 7:29 अपराह्न

    वंदना जी, बधाई के लिए आभार!!

     
  36. सुज्ञ

    28/04/2013 at 7:32 अपराह्न

    प्रवीण जी, शुभकामनाओं के लिए कोटिश धन्यवाद!!आपके प्रेरक वचन सहायक है.

     
  37. सुज्ञ

    28/04/2013 at 7:38 अपराह्न

    आभार,नीतू जी, बिलकुल समीक्षा के लिए दोनो का होना जरूरी है.

     
  38. सुज्ञ

    28/04/2013 at 7:43 अपराह्न

    बधाई के लिए आभार संतोष जी,यह आपका स्नेह है…..

     
  39. सुज्ञ

    28/04/2013 at 8:05 अपराह्न

    बहुत बहुत आभार सुशील जी, प्रयास यही है जो हमें अच्छा लगता है वह हरेक को प्रिय लगने के लिए पहूंचे….

     
  40. सुज्ञ

    28/04/2013 at 8:33 अपराह्न

    संजय अनेजा जी, अनंत आभार, आपकी सज्जनता से सीखता रहा हूँ.बैठे रहने से नदिया पार नहीं होती, कोशीश करने वालो की कभी हार नहीं होती.हार? यहाँ तो हार की भी चिंता नहीं, ग्लानि नहीं, फिर क्यों विचलित हों…..

     
  41. सुज्ञ

    28/04/2013 at 8:44 अपराह्न

    जी! सतीश जी, लेखनी आखिर तो लेखक के भावों को ही अभिव्यक्त करती है. लेख हो या टिप्पणी अधैर्य, आवेश, अहँकार, क्रोध और असावधानी व्यक्तित्व को उजागर कर ही देती है.मेरे प्रति आपका लगाव और स्नेह वास्तव में आपको सुकून महसूस करवाता है, वह शक्ति आपके दृष्टिकोण मेँ है, लेखन में कहाँ…..

     
  42. सुज्ञ

    28/04/2013 at 8:47 अपराह्न

    पूरण जी, बधाई के लिए आपका आभार मित्र!!

     
  43. सुज्ञ

    28/04/2013 at 9:12 अपराह्न

    बधाई के लिए आभार अल्पना जी,भला इस सफर में जिस पर चल कर निर्बाध सम्मान और आदर प्राप्त होता है, सफर के सहयोगियों के अवदान के प्रति कैसे कृतघ्न हो सकते है.

     
  44. सुज्ञ

    28/04/2013 at 9:18 अपराह्न

    अनु जी,आपकी शुभकामनाओं के लिए आभार!!

     
  45. सुज्ञ

    28/04/2013 at 9:27 अपराह्न

    डॉक्टर दराल साहब, शुभकामनाओं के लिए कोटि कोटि आभार!!सही कहा-"मन पसंद काम करने से मन को शांति मिलती है।"जिन्हें सम्यक प्रकार से जिम्मेदारियां निभाने के अवसर मिलते है,सौभाग्यशाली है.

     
  46. सुज्ञ

    28/04/2013 at 9:44 अपराह्न

    आपका अनंत आभार अनुराग जी,आपके सहयोग व सलाह का ऋणानुदान सहज सुलभ रहा है. आप दर्पण रहे है जिसमें मैंने सदैव अपने विचारों का बिंब परखा है.

     
  47. Ravishankar Shrivastava

    28/04/2013 at 11:06 अपराह्न

    बधाईयाँ. हिंदी ब्लॉग जगत भी आपका ऋणी रहेगा चूंकि यह आप जैसे सक्रिय ब्लॉगरों के भरोसे ही गुलजार रहता आया है🙂

     
  48. सुज्ञ

    28/04/2013 at 11:24 अपराह्न

    रवि जी, आपका प्रोत्साहन भी सहयोगी रहा है.आभारी हूँ!!

     
  49. VICHAAR SHOONYA

    28/04/2013 at 11:31 अपराह्न

    तीन वर्ष बीत गए और पता ही नहीं चला। मुझे ऐसा याद पड़ता है की शुरुवात में आपसे परिचय एक मियां जी (क्षमा करें उनका नाम याद नहीं आ रहा) के ब्लॉग पर आपकी टिप्पणियों के जरिये हुआ था। सच कहूँ तो पिछले दिनों जब मैं व्यस्त था तो सिर्फ आपके और संजय अनेजा जी के ब्लोग्स के जरिये ही मैं ब्लॉगजगत से जुड़ा हुआ था। मैं व्यक्तिगत रूप से आपका आभारी हूँ की बहुत सी जगहों पर आपके विचारों ने मेरा मार्गदर्शन किया है।

     
  50. राजन

    28/04/2013 at 11:41 अपराह्न

    मेरी और से भी आपको बधाई एवं शुभकामनाएँ!चाहे आपसे कुछ बातों में तीव्र असहमति रहे पर ये बात तो सभी मानेंगे कि आप कभी किसीके प्रति असंयमित नहीं होते हैं।इस ब्लॉग के अलावा आप "निरामिष" के माध्यम से जो कर रहे हैं वह भी बहुत महत्वपूर्ण और अनुकरणीय है।मैंने अक्सर देखा है कि आप इस बात को लेकर कई बार परेशान हो जाते हैं कि लोग संस्कारों को दोष क्यों दे रहे हैं खासकर जब बलात्कार जैसी कोई घटना होती है।हो सकता है आपका ये सोचना सही हो पर मुझे लगता है कि इसमे निहित भावार्थ संस्कारों को दोष देना नहीं बल्कि उस प्रवृति का विरोध है जिसमें हम ये मानते नहीं कि हमारे बीच कुछ गलत भी है।जब कोई यह कहता है कि क्या यही हमारे संस्कार है? तब इसका मतलब यह नहीं होता कि हमारे उच्च नैतिक प्रतिमानों को कोसा जा रहा है बल्कि हम जो हमारे ही नैतिक मूल्यों का प्रचार प्रसार व उनका पालन कराने में असमर्थ रहे उस असफलता को दोष देना है।वर्ना अपने समाज अपने परिवार अपने धर्म से सभी को लगाव होता ही है बाकी ज्यादा गंभीर होना भी सही नहीं होता।मेरा तो अपने बारे में भी यही मानना है कि न मैं किसीके सहमत होने भर से सही होता हूँ न असहमत होने भर से गलत ।

     
  51. सुज्ञ

    28/04/2013 at 11:45 अपराह्न

    दीप जी,मुझे भी स्मरण है,हमारी मुलाकात कुछ ऐसे ही हुई थी. आपका आभार कि आप व्यस्तताओं के मध्य भी हमारी खोज खबर लेते रहे. यह आपका मित्रता भरा स्नेह है जो आप श्रेय अर्पण कर रहे है. इस वात्सल्य भाव के लिए पुनः आभार!!

     
  52. डा. श्याम गुप्त

    29/04/2013 at 12:21 पूर्वाह्न

    सतीश जी लेखक का व्यवहार नहीं…. लेखन व उसकी गुणवत्ता देखनी चाहिए..

     
  53. संगीता स्वरुप ( गीत )

    29/04/2013 at 12:37 पूर्वाह्न

    ब्लॉग जगत में तीन वर्ष होने की बधाई ….. आपका लेखन सार्थक और प्रेरक होता है …. आभार ।

     
  54. डॉ. मोनिका शर्मा

    29/04/2013 at 1:11 पूर्वाह्न

    हार्दिक शुभकामनायें | सद्प्रयास जारी रहे, सतत लेखन की शुभकामनाएं …..

     
  55. तुषार राज रस्तोगी

    29/04/2013 at 1:13 पूर्वाह्न

    वाह! लाजवाब लेखन | आनंदमय और बहुत ही सुन्दर, सुखद अभिव्यक्ति विचारों की | पढ़कर प्रसन्नता हुई के आपकी ब्लॉग्गिंग के तीन साल पूरे हो गए | आभार, शुभकामनायें और बधाई |कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें | Tamasha-E-ZindagiTamashaezindagi FB Page

     
  56. सुज्ञ

    29/04/2013 at 1:16 पूर्वाह्न

    राजन जी आपकी बधाई एवं शुभकामनाओं के लिए बहुत बहुत आभार!! एक तर्कशील व सुलझे चिंतक से संयमित होने का श्रेय पाना मेरे लिए उपलब्धि है. आपका पुनः आभार!!"निरामिष" आंदोलन मेरा शीर्ष स्वप्न है. उसमें जैसे प्राण बसते है.आगे आपने जो विषय उठाया है,मुझे भी अंदेशा था कि मेरे विचारों को नहीं समझा जा रहा…. यह सच है कि जब भी सँस्कारों को, आदर्शों को. नैतिक मूल्यों को कटघरे में खडा किया जाता है, या आरोपित किया जाता है मुझे बहुत ही अनुचित प्रतीत होता है.यह परिवार, समाज, धर्म लगाव से प्रेरित नहीं बल्कि नैतिक प्रतिमानों के सम्भावित क्षरण के दर्द से उत्प्रेरित होता है. बलात्कार जैसे दुष्कृत्यो पर त्वरित प्रतिक्रिया स्वरूप जब यह प्रश्न दागा जाता है कि- "क्या यही हमारे संस्कार है?" तो ध्वनि और सँकेत यही दर्शाता है कि 'बलात्कार आदि दुष्कृत्य ही हमारे संस्कार है' अन्यथा यह सर्वविदित है कि ब्लात्कारी दुष्कर्मी आदि में संस्कार होते ही नहीं. जिनमें संस्कार है ही नहीं तो संस्कारों की दुहाई क्यों और किसे? और यदि यह संस्कार के प्रचार प्रसार में असफलता का दोष है तो यह व्यंग्य करने वाले और अन्य सभी सभी दोषी है. फिर किसने किसे क्या सीख दी? कहने का तात्पर्य यही कि सुधार की अपेक्षा हो तब भी संस्कार की दुहाई व्यर्थ है. फिर इस व्यर्थ शब्दावली का प्रयोजन क्या है? इसलिए मुझे लगता है कि इसमे निहित भावार्थ संस्कारों के औचित्य को ही समाप्त करना है. अन्यथा शब्दावली यह होती कि "इन दुष्कर्मियों तक क्यों नहीं पहूँचते हमारे संस्कार". इन वाक्यों के दूरगामी परिणामो पर गम्भीर होना जरूरी है. संस्कारों केप्रति आदर बचा रहा तो उनकी कभी न कभी व्यवहार में आने की सम्भावना रहेगी. लेकिन उनके अवमूल्यन से,उन्हें अवांछित बना देने से, उनकी उपयोगिता को खण्डित करने से नैतिक निष्ठा,सदाचरण के सर्वथा नष्ट होने की भूमिका तैयार होती है.आदर्श प्रतिमानों का सौगंध खाने मात्र के लिए भी अस्तित्व में बचे रहना जरूरी है. उन्हें निंदित करना, अनावश्यक आलोचित करना, बार बार चोट पहूँचा कर अप्रासंगिक बना देना, उसके प्रति निरादर पैदा करना, वितृष्णा पैदा करना वस्तुतः हमारे जीवनमूल्यों से देश निकाला देने के समान है. फिर उन आदर्शों को विलुप्त होने से नहीं बचाया जा सकता.मैं तो समझता हूँ, सहमति की विशेष उपयोगिता नहीं जबकि असहमति विमर्श चिंतन मनन के अवसर प्रदान करती है.

     
  57. सुज्ञ

    29/04/2013 at 7:47 पूर्वाह्न

    संगीता दी,आपके स्नेह प्रोत्साहन के लिए आभार!!

     
  58. सुज्ञ

    29/04/2013 at 7:51 पूर्वाह्न

    डॉ. मोनिका जी,शुभकामनाओं के लिए आभार, आपका सहयोग सातत्य भी है.

     
  59. सुज्ञ

    29/04/2013 at 7:56 पूर्वाह्न

    तुषार जी, बधाई और शुभकामनाओं के लिए आभार

     
  60. वाणी गीत

    29/04/2013 at 9:05 पूर्वाह्न

    प्रेरक और सार्थक विचार , और कभी तंज भी🙂 आपकी पोस्ट पढना बहुत अच्छा लगता है , बहुत बधाई और ऐसे अनगिनत वर्षों के लिए ढेरों शुभकामनायें !

     
  61. VIJAY SHINDE

    29/04/2013 at 10:58 पूर्वाह्न

    सुज्ञ जी आप मूल्य और नैतिक पाठों को सामने रख ब्लॉग लेखन करते हैं साथ ही जहां इसे हानि पहुंती है वहां कठोर आघात भी। बडी ईमानदारी के साथ इसे स्वीकार कर अपने मूल्यों और तत्वों पर कायम रहना आपकी अडिगता को दिखाता है। आपके इसी संकल्प का सभी अनुसरन करना पसंद करेंगे।

     
  62. सुज्ञ

    29/04/2013 at 11:09 पूर्वाह्न

    वाणी जी, आपका आभार!!! तंज भी? क्या करें अभिव्यक्ति में रंज भी कभी कभी तंज सा लगता है :)आपका स्नेह सर आँखो पर !!

     
  63. Chaitanyaa Sharma

    29/04/2013 at 11:24 पूर्वाह्न

    ढेर सारी बधाईयाँ आपको ….

     
  64. सदा

    29/04/2013 at 11:25 पूर्वाह्न

    “सुज्ञ” ब्लॉग को तीन वर्ष पूर्ण हुए…. आपके प्रेरक विचार एवं प्रस्‍तुति हमेशा यूँ ही अनवरत् रहे …. अनंत शुभकामनाओं के साथ सादर

     
  65. सुज्ञ

    29/04/2013 at 11:29 पूर्वाह्न

    विजय जी, आपका निरीक्षण यथार्थ है.आश्चर्यजनक रूप से तलस्पर्शी !!!!आपका अनंत आभार आपने समझा!!

     
  66. Suman

    29/04/2013 at 11:36 पूर्वाह्न

    सृजनात्मक जीवन शैली प्रभु की अनुकंपा है, बांटने में जो आनंद है और किसी चीज में नहीं !ब्लॉग के तीन वर्ष पूर्ण करने की हार्दिक बधाई।

     
  67. सुज्ञ

    29/04/2013 at 11:37 पूर्वाह्न

    नन्हे राजा!! आपकी बधाई, शुभाकांक्षा है मेरे लिए, चैतन्य!!

     
  68. सुज्ञ

    29/04/2013 at 11:54 पूर्वाह्न

    सीमा जी आपकी स्नेहपूरित सद्भावयुक्त मंगलकामनाओं के लिए आभार!!

     
  69. सुज्ञ

    29/04/2013 at 12:06 अपराह्न

    सदा शाश्वत आर्षवाणी का प्रसाद बांटने में आत्मातिरेक आनंद की अनुभूति होती है.जैसे सर्वे भवंतु सुखिनः का जयघोष होता हैसुमन जी,आपका अनेकानेक आभार!!

     
  70. राजन

    29/04/2013 at 12:50 अपराह्न

    @मुझे भी अंदेशा था कि मेरे विचारों को नहीं समझा जा रहासुज्ञ जी,मैं बिल्कुल आपके विचारों को भी समझा और उन लोगों की मनःस्थिति को भी जिनकी प्रतिक्रिया से आपको आपत्ति है।मुझे तो दोनों ही अपनी अपनी जगह सही लगते हैं।हाँ ये जरूर कहूँगा कि आप किसी बात का यदि शाब्दिक अर्थ ही निकालेंगें तब तो सब गलत ही गलत नजर आएगा।@और यदि यह संस्कार के प्रचार प्रसार में असफलता का दोष है तो यह व्यंग्य करने वाले और अन्य सभी सभी दोषी है. आपका कहना बिल्कुल सही है और यही कारण है कि जब कोई दूसरा ठीक यही बात कहता है तो यह सवाल व्यंग्य करने वाले उसका विरोध नहीं करते कि आपने हमें क्यों दोषी ठहराया।और फिर बाकियों में और यह सवाल करने वालों में एक अंतर यह तो है कि ये लोग मान रहे हैं कि हमारे बीच भी एक गलत सोच मौजूद है सब कुछ इतना अच्छा नहीं है जितना हम भोले बने माने बैठे हैं।लेकिन बहुत से लोग ऐसा नहीं मानते ।वर्ना यूँ आप हमारे धार्मिक सद् विचारों का प्रचार करें देखिए कोई आपका विरोध नहीं करेगा पर हाँ फिर भी कोई आपको गलत बताता है तब वह निश्चित रूप से खुद ही गलत है।उम्मीद है इस पोस्ट पर मेरा इस तरह का विमर्श छेडना आपको असंगत नहीं लग रहा होगा।

     
  71. सुज्ञ

    29/04/2013 at 1:37 अपराह्न

    @ "उम्मीद है इस पोस्ट पर मेरा इस तरह का विमर्श छेडना आपको असंगत नहीं लग रहा होगा।"यह विमर्श असंगत नहीं, सुसंगत है क्योंकि यह ब्लॉगिंग के तीन वर्ष पूर्ण करने पर लेख है तो यही अवसर है जब विचारों की समीक्षा कर ली जाय, इस चर्चा से आप मुझे स्वयं को स्पष्ट करने का अवसर भी प्रदान कर रहे है. मैं स्वयं अपने चौथे वर्ष की पहली पोस्ट इन्ही उलझनो पर अपना अभिमत स्थिर करने के लिए प्रयोग करने वाला था.@मुझे तो दोनों ही अपनी अपनी जगह सही लगते हैं।हाँ ये जरूर कहूँगा कि आप किसी बात का यदि शाब्दिक अर्थ ही निकालेंगें तब तो सब गलत ही गलत नजर आएगा।सभी 'अपनी'जगह सही ही होते है. क्योंकि वे प्रस्तुतिकरण अपने दृष्टिकोण पर आधारित निश्चित करते है. किंतु समग्रता में भिन्नता होती है. किसी भी बात को समझने के लिए सारे दृष्टिकोण पर सम्यक विचार किया जाय तब ही यथार्थ वस्तुस्थिति स्पष्ट होती है. कोई दृष्टिकोण सर्वांग गलत नहीं होता किंतु एक ही दृष्टिकोण का आग्रह और दूसरे सभी दृष्टिकोणों का निषेध यथार्थ को भी मिथ्या बना देता है. विवेचन सभी दृष्टियों पर सम्यक प्रकार से समग्रता से हो तो सत्य उभरता है.शाब्दिक अर्थ? शब्दों में अपार शक्ति है. किसी की तुलना करते हुए बोले गए शब्द ही निर्धारित करते है कि व्यक्ति प्रोत्साहित होगा या निरूत्साहित. शब्द ही निर्धारित करेंगे बात सकारात्मक अभिगम होगी या नकारात्मक. शब्दों के चयन में भावनाएं होती है अतः शब्द ही कथन का भावार्थ प्रकट कर देते है.

     
  72. anshumala

    29/04/2013 at 2:56 अपराह्न

    सबसे पहले तिन साल होने की बधाई ! निजी जीवन में गुस्सा मेरी नाक पर होता है क्योकि वहां लिए गए फैसले बाते हमारे जीवन को प्रभावित करते है जबकि ब्लॉग पर ऐसा नहीं है कोई कुछ भी कहे आप का जीवन प्रभावित नहीं कर सकता है इसलिए ज्यादातर शांत ही रहती हूँ , हा बकवास हो या उंगली कोई अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर की चीज पर उठाये तो क्रोध दिखाने में मुझे कोई परहेज नहीं है और न ही मै इसे बुरा मानती हूँ, न तो अपने लिए और न ही दूसरो के लिए, मै इसे हिंसा नहीं मानती हूँ , नैतिकता में मेरा विश्वास है किन्तु उनका मानदंड इतना ऊँचा नहीं बनाती की जिसका आज के समय में पालन करना संभव ही न हो , किन्तु आप ऐसा ही करते है नतीजा आप कई बार खुद भी उसका पालन नहीं कर पाते है , रचना जी की फोटो जब किसी ने गलत शब्दों के साथ अपने ब्लॉग पर लगाईं तो उनके साथ आप की उन लोगो में थे जो जम कर इस बात की आलोचना कर रहे थे , किन्तु वो आलोचना और उसके शब्द आप की कही जा रही बातो से मेल नहीं खा रहे थे आप की सभी को क्षमा करने वाली बात वहा गायब थी , मेरे लिए आप गलत नहीं कर रहे थे किन्तु नैतिकता का जो ऊँचा मानदंड आप खड़ा करते है उस नजर से वो गलत था , यदि बात स्त्री के अपमान की थी , तो ये ब्लॉग जगत के लिए नया नहीं था , इसके पहले इतनी तीव्र आलोचना आप की नहीं देखि मैंने , अब जैसे बॉब पुरुष्कारो में हलाल मिट ब्लॉग के लिए आप के कहे जा रहे शब्द आप का उसके खिलाफ अभियान आप के इस ब्लॉग पर कहे जा रहे विचारो से मेल नहीं खा रहे थे हा वो शाकाहार के पक्ष में थे किन्तु वो शब्द और कार्य आप के विचार के अनुसार वाचिक हिंसा जैसे थे , किन्तु मेरी नजर में वो भी गलत नहीं थे , आप की इन बातो से किसी खास वर्ग को लेकर आप की नापसंदगी भी झलकती है , और किसी से भी नफ़रत नकारने के आप के विचार से मेल नहीं खाती है । मै बस इतना कहना चाह रही हूँ की नैतिकता जीवन के लिए जरुरी है किन्तु उसके मापदंड इतने ऊँचे नहीं होने चाहिए की एक आज का आम इन्सान उसे देख कर ही दूर से भाग जाये उसे अपनाने की सोचे ही नहीं , उसे तो आम इन्सान और आज की समय के इतना करीब होना चाहिए की सभी को लगे की हा थोडा प्रयास किया जाये तो उसे अपनाया जा सकता है । उम्मीद है इसे भी सकारात्मक तरीके से लेंगे जैसा आप हमेसा लेते रहे है ।

     
  73. सुज्ञ

    29/04/2013 at 4:05 अपराह्न

    @ यह सवाल व्यंग्य करने वाले उसका विरोध नहीं करते कि आपने हमें क्यों दोषी ठहराया।यहाँ भी अंतर को समझना होगा, आरोप एक संस्कारों में आस्था व्यक्त करते समुदाय पर है और प्रतिपक्ष में व्यक्तिगत दृष्टिकोण मात्र. यह देखना जरूरी है कि व्यंग्य कर्ता का लक्ष्य क्या है? यदि दोनो का लक्ष्य संस्कार का प्रचार प्रसार है तो देखना पडेगा कि ताने उल्हाने व्यंग्य से वह सफलता मिलेगी?देखिए,ताने उल्हाने देने से संस्कार या सद्विचार स्थापित नहीं होते. तुलना करके दूसरे के आचार श्रेष्ठ और स्वयं के आचार निकृष्ट बता देने से आचारों के प्रति आकर्षण नहीं बनता. 'सीखो सीखो उनसे सीखो, तुम्हारे में ऐसे शिष्टाचार है ही कहाँ?' इस प्रकार के तानों से भी सीखने की भावना नहीं जगती. यह सर्वमान्य सत्य है.तो फिर भी ऐसा करने का उद्देश्य क्या है?मैं मानता हूं आत्मावलोकन सबसे अच्छी बात है.अपनी कमियों कमजोरीयों पर चिंतन होना भी चाहिए.लेकिन हर समय मात्र कमियां या कमजोरियां ही उभार उभार कर उजागर करने का आशय क्या है? अच्छा-बुरा हर जगह होता है. अच्छे का गौरव आपको लेने नहीं देना है, पराए शिष्टाचारों पर आपको गौरवगान गाना है. यहां थोडी सी यदा कदा प्रकट बुराई को सतह पर फैला कर दिखाना है कि सब कुछ बुरा ही बुरा है.क्या इन कार्यों से प्रेरित होकर कोई तत्काल संस्कारी बन सकता है? अगर आपका इमानदार प्रयास नैतिक निष्ठा स्थापित करने का है तो कार्य भी नैतिक निष्ठा के प्रति आदर स्थापित करने का होना चाहिए. यह मान लेने से क्या हो जाता है कि "हमारे बीच भी एक गलत सोच मौजूद है" रास्ता तो तब बनता है जब यह संदेश दिया जाय कि हम अच्छे रहे है, रह सकते है, सब कुछ इतना भी बुरा नहीं कि दूर न किया जा सके. और आशा व सम्भावनाए अभी भी है. संस्कारों से चिड पैदा करने से उनके पुनर्स्थापना की सम्भावनाएं धूमिल हो जाती है.मैं हमारे धार्मिक सद् विचारों का प्रचार नहीं बल्कि मानवीय सदाचारों का प्रसार चाहता हूँ हां यह हो सकता है कि उन सदाचारों का स्रोत धार्मिक हो.

     
  74. सुज्ञ

    29/04/2013 at 6:07 अपराह्न

    अंशुमाला जी,बधाई के लिए आपका बहुत बहुत आभार!!आपने तो मेरे वाणी-व्यवहार पर गहन शोध संशोधन कर लिया🙂 होना ही चाहिए ताकि कथनी-करनी का अंतर पता चले. रचना जी की फोटो प्रकरण,हलालमीट बॉब प्रकरण,और वर्ग विशेष से नापसंदगी सभी उनकी सोच और मानसिकता का विरोध या आलोचना थी. यहां मनुष्य विशेष से कोई द्वेष नही है. तब भी वे मानव या जीवन के नाते क्षम्य थे और आज भी है.जब मैं किसी को हिंसक कहता हूँ तो यह उसकी मानसिकता को ही सम्बोधित होता है. प्रवृति को होता है. हिंसक मन,हिंसक विचार, हिंसक वाणी और हिंसक कृत्य को आलोचित भी न किया जाय तो सात्विक मन, सद्विचार, सद्वाणी और सदाचार का औचित्य कैसे स्थापित होगा. दुर्विचार,दुराचार आदि दुर्गुणों की निंदा आलोचना करना नैतिक मूल्यों के साथ समझौता नहीं है बल्कि उन्ही नैतिक मूल्यों का संरक्षण है. पाप से घृणा करो, पापी से नहीं इस उक्ति पर आस्था है.किंतु नैतिकताएं तो अपने आप में नैतिकताएं है उसमें उन्नीस बीस कैसा? वस्तुतः हमारे देश में नैतिकताओं पर फ्लेक्षी सोच ने ही नैतिकताओं का भठ्ठा बिठाया है. पालन हो सके इतनी ईमानदारी? डगर बडी कठिन है अतः प्रत्येक व्यक्ति प्रत्येक नैतिकता के पालन में स्वयं को असमर्थ ही मानेगा उत्तम नैतिक मूल्यों के साथ समझौता, साबूत लकडी में जरा सी दीमक चला लेने के समान है देखते ही देखते लकडी का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा,बचेगी वह सिर्फ मिट्टी होगी.इसलिए नैतिकता के मापदंड तो परिशुद्ध परफेक्ट ही रहेंगे.इन्सान अपनाए तो पुरूषार्थ और दूर भागे तो पलायन ही माना जाना चाहिए. गुण आम इंसान के लायक बनाने की प्रक्रिया में उनका सत्व नष्ट हो जाता है, वस्तुतः आम इंसान को गुणॉं के लायक बनना चाहिए.

     
  75. रश्मि प्रभा...

    29/04/2013 at 6:40 अपराह्न

    कई वर्ष जुड़ें … शुभकामनायें

     
  76. सुज्ञ

    29/04/2013 at 6:47 अपराह्न

    अनेक बार आपसे मिले सहयोग को कैसे भुला सकता हूं…..आपका अनेकों बार आभार!!

     
  77. anshumala

    29/04/2013 at 7:51 अपराह्न

    गहन अध्ययन जैसा कुछ भी नहीं है सभी का व्यवहार सामान्य ही था आप का भी , किन्तु आप ही सभी को क्षमा करने की बात करते है , किन्तु जब मुद्दा अपने विचारो का हो तो हम क्षमा की बात भूल जाते है , यही कारण है की जब हम भी महिलाओ के प्रति बुरा विचार और सोच देखते है तो पुरजोर तरीके से उसका विरोध करते है और उसे वाचिक हिंसा नहीं मानते है और मानते है की कुछ चीजो का विरोध ऐसे ही कड़े शब्दों में होना चाहिए , और उसी तरह जरुरत पड़ने पर शरीरिक हिंसा भी बुरी नहीं है किसी को सबक सिखाने के लिए या ये बताने के लिए की तुम गलत हो किन्तु आप इस बात को सही नहीं मानते है , जो की ठीक विचार नहीं है , व्यक्ति को समय मुद्दे माहौल के हिसाब से व्यवहार करना चाहिए न की नैतिकता के ऊँचे मानदंड से । आप की नजर में हलाल मिट का विरोध जरुरी है उसमे कोई भी अनैतिक बात नहीं है क्योकि शाकाहार और अहिंसा आप के विचार है और कष्ट आप को हो रहा है जबकि हलाल मिट के समर्थको को आप की बात पसंद नहीं आती है उन्हें ये नैतिक रूप से गलत लगता है । उसी तरह हम भी स्त्रिया है , उन पर होने वाले अत्याचार को हम समझ सकते है और हमें भी कष्ट होता है लोगो के महिलाओ के प्रति विचार देख कर और हम उसका विरोध करते है । जहा तक बात नैतिकता की है तो मुझे लगता है क्रोध काम माया कोई भी चीज बुरी नहीं होती है , बुरी होती है उसकी अति , मनुष्य को बस सामान्य व्यवहार करना चाहिए, क्रोध के मुद्दे पर क्रोध और ख़ुशी के समय खुशी कभी क्षमा और कभी दंड , व्यवहर परिस्थिति समय माहौल के हिसाब से हो ।

     
  78. सुज्ञ

    29/04/2013 at 9:16 अपराह्न

    महिलाओ के प्रति बुरा विचार दुर्भाव युक्त सोच और निरादर का पुरजोर विरोध और ऐसी मानसिकता की आलोचना होनी ही चाहिए लेकिन ऐसे विचारों को पूरे पुरूष समाज के विचार कहकर प्रतिशोध लेना कहां तक न्याय संगत है? मैंने नारी के प्रति कदाचारियों की सोच की आलोचना करने पर तो कभी आपत्ति नहीं दर्शायी, फिर यह क्यों? हां आपके नारी समस्याओं का समाधान शारीरिक हिंसा में बिलकुल नहीं है. आखिर हम महिलाओं के प्रति शारीरिक हिंसा का विरोध जो करते है.क्रोध तो बुरा और हिंसा को प्रेरित करने वाला है ही, साथ ही क्रोध सबसे पहले विवेक को हर लेता है.इसलिए क्रोध की दशा में मुद्दे माहौल कुछ भी हो निर्णय नहीं लेने चाहिए…..हलाल मीट का मामला ऐसा नहीं है जैसा आप तुलनात्मक प्रस्तुत कर रही है. यह ब्लॉग तो साल भर पुराना है मात्र मांसाहार के विरोध की ही बात होती तो लगातार साल भर विरोध चलता रहता. लेकिन इस बार बॉब में उसके भारतीय प्रतिनिधित्व का मसला है.एक तो हिंसा का प्रचार और उपर से उसे भारत का प्रतिनिधित्व, बडा क्रूर मजाक है. इसको अगर नैतिक रूप से जो कोई भी गलत नहीँ मानते तो उनकी नैतिकता के वही पैमाने है जिसका जिक्र आप करती है.न क्रोध अच्छा है न माया करना. इनकी अति तो क्या, यह अल्प मात्र भी बुरा है. रही बात दंड की तो व्यवस्था में दंड के अधिकार जिनके है उन्ही के पास सुरक्षित रहने चाहिए प्रत्येक व्यक्ति अगर दंडाधिकारी बनता है तो व्यवस्था में अनर्थ का सर्जन होता है.

     
  79. राजन

    30/04/2013 at 9:21 अपराह्न

    सुज्ञ जी,अब यहाँ कौन संस्कारों में आस्था रखने वालों को ताने दे ले रहा है।आप फिर गलत समझ रहे हैं।हाँ सवाल जरूर उठाए जा रहे हैं तो ये उनकी संस्कारों में आस्था की वजह से नहीं बल्कि उनकी इस आदत के कारण जो मानते नहीं कि समाज में यदि अनैतिकता बढ़ी है तो इसका कारण केवल बाहरी तत्व या कारण ही नहीं बल्कि हमारी खुद की असफलता है खुद की गलत सोच है।अब इसमें कोई दोष नहीं लगता।यदि कोई ईलाज की बात करेगा तो उससे पहले बीमारी और इसके लक्षण की बात ही करनी होगी।अब तरीके में थोडी आक्रामकता भी हो सकती है तो थोड़ा संयत भाव भी।पर यह काम करेंगे सब ही।हाँ ये बात सच है कि एक अतिवाद उन लोगों में भी हो सकता है वह भी गलत हो सकते है तो आप भी वहाँ अपनी बात रखें मैं खुद भी ऐसा करता हूँ।अभी कुछ दिन पहले दिनेशराय जी के तरीके का मैंने विरोध किया था कन्यादान वाली पोस्ट पर ।मैंने यही बात पहली टीप के अंत में कही थी कि आप यदि सही हैं तो आपकी बात का असर होगा ही चाहे लोग सामने यह बात न मानें।और आपका ये आरोप तो बिल्कुल गलत है कि केवल कमियाँ बताई जा रही है।नहीं बलात्कार जैसे अपराध रोकने के लिए क्या किया जाए और लड़कों को क्या सिखाया जाए इस पर भी बातें हुई।

     
  80. राजन

    30/04/2013 at 10:00 अपराह्न

    इस काम क्रोध वाली बात पर आप दोनों के विचारों से असहमत।ये तो शायद कहीं नहीं कहा गया है कि ऐसे विचार मन में आने भर से कोई व्यक्ति नीच अधम पापी हो जाता है।हाँ इन्हें विकार जरूर माना गया है कि इन्हीं विकारों की वजह से व्यक्ति अपराधी बनता है अतः इनसे सावधान किया गया है न कि कोई अपराधबोध भरा गया है।अतः इस बात को मान लेने में कोई बुराई नहीं कि ये मानसिक विकार तो हैं।अति सर्वत्र वर्जयेत जैसी बात भी हमारे यहाँ कही गई लेकिन किसी बुराई की बात होगी तो ये नहीं समझाया जाएगा कि काम क्रोध ईर्ष्या सब अच्छे हैं बस इनकी अति बुरी है।ऐसे फिर इस 'अति' की सबकी अपनी अलग परिभाषा हो जाएगी ।

     
  81. सुज्ञ

    30/04/2013 at 10:53 अपराह्न

    राजन जी,हो सकता है वे सवाल मुझे ही ताने लगे हों. यह भी सही है कि-"समाज में यदि अनैतिकता बढ़ी है तो इसका कारण केवल बाहरी तत्व या कारण ही नहीं बल्कि हमारी खुद की असफलता भी है खुद की गलत सोच भी है। लक्षण अगर संस्कारों का ना पाया जाना है तो निदान भी तो संस्कारों के 'प्रसार' में विफलताए होना चाहिए, संस्कारों की विफलता. अब ईलाज के तौर पर होना तो यह चाहिए की संस्कारों की पुनर्स्थापना हो, उसका समग्र प्रसार हो, उनका महिमामण्डन हो कि सभी वर्ग में आदरयोग्य हो जाय, स्वीकार्य हो जाय. लेकिन यह क्या बात हुई कि जो ईलाज है, जो दवा है उसे ही फिकवाने या नष्ट करने का कार्य हो? यह भला कैसा ईलाज हुआ?मानते हम भी है कि नैतिक संस्कारों में कमी आई है नीति के प्रति निष्ठा में उतार आया है. ऐसे संस्कारों के प्रति आदर क्षीण हुआ है. हम भी लक्षण, बीमारी और ईलाज की ही बात करते है. नैतिकताओं के प्रति आदर न दिखाई देना लक्षण है,संस्कारों से अरूचि पैदा करना, संक्रमित करना है. संस्कारों का विखण्डित होकर झड्ना बिमारी है. संस्कारों के प्रति आदर बढाना, विश्वास पनपाना,ट्रीट्मेंट है. संस्कारों का पुनः आरोपण प्रसारण संवर्धन ही ईलाज है.मैं वहां बात रखता भी रहा हूं. किंतु संयतता का ही तकाजा है कि सीधे कहने से बचा जाय,इसी लिए संकेतो की भाषा में बात करना विवशता होती है. मैं किसी को आहत नहीं करना चाहता. मैं अच्छी तरह से जानता हूं सभी का, चीजों को देखने का एक अपना दृष्टिकोण होता है. दृष्टिकोण से तब तक कोई समस्या नहीं जब बात और किसी तथ्य को प्रभावित न करती हो.लेकिन अगर हमें महसुस हो कि अभी अच्छी लगने वाली बात, परिणामों को दुष्प्रभावित करगी तो संकेत तो करना ही पडता है.केवल कमियाँ ही बताई जा रही थी, यह तो जब समाधान या सुझाव देना स्मरण करवाया गया तो कुछ समाधान प्रकाश में आए.उसमें भी नैतिक मूल्यों के पुनः स्थापना की बात नहीं की गई, जबकि समस्या का कारण नैतिक मूल्यों के पतन को ही जोर शोर से बताया गया.

     
  82. विष्णु बैरागी

    01/05/2013 at 5:12 पूर्वाह्न

    बधाइयॉं और अभिनन्‍दन।विकृतियों की लोकप्रियता ही सद्प्रवृत्तियों की आवश्‍यकता और अपरिहार्यता की जमीन तैयार करती है। ब्‍लॉग इसके लिए मुझे बहुत ही उपयुक्‍त और प्रभावी माध्‍यम अनुभव होता है। सक्रिय दुर्जनों के इस समय में सज्‍जनों की सक्रियता और एकजुटता स्‍वत: ही सामाजिक आवश्‍यकता से कोसों आगे बढकर राष्‍ट्रीय आवश्‍यकता बन जाती है।ऐसे में, आप जैसों की अनदेखी करना अपने आप में अपराध होगा। आपकी कोशिशें और योगदान अनुपम और स्‍तुत्‍य है। प्रयत्‍नों को ही तो परिणाम मिलते हैं। हम सब आपके साथ हैं।

     
  83. सुज्ञ

    01/05/2013 at 10:37 पूर्वाह्न

    विष्णु बैरागी जी,बधाई एवं उष्मा भरे स्वागत का अनंत आभार!!बहुत ही प्रभावशाली बात कही,"विकृतियों की लोकप्रियता ही सद्प्रवृत्तियों की आवश्‍यकता और अपरिहार्यता की जमीन तैयार करती है। ब्‍लॉग इसके लिए मुझे बहुत ही उपयुक्‍त और प्रभावी माध्‍यम अनुभव होता है।"अपने प्रयासों की सार्थकता अनुभूत हुई और मनोबल को अभुतपूर्व संबल मिला. एक बार फिर से आभार, एक नई उर्जा का संचार महसुस कर रहा हूं….

     
  84. jyoti khare

    01/05/2013 at 9:26 अपराह्न

    हार्दिक बधाई और शुभकामनायें विचार कीं अपेक्षा आग्रह है मेरे ब्लॉग का अनुसरण करें jyoti-khare.blogspot.in कहाँ खड़ा है आज का मजदूर——?

     
  85. सुज्ञ

    02/05/2013 at 1:02 पूर्वाह्न

    आपका बहुत बहुत आभार ज्योति खरे साहब!!

     
  86. premkephool.blogspot.com

    15/07/2013 at 12:30 पूर्वाह्न

    ब्लोगिंग के तीन वर्ष पूर्ण करने की बहुत२ हार्दिक बधाई।

     
  87. darshanjangra.blogspot.com

    15/07/2013 at 12:30 पूर्वाह्न

    हार्दिक बधाई और शुभकामनायें

     

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं यह ब्लॉग लिखने के अलावा गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। रेलवे से ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर्ड अफसर।

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