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दर्पोदय

25 दिसम्बर
English: Portrait of Akbar the Great: This por...
हिन्दी: मुग़ल चित्रकार मनोहर द्वारा बनाया गया मुग़ल बादशाह अकबर का चित्र (Photo credit: Wikipedia)
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दंभ का तीव्र उदय!!

एक बादशाह इत्र का बहुत शौकीन था। एक दिन वह दरबार में अपनी दाढ़ी में इत्र लगा रहा था। अचानक इत्र की एक बूंद नीचे गिर गई। बादशाह ने सबकी नजरें बचाकर उसे उठा लिया। लेकिन पैनी नजर वाले वजीर ने यह देख लिया। बादशाह ने भांप लिया कि वजीर ने उसे देख लिया है।

दूसरे दिन जब दरबार लगा, तो बादशाह एक मटका इत्र लेकर बैठ गया। वजीर सहित सभी दरबारियों की नजरें बादशाह पर गड़ी थीं। थोड़ी देर बाद जब बादशाह को लगा कि दरबारी चर्चा में व्यस्त हैं, तो उसने इत्र से भरे मटके को ऐसे ढुलका दिया, मानो वह अपने आप गिर गया हो। इत्र बहने लगा। बादशाह ने ऐसी मुद्रा बनाई, जैसे उसे इत्र के बह जाने की कोई परवाह न हो। इत्र बह रहा था। बादशाह उसकी अनदेखी किए जा रहा था।

वजीर ने यह देखकर कहा- जहांपनाह, गुस्ताखी माफ हो। यह आप ठीक नहीं कर रहे हैं। जब किसी इंसान के मन में चोर होता है तो वह ऐसे ही करता है। कल आपने जमीन से इत्र उठा ली तो आपको लगा कि आपसे कोई गलती हो गई है। आपने सोचा कि आप तो शहंशाह हैं, आप जमीन से भला क्यों इत्र उठाएंगे। लेकिन वह कोई गलती थी ही नहीं। एक इंसान होने के नाते आपका ऐसा करना स्वाभाविक था। लेकिन आपके भीतर शहंशाह होने का जो घमंड है, उस कारण आप बेचैन हो गए। और कल की बात की भरपाई के लिए बेवजह इत्र बर्बाद किए जा रहे हैं। सोचिए आपका घमंड आपसे क्या करवा रहा है। बादशाह लज्जित हो गया।

हमारे  निराधार और काल्पनिक अपमान के भयवश, हमारा दंभ उत्प्रेरित होता है। दर्प का उदय हमारे विवेक को हर लेता है। दंभ से मोहांध बनकर हम उससे भी बडी मूर्खता कर जाते है, जिस मूर्खता के कारण वह काल्पनिक अपमान भय हमें सताता है।

 

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14 responses to “दर्पोदय

  1. Vivek Rastogi

    25/12/2012 at 4:27 अपराह्न

    इंसान अपना यही दंभ छोड़ दे तो दुनिया स्वर्ग हो जायेगी ।

     
  2. देवेन्द्र पाण्डेय

    25/12/2012 at 5:55 अपराह्न

    प्रेरक

     
  3. धीरेन्द्र सिंह भदौरिया

    25/12/2012 at 7:14 अपराह्न

    इंसान का घमंड उसे पतन की ओर ले जाता है,,,प्रेरक प्रस्तुति,,सुज्ञ जी,,बहुत दिनों से आप मेरी पोस्ट पर नही आये,,आइये स्वागत है,,recent post : समाधान समस्याओं का,

     
  4. चला बिहारी ब्लॉगर बनने

    25/12/2012 at 10:19 अपराह्न

    अहंकार का ढपोर शंख!!

     
  5. Anupama Tripathi

    25/12/2012 at 10:27 अपराह्न

    सार्थक आलेख …

     
  6. Anju (Anu) Chaudhary

    25/12/2012 at 11:08 अपराह्न

    बहुत बढिया जी ….एक दम सही बात अहंकार ही बुद्धि का नाशक है

     
  7. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

    26/12/2012 at 7:41 पूर्वाह्न

    बहुत कठिन है डगर पनघट की … प्रेरक कथा!

     
  8. प्रवीण पाण्डेय

    26/12/2012 at 6:29 अपराह्न

    और देख रहे हैं तो हम वह नहीं रह जाते हैं, जो हम होते हैं। कठिन होता है तब स्वयं न हो पाना।

     
  9. संगीता स्वरुप ( गीत )

    27/12/2012 at 12:33 पूर्वाह्न

    आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 27 -12 -2012 को यहाँ भी है …. आज की हलचल में ….मुझे बस खामोशी मिली है …………. संगीता स्वरूप . .

     
  10. संगीता स्वरुप ( गीत )

    27/12/2012 at 6:56 अपराह्न

    दंभ मनुष्य की सोच को नीचे गिरा देता है ….. कहानी के माध्यम से यह बात बहुत अच्छे से समझाई है ।

     
  11. Naveen Mani Tripathi

    27/12/2012 at 9:40 अपराह्न

    nayee purani halchal pr apki prastuti bahut hi prabhavshali lagi …sadar abhar .

     
  12. vandana

    28/12/2012 at 6:37 पूर्वाह्न

    बढ़िया कहानी

     
  13. Kumar Radharaman

    28/12/2012 at 4:21 अपराह्न

    अपने एकांत में,अपने मूल में अगर कोई रहता है,तो वह प्रजा है,राजा नहीं।

     
  14. liveaaryaavart.com

    31/12/2012 at 5:52 अपराह्न

    प्रभावी लेखन,जारी रहें,बधाई !!

     

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं यह ब्लॉग लिखने के अलावा गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। रेलवे से ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर्ड अफसर।

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