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सनातन भवन

06 मार्च
“सनातन धर्म को लेकर अक्सर संशय पैदा किए जाते है कि इसमें न जाने कितने पंथ सम्प्रदाय है, सभी के दर्शन विचार भिन्न भिन्न है जो परस्पर विरोधाभास का सर्जन करते है्। तो दूसरी ओर इसे उदारता या खुलेपन के नाम प्रसंशित कर प्रत्येक विचारधारा को समाहित करने के विशेषण की तरह निरूपित करते है। यह दोनो ही परस्पर विरोधाभासी बयान सनतन धर्म के यथार्थ चरित्र से कोशों दूर है। सनातन धर्म में कितने भी भिन्न भिन्न दर्शन पंथ सम्प्रदाय हो, सनातन धर्म और उसकी सभी शाखाएँ , सनातन के ‘मूल तत्वो और सिद्धांतो ‘ पर प्रतिबद्ध है। विचार और विवेचन पर उदार होने के उपरांत भी अपने आराध्यों  की पूजनीयता पर संदेह स्वीकार नहीं करते। इसी निष्ठा  के बल पर सनातन धर्म  आज भी अपना अस्तित्व बनाए हुए है।”

सनातन एक प्राचीन विशाल और विख्यात भवन है। एक पुरातत्व धरोहर है। इस में अभी तक समग्र भवन का आमूल चूल परिवर्तन नहीं हुआ है बल्कि अपने अपने कमरे को सजाने का कार्य हुआ है, सजाने में भी प्रतिस्पर्धात्मक सज्जा। इस तरह की सज्जा ने मूल तत्वो और सिद्धांतो की नींव को जस का तस रखा, उसमें कोई समझोता नहीं किया। किसी कक्ष ने पुरातत्व को समझा तो उसने जीर्णोद्धार करते हुए पुनः पुरातन साज सज्जा में बनाया। तो किसी कक्ष ने सुविधा और सरलता को ध्यान में रखते हुए उपयोगी सज्जा प्रदान की। किसी ने अपनी सुविधा तो किसी ने दूसरो की सुविधा को महत्व देते हुए सज्जा को स्वरूप दिया। तो किसी ने सुरक्षा के मद्देनजर भवन को सुरक्षा उपकरणो से सज्जित किया। लेकिन किसी ने भी नींव को कमजोर करने का दुस्साहस नहीं किया। कुछ भौतिकवादीयों नें इसी भवन में तलघर बानाने के लिए तल खोद दिया, इस खुदाई में नींव पर भी आघात हुए पर नींव मजबूत थी, कुछ गम्भीर बिगाड नहीं हुआ। अल्प काल तक भौतिकवादी इसमें रहे किन्तु शीघ्र ही यह तहखाना, वीरान अन्धेरी कोठरी में परिवर्तित हो गया। आज-कल इस तलघर में  कुछ मजदूर, मोहल्ले के सताए लोग और इन दोनो के रहनुमा, रात अंधेरे ताश खेलकर टाईम-पास करते है। बहुत पहले कुछ लोगों ने इसके मझले बढा दिए थे, टॉप पर उन्होने हवादार खिडकियां, प्रकाश के लिए खूबसूरत बाल्कनी से कक्ष सजा दिए थे, इनके द्वारा किए गए अतिरिक्त निर्माण से भी सनातन भवन की नींव को कोई खतरा नहीं था। समय समय कभी इसकी या कभी उसकी सजावटें बढती घट्ती रहती, नए युग में नया दौर आया, भवन के बाहरी रंग-रोगन का प्रस्ताव आता और पास भी होता, कुछ पुरातन धरोहरवादीयों ने दबी जुबां से विरोध भी किया कि इससे भवन की पुरातत्व पहचान विकृत हो जाएगी किन्तु नींव को कोई खतरा न देख, चुप लगा गए। इस तरह आन्तरिक और बाहरी सजावटें निरन्तर बदलती रही पर भवन की नींव मजबूत थी हर नवनिर्माण सह गई। किन्तु अब इस आधुनिक काल में प्रगतिशील निवासी अजीब प्रस्ताव लाने लगे है। आजकल सुन्दर कंगूरों का फैशन चल पड़ा है, और वे नींव में लगे बेशकीमती पत्थरो को निकाल कर उससे भवन के कंगूरे अलंकृत करना चाहते है। किन्तु नई फैशन का मोह ऐसा है कि दूरदृष्टि कुंठित हो चली है। नींव जिस पर भवन टिका हुआ है, और भवन जिस पर इनका ही अस्तित्व आश्रय लिए हुए है।

पास में ही कोई ऐसा ही वैभवशाली भवन बनाने की महत्वाकांक्षा लिए हुए है। वह ऐसा ही सुदृढ भवन बनाना चाहता है। वह स्ट्रक्चर तो अपनी पसंद का रखना चाहता है किन्तु नींव सनातन भवन जैसी बनाना चाह्ता है। वह अपनी भूमि से सूरंग खोद कर बार बार इसकी नींव देखता है इसी सुंरग खुदाई से सनातन भवन में हल्का सा कम्पन महसुस होता है लेकिन यह पडौसी आज तक नहीं जान पाया कि इसकी नींव किन कारणो से मजबूत है। उसकी समस्या यह है कि इस नीव और अपने स्ट्रक्चर के वास्तु की इन्जिनियरिंग का मेल नहीं बैठ रहा। निर्माण काल में बिगडे सम्बंधो से आज भी सनातन भवन और इनके बीच झगडे आम है।

दूसरी तरफ के पडौसी के पास सनातन भवन का पूरा नक्शा, निर्माण कला का इतिहास और रिपोर्ट्स उपलब्ध है जो कभी वह इस भवन से चुरा ले गया था। यह ज्यादा समझदार है, अपनी इस जानकारी का ढिंढोरा नहीं पीटता, उसने सनातन भवन की नींव के लिए बने विराट प्लेटफार्म का उपयोग, अपनी नींवें ठहराने के लिए किया। परिणामस्वरूप सनातन भवन का एक अंश झुकाव इस भवन की ओर हो गया, जो देखने पर नज़र नहीं आता। अपने स्ट्रक्चर में जरा सा अनुकूल परिवर्तन कर भवन खडा कर ही लिया है। शान्त रहता है और दबे पांव लक्ष्य की ओर बढ़ता है, इस तरह स्वयं के भवन को सुदृढ करता रहता है।

इन दोनो पडौसियों ने अपनी इमारत पर लिख रखा है ‘अपने पडौसी से प्रेम करो’ जिसकी पूरा शहर सराहना करता है। किन्तु सनातन भवन ने लिख रखा है ‘पूरे शहर को अपना परिवार समझो’ पर पता नहीं शहर इस तख्ती की तरफ आंख उठा कर नहीं देखता, शायद ईर्ष्या वश श्रेय देना नहीं चाहता।

 
55 टिप्पणियाँ

Posted by on 06/03/2013 in बिना श्रेणी

 

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55 responses to “सनातन भवन

  1. धीरेन्द्र सिंह भदौरिया

    06/03/2013 at 7:25 अपराह्न

    शायद ईर्ष्या वश श्रेय देना नहीं चाहता। Recent post: रंग,

     
  2. दीपक बाबा

    06/03/2013 at 7:29 अपराह्न

    ये नीव सनातन आस्था के कारण ही मज़बूत है..

     
  3. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

    06/03/2013 at 7:40 अपराह्न

    सटीक तुलना की है। उदारता की बराबरी उदारता का मर्म समझे बिना नहीं हो सकती …

     
  4. कुश्वंश

    06/03/2013 at 7:42 अपराह्न

    सुज्ञ जी ठीक कहा आपने शायद ईर्ष्या वश ही.

     
  5. Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता

    06/03/2013 at 8:02 अपराह्न

    साधू साधू …सच में , समझ नहीं आ रहा किन शब्दों में आपको आभार प्रकट करू ……ख़ुशी है जो आप अपनी नींव पर पड़ती चोटों की ओर सचेत है, दुसरे भवन वालों के झांसों और सिखावों में आकर अपने भवन की नींव "जांचने" के लिए उसे बारम्बार खोद नहीं रहे …..——वहां तो नहीं – लेकिन यहाँ अवश्य कहूँगी – वैज्ञानिक चिंतकों को पूरी स्टडी किये बिना किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना , और न सिर्फ पहुंचना बल्कि उस निष्कर्ष को प्रतिपादित करना , शोभा नहीं देता । मैं खुद एक वैज्ञानिक हूँ । वैसे मुझे कट्टर आदि वहां कहा गया है – लेकिन हूँ नहीं मैं वह सब । @ चार्ल्स डार्विन – उन्होंने खुद ही अपने विद्यार्थियों से कहा था कि यह सिद्धांत वैज्ञानिक नहीं है – क्योंकि बीच की कड़ियाँ लुप्त होने की कोई ठोस वजह नहीं मिलती – न वे हैं, न उनके अवशेष ही । तो जिस सिद्धांत का प्रस्तोता स्वयं ही उसे "ठीक नहीं है" कह रहा है – उस सिद्धांत के बल पर अपने अवतारों को काल्पनिक मान लेना वैज्ञानिक है क्या ? @ नरसिंह अवतार में बड़ी सुन्दर कल्पना – अब कल्पना मान ही लिया गया – तो उत्तर क्या दिया जाए ? क्या बिना किसी एविडेंस के इसे "कल्पना" नाम दे देना वैज्ञानिक है ? @ अवतारों को ही सच मानने की मूर्खता …… ज्ञान अध्ययन और विवेक में कहीं घोर कमी ……. ऐसे लोग निरक्षर लोगों से भी ज्यादा अहितकारी है समूचे समाज के लिए अब साफ़ शब्दों में मुझे मूर्ख , समाज के लिए आदि अहितकारी , आदि उपाधियाँ नवाजी जाना – क्या यह वैज्ञानिक चिंतन है ? बिना एविडेंस के ? :)एक बड़ा ही रोचक तथ्य है – आज का पीरियोडिक टेबल ऑफ़ एलिमेंट्स । यह टेबल ज्ञात एलिमेंट्स को क्लासिफाय करने के लिए बना । मेन्देलिव ने ज्ञात गुणों पर टेबल बनाया – जिसमे बहुत कुछ थियरी आगे जा कर सही नहीं लगी एविडेंस से …. तो थियरी बदल दी गयी । मोस्ली का टेबल प्रयुक्त होने लगा ……—————————

     
  6. Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता

    06/03/2013 at 8:02 अपराह्न

    विज्ञान में हमें एक सिद्धांत सिखाया जाता है – bayesian inference. यह सिद्धांत कहता है कि (http://en.wikipedia.org/wiki/Bayesian_inference) यदि "एविडेंस" और "थियरी" में जमीन आसमान का फर्क हो – तो दोनों को ही जांचे बिना निष्कर्ष देना अनुचित है । जैसे Rationally, Bayes' rule makes a great deal of sense. If the evidence doesn't match up with a hypothesis, one should reject the hypothesis. But if a hypothesis is extremely unlikely a priori, one should also reject it, even if the evidence does appear to match up.For example, imagine that I have various hypotheses about the nature of a newborn baby of a friend, including:: the baby is a brown-haired boy.: the baby is a blond-haired girl.: the baby is a dog.Then consider two scenarios:I'm presented with evidence in the form of a picture of a blond-haired baby girl. I find this evidence supports and opposes and .I'm presented with evidence in the form of a picture of a baby dog. Although this evidence, treated in isolation, supports , my prior belief in this hypothesis (that a human can give birth to a dog) is extremely small, so the posterior probability is nevertheless small.The critical point about Bayesian inference, then, is that it provides a principled way of combining new evidence with prior beliefs, through the application of Bayes' rule.—————————अब यदि राम के चरित्र में शोषक जैसे तत्व पूरे जीवनकाल में कहीं भी नहीं मिलते – तो कैसे शोषक ठहराए जाएँ उनके तथाकथित दो कृत्य – सेता का "शोषण" और शम्बूक का भी ?जो राम १. निषाद (जातिभेद?) को गले लगायें , २. बंदरों रीछों (मानव से इतर प्राणियों तक से मित्रभाव – जाती की तो बात ही छोड़ दीजिये) को गले लगायें, ३. जो शबरी (जातिभेद?)के झूठे बेर खाएं , ४. जो मंथरा (जाती / स्त्री / दासी / और इस सब सेऊपर उन्हें वन भेजने और पितृ शोक की कारिणी) ) के उनके साथ किये कृत्य के बाद भी उसका या ५. कैकेयी (स्त्री / सौतेली माता / उन्हें वन भेजने वालीं / उनके पिता की मृत्यु की कारिणी )का भी अनादर न करें – वे राम अपनी प्रिया सीता के या शम्बूक के साथ ऐसा – करें – अजीब सा नहीं लगता ??यह वही है की मुझे ऊपर दिए हाइपोथिसिस में से "H3" मान्य हो रहा है ।🙂 तब हमें सोचना चाहिए न कि एविडेंस मिल रहा है या नहीं ? कुछ भाषाकार कहते हैं की रामायण की पूरी भाषा, छंद आदि ,और अवध लौटने के बाद राम के राजा होने के बाद की कथा ,में भाषा ही नहीं मिलती । कहीं ऐसा तो नहीं कि थियरी हमें राम के बारे में भ्रमित करने के लिए पिछले 700 वर्षों में बदल दी गयी हो जब कि हम गुलाम थे ?

     
  7. Kalipad "Prasad"

    06/03/2013 at 10:04 अपराह्न

    सनातन धर्म में बहुत कुछ है आप क्या देखना चाहते है निर्भर करता है आपके सोच पर!latest post होलीl

     
  8. भारतीय नागरिक - Indian Citizen

    06/03/2013 at 10:35 अपराह्न

    बहुत ही अच्छा लिखा है. किन शब्दों में तारीफ करूं. समझदार को इशारा काफी होता है और आपने तो इतना अच्छा समझाया है, इसका मर्म सनातनियों को तो जानना और मानना चाहिये. शिल्पा जी का एक आलेख भी बहुत अच्छा था जिसमें आलोचना को लेकर लिखा गया था.

     
  9. डॉ. मोनिका शर्मा

    07/03/2013 at 12:40 पूर्वाह्न

    अर्थपूर्ण विचार का मर्म सुंदर ढंग से समझाया ….उदार होने और उदार बनने में अंतर है | गहरे उतरकर समझना होगा हम सबको

     
  10. वाणी गीत

    07/03/2013 at 8:07 पूर्वाह्न

    इस तख्ती की तरफ आंख उठा कर नहीं देखता, शायद ईर्ष्या वश श्रेय देना नहीं चाहता।!!बहुत विस्तार से समझाया , जो समझे उसका भला !

     
  11. Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता

    07/03/2013 at 10:04 पूर्वाह्न

    लेकिन अपने भवन की नींवें खोद कर अपने भवन के वैज्ञानिक कंगूरे बनाने वाले यह समझ नहीं पायेंगे कि, पडोसी की बातों के असर में आकर वे अपनी धरोहर को कितना भारी नुक्सान कर रहे हैं । कर तो वे रहे हैं, लेकिन इसका फल वे "नहीं" भोगेंगे । इसका फल भोगेंगी उनकी (और हमारी) आने वाली सन्ततियां – जो निश्चित ही gurudwaara mehatiyana saahib (google images) में दिखाई बर्बरता की मूर्तियों का हश्र भोगेंगी ….. वे यह नहीं समझेंगे कि "वे" तो "वैज्ञानिक और स्वतंत्र चिंतन" कर रहे हैं – लेकिन यह प्रोपागांडा फैलाया गया है हिन्दुओं को इसी अविश्वास में धकेलने के लिए । उनकी नींवें तो मजबूत हैं – इसलिए वे तो "वैज्ञानिक चिंतन" करते हुए भी "सनातन धर्मी" ही बने रहेंगे । किन्तु उनकी "वैज्ञानिक बातों" के असर से हिन्दू बच्चे और युवा , हिन्दू धर्म में अपनी श्रद्धा और विश्वास खोते जा रहे हैं । और फिर easy होता है उन्हें कर धर्म परिवर्तित करवा लेना । वही जो मैंने आलोचना वाली पोस्ट में कहा – साम – दाम – दंड – भेद ।साम का अर्थ है समझाना – कि तुम्हारे विश्वास ही गलत हैं । १. "अवतार" अवतार नहीं , असाधारण मानव थे । २. "गीता" दिव्या गीता नहीं है – एक लड्किबाज़ / धोखेबाज़ / हिंसापूर्ण शोषक की "भोले अर्जुन" को भयानक युद्ध में "फंसाने" की साजिश है । ३. "वेद" वेद ही नहीं हैं – वे स्वार्थ सिद्धि के लिए किन्ही मांसभक्षी क्रूर शक्तिवंत देवताओं को चढ़ाई जा रही मांस रुपी उत्कोच भर हैं । all the three foundation stones are being proved shaky……दुखद है कि ये बातें समझाने में पडोसी से ज्यादा स्वभवन निवासी आगे हैं ।वे भूले जाते हैं कि उनके और उनके अपने बच्चों के संस्कार कितने ही मजबूत क्यों न हों हर हिन्दू बच्चे के पास उतनी सशक्त पृष्ठभूमि नहीं । कई बच्चे उनकी इस समझाइश के कारण हिन्दू धर्म से आस्था खो रहे हैं – और पडोसी उन्हें दाम (धन / प्रेम विवाह) / दंड (मेहतियाना साहब) / भेद (हिन्दू रहोगे तो तुम्हारा शोषण होगा )से अपने घर में बुला लेते हैं.In future – by 2052 it is estimated that the hindus will be in minority in India by the present trends in the past 4 population counts.so our future generations will be forced to the fate of aurangzeb's times, and these so called "modern scientific thinkers" will be as responsible for this as the original converters…….

     
  12. संतोष त्रिवेदी

    07/03/2013 at 10:30 पूर्वाह्न

    एक बात और गौर करने लायक है कि धर्म तो विज्ञान को समझ रहा है पर वह अपनी तार्किकता के आगे बाकी किसी का अस्तित्व मानने को तैयार नहीं है …आजकल यदि आप किसी तरह अपनी उपस्थिति दर्ज़ नहीं करा पा रहे हैं तो शार्टकट है कि हमारे बने-बनाये मूल्यों और प्रतिमाओं का ध्वंस कर दें.इससे तात्कालिक प्रसिद्धि पाने का उनका दंभ पूरा हो जाता है.आज राम,सीता आदि हमारे प्रतीकों के सहारे वे लोग मूल्यों की बात करते हैं ,जिनके स्वयं कोई मूल्य नहीं हैं.यदि आप राम कथा पर आस्था रखते हैं तो उससे तर्क की कसौटी पर कसने पर कुछ भी हासिल नहीं होगा.कल को लोग यह भी पूछ सकते और कह सकते हैं कि इनका कोई अस्तित्व ही नहीं था.कुछ लोग सीता के निर्वाण को आत्मदाह मान रहे हैं और इसके लिए राम को दोषी.उन्हें यह भी नहीं पता कि ऐसी धारणाओं से सीता को आत्मिक शांति के बजाय कष्ट होगा.तत्कालीन सन्दर्भों को आज अपने संकुचित नज़रिए से देखना प्रगतिशीलता नहीं मूर्खता की निशानी है.

     
  13. रविकर

    07/03/2013 at 12:17 अपराह्न

    सुन्दर प्रस्तुति-आभार-सादर नमन-

     
  14. Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता

    07/03/2013 at 12:50 अपराह्न

    जी संतोष जी अपने जीवन के लक्ष्य के बारे में सम्पूर्ण ज्ञान के साथ अवतरित होने वाली सीता जी , राम जी , और सती जी , इन सब के चरित्रों में "पलायनवादी आत्महत्या" जैसी मूर्खताओं को आरोपित करना , यह दिखाता है कि वे साधारण मानव / मानवी भर थीं , जो जीवन में कठिनाइयाँ आने पर आत्महत्या जैसे पलायनवादी कदम उठा लेतीं थीं। यह आरोपण सिर्फ राम का नहीं, सीता का उससे भी बड़ा अपमान है , क्योंकि पलायनवादी उन्हें साबित किया जा रहा है । आगे की पीढियां इन्ही "आत्महत्या" की आरोपित बातों को लेकर सीता की निंदा करेंगी , कि उन्होंने यह कर कर स्त्री शोषण को बढ़ावा दिया और सन्देश दिया कि स्त्री को पति से अलग होना पड़े , तो उसे आत्महत्या कर लेनी चाहिए । ज्ञान में जीवन लक्ष्य सम्पूर्ण हो जाने के बाद शरीर को स्वेच्छा से त्याग देना अनेक ऋषि मुनियों ने किया है । अवतार पूर्ण इश्वर का ही स्वरुप हैं – उनकी मृत्यु हम मानवों की तरह उनकी इच्छा के बिना संभव ही नहीं है । तो कोई न कोई लोक लीला रची ही जानी है उसके लिए ।

     
  15. सुज्ञ

    07/03/2013 at 1:09 अपराह्न

    जी, यही तो बात है, उदारता के मायने शहर भर का कचरा सनातन भवन के द्वार पर डम्प करवाना नहीं होता.

     
  16. Madan Mohan Saxena

    07/03/2013 at 2:18 अपराह्न

    वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति .

     
  17. सुज्ञ

    07/03/2013 at 4:25 अपराह्न

    आश्चर्य तो इस बात का है कि जो राम के चरित्र को आदर्श ही नहीं मानते, जिनकी विचारधारा का राम से स्नान सूत्तक का सम्बंध नहीं वे उठकर राम की नैतिकताओं पर सवाल खडे करते है। और उपर से तुर्रा यह कि कहते है 'सवाल खडे करके ही हम राम को जानेंगे' अरे भाई जब आपको राम आदर्श नहीं लगते, आपको उनकी जीवन शिक्षाओं का अनुगमन करना ही नहीं है तो राम को क्यों जानना है?भारतीय तो राम चरित्र के आदर्शों को जीवन औषधि मानते है, नैतिक दृढता के लिए प्रेरणा पाते रहते है। उनके जीवन मूल्यों से प्रेरित होकर ही संस्कारों के प्रति आदरेय मानसिकता बनी रहती है। अन्यथा मूल्यहीन लोग संस्कारों पर व्यंग्य के साथ गालियां देते ही रहते है।इसलिए जो वस्तु जिनके लिए मूल्यवान है कमसे कम उनके लिए तो रहने दो!! आपको क्या अधिकार है उनके जीवन-मूल्यों के मानक को खण्डित करो……

     
  18. संतोष त्रिवेदी

    07/03/2013 at 4:27 अपराह्न

    सच में ।

     
  19. संतोष त्रिवेदी

    07/03/2013 at 4:28 अपराह्न

    आभार शिल्पा जी ।

     
  20. Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता

    07/03/2013 at 4:31 अपराह्न

    exactly.THEY believe the RAMA to be wrong – and they try to convince those who do believe in HIM – that wake up! your belief is flawed !!!and then they claim to want to learn about RAMA – WHY???? when they believe he was a "shoshak" WHY do they want to know him ?

     
  21. सुज्ञ

    07/03/2013 at 4:38 अपराह्न

    सही कहा आपने…उदार होने और उदार बनने में अंतर है |धन जैसी चीज हो तो लोगों में बाँट कर उदार कहलाएं, किन्तु उदार कहलवाने के लिए अपने आधारभूत सिद्धांत अपने ही हाथों खण्डित कर लें यह कौनसी बुद्धिमत्ता है।😦

     
  22. सुज्ञ

    07/03/2013 at 5:16 अपराह्न

    बहुत ही स्पष्टता से कही आपने संतोष जी,@एक बात और गौर करने लायक है कि धर्म तो विज्ञान को समझ रहा है पर वह अपनी तार्किकता के आगे बाकी किसी का अस्तित्व मानने को तैयार नहीं है .यह तार्किकता का दंभ गम्भीर विज्ञानी को नहीं होता इतना अव्यस्क अल्पविज्ञानी को होता है। कहते है चाय से भी किटली अधिक गर्म वैसे ही विज्ञान से वैज्ञानिक अपने को अधिक अक्लवान समझता है।और मनुष्य के दंभ का तो पूछो ही मत, एक बार जुबा से निकल गया तो निकल गया। भैस की पूंछ पकडी सो पकडी। 'कथन का ईगो' मनुष्य की समझ का दिवाला निकाल देता है। उसे जब होश आता है तब पता चलता है उसकी पकडी हुई बात मूर्खता भरी थी।

     
  23. संतोष त्रिवेदी

    07/03/2013 at 5:20 अपराह्न

    🙂

     
  24. सुज्ञ

    07/03/2013 at 5:33 अपराह्न

    सही है, दूरदृष्टि के अभाव में जो इस धरोहर को विकृत करने का कार्य कर रहे है इसके दुष्परिणाम आने वाली पीढ़िया भुगतेगी!!

     
  25. MANU PRAKASH TYAGI

    07/03/2013 at 5:52 अपराह्न

    सुंदर लेखन

     
  26. Arvind Mishra

    07/03/2013 at 6:19 अपराह्न

    इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

     
  27. Arvind Mishra

    07/03/2013 at 6:22 अपराह्न

    ब्लॉगपीठ के शंकराचार्य आदरणीय शंकराचार्य सुज्ञ जी और वैज्ञानिक शिल्पा मेहता जी ,मुझे बातें साफ़ साफ़ करने की आदत है- आप लोग जिस जेहाद में लगे हुए हैं उससे निश्चित ही हिन्दू धर्म दर्शन का कोई भला नहीं होने वाला है -आप छदम धर्म को बढ़ावा दे रहे हैं -वैज्ञानिकता तो आपमें खैर है ही नहीं -आज जो डार्विन के विकास वाद को नहीं मानता उसे वैज्ञानिक समाज में नीची नज़रों से देखा जाता है -स्पष्ट है वह अभी भी दो ढाई सौ साल पहले तक के ज्ञान पर रुका हुआ है -उसकी वैज्ञानिक शिक्षा में कहीं कोई बड़ा खोट रह गया है -आज की वैचारिक दुनियां जिन तीन महारथी बुद्धिजीवियों के अवदान पर टिकी है उनमें कार्ल मार्क्स, .आईनसटीन और डार्विन हैं -डार्विन विनम्र थे मगर उन्होंने अपने शिष्यों से ऐसा कुछ नहीं कहा कि उन्हें अपने सिद्धांतों पर भरोसा नहीं हैं -यहाँ उन्हें शल्प जी ने मिसकोट किया है .सनातन धर्म को पहला जोर का धक्का जोर से बुद्ध ने ही दे दिया था – तबसे इस धर्म ने बहुत बुनियादी सुधार किया है अपने में -वैदिकी ब्राहमण मांस खाते थे ,पशुमेध करते थे,नरमेध तक जा पहुंचे थे सब ख़त्म हुआ अब .आप लोगों से बस निवेदन करता हूँ अपने अध्ययन को और व्यापक बनाईए नहीं तो कुछ और लिखिए पढ़िए -धर्म की अर्थी लिये मत फिरिए …एक व्यक्ति के रूप में आप सम्माननीय हैं मगर एक अध्येता के रूप में आप दोनों निराश करते हैं🙂

     
  28. संतोष त्रिवेदी

    07/03/2013 at 6:44 अपराह्न

    गुरु जी,आपने निराश किया है। एक न्यायाधीश की तरह आपने हथौड़ा चलाकर अपना एकपक्षी निर्णय सुना दिया है।यहाँ कोई ऐसा नहीं है जिसे विज्ञान की तार्किकता पर संदेह हो। बात यह है कि धर्म को आप विज्ञान के नज़रिए से देखना ही गलत है।आपकी थ्योरी के अनुसार यदि राम चरित मानस को ही आँका जाय तो वह महज़ फैंटेसी और कूड़े से ज्यादा कुछ नहीं निकलेगी,जबकि हमारी तरह आप भी अच्छे अध्येता हैं।तो क्या मानस इस तरह अप्रासंगिक हो जाएगी?धार्मिक होना और धर्मांध होना दो अलग चीज़ें हैं और इस पर बहस हो सकती है पर आप आस्था की बात पर तर्क की कसौटी कैसे निर्धारित कर सकते हैं ?हम रामभक्त हैं इसका मतलब यह नहीं है कि नारियों के प्रति या विज्ञान के प्रति हमारी आस्था नहीं है।आप की अवधारणा से तो पूजा-पाठ सब व्यर्थ है क्योंकि विज्ञान किसी भगवान को नहीं मानता।आप जैसे धार्मिक व्यक्ति से ऐसी व्याख्या की उम्मीद नहीं है।

     
  29. Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता

    07/03/2013 at 6:51 अपराह्न

    १. @ ब्लॉगपीठ के शंकराचार्य आदरणीय शंकराचार्य सुज्ञ जी और वैज्ञानिक शिल्पा मेहता जी ,…. सुज्ञ जी जैसे ग्यानी व्यक्ति के समतुल्य मेरा नाम लेने के लिए आभार आपका । २. @ मुझे बातें साफ़ साफ़ करने की आदत है- आप लोग जिस जेहाद में लगे हुए हैं उससे निश्चित ही हिन्दू धर्म दर्शन का कोई बहला नहीं होने वाला है -आप छदम धर्म को बढ़ावा दे रहे हैं ….यह आपका निजी विचार हो सकता है । a. प्रथम तो मैं "जेहाद" कर रही हूँ ऐसा मुझे नहीं लगता । b. और द्वितीय बिंदु – भला होगा या नहीं होगा उससे कम से कम मुझे तो कोई सरोकार नहीं – मैं अपना कर्म कर रही -हूँ धर्म की रक्षा करने के लिए मैं बहुत ही तुच्छ हूँ । इश्वर खुद धर्म रक्षा कर लेंगे :)३. @ वैज्ञानिकता तो आपमें खैर है ही नहीं -….कोई बात नहीं – न सही । :)वैज्ञानिक होने का सर्टिफिकेट मुझे वैसे भी आपसे चाहिए नहीं – देश में आपके सर्टिफिकेट के बिना भी बहुत से वैज्ञानिक हैं🙂🙂 मैं अपने नाम के आगे इंजिनियर लिखती हूँ , वैज्ञानिक नहीं । वैज्ञानिक खोजें करते -हैं इंजिनियर उन खोजों पर निर्माण करते हैं🙂 ४. @ आज जो डार्विन के विकास वाद को नहीं मानता उसे वैज्ञानिक समाज में नीची नज़रों से देखा जाता है -स्पष्ट है वह अभी भी दो ढाई सौ साल पहले तक के ज्ञान पर रुका हुआ है -उसकी वैज्ञानिक शिक्षा में कहीं कोई बड़ा खोट रह गया है ….वैज्ञानिक समाज तो किसी को भी नीची दृष्टि से नहीं देखता – यह आप ही ने पिछली पोस्ट में कहा था🙂 वैज्ञानिकों में थियरिज को लेकर मतभेद होते ही रहते हैं – और सच में वैज्ञानिक होते हैं, उन्हें समय ही नहीं होता दूसरों को नीची दृष्टि से देखने में बर्बाद करने के लिए🙂 ५. @ -आज की वैचारिक दुनियां जिन तीन महारथी बुद्धिजीवियों के अवदान पर टिकी है उनमें कार्ल मार्क्स, .आईनसटीन और डार्विन हैं -डार्विन विनम्र थे मगर उन्होंने अपने शिष्यों से ऐसा कुछ नहीं कहा कि उन्हें अपने सिद्धांतों पर भरोसा नहीं हैं -यहाँ उन्हें शल्प जी ने मिसकोट किया है …..हो सकता है – मैंने पढ़ा है यह उनके बारे में – हो सकता है आपकी जानकारी मुझसे बेहतर हो🙂 ६. सनातन धर्म को पहला जोर का जोर से बुद्ध ने ही दे दिया था – तबसे इस धर्म ने बहुत बुनियादी सुधार किया है अपने में …a. धर्म में सुधार आ ही नहीं सकता । धर्म त्रुटिहीन है, परफेक्ट है वह । इसीलिए तो "धर्म" है ।b. पंथों , परम्पराओ और रीतियों में बिगाड़ और सुधार होते ही रहते हैं – लेकिन धर्म एक है और उसमे सुधार की ही नहीं होती । ७. @-वैदिकी ब्राहमण मांस खाते थे ,पशुमेध करते थे,नरमेध तक जा पहुंचे थे सब ख़त्म हुआ अब …..:) यह आपका विचार हो सकता है । इस पर पंडितों में दो मत हैं – और मैं इतनी ज्ञानि नहीं , कि , इस अपने निर्णय थोप सकूं । ८. @ आप लोगों से बस निवेदन कर सकता हूँ अपने अध्ययन को और व्यापक बनाईए नहीं तो कुछ और लिखिए पढ़िए -….a. निवेदन करने का अधिकार हर एक व्यक्ति को है । लेकिन मैं इसे स्वीकार नहीं करती । b. मुझे यह "निवेदन" अस्वीकार है और रहेगा । मैं जब जब उचित समझूँगी इस (या किसी भी और) विषय पर लिखूंगी । न आप मुझे अपने विचार रखने से रोक सकते हैं , न मैं आपको । भारत का संविधान हम दोनों को अभिव्यक्ति की आज़ादी देता है । ९. @ धर्म की अर्थी लिये मत फिरिए …….धर्म की अर्थी निकालने वाला आज तक कोई हुआ नहीं इस संसार में – कोशिशें बहुतों ने की – कोई कर न सका ।🙂 अप प्रयास करना चाहते हों तो कीजिये .. यह आपका निर्णय है । १०. एक व्यक्ति के रूप में आप सम्माननीय मगर एक अध्येता के रूप में आप दोनों निराश करते हैं🙂 ….कोई बात नहीं – आपके निराश होने न होने से कम से कम मुझे तो कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ने वाला । मैं जो हूँ, वह हूँ – और अपने लिए हूँ । मैंने आज तक जीवन में अपने पति और परिवार के अतिरिक्त किसी की आशा और निराशा के लिए , न अपने आप को बदलने का कोई प्रयास किया , न आगे ही करूंगी ।

     
  30. Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता

    07/03/2013 at 6:52 अपराह्न

    १. @ ब्लॉगपीठ के शंकराचार्य आदरणीय शंकराचार्य सुज्ञ जी और वैज्ञानिक शिल्पा मेहता जी ,….सुज्ञ जी जैसे ग्यानी व्यक्ति के समतुल्य मेरा नाम लेने के लिए आभार आपका । २. @ मुझे बातें साफ़ साफ़ करने की आदत है- आप लोग जिस जेहाद में लगे हुए हैं उससे निश्चित ही हिन्दू धर्म दर्शन का कोई बहला नहीं होने वाला है -आप छदम धर्म को बढ़ावा दे रहे हैं ….यह आपका निजी विचार हो सकता है । a. प्रथम तो मैं "जेहाद" कर रही हूँ ऐसा मुझे नहीं लगता । b. और द्वितीय बिंदु – भला होगा या नहीं होगा उससे कम से कम मुझे तो कोई सरोकार नहीं – मैं अपना कर्म कर रही -हूँ धर्म की रक्षा करने के लिए मैं बहुत ही तुच्छ हूँ । इश्वर खुद धर्म रक्षा कर लेंगे :)३. @ वैज्ञानिकता तो आपमें खैर है ही नहीं -….कोई बात नहीं – न सही । :)वैज्ञानिक होने का सर्टिफिकेट मुझे वैसे भी आपसे चाहिए नहीं – देश में आपके सर्टिफिकेट के बिना भी बहुत से वैज्ञानिक हैं🙂🙂 मैं अपने नाम के आगे इंजिनियर लिखती हूँ , वैज्ञानिक नहीं । वैज्ञानिक खोजें करते -हैं इंजिनियर उन खोजों पर निर्माण करते हैं🙂 ४. @ आज जो डार्विन के विकास वाद को नहीं मानता उसे वैज्ञानिक समाज में नीची नज़रों से देखा जाता है -स्पष्ट है वह अभी भी दो ढाई सौ साल पहले तक के ज्ञान पर रुका हुआ है -उसकी वैज्ञानिक शिक्षा में कहीं कोई बड़ा खोट रह गया है ….वैज्ञानिक समाज तो किसी को भी नीची दृष्टि से नहीं देखता – यह आप ही ने पिछली पोस्ट में कहा था🙂 वैज्ञानिकों में थियरिज को लेकर मतभेद होते ही रहते हैं – और सच में वैज्ञानिक होते हैं, उन्हें समय ही नहीं होता दूसरों को नीची दृष्टि से देखने में बर्बाद करने के लिए🙂 ५. @ -आज की वैचारिक दुनियां जिन तीन महारथी बुद्धिजीवियों के अवदान पर टिकी है उनमें कार्ल मार्क्स, .आईनसटीन और डार्विन हैं -डार्विन विनम्र थे मगर उन्होंने अपने शिष्यों से ऐसा कुछ नहीं कहा कि उन्हें अपने सिद्धांतों पर भरोसा नहीं हैं -यहाँ उन्हें शल्प जी ने मिसकोट किया है …..हो सकता है – मैंने पढ़ा है यह उनके बारे में – हो सकता है आपकी जानकारी मुझसे बेहतर हो🙂 ६. सनातन धर्म को पहला जोर का जोर से बुद्ध ने ही दे दिया था – तबसे इस धर्म ने बहुत बुनियादी सुधार किया है अपने में …a. धर्म में सुधार आ ही नहीं सकता । धर्म त्रुटिहीन है, परफेक्ट है वह । इसीलिए तो "धर्म" है ।b. पंथों , परम्पराओ और रीतियों में बिगाड़ और सुधार होते ही रहते हैं – लेकिन धर्म एक है और उसमे सुधार की ही नहीं होती । ७. @-वैदिकी ब्राहमण मांस खाते थे ,पशुमेध करते थे,नरमेध तक जा पहुंचे थे सब ख़त्म हुआ अब …..:) यह आपका विचार हो सकता है । इस पर पंडितों में दो मत हैं – और मैं इतनी ज्ञानि नहीं , कि , इस अपने निर्णय थोप सकूं । ८. @ आप लोगों से बस निवेदन कर सकता हूँ अपने अध्ययन को और व्यापक बनाईए नहीं तो कुछ और लिखिए पढ़िए -….a. निवेदन करने का अधिकार हर एक व्यक्ति को है । लेकिन मैं इसे स्वीकार नहीं करती । b. मुझे यह "निवेदन" अस्वीकार है और रहेगा । मैं जब जब उचित समझूँगी इस (या किसी भी और) विषय पर लिखूंगी । न आप मुझे अपने विचार रखने से रोक सकते हैं , न मैं आपको । भारत का संविधान हम दोनों को अभिव्यक्ति की आज़ादी देता है । ९. @ धर्म की अर्थी लिये मत फिरिए …….धर्म की अर्थी निकालने वाला आज तक कोई हुआ नहीं इस संसार में – कोशिशें बहुतों ने की – कोई कर न सका ।🙂 अप प्रयास करना चाहते हों तो कीजिये .. यह आपका निर्णय है । १०. एक व्यक्ति के रूप में आप सम्माननीय मगर एक अध्येता के रूप में आप दोनों निराश करते हैं🙂 ….कोई बात नहीं – आपके निराश होने न होने से कम से कम मुझे तो कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ने वाला । मैं जो हूँ, वह हूँ – और अपने लिए हूँ । मैंने आज तक जीवन में अपने पति और परिवार के अतिरिक्त किसी की आशा और निराशा के लिए , न अपने आप को बदलने का कोई प्रयास किया , न आगे ही करूंगी ।

     
  31. सुज्ञ

    07/03/2013 at 7:08 अपराह्न

    आदरणीय डॉ अरविन्द मिश्रा जी,पहली बात तो कार्ल मार्क्स के अनुयायी कबसे धर्म के भले की चिंता करने लगे? और उसमें भी सनातन धर्म की? हम अगर सनातन धर्म दर्शन के सिद्धांतो की सुरक्षा की बात न कर सभी धर्मों के शुद्ध स्वरूप संरक्षण की बात करते तब भी कार्ल मारकस के अनुयायी तो जेहादी ही कहते। हिन्दू धर्म दर्शन का भला किस में है, यह आप ईमानदारी से सोच भी नहीं सकते, तो भला प्रतिपादित करना तो दूर की बात है। दूसरी, वैज्ञानिक समाज में नीची नज़रों से देखे जाने के डर से ही आप डार्विन के विकासवाद थियरी को मान रहे है? क्या यही है आपकी विज्ञान निष्ठा?समस्त जगत के समक्ष यह स्पष्ट है कि डार्विन का विकासवाद अभी तक एक प्रस्तावित थियरी के स्तर पर है। प्रतिपादित सिद्धांत नहीं।आप निवेदन न भी करते तब भी हमारा अध्ययन अनवरत जारी ही है और रहेगा। व्यापक से व्यापक बनाना ही लक्ष्य है मूढ़ की तरह किसी एक सूत्र पर स्थिर हो जाना नहीं। और यह व्यापक अध्ययन का ही परिणाम है कि सनातन धर्म में विकार लाने के प्रयास और उससे पहूँचने वाली क्षति स्पष्ट दृष्टिगोचर हो जाती है।धर्म की अर्थी ? अभी धर्म विरोधी सफल नहीं हुए है कि हमें धर्म की अर्थी उठानी पडे, अभी तक तो हम धर्मरथ खींच रहे है।आप भी एक व्यक्ति के रूप में आप सम्माननीय हैं किन्तु एक गम्भीर विचारक के रूप में आपने सदैव निराश किया है। 🙂

     
  32. प्रवीण पाण्डेय

    07/03/2013 at 7:41 अपराह्न

    किसी ने सर्वे भवन्तु सुखिनः को समझा ही नहीं और व्याख्यान पढ़ दिये..

     
  33. Arvind Mishra

    07/03/2013 at 8:59 अपराह्न

    अवतारवाद एक आदि वैज्ञानिक सोच (प्रोटो साईंटिफिक थाट ) भर है बाकी सब पुराणकार की कल्पना है- सच कुछ नहीं है -इतनी भी समझ आप लोगों को नहीं है तो आप से तो बात ही नहीं की जा सकती -सुज्ञ जी मैंने तो आपको वैचारिक /बुद्धि के इस स्तर का सोचा नहीं था -माफ़ करियेगा पढ़े लिखे बौड़म हैं आप लोग!🙂 सारी!

     
  34. संतोष त्रिवेदी

    07/03/2013 at 9:05 अपराह्न

    …बौड़म शब्द लिखकर आपने अपनी ही तौहीन की है….बहुत अफ़सोस है मुझे ।

     
  35. Arvind Mishra

    07/03/2013 at 9:11 अपराह्न

    आप सरीखे अधकचरे ज्ञान के लोगों से माफी चाहता हूँ =आप कितना बड़ा नुक्सान हिन्दू धर्म का कर रहे हैं आप नहीं जानते -आप सरीखे लोगों के चलते हिन्दू धर्म चिंतन कभी किनारे तक जा पंहुचा था -मेरे चेले भी प्राईमरी सोच के ही बने रहना चाहते हैं -सच है बिनु सत्संग विवेक न होई!राम कृपा बिनु सुलभ न सोई:-)

     
  36. Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता

    07/03/2013 at 9:33 अपराह्न

    :):)ahankaar🙂

     
  37. Arvind Mishra

    07/03/2013 at 9:35 अपराह्न

    हा हा हा हा -शुभकामना स्वीकार्य देवि🙂

     
  38. Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता

    07/03/2013 at 9:36 अपराह्न

    pranam🙂

     
  39. Arvind Mishra

    07/03/2013 at 9:41 अपराह्न

    अखंड सौभाग्यवती भव!

     
  40. संतोष त्रिवेदी

    07/03/2013 at 9:45 अपराह्न

    …मगर वैज्ञानिकों के शब्दकोष में आशीष जैसा कुछ होता तो नहीं🙂

     
  41. Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता

    07/03/2013 at 9:46 अपराह्न

    abhaar aapka – this is an unexpected blessing … thanks….

     
  42. Arvind Mishra

    07/03/2013 at 9:52 अपराह्न

    इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

     
  43. Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता

    07/03/2013 at 9:54 अपराह्न

    my husband is also conveying his thanks to u sir – it is a blessing to him too …. so double thanks – from both of us🙂

     
  44. Arvind Mishra

    07/03/2013 at 9:54 अपराह्न

    Thanks Shilpa,such blessings emerge out spontaneously from core of the heart of a true Brahamin! I may not accept your stand on any particular issue but I have all the good wishes for you….both are different things and should not be mixed!

     
  45. सुज्ञ

    07/03/2013 at 10:09 अपराह्न

    अरविंद जी,कहिए तो सही कौन सी बात आपको "वैचारिक /बुद्धि के इस स्तर का" व "पढ़े लिखे बौड़म" जैसा लगा? सच मेँ साफ साफ कहने वाले आप साफ ही कहेँगे.और स्पष्ट कर ही लिजिए, उपास्योँ की आलोचना न करने का कहना आपको जेहादी, कट्टरता आदि क्योँ लगती है? कृपया!!!

     
  46. Arvind Mishra

    07/03/2013 at 10:11 अपराह्न

    @सुज्ञ जी,काश मैं समझा पाता -मगर यह माध्यम और सीधे संवाद का अभाव यह संभव नहीं होने देगा -कभी मिल बैठ कर चर्चा होगी -मनभेद न हो बस!

     
  47. सुज्ञ

    07/03/2013 at 10:19 अपराह्न

    अरविंद जी,कोई मनभेद नहीं है. आप निश्चिंत रहें. किंतु आरोप इसी माध्यम से है थोडासा ही सही स्पष्टिकरण भी इसी माध्यम पर कर दीजिए. कमसे कम हमारे बारे में लोग दुराग्रह न पाल बैठे…. आप स्पष्ट वक्ता है.

     
  48. Arvind Mishra

    07/03/2013 at 10:22 अपराह्न

    अब यह मेरे लिए इतना आसान नहीं रहा -खुद को कमजोर पा रहा हूँ यहाँ!🙂

     
  49. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

    08/03/2013 at 3:55 पूर्वाह्न

    डेमोक्रेसी, सनातन धर्म और विज्ञान सभी मे असहमति का पूरा आदर है और भेड़ों की अंधी हांक का रिवाज नहीं है। खुशी की बात यह भी है कि अब तक के सभी भागीदार इन तीनों पद्धतियों से परिचित हैं इसलिए एक दूसरे के मंतव्य को समझने के ईमानदार प्रयास की उम्मीद है। वार्ता का यह ढंग देखकर अफसोस तो हो रहा है लेकिन सुज्ञ जी की उदारता और मानसिक परिपक्वता से परिचित हूँ इसलिए उनकी ओर से कोई मनभेद नहीं होगा इस बात पर पूरा भरोसा है।

     
  50. सुज्ञ

    08/03/2013 at 8:34 पूर्वाह्न

    अरविंद जी हाथी पर चढ बैठे है.:) मिलने आए तीन मित्रों का 'उदारता' से स्वागत भी नहीं कर पा रहे, समस्त सनातन धर्म में 'व्यापक उदारता' पर कैसे बात होगी?

     
  51. Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता

    08/03/2013 at 11:20 पूर्वाह्न

    :)1. I have never objected to asahmati, 2. AS SOON AS sugya ji pointed out the difference between "nindaa" and "aalochana" in a comment on my post, i immediately added a sentence in the beginning of my post that anywhere i say "alochanaa" it means "ninda ke uddeshya se kee jaa rahi aalochanaa"….. In fact, I actually wanted to replace the word everywhere in the post, but felt it would be deception with my readers and friends to do so, as many people had already expressed their opinions based on the word "alochanaa" used by me initially ….3. i have repeatedly said in the comments at all the 3 of these posts ( 3.1. mine http://shilpamehta1.blogspot.in/2013/03/hinduism-criticism-parmatma-avtaar-rama.html, 3.2. mishra sir's http://mishraarvind.blogspot.in/2013/03/blog-post.html3.3. and now here at sugya ji's present post) that i have NO OBJECTION TO Asahmati or even nastiktaa … what i am asking is the avoidance of judgmental criticism. Anyone and everyone has all the right to agree or disagree with me on this.4. when we start using personally insulting words at the other party in a discussion on a public forum, we can just not assume that they will be as udaar and paripakv (especially when we are specifically calling them the opposite🙂 ) as sugya ji is and there will not be a manbhed ever.5. yes democracy , sanatan dharma , and science do respect asahmati. 6. but freedom of individual does not mean that he can hit another with personally insulting words as weapons thereby attacking the other's equal right to asahmati. 7. i disagree with a particular trend, i expressed my opinion. ANYONE AND Everyone has all the right to disagree with me and express his/ her point of view. BUT NONE OF US have the right to use personal insults against each other on a public forum. 8. The discussion was not about any person or him or her being scientific / gyaani / udaar / kattar / baudam / etc etc etc🙂 ….. it was about an issue, which it has not stayed. i am not interested in participating in a war of personalities ……

     
  52. सदा

    08/03/2013 at 4:20 अपराह्न

    शायद ईर्ष्या वश श्रेय देना नहीं चाहता।बहुत सही कहा आपने …

     
  53. Virendra Kumar Sharma

    09/03/2013 at 1:01 अपराह्न

    सारगर्भित विवेचना सनातन धर्म के शाश्वत सर्वकालिक स्वरूप की .

     
  54. सुज्ञ

    09/03/2013 at 8:00 अपराह्न

    प्रिय मित्रों,हमारे मन न तो कट्टरता है न जिहाद जैसा कुछ। आराध्यों की आलोचना निंदा पर आपत्ति कोई फतवा नहीं है। हमारे विचार है हम मानते है यह अहितकर है। हमें दुख है आपत्ति जताने पर उलट उपास्यों की निंदा-आलोचना में वृद्धि हुए जा रही है। आपत्ति करके कहीं न कहीं अप्रत्यक्ष भागीदार महसुस करते है। मेरे राम, मेरे राम कहकर भी राम की आलोचना-निंदा को प्रोत्साहित करना हमारी नजर में 'पीठ पर वार'है। समीक्षा के बहाने भी राम का चरित्र खण्डन करना, राम की पूजनीयता को धीमा जहर देने के समान है। उनके चरित्र को आराध्य पद से पददलित करने के समान है। जबकि समस्त निंदा के सन्दर्भ संदेहास्पद है। जिन्हें लगता है ऐसे मानमर्दन से राम की पूजनीयता में क्षति नहीं होने वाली, आदर्शों में न्यूनता नहीं आने वाली वे बहुत ही बडी भूल कर रहे है।खैर यह वाद विद्रोह का कारण न बने, 'वर्तमान पोस्ट चर्चा' को विराम देने की इच्छा है।सादर, आभार सहित!!

     
  55. Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता

    10/03/2013 at 10:59 पूर्वाह्न

    sahmat hoon …

     

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं यह ब्लॉग लिखने के अलावा गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। रेलवे से ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर्ड अफसर।

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