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मैं बेकार क्यों डरुं?

16 अप्रैल
एक मछुआरा समुद्र के तट पर बैठकर मछलियां पकड़ता और अपनी जीविका अर्जित करता।

एक दिन उसके वणिक मित्र ने पूछा, “मित्र, तुम्हारे पिता हैं?”

मछुआरा बोला “नहीं, उन्हें समुद्र की एक बड़ी मछली निगल गई।”

वणिक ने पूछा, “और, तुम्हारा भाई?”

मछुआरे ने उत्तर दिया, “नौका डूब जाने के कारण वह समुद्र की गोद में समा गया।”

वणिक ने दादाजी और चाचाजी के सम्बन्ध में पूछा तो उन्हे भी समुद्र लील गया था।

वणिक ने कहा, “मित्र! यह समुद्र तुम्हारे परिवार के विनाश का कारण है, इस बात को जानते हुए तुम यहां बराबर आते हो! क्या तुम्हें मरने का डर नहीं है?”

मछुआरा बोला, “भाई, मौत का डर किसी को हो या न हो, पर वह तो आयगी ही। तुम्हारे घरवालों में से शायद इस समुद्र तक कोई नहीं आया होगा, फिर भी वे सब कैसे चले गये? मौत कब आती है और कैसे आती है, यह आज तक कोई भी नहीं समझ पाया। फिर मैं बेकार क्यों डरुं?”

वणिक के कानों में भगवान् महावीर की वाणी गूंजने लगी-“नाणागमो मच्चुमुहस्स अत्थि।” मृत्यु का आगमन किसी भी द्वार से हो सकता है।

वज्र-निर्मित मकान में रहकर भी व्यक्ति मौत की जद से नहीं बच सकता, वह तो अवश्यंभावी है। इसलिए प्रतिक्षण सजग रहने वाला व्यक्ति ही मौत के भय से ऊपर उठ सकता है।

बोध कथा: आत्म-चिंतन

 

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21 responses to “मैं बेकार क्यों डरुं?

  1. प्रवीण पाण्डेय

    16/04/2013 at 6:57 अपराह्न

    उसका एक क्षण, मेरा सारा जीवन

     
  2. कालीपद प्रसाद

    16/04/2013 at 7:20 अपराह्न

    सच है, जो अटल सत्य है उससे दर कैसा ?

     
  3. सतीश सक्सेना

    16/04/2013 at 7:43 अपराह्न

    वाह …सही याद दिलाया भाई !!

     
  4. संजय अनेजा

    16/04/2013 at 8:09 अपराह्न

    एक गज़ल गाई थी मनोज कुमार जी के सुपुत्र साहब ने – ’अहले दिल जाने जाँ, है बहुत सख्त जाँ,ये न समझो, जुदाई में मर जायेंगे’उसीमें दो लाईन ऐसी थीं – हमने जी भर के पी, तुमने बिलकुल न पीहम भी मर जायेंगे, तुम भी मर जाओगे :)हँस लें तो हँसने की बात है सुज्ञजी, न तो ’किमाश्चर्यम’ भी यही है।

     
  5. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

    16/04/2013 at 8:11 अपराह्न

    क्या ड्रामा है ज़िंदगी भी, अभी पाँव ठीक से जमे भी नहीं कि जाने की तैयारी शुरू हो गई।

     
  6. चला बिहारी ब्लॉगर बनने

    16/04/2013 at 9:11 अपराह्न

    सुज्ञ जी आज आपकी इस कथा से एक विनोद में कही बात याद आई.. जब उस वणिक ने मछुआरे से कहा कि मित्र! यह समुद्र तुम्हारे परिवार के विनाश का कारण है, इस बात को जानते हुए तुम यहां बराबर आते हो! क्या तुम्हें मरने का डर नहीं है?तो मछुआरे ने हंसकर कहा, "महाशय! आपके परिवार में निश्चय ही अधिकांश सम्बन्धियों की मृत्यु उनकी शय्या पर हुई होगी, तो क्या आपके वंश में लोगों ने शय्या पर शयन करना त्याग दिया?".मृत्यु से बचने के लिए तो एक सम्राट ने एक मीनार बनवाई और उसमें मृत्यु के प्रवेश के समस्त द्वार बंद कर दिए. तब उसे भान हुआ कि ऐसा करते हुए तो वह जीविन ही मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा. और उसके ज्ञान चक्षु खुल गए!!.बहुत ही प्रेरक प्रसंग!!

     
  7. Majaal

    16/04/2013 at 10:02 अपराह्न

    सत्य वचन, कायर लोग जीवन में कई बार मरते है , मृत्यु का चिंतन भी एक प्रकार की परोक्ष मृत्यु ही तो है…लिखते रहिये

     
  8. धीरेन्द्र सिंह भदौरिया

    16/04/2013 at 10:05 अपराह्न

    प्रेरक ज्ञान देती सुंदर प्रस्तुति,आभार,RECENT POST : क्यूँ चुप हो कुछ बोलो श्वेता.

     
  9. भारतीय नागरिक - Indian Citizen

    17/04/2013 at 12:10 पूर्वाह्न

    एक गाना याद आ गया-जिन्दगी तो बेवफ़ा है एक दिन ठुकरायेगी..

     
  10. भारतीय नागरिक - Indian Citizen

    17/04/2013 at 12:10 पूर्वाह्न

    लेकिन मृत्यु का चिंतन कई दफा कुमार्ग से बचा भी देता है.

     
  11. भारतीय नागरिक - Indian Citizen

    17/04/2013 at 12:11 पूर्वाह्न

    एक गाना याद आ गया-जिन्दगी तो बेवफ़ा है एक दिन ठुकरायेगी..

     
  12. वाणी गीत

    17/04/2013 at 8:43 पूर्वाह्न

    मृत्यु का भय सकारात्मक चिंतन दे तो उचित ही है !वर्ना तो डर डर कर क्या जीना !सार्थक विचार !

     
  13. निहार रंजन

    17/04/2013 at 9:25 पूर्वाह्न

    बिलकुल सच्ची बात. इस भय में नाहक जीवन क्यों व्यर्थ हो. सच हो तो इसके जैसा.

     
  14. संगीता स्वरुप ( गीत )

    17/04/2013 at 12:53 अपराह्न

    मृत्यु सत्य है ,शाश्वत है ,आना तय है …फिर उसका इंतज़ार क्यों ? और उससे डरना कैसा ? रोचक बोध कथा

     
  15. सदा

    17/04/2013 at 1:07 अपराह्न

    " मृत्यु का आगमन किसी भी द्वार से हो सकता है।''सच तो यही है फिर भय कैसा ……….. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति …. आभार

     
  16. दिगम्बर नासवा

    17/04/2013 at 1:24 अपराह्न

    बहुत प्रेरक ओर सलिल जी की प्रति-टिप्पणी भी बहुत प्रेरक …सत्य का भान कराती बोध-कथा …

     
  17. तुषार राज रस्तोगी

    18/04/2013 at 4:45 पूर्वाह्न

    लाजवाब प्रस्तुति | कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें | Tamasha-E-ZindagiTamashaezindagi FB Page

     
  18. डॉ. मोनिका शर्मा

    18/04/2013 at 8:54 पूर्वाह्न

    सच है ….. जो होना है, वो होना है

     
  19. रचना

    18/04/2013 at 7:39 अपराह्न

    shaayad uski mrityu wahii likhi thee isliyae roj aanaa uski niyati thee

     
  20. धीरेन्द्र अस्थाना

    18/04/2013 at 9:14 अपराह्न

    mritu aur jivan dono sthitiyan bhay paida krtin hain;nirbhar karta hai ap kitne nidar rahte hai.

     
  21. आशा बिष्ट

    21/04/2013 at 2:23 अपराह्न

    सही बात

     

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं यह ब्लॉग लिखने के अलावा गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। रेलवे से ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर्ड अफसर।

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