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आत्मरक्षा में की गई हिंसा, हिंसा नहीं होती ????

17 अगस्त

‘हिंसा’ चाहे कितने ही उचित कारणों से की जाय कहलाती ‘हिंसा’ ही है। उसका किसी भी काल, कारण, स्थिति, के कारण ‘अहिंसा’ में परिवर्तन नहीं हो जाता। वैसे तो प्रतिकार या आत्मरक्षा में हिंसा का हो जाना सम्भव है,  तब भी वह विवशता में की गई ‘हिंसा’ ही कहलाएगी। ऐसी हिंसा के लाख अवश्यंभावी कारण जता कर भी उसे ‘अहिंसा’ रूप में स्थापित नहीं जा सकता। प्रतिरक्षात्मक हिंसा को भी सर्वसामान्य सहज बनाया भी नहीं जाना चाहिए, अन्यथा अनियंत्रित अराजकाता ही फैल जाएगी। इस तरह तो प्रतिरक्षा या प्रतिशोध को आगे कर प्रत्येक व्यक्ति हिंसा में रत रहने लगेगा और उसे अभिमान पूर्वक ‘अहिंसा’ कहने लगेगा।

विधि-नियमानुसार भी अभियोग में, आत्मरक्षार्थ हिंसा हो जाने पर मात्र अपराध की तीव्रता कम होती है, समूचा अपराध ही सुकृत्य में नहीं बदल जाता न ही उस कृत्य को अहिंसा स्वरूप स्वीकार किया जाता है। कानून किसी को भी दंडित कर देने की जनसामान्य को  अनुमति नहीं देता, चाहे दंड देना कितना भी न्यायसंगत हो। अदालती भाषा में इसे ‘कानून हाथ में लेना’ कहते है। अन्यथा लोग स्वयं न्यायाधीश बन, प्रतिरक्षार्थ एक दूसरे को दंडित ही करते ही रहेंगे। और बाकी जो बच जाय उन्हें प्रतिशोध में दंडित करेंगे। इस तरह तो हिंसा का ही राज स्थापित हो जाएगा। इसीलिए अत्याचार और अन्याय के बाद भी प्रतिशोध में दंडित करने का अधिकार अत्याचार भोगी को भी नहीं दिया गया है। हिंसक विचारधारा और हिंसा की यह व्यवस्था सभ्य समाज में स्वीकृत नहीं होती।

इसका भी कारण है सभी तरह के कारणों कारकों पर समुचित विचार करने के बाद ही अपराध निश्चित किया जाता है। प्रतिरक्षा में हिंसा अपवाद स्वरूप है प्रतिरक्षात्मक हिंसा से पहले भी अन्य सभी विकल्पों पर विचार किया जाता है। यह सुनिश्चित करने के लिए ही  न्यायालय व्यवस्था होती है। अन्यथा सामन्य जन द्वारा तो जल्दबाजी आवेश क्रोध आदि वश निरपराधी की हिंसा हो सकती है। धैर्य, सहनशीलता या समता हमेशा विवेक को सक्रिय करने के उद्देश्य से ही होती है।

पालतू नेवले और माँ की वह बोध-कथा है जिसमें सोए बच्चे को बचाने के लिए नेवला सांप से लडता है और उसको मार देता है, घड़ा भरकर घर आते ही द्वार पर मां नेवले के मुँह में रक्त देखकर निर्णय कर लेती है कि इसने बच्चे को काट खाया है। आवेश में नेवले पर घड़ा गिराकर मार देती है किन्तु जब भीतर जाकर देखती है कि बच्चा तो सुख की निंद सो रहा है और पास ही साँप मरा पड़ा है। उसे होश आता है, नेवला अपराधी नहीं रक्षक था। अब पश्चाताप ही शेष था। हिंसा तो हो चुकी। नेवला जान से जा चुका।

इसीलिए न्यायालयों का अलिखित नियम होता है कि भले 100 अपराधी बच जाय, एक निरपराधी को सजा नहीं होनी चाहिए। क्योंकि सुसंस्कृत मानव जानता है जीवन अमूल्य है। एक बार जान जाने के बाद किसी को जीवित नहीं किया जा सकता।

गौतम बुद्ध का एक दृष्टांत है सहनशीलता में निडरता के लिए भी और जीवन के मूल्य (अहिंसा) के लिए भी।

अंगुलिमाल नाम का एक बहुत बड़ा डाकू था। वह लोगों को मारकर उनकी उंगलियां काट लेता था और उनकी माला पहनता था। इसी से उसका यह नाम पड़ा था। आदमियों को लूट लेना, उनकी जान ले लेना, उसके बाएं हाथ का खेल था। लोग उससे डरते थे। उसका नाम सुनते ही उनके प्राण सूख जाते थे।

संयोग से एक बार भगवान बुद्ध उपदेश देते हुए उधर आ निकले। लोगों ने उनसे प्रार्थना की कि वह वहां से चले जायं। अंगुलिमाल ऐसा डाकू है, जो किसी के आगे नहीं झुकता।

बुद्ध ने लोगों की बात सुनी,पर उन्होंने अपना इरादा नहीं बदला। वह बेधड़क वहां घूमने लगे।जब अंगुलिमाल को इसका पता चला तो वह झुंझलाकर बुद्ध के पास आया। वह उन्हें मार डालना चाहता था, लेकिन जब उसने बुद्ध को मुस्कराकर प्यार से उसका स्वागत करते देखा तो उसका पत्थर का दिल कुछ मुलायम हो गया।

बुद्ध ने उससे कहा, “क्यों भाई, सामने के पेड़ से चार पत्ते तोड़ लाओगे?”

अंगुलिमाल के लिएयह काम क्या मुश्किल था! वह दौड़ कर गया और जरा-सी देर में पत्ते तोड़कर ले आया।

“बुद्ध ने कहा, अब एक काम करो। जहां से इन पत्तों को तोड़कर लाये हो, वहीं इन्हें लगा आओ।”

अंगुलिमाल बोला, “यह कैसे हो सकता?”

बुद्ध ने कहा, “भैया! जब जानते हो कि टूटा जुड़ता नहीं तो फिर तोड़ने का काम क्यों करते हो?”

इतना सुनते ही अंगुलिमाल को बोध हो गया और उसने सदैव के लिए उस हिंसा और आतंक को त्याग दिया।

सही भी है किसी को पुनः जीवन देने का सामर्थ्य नहीं तो आपको किसी का जीवन हरने का कोई अधिकार नहीं। आज फांसी की न्यायिक सजा का भी विरोध हो रहा है। कारण वही है एक तो सजा सुधार के वांछित परिणाम नहीं देती और दूसरा जीवन ले लेने के बाद तो कुछ भी शेष नहीं रहता न सजा न सुधार।

एक सामान्य सी सजा के भी असंख्य विपरित परिणाम होते है। ऐसे में चुकवश सजा यदि निरपराधी को दे दी जाय तो परिणाम और भी भयंकर हो सकते है। सम्भावित दुष्परिणामों के कारण अहिंसा का महत्व अनेक गुना बढ़ जाता है। किसी भी तरह की हिंसा के पिछे कितने ही उचित कारणों हो, हिंसा प्रतिशोध के एक अंतहीन चक्र को जन्म देती है। प्रतिरक्षा में भी जो सुरक्षा भाव निहित है उसका मूल उद्देश्य तो शान्तिपूर्ण जीवन ही है। जिस अंतहीन चक्र से अशान्ति और संताप  उत्पन्न हो और समाधान स्थिर न हो तो क्या लाभ?

प्रतिरक्षा में हिंसा हमेशा एक ‘विवशता’ होती है, यह विवशता भी गर्भित ही रहनी भी चाहिए। इस प्रकार की हिंसा का सामान्ययीकरण व सार्वजनिक करना हिंसा को प्रोत्साहन देना है। ऐसी हिंसा की संभावना एक अपवाद होती है। सभ्य मानवों में अन्य उपाय के न होने पर ही सम्भावनाएं बनती है। अतः विवशता की हिंसा को अनावश्यक रूप से जरूरी नियम की तरह प्रचारित नहीं किया जाना चाहिए। और न ही इसे ‘अहिंसा’ नाम देकर भ्रम मण्डित किया जाना चाहिए। यदि इस प्रकार की हिंसा का सेवन हो भी जाय तो निष्ठापूर्वक हिंसा को हिंसा ही कहना/मानना चाहिए उसे वक्रता से अहिंसा में नहीं खपाया जाना चाहिए।

  • हिंसा नाम भवेद् धर्मो न भूतो न भविष्यति।  (पूर्व मीमांसा) 
    अर्थात् :- हिंसा में धर्म माना जाए, ऐसा न कभी भूतकाल में था, न कभी भविष्य में होगा।
 

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50 responses to “आत्मरक्षा में की गई हिंसा, हिंसा नहीं होती ????

  1. Rakesh Kumar

    17/08/2012 at 7:04 अपराह्न

    बहुत ही विवेकपूर्ण और तार्किक चिंतन है आपका.अहिंसा एक दैवी सम्पदा है जबकि हिंसा एक तामसिक अज्ञानपूर्ण वृति मात्र है.जाके पैर न फटी बिबाई,वो क्या जाने पीर पराई की कहावत हिंसा करने वाले को जैसे जैसे समझ आएगी,तभी वह अहिंसा की तरफ उन्मुखहो पायेगा.सार्थक चिंतन कराती आपकी सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार,सुज्ञ जी.

     
  2. सतीश सक्सेना

    17/08/2012 at 10:36 अपराह्न

    निर्दोष को सज़ा नहीं होनी चाहिए …आभार आपका !

     
  3. dheerendra

    17/08/2012 at 11:46 अपराह्न

    प्रतिरक्षात्मक हिंसा को सर्वसामान्य सहज बनाया भी नहीं जा सकता। अन्यथा अनियंत्रित अराजकाता फैल जाएगी,,,,,RECENT POST…: शहीदों की याद में,,

     
  4. expression

    17/08/2012 at 11:57 अपराह्न

    बहुत सार्थक और विचारणीय पोस्ट..आभार आपका.सादरअनु

     
  5. डॉ॰ मोनिका शर्मा

    18/08/2012 at 11:21 पूर्वाह्न

    हिंसा भले कितने ही उचित कारणों से हो प्रतिशोध के एक अंतहीन चक्र को जन्म देती है। जी ….तार्किक ढंग से रखे अर्थपूर्ण विचार ….

     
  6. एक बेहद साधारण पाठक

    18/08/2012 at 12:54 अपराह्न

    @हिंसा को हिंसा ही कहना/मानना चाहिए उसे वक्रता से अहिंसा में नहीं खपाया जाना चाहिए। सही कहा | विवेकपूर्ण और तार्किक चिंतन|आभार!

     
  7. अमित शर्मा

    18/08/2012 at 2:12 अपराह्न

    हिंसा और नृशंसता शायद एक है पर जहाँ समष्टि के व्यापक हितार्थ हिंसा को अपनाना पढ़े, तो अहिंसा का व्यतिक्रम नहीं होगा . परन्तव इस भेद का निश्चय अधिकारी व्यक्ति द्वारा ही किया जाना चाहिए . नहीं तो नृशंस प्रवृतियों के दमन की आड़ में नृशंसता का ही खेल होगा .आभार गहन चिंतन के लिए !

     
  8. अमित शर्मा

    18/08/2012 at 2:19 अपराह्न

    इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

     
  9. anshumala

    18/08/2012 at 3:23 अपराह्न

    मुझे लगता है की प्रतिशोध और आत्मरक्षा दो अलग अलग चीजे है आप दोनों को मिला रहे है ये ठीक नहीं है , प्रतिशोध से अराजकता फैलती है आत्मरक्षा से नहीं ,आत्मरक्षा में की गई हिंसा को आप हिंसा तो कह सकते है कित्नु उस व्यक्ति को हिंसक या हिंसक विचारो वाला नहीं कह सकते है ,यदि कोई उसी अंगुलिमाल को अपने रक्षा करते हुए मार दे तो उस व्यक्ति को आप ये नहीं कह सकते है की तुम भी अंगुलिमाल जैसे ही हिंसक हो , दोनों में बहुत फर्क है ,आप सामने किसी के खिलाफ हो रहे अपराध को चुचाप देखते है सक्षम होते हुए रोकते नहीं है और कहे की ये तो पुलिस कानून का काम है , तो ये अहिंसा नहीं कायरता है इसको बढ़ावा ना दे और ना ही इन दो बातो को आपस में मिलाए |अहिंसा की कोई एक परिभाषा नहीं होती है एक जैन धर्म को मानने वाले के लिए जमीन के अन्दर हो रहे खाद्य सामना को खाना भी हिंसा है, आलू ,गाजर , प्याज लहसुन, मुली आदि आदि , बरसात के दिनों में साग और ज्यादातर सब्जिया आदि भी खाना हिंसा है , खमीर उठा कर डोसा इडली खाना भी हिंसा है खमीर उठाने का काम बैक्टीरिया करता है जो उसके अंदर ही रहता है और डोसा इटली के साथ उसे भी खा जाते है बासी खाना जिसमे बहुत छोटे बैक्टीरिया हो जाते है दो घंटे बाद ही उसे खाना भी हिंसा है , मंदिरों में चढ़ावा चढ़ाना भी हिंसा को दावत देना है क्योकि उन को खाने के लिए छोटे जीव आते है और मारे जाते है , रास्ते में बिना ध्यान से देखे चलना भी हिंसा है , यहाँ तक की मुँह को ढंके बिना साँस लेना भी हिंसा है , किस हिंसा की बात आप कर रहे है | दुनिया में ऐसे भी लोग है जो दूध और उससे बने सामना को खाना भी हिंसा मानते है उसे मांसाहारी मानते है उनके अनुसार दूध जानवर के खून से बनता है और वो उसके बच्चे के लिए होता है हमारे लिए नहीं , सिल्क और चमड़े के कपडे आदि पहनना भी हिंसा है , घर में पेस्ट कंट्रोल करवाना भी हिंसा है , मच्छर मारने के लिए कुछ लगाना भी हिंसा है और भी ना जाने दुनिया में कितने दृष्टिकोण है इस हिंसा और अहिंसा को लेकर इन सभी को देखु तो मै मानती हूं की मै बहुत बड़ी हिंसक विचारो और सोच वाली महिला हूं , इन सब को देखने के बाद ऐसा मानना और सुनना बुरा भी नहीं लगता है और शब्दों से हिंसा करने में तो मुझे जरा भी समय नहीं लगता है इस ब्लॉग जगत में मेरी सुरुआती दिनों में किसी को मेरी हिंसक ( व्यंग्य ) शब्दों से ऐसी चोट लगी थी दिमाग पर की बेचारे मेरे नाम का सही उच्चारण ही नहीं कर पा रहे थे और अंशुमाला को अन्गुलिमाला { आप की कहानी से मुझे वो घटना याद आ गई😉 }कहने लगे और यहाँ हिंसा पर आप की बात का समर्थन करने वाले और भारतीय संस्कार परम्परा की दुहाई देने वाले नारी के देवी कहने वाले दो लोगों को उसमे कोई हिंसा और गलत बात नजर नहीं आ रही थी वो उसका विरोध तो दूर उसका समर्थन कर रहे थे ( उन्होंने सोचा होगा की अच्छा मजा चखाया देवी जी को शब्दों की हिंसा के बदले शब्दों की हिंसा बराबर का हिसाब वैसे मै इसको बराबर का नहीं मानती थी क्योकि मेरे शब्दों के आगे उनके ये शब्द लग रहा था की मेरे पहाड़ के बदले में उन्होंने बस एक कंकड़ भर मारा था ) कहने का मतलब ये की आप की बातो में हा में हा मिलना तो आसान है सभी के लिए लेकिन उसे अपने जीवन में उतारना बड़ा मुश्किल है |

     
  10. Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता

    18/08/2012 at 3:52 अपराह्न

    नो कमेंट्स |आभार

     
  11. रश्मि प्रभा...

    18/08/2012 at 4:01 अपराह्न

    बुद्ध और अंगुलिमाल उदाहरण हैं … कहीं कहीं तो कई बार विनम्रता से बोलते लोगों को शब्दों से मार देते हैं लोग ! बचाव में हिंसा नहीं होती , बस वह बचाव है…. पर अपशब्द …. वह मानसिक हिंसा है , जिसे बचाव के उद्देश्य भी नहीं करना चाहिए

     
  12. सदा

    18/08/2012 at 5:19 अपराह्न

    बेहद गहन भाव लिए आपकी यह उत्‍कृष्‍ट प्रस्‍तुति … आभार

     
  13. सुज्ञ

    18/08/2012 at 5:29 अपराह्न

    @मुझे लगता है की प्रतिशोध और आत्मरक्षा दो अलग अलग चीजे है आप दोनों को मिला रहे है ये ठीक नहीं है , प्रतिशोध से अराजकता फैलती है आत्मरक्षा से नहीं ,अंशुमाला जी,आत्मरक्षा और प्रतिशोध अलग अलग होते हुए भी एक ही शृंखला की एक दूसरे से सीधे जुडी कड़ियाँ है। और दोनो ही एक दूसरे की प्रेरक भी। तथापि संभावित आत्मरक्षा की हिंसा भी प्रशंसनीय और प्रसारण योग्य नहीं होती। आत्मरक्षा के अभिप्रायः का निर्णय कठिन होता है, यह निर्णय भी आवेशमय परिस्थितियों में होता है। और यह स्थापित करने के बाद आप किसी को भी रोक नहीं सकते जब हर कोई अपनी हिंसा को आत्मरक्षा के लिए की गई हिंसा मनवाने पर ही तुल जाएगा।आतंकवाद क्यों पनपता है पता है? जब किसी समूह या विचारधारा को लगता है हमारा अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा या मंद हो जाएगा उस भय की प्रतिक्रिया में अपने अस्तित्व की आत्मरक्षा के लिए दूसरों को आतंकित कर हावी रहने का गलत मार्ग अपनाते है। और ऐसा ही अक्सर व्यक्तिगत विवादों में भी होता है जब दमन के भय के कारण प्रतिपक्ष को पूर्व में दमित किया जाता है।

     
  14. सुज्ञ

    18/08/2012 at 5:44 अपराह्न

    @ आत्मरक्षा में की गई हिंसा को आप हिंसा तो कह सकते है……बस इतना ही कहना था कि हिंसा को हिंसा ही मानना है बाकी सब गर्भित रहे उसी में अच्छा है।@ आप सामने किसी के खिलाफ हो रहे अपराध को चुचाप देखते है सक्षम होते हुए रोकते नहीं है और कहे की ये तो पुलिस कानून का काम है , तो ये अहिंसा नहीं कायरता है इसको बढ़ावा ना दे और ना ही इन दो बातो को आपस में मिलाए |आम व्यक्ति की छोडिए पिछले दिनों आज़ाद मैदान में उपद्र्वियों नें जो कुत्सित नाच किया किन्तु मुंबई पुलिस सक्षम होते हुए भी आकृमक नहीं संयम से काम लिय। क्या मुंबई पुलिस को कायर कहेंगी? या फिर विवेकशील कि उसने गम्भीरता से सोचते हुए तीव्र प्रतिकार न कर मुंबई को प्रतिशोध और अराजकता से बचा लिया।जिम्मेदार लोगों की मेघा इतनी विकसित होती है कि वे कायरता व वीरता के फेर में न पड़कर विवेकशीलता से काम लेते है।

     
  15. सुज्ञ

    18/08/2012 at 5:56 अपराह्न

    जैन धर्म की अहिंसा पर आपने सब कुछ सही व सत्य कहा है।जैन ग्रहस्थों के लिए अपनी श्रेणी अनुसार पालन करना होता है, क्योंकि उन्होंने अहिंसा अणुव्रत धारण किया हुआ होता है। इसका यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता कि जिन्होंने व्रत धारण नहीं किया है वे भी उस सुक्ष्म स्तर की अहिंसा का पालन करे ही। यहां तक कि जैनों में स्वयं अपने द्वारा लिए गए संकल्पों के आधार पर कम ज्यादा हो सकता है।लेकिन हमारा विषय 'प्रतिरक्षात्मक हिंसा के सर्वसामान्यकरण' को लेकर है। इसका सम्बंध जीवों या सुक्ष्म-जीवों से नहीं बल्कि मनुष्य द्वारा मनुष्य के साथ है।

     
  16. सुज्ञ

    18/08/2012 at 6:16 अपराह्न

    @ कहने का मतलब ये की आप की बातो में हा में हा मिलना तो आसान है सभी के लिए लेकिन उसे अपने जीवन में उतारना बड़ा मुश्किल है |यह बात भी आपकी सही है इन विचारों को जीवन में उतारना बड़ा मुश्किल है। खैर जानता हूँ आपके हिंसा प्रतिहिसा पर विचार स्पष्ट है। शाब्दिक हिंसा में बराबरी का हिसाब नहीं, आपके पहाड़ की तुलना में सभी के कंकड़ ही है:) इसलिए आप तो आलेख सम्प्रेषित तथ्यों को उपेक्षित ही करें🙂 किन्तु पाठकों में सरल मन लोग भी हो सकते है, मुश्किल परिस्थियों में भी संघर्ष कर उतारने का श्रम कर सकते है उनके लिए तो प्रयास द्वार खुले रहें।सविनय, सादर!!

     
  17. संजय @ मो सम कौन ?

    18/08/2012 at 6:55 अपराह्न

    उच्चता का मापदंड बहुत ऊंचा हो गया है सुज्ञजी:)हम सब बहुत साधारण जन हैं, बुद्ध होना तो बहुत दूर की बात है|इस मामले में मुन्नाभाई वाला फार्मूला अपने को सही लगता है, एक थप्पड़ के बाद दूसरा गाल आगे करना है लेकिन दूसरे गाल पर भी थप्पड़ लग जाए, उससे आगे बापू ने कुछ नहीं बोला|सेल्फ डिफेन्स हर नागरिक का अधिकार है| न सिर्फ सेल्फ डिफेन्स बल्कि दूसरों की रक्षा करने में भी यदि सक्षम हों तो जरूर करनी चाहिए और इसके लिए विवशता में ही सही जैसा भी प्रतिकार करना पड़े, करना चाहिए| क़ानून में जो कहा गया था वो निरपराध को बचाने के लिए था लेकिन इसी उक्ति का सहारा लेकर क़ानून के जानकार जब वाक्जाल फैलाते हैं तो उनका उद्देश्य निरपराध को बचाना नहीं बल्कि गुनाहगार को बचाना होता है| टिप्पणी में आपने आजाद मैदान में पुलिस के व्यवहार को संयमित कहा है, मैं सक्षमता और सयम इसे तब मानता अगर उस सक्षम फ़ोर्स के रहते कोई उस अमर शहीद ज्योति को नुक्सान न पहुंचा पाता|अहिंसा के महत्त्व को मैं नहीं नकार रहा हूँ, मेरी असहमति सिर्फ किताबी सिद्धांतों को सब कुछ मान लेने से है| अगर समाज सभ्य समाज है तो ये सिद्धांत ठीक हैं लेकिन 'शठे शाठ्यम समाचरेत' को अपवादित परिस्थितयों में मैं गलत नहीं समझता| अनुराग जी ने एक पोस्ट क्रोध और मन्यु विषय पर लिखी थी, मुझे बहुत पसंद आई थी|अंतिम पंक्तियों से सहमत हूँ, ऐसी हिंसा का भी जनरालाईजेशन नहीं करना चाहिए| मुझे भी ये अपवाद की स्थिति में ही मान्य लगती हैं|

     
  18. एक बेहद साधारण पाठक

    18/08/2012 at 8:13 अपराह्न

    बढ़िया चर्चा है !

     
  19. सुज्ञ

    18/08/2012 at 8:25 अपराह्न

    ऊंचा वाला तो शायद नहीं है :)जिस बात से आप सहमत है कि "ऐसी हिंसा का भी जनरालाईजेशन नहीं करना चाहिए| मुझे भी ये अपवाद की स्थिति में ही मान्य लगती हैं|"इसी विचार के अनुशासन में लिखने का प्रयास किया है।बाकि आपके सभी दृष्टिकोण सादर स्वीकृत है संजय जी!!

     
  20. संजय @ मो सम कौन ?

    18/08/2012 at 10:02 अपराह्न

    धन्यवाद सुज्ञजी,असहमति की स्वीकृति के लिए:)

     
  21. anshumala

    18/08/2012 at 10:07 अपराह्न

    आप की बात को अपने शब्दों में कह रही हूं ताकि स्पष्ट रहे की आप की बात को सही समझ रही हूं की नहीं |@ तथापि संभावित आत्मरक्षा की हिंसा भी प्रशंसनीय और प्रसारण योग्य नहीं होती।यदि आप यहाँ ये कहना चाह रहे है की किसी महिला ने चेन स्नेचर को पकड कर पिट दिया और अपनी चेन बचा ली , किसी व्यक्ति ने हथियार ले कर लूटने आये लुटेरो को उनके ही हथियार से मार कर भगा दिया या उसे पकड़ कर पिट कर पुलिस के पास ले गया या किसी गोवाहाटी कांड में वो लड़की लड़को से मार खाने के बजाये उसे मार रही होती तो वो प्रसंसा के काबिल नहीं है और उसका प्रचार दूसरो में नहीं करना चाहिए नहीं तो दूसरे भी इस तरत खुद को बचाने के लिए गुंडों मवालियो, मनचलों के खिलाफ हिंसा कर हिंसा को बढ़ावा देंगे तो मै आप की इस विचार से बिल्कुल भी सहमत नहीं हूं , इस तरह की हिंसा प्रचारित करनी चाहिए ताकि लोग खुद हिम्मत करके अपनी और अपने सामानों की सुरक्षा खुद कर सके ना की पुलिस को कोसते रहे और जुर्म सहते रहे | मुझे तो लगता है की भारत इतने सालो तक विदेशी आक्रमणकरियो का गुलाम इसीलिए रहा क्योकि यहाँ अहिंसा के नाम पर लोगो में कायरता भरी गई उन्हें कायर बना दिया गया और आज भी ये लोगो में भरा पड़ा है अहिंसा के नाम पर | लोगो को समझना चाहिए की एक अहिंसा सज्जनों के लिए होता है दुर्जनों के लिए नहीं | एक बार फिर आप आत्मरक्षा और प्रतिशोध को मिला रहे है मैंने बात तुरंत प्रतिक्रिया की कही है ना की सोच समझ कर दुश्मनों पर हमला करने की की है | @ बस इतना ही कहना था कि हिंसा को हिंसा ही मानना है बाकी सब गर्भित रहे उसी में अच्छा है।आप डाकू और पुलिस दोनों को एक ही श्रेणी में रखने के लिए कह रहे है |मैंने कहा है की किसी व्यक्ति के प्रति अपराध को चुपचाप देखना कायरता है , आजाद मैदान वाले केस में लोगों के प्रति अपराध नहीं हो रहा था लोगों की हत्याये नहीं की जा रही थी यदि वो होता और उसके बाद भी पुलिस चुप रहती तो वो कही से भी विवेकशील बात नहीं होती |जैन धर्म की जानकारी मै नहीं दे रही थी मै ये बता रही थी की हमारे ही देश में अहिंसा के कितने ऊँचे मानदंड है लोगों के लिए जिसका पालन करना सभी के बस की बात नहीं है , संभव है की उनके लिए उन्हें छोड़ बाकि सब हिंसक विचारो वाले लोग है इसलिए किसी को या किसी के विचारो को हिंसक कहने के पहले सोचा लेना चाहिए |@शाब्दिक हिंसा में बराबरी का हिसाब नहीं,मैंने तो बस उनके और अपने मन की बात कही है मेरे मामूली से व्यंग्य भी उन को बड़े लगते है जिन पर की जाती है वरना वो होते तो बहुत ही मामूली है |

     
  22. anshumala

    18/08/2012 at 10:09 अपराह्न

    @ दूसरे गाल पर भी थप्पड़ लग जाए, उससे आगे बापू ने कुछ नहीं बोला |संजय जी मै भी इसी को सही मानती हूं गाँधी के बजाये तिलक की अहिंसा ज्यादा सही लगती है |

     
  23. एक बेहद साधारण पाठक

    18/08/2012 at 10:25 अपराह्न

    @ दूसरे गाल पर भी थप्पड़ लग जाए, उससे आगे बापू ने कुछ नहीं बोला |ये फोर्म्युला नहीं चीटिंग है….. क्या इस तरह हम ये मान लेंगे की "बापू" ने "हिंसा" को मौन सहमति दी थी?? , सोचिये इस तरह कितने महापुरुषों के द्वारा दी गयी शिक्षा के मूल अर्थों में पूरा बदलाव किया जा सकता है ?

     
  24. एक बेहद साधारण पाठक

    18/08/2012 at 10:37 अपराह्न

    बात फिल्मों की चली है तो मैं "रक्त चरित्र" का उल्लेख करना चाहूँगा | इस फिल्म के दोनों भागों में दोनों नायक के पास हिंसा की वजह होती है मतलब आप पहचान भी नहीं पायेंगे की कौन नायक है और कौन खल नायक …..

     
  25. anshumala

    18/08/2012 at 10:37 अपराह्न

    पाठक जी जो कहा जा रह है उसे पहले अच्छे से समझे फिर कोई बात करे आप हमेसा चीजो के जल्दीबाजी में पढ़ कर जवाब देते है , यहाँ बापू के हिंसा या अहिंसा की बात नहीं की जा रही है बल्कि ये कहा जा रहा है की एक हद तक ही दूसरे की खुद पर की जा रहे जुर्म को सहना चाहिए उसके बाद नहीं उसके बाद खुद को बचाने के लिए या सामने वाले को डराने के लिए हाथ उठा कर उसे डरना पड़े तो उसे गलत नहीं मानना चाहिए |

     
  26. Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता

    18/08/2012 at 10:42 अपराह्न

    साधारण पाठक जी इसे ऐसा भी सोचा जा सकता है कि, एक गाल पर थप्पड़ लगने के बाद दूसरा गाल आगे कर के बापू अपने आप को तो महान बना रहे थे (अपने परिभाषा में), किन्तु इस के साथ सामने वाले को छिपे तौर पर और अधिक हिंसा पर उतारू कर रहे थे | समाज की नज़रों में उसे गिरा कर (उसे और हिंसक बन्ने पर उकसा कर) और स्वयं अपनी विचारधारा को उठाने का यह प्रयास कितना "अहिंसक" कहलायेगा – यह भी एक प्रश्न है |

     
  27. संजय @ मो सम कौन ?

    18/08/2012 at 10:43 अपराह्न

    @ ये फोर्म्युला नहीं चीटिंग है..फिल्म का जिक्र हिंसा के प्रतिकार में अपने स्थिति स्पष्ट करने के लिए आया| मौजूदा हालात में आप क्या राय देते हैं? दुसरे गाल के बाद फिर से पहला गाल, फिर दूसरा गाल & so on या कुछ और? हम एक दुसरे के विचार जान रहे हैं, हो सकता है आपके विचार हमें अपने वालों से बेहतर लगें इसलिए हिचकिएगा नहीं प्लीज़|

     
  28. एक बेहद साधारण पाठक

    18/08/2012 at 10:47 अपराह्न

    आपकी और मेरी चर्चा का अक्सर यही नतीजा निकलता हैआप कुछ ऐसा कहती हैं — "हमेसा चीजो के जल्दीबाजी में पढ़ कर जवाब देते है"मैं ये मानता हूँ की आप बात के मर्म को समझने की कोशिश बिलकुल भी नहीं करतीं खैर ….जाने दीजिये ….

     
  29. Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता

    18/08/2012 at 10:51 अपराह्न

    साधारण पाठक जी इसे ऐसा भी सोचा जा सकता है कि, एक गाल पर थप्पड़ लगने के बाद दूसरा गाल आगे कर के बापू अपने आप को तो महान बना रहे थे (अपने परिभाषा में), किन्तु इस के साथ सामने वाले को छिपे तौर पर और अधिक हिंसा पर उतारू कर रहे थे | समाज की नज़रों में उसे गिरा कर (उसे और हिंसक बन्ने पर उकसा कर) और स्वयं अपनी विचारधारा को उठाने का यह प्रयास कितना अहिंसक कहलायेगा – यह भी एक प्रश्न है |

     
  30. एक बेहद साधारण पाठक

    18/08/2012 at 10:53 अपराह्न

    वैसे कमेन्ट के टाइम को देख कर लगता है की संभवतया आपने मेरा दूसरा कमेन्ट नहीं पढ़ा था ….. शायद उससे कुछ समझ में आये

     
  31. Ankur jain

    18/08/2012 at 11:48 अपराह्न

    सुज्ञजी आप की चर्चा और प्रस्तुति हमेशा लीक से हटकर होती है यही वजह है कि उन्हें आज के सामान्य परिवेश और तथाकथित प्रैक्टिकल माहौल में रह रहे लोगों को पचा पाना आसान नहीं होता..लेकिन जिस गंभीरता और गहन अध्ययन से आप अपनी बात प्रस्तुत करते हैं उसे पचाने के लिए लोगों को धार्मिक, अध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन कर अपनी एक स्वस्थ पृष्ठभुमि निर्मित करनी पड़ेगी। निश्चित ही आपके द्वारा कथित इस अहिंसा के संबंध में भी लोगों की असहमति आएगी..कारण कि लोग आधुनिक परिप्रेक्ष्य में आपकी बात को देखने और समझने का प्रयत्न कर रहे हैं..किंतु इस अहिंसा को समझने के लिए आज की इस छद्म आधुनिकता से ऊपर उठने की ज़रुरत है…सशक्त, सुंदर, विचारणीय आलेख…पूर्णतः सहमत!!!!!

     
  32. सुज्ञ

    19/08/2012 at 12:00 पूर्वाह्न

    @मुझे तो लगता है की भारत इतने सालो तक विदेशी आक्रमणकरियो का गुलाम इसीलिए रहा क्योकि यहाँ अहिंसा के नाम पर लोगो में कायरता भरी गई उन्हें कायर बना दिया गया और आज भी ये लोगो में भरा पड़ा है अहिंसा के नाम पर |यह आपका भ्रम है कि अहिंसा के नाम पर कायरता पनपती है, कायरता पनपती है उन लोगों द्वारा जो हिंसा में बुराई न मानते हुए भी मात्र जबानी जमाखर्च की तरह वीरता की गाथाएं रचते है, बडी बडी बाते करते है और वास्तव में अवसर आने पर मुंह छुपाते है। विदेशी आक्रमणकरियो से लड़ने की जवाबदारी अहिंसकों की कभी नहीं रही, फिर भी सही मायने में अहिंसा कर्तव्य से हटना नहीं सिखाती। इतिहास में एक भी ऐसा दृष्टांत नहीं है कि विदेशी आक्रमण के समय अहिंसक होने के कारण कोई संग्राम से भाग खड़ा हुआ हो। अहिंसा कायरता नहीं सिखाती हां अनावश्यक द्वेषयुक्त आकृमकता नहीं जगाती।क्या विश्व में ऐसी कोई कौम है जो अहिंसक के विपरित अपने हिंसक शौर्य के बल पर अभी तक अपराजेय रही है? @ आजाद मैदान वाले केस में लोगों के प्रति अपराध नहीं हो रहा था लोगों की हत्याये नहीं की जा रही थी.बस यही सोच का वह अन्तर है हत्याएं होने तक ही अपराध मानना है, वहां शहिदों के स्मारक का अपमान किया गया, आग लगाई गई जानहानि होने के पहले कोई सुचना नहीं मिलती!! फिर कहां गया आपका आत्मरक्षा का प्रश्न? आत्मरक्षा क्या दुर्घटना होने के बाद की जाती है? हमारे देश में किसी के अहिंसा के ऊँचे मानदंड है तो मुझे नहीं लगता कि वे वैसे ही मानदंड़ किसी पर थोपते है या सर्वांग हिंसा मुक्त समाज की अभिलाषा से कोई धारणाएं प्रचलित करते है या दूसरों को अनावश्यक हिंसक कहते फिरते है। फिर 'किसे क्या सोच लेना चाहिए' समझ नहीं आया।आप मानती है अ्हिंसक विचार कायरता लाता है जो गुलामी का आमंत्रक है और आज भी लोगों में भरा पडा है और आपके हिसाब से यह ठीक नहीं है। ऐसा मानने के लिए आप स्वतंत्र है। मैं तो पहले ही कह चुका हूँ आप पोस्ट के विचारों की उपेक्षा कर सकती है।आलेख में व्यक्त विचार स्पष्ट है प्रतिरक्षात्मक हिंसा अपवाद मात्र है इसे सर्वसामान्य या सार्वजनीकरण न होना चाहिए। कोई जरूरी नहीं आप सहमत हो ही।

     
  33. एक बेहद साधारण पाठक

    19/08/2012 at 7:07 पूर्वाह्न

    @मौजूदा हालात में आप क्या राय देते हैं? दुसरे गाल के बाद फिर से पहला गाल….मेरी राय: वैसे तो मैं ऐसी नौबत आने ही नहीं दूंगा की एक भी खाना पड़े🙂 फिर भी मान लिया खा लिया और सामने वाला अब भी हिंसक मूड में है तो चाहे कुछ भी हो दुसरे या तीसरे का मौका नहीं दूंगा… अनेकों युक्तियाँ हैं …… फिर चाहे सामने वाले के हाथों को पकड़ना पड़े या दौड़ा दौड़ा के उसका गुस्सा ठंडा होने तक इन्तजार करना पड़े🙂 जीवन की हिंसक घटनाओं का एक बड़ा प्रतिशत बातचीत / धीरज से टाला जा सकता है तो इसमें कोई बुराई या नुक्सान नहीं| ये ध्यान रखने वाली बात है की ये शान्ति की पहल विन-विन सिचुएशन जैसी लगनी चाहिए | मेरी प्राथमिकता हमेशा हिंसा के कुचक्र से सम्मान पूर्वक बचाव को है | ये बात थोड़ी कम प्रेक्टिकल लग सकती है लेकिन मैंने कईं सभ्य लोगों को इसे फोलो करते देखा है और मेरी भी यही कोशिश रहती है |

     
  34. एक बेहद साधारण पाठक

    19/08/2012 at 7:20 पूर्वाह्न

    शिल्पा जी, मैं गांधी जी की इस गाल आगे बढ़ाओ पद्दति का फोलोवर नहीं हूँ लेकिन हाँ मैं यही चाहूँगा की गांधी जी सदैव अहिंसा के प्रतीक के रूप में जाने जाएँ |

     
  35. संजय @ मो सम कौन ?

    19/08/2012 at 9:04 पूर्वाह्न

    राय अच्छी लगीं| संभव हो तो और युक्तियाँ भी शेयर करें|हिंसक घटनाओं को टाला जा सकना निश्चित ही पहली प्राथमिकता होनी चाहिए, यथासंभव यही कोशिश हम लोग करते भी हैं| हाँ, एक्सट्रीम घटनाओं से सामना होने पर भी पहली प्राथमिकता यही रहनी चाहिए, एकमात्र प्राथमिकता तक सीमित कर देना सामने वाले की हिंसक प्रवृत्ति को बढ़ावा देना सा ही लगेगा मुझे|

     
  36. सुज्ञ

    19/08/2012 at 9:34 पूर्वाह्न

    अंकुर जी,इस प्रेरक प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार!!वर्तमान आलेख में मेरा आशय धर्म-दर्शन-अध्यात्म की गहन अहिंसा से नहीं था। न शास्त्रीय या किताबी सिद्धांतों की अहिंसा आधार है। उलट प्रस्तुत लेख में मेरा आशय आज के सामान्य परिवेश में अहिंसा अधिक प्रैक्टिकल और अत्यावश्यक है यह प्रस्तुत करना था।हम प्रायः देखते है कि व्यक्ति जितना शिक्षित और समझदार होता है हिंसा व अधैर्य से दूर होता जाता है। किसी उद्दंड आक्रमक से सामना हो भी जाय तब भी सीधे हाथापाई अथवा मारामारी से बचने का ही प्रयत्न करते है और ऐसे हर समय मारामारी को उद्दत को कौन मुंह लगाए कहकर हिंसा से बचने का प्रयास करते है। इससे प्रमाणित होता है कि अहिंसा सभ्य और विकसित समाज का अनिवार्य गुण है, कायरता नहीं।किन्तु फिर भी आज के शिक्षित विकसित आधुनिक समय में अशान्ति अधैर्य असंतोष बढ़ रहा है, आवेश आक्रोश द्वेष हिंसा प्रतिहिंसा में वृद्धि हो रही है। कारण एक ही है जानते अजानते हिंसक मूल्यों का प्रचार प्रसार।इसीलिए प्रस्तुत लेख में यह कहने का प्रयास किया गया है कि कितने भी उचित कारण हो पर हिंसा को संरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए, न उसका समर्थन संवर्धन करना चाहिए। और यह करना कोई उच्चत्तम उत्कृष्ट अथवा असाध्य असंभाव्य भी नहीं।

     
  37. प्रवीण पाण्डेय

    20/08/2012 at 8:53 पूर्वाह्न

    टूटे से फिर न जुड़े..

     
  38. सुज्ञ

    20/08/2012 at 3:14 अपराह्न

    आभार, स्नेहीजन राकेश जी,सत्य उद्धरण है-"हिंसा एक तामसिकअज्ञानपूर्ण वृति मात्र है."

     
  39. सुज्ञ

    20/08/2012 at 3:18 अपराह्न

    आभार सतीश जी,चुकवश एक निर्दोष भी जब सजा पाता है तो समस्त समाज में अनेक विकृतियाँ व्याप्त हो जाती है।

     
  40. सुज्ञ

    20/08/2012 at 3:20 अपराह्न

    धीरेन्द्र जी, आभार

     
  41. सुज्ञ

    20/08/2012 at 3:23 अपराह्न

    अनु जी, आभार, सार्थक हुई पोस्ट भी!!

     
  42. सुज्ञ

    20/08/2012 at 3:24 अपराह्न

    आभार मोनिका जी,आपने इन विचारों को अर्थ-समर्थ महसुस किया।

     
  43. सुज्ञ

    20/08/2012 at 3:28 अपराह्न

    बहुत बहुत आभार अमित जीआपने मेरे विचारों को सुगम वाणी प्रदान की"भेद का निश्चय अधिकारी व्यक्ति द्वारा ही किया जाना चाहिए . नहीं तो नृशंस प्रवृतियों के दमन की आड़ में नृशंसता का ही खेल होगा ."

     
  44. सुज्ञ

    20/08/2012 at 3:35 अपराह्न

    बहुत बहुत आभार शिल्पा जी

     
  45. सुज्ञ

    20/08/2012 at 3:40 अपराह्न

    रश्मि दी, आपने सही कहा…"बचाव के उद्देश्य भी नहीं करना चाहिए"कईं बार तो बचाव का बहाना तक झूठा होता है और वस्तुतः वह अपने अहम का बचाव होता है उसी की ओट में मानसिक प्रताड़ना और वचन हिंसा की जाती है।

     
  46. सुज्ञ

    20/08/2012 at 3:43 अपराह्न

    बहुत बहुत आभार सीमा जी!!

     
  47. सुज्ञ

    20/08/2012 at 3:56 अपराह्न

    @ असहमति की स्वीकृति के लिए:)स्वीकृति क्या सर आँखो पर है जी :)मन्यु तो समतावान महापुरूषों का गहना है जी, साधारण जन में मन्यु को धारण करने की पात्रता भी कहाँ?

     
  48. सुज्ञ

    20/08/2012 at 7:29 अपराह्न

    आभार प्रवीण जी,बोध कथा में इसी ओर संकेत किया गया है कि जीवन तार टूटने पर पुनः जोड पाना किसी के बस का नहीं।

     
  49. प्रवीण शाह

    20/08/2012 at 9:50 अपराह्न

    ‘हिंसा’ चाहे कितने ही उचित कारणों से की जाय कहलाती ‘हिंसा’ ही है। उसका किसी भी काल, कारण, स्थिति, के कारण ‘अहिंसा’ में परिवर्तन नहीं हो जाता। वैसे तो प्रतिकार या आत्मरक्षा में हिंसा का हो जाना सम्भव है, तब भी वह विवशता में की गई ‘हिंसा’ ही कहलाएगी। ऐसी हिंसा के लाख अवश्यंभावी कारण जता कर भी उसे ‘अहिंसा’ रूप में स्थापित नहीं जा सकता। प्रतिरक्षात्मक हिंसा को भी सर्वसामान्य सहज बनाया भी नहीं जाना चाहिए, अन्यथा अनियंत्रित अराजकाता ही फैल जाएगी। इस तरह तो प्रतिरक्षा या प्रतिशोध को आगे कर प्रत्येक व्यक्ति हिंसा में रत रहने लगेगा और उसे अभिमान पूर्वक 'अहिंसा' कहने लगेगा।सहमत हूँ आपसे, पर साथ ही यह भी कहूँगा कि अहिंसा एक उच्च आदर्श भले ही हो परंतु हर जगह यह लागू नहीं होता… मिसाल के तौर पर देश रक्षा के लिये युद्ध में शत्रु को अधिकतम क्षति पहुंचाने के लिये हिंसा वांछनीय है… टिप्पणी में आपने आजाद मैदान में पुलिस के व्यवहार को संयमित कहा है, मैं सक्षमता और सयम इसे तब मानता अगर उस सक्षम फ़ोर्स के रहते कोई उस अमर शहीद ज्योति को नुक्सान न पहुंचा पाता|संजय जी सही कहते हैं, अपने देश के लिये कुरबान अपनी फौज के दिवंगत शहीदों के प्रति कृतज्ञ कोई भी आत्मसम्मानी राष्ट्र व उसका पुलिस अधिकारी 'अमर जवान ज्योति' की यह बेकदरी नहीं होने देता…शायद ही कभी जीवन में रोया हूँ मैं, पर वह बेकदरी देख बरबस रो पड़ा मैं… भाड़ में जाये ऐसी अहिंसा… अमर जवान ज्योति को नुकसान पहुँचाने वाले कीड़े तुरंत मार कर नाली में डाल दिये जाने लायक थे, और ऐसा ही किया भी जाना चाहिये था… भले ही बाद में कुछ भी होता… आत्मसम्मानी राष्ट्र कुछ बातों पर कभी समझौता नहीं करते… यह बात हमारे नीतिनिर्धारक जितनी जल्दी समझें उतना अच्छा… अन्यथा भविष्य के प्रति बहुत आशावान नहीं रह सकता कोई भी… …

     
  50. सुज्ञ

    21/08/2012 at 9:47 पूर्वाह्न

    प्रवीण शाह जी,आपके कर्तव्य भाव के कथनो से सहमत!!देशरक्षा युद्ध में हिंसा वांछनीय ही नहीं कर्तव्य है। किन्तु गैरजरूरी जंग को इन हिंसाओं के कारण ही टालने के प्रयास होते है। और शत्रु जब समर्पण कर दे, लक्ष्य सिद्ध हो जाय तो तत्काल शत्रु के साथ भी अहिंसा के आदर्श प्रवर्तमान हो जाते है।अमर जवान स्मारक के अपमान पर आपके आक्रोश में आत्मसम्मान छलकता है इन बेकदरों के कुकृत्य भर्तसना के योग्य ही है सामान्यतया इन बेगैरतों के प्रति सहानुभूति देखते है किन्तु आज तो आपने हमारी ईद कर दी।

     

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं यह ब्लॉग लिखने के अलावा गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। रेलवे से ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर्ड अफसर।

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