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बुराई और भलाई

15 अगस्त

उभरती बुराई ने दबती-सी अच्छाई से कहा, “कुछ भी हो, लाख मतभेद हों, है तो तू मेरी सहेली हो। मुझे अपने सामने तेरा दबना अच्छा नहीं लगता। आ, अलग खड़ी न हो, मुझ में मिल जा, मैं तुझे भी अपने साथ बढ़ा लूंगी, समाज में फैला लूंगी।”

भलाई ने शांति से उत्तर दिया, “तुम्हारी हमदर्दी के लिए धन्यवाद, पर रहना मुझे तुमसे अलग ही है।”

“क्यों?” आश्चर्यभरी अप्रसन्नता से बुराई ने पूछा।

“बात यह है कि मैं तुमसे मिल जाऊं तो फिर मैं कहां रहूंगी, तब तो तुम-ही-तुम होगी सब जगह।” अच्छाई ने और भी शान्त होकर उत्तर दिया।

गुस्से से उफन कर बुराई ने अपनी झाड़ी अच्छाई के चारों ओर जकड़ कर फैला दी और फुंकार कर कहा, “ले, भोग मेरे निमन्त्रण को ठुकराने का नतीजा! अब पड़ी रह मिट्टी में मुंह दुबकाये! दुनिया में तेरे फैलने का अब कोई मार्ग नहीं।”

अच्छाई ने अपने नन्हे अंकुर की आंख से जहाँ भी झांका, उसे बुराई की जकड़बंध झाड़ी के तेज कांटे, भाले के समान तने हुए दिखाई दिए। सचमुच आगे कदम भर सरकाने की भी जगह न थी।

बुराई का अट्टहास चारों ओर गूंज गया। परिस्थितियां निश्चय ही प्रतिकूल थीं। फिर भी पूरे आत्म्-विश्वास से अच्छाई ने कहा, “तुम्हारा फैलाव आजकल बहुत व्यापक है, बहन! जानती हूं इस फैलाव से अपने अस्तित्व को बचाकर मुझे वृद्धि और प्रसार पाने में पूरा संघर्ष करना पड़ेगा, पर तुम यह न भूलना कि कांटे-कांटे के बीच से गुजर कर जब मैं तुम्हारी झाड़ी के ऊपर पहुंचूंगी तो मेरे कोमल फूलों की महक चारों ओर फैल जायगी और सभी की दृष्टि मोहक फूलों पर जमेगी, तब तेरा अस्तित्व ओझल ही रहेगा। अन्ततः यह जानना भी कठिन होगा कि तुम हो कहाँ।”

व्यंग्य की शेखी से इठलाकर बुराई ने कहा, “दिल के बहलाने को यह ख्याल अच्छा है।”

गहन सन्तुलन में अपने को समेटकर अच्छाई ने कहा, “तुम हंसना चाहो, तो जरुर हंसो, मुझे आपत्ति नहीं, पर जीवन के इस सत्य को कृत्रिम हंसी में झुठलाया नहीं जा सकता कि तुम्हारे प्रसार और प्रशंसकों की भी एक सीमा है, क्योंकि उस अति की सीमा तक तुम्हारे पहुंचते-न-पहुंचते तुम्हारे सहायकों और अंगरक्षकों का ही दम घुटने लगता है। जबकि इसके विपरित मेरे फैलाव की कोई सीमा ही प्रकृति ने नहीं बांधी, बुराई बहन!!”

बुराई गंभीर हो गई और उसे लगा कि उसके काँटों की शक्ति स्वयंमेव पहले से कम होती जा रही है और अच्छाई का अंकुर तेजी से वृद्धि पा रहा है।

 

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19 responses to “बुराई और भलाई

  1. कुश्वंश

    15/08/2012 at 9:30 अपराह्न

    सटीक और दूर तक मार करने वाली करती बधाई सुज्ञ जी स्वतंत्रता दिवस की भी

     
  2. Rajesh Kumari

    15/08/2012 at 10:00 अपराह्न

    काँटों के बिम्ब के माध्यम से सटीक बात को रखा है बुराई कितनी भी खुश हो जाए अच्छाई से हमेशा ही हार जाती है बहुत बढ़िया प्रस्तुति

     
  3. Archana

    15/08/2012 at 10:09 अपराह्न

    बहुत ही अच्छी लगी बोध -कथा…रिकार्ड करने की अनुमति चाहिए…

     
  4. चला बिहारी ब्लॉगर बनने

    15/08/2012 at 10:39 अपराह्न

    प्रेरक कथा.. इतनी सरलता और सुबोध रूप से आपने कहा है इसे कि बस ह्रदय को छू गयी!! सुज्ञ जी, आभार!!

     
  5. Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता

    15/08/2012 at 10:42 अपराह्न

    acchaai hoti hi aisee hai🙂

     
  6. सुज्ञ

    15/08/2012 at 10:45 अपराह्न

    स्वागत है

     
  7. रविकर फैजाबादी

    15/08/2012 at 11:02 अपराह्न

    मानसून मनभर बरस, हरसाया इस बरस |कांटे सड़ते टूटते, रही लताएँ हरस |रही लताएँ हरस, सरस उर्वरा धरा ने |कर के अंकुर परस, लगी नित उसे बढाने |होय बुराई पस्त, ढकी फूलों से झाड़ी |लता बढ़ी मदमस्त, हराती बड़ी खिलाड़ी ||

     
  8. रविकर फैजाबादी

    15/08/2012 at 11:04 अपराह्न

    लता बढ़ी मदमस्त, हारती बुरी खिलाड़ी ||

     
  9. डॉ॰ मोनिका शर्मा

    15/08/2012 at 11:04 अपराह्न

    सहजता से समझाई गहरी बात ….

     
  10. संजय @ मो सम कौन ?

    15/08/2012 at 11:21 अपराह्न

    मुझे लगता है सुज्ञ जी कि ये अच्छाई और बुराई, प्रकाश-अंधकार दोनों पक्ष हमेशा रहेंगे| सरल बिम्बों में सरस कथा रोचक भी है और प्रेरक भी|

     
  11. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

    16/08/2012 at 7:47 पूर्वाह्न

    गम्भीर, प्रेरक, सुन्दर, और … सत्य!

     
  12. संतोष त्रिवेदी

    16/08/2012 at 8:24 पूर्वाह्न

    बुराई अच्छाई को अपने में समेट ले तो कोई बुराई नहीं है ।

     
  13. वाणी गीत

    16/08/2012 at 9:02 पूर्वाह्न

    बुराई और अच्छाई साथ ही चलती है , विश्वास तो यही होता है कि जीत अच्छाई की ही होगी , हालाँकि कई बार विश्वास बुरी तरह टूटता है फिर भी लौ जगाये रखनी ही होगी !

     
  14. सुज्ञ

    16/08/2012 at 9:07 पूर्वाह्न

    बुराई और अच्छाई का अस्तित्व भी शाश्वत सत्य है, इतना ही नहीं अच्छाई को उजागर भी बुराई ही करती है। अपेक्षा यह है कि अच्छाई कोपल भर भारी होनी चाहिए……

     
  15. देवेन्द्र पाण्डेय

    16/08/2012 at 9:40 पूर्वाह्न

    दोनो सहेलियाँ सदियों से रही हैं सदियों रहेंगी। कभी किसी का असर अधिक होगा, कभी किसी का। एक मर जाय दूसरी जीवित रहे, यह हो नहीं सकता।

     
  16. सदा

    16/08/2012 at 1:12 अपराह्न

    सरल एवं सहज़ शब्‍दों में आपकी यह प्रस्‍तुति मन को भावविभोर कर गई … आभार

     
  17. dheerendra

    17/08/2012 at 12:25 पूर्वाह्न

    बुराई पर हमेशा अच्छाई की विजय होती है,बेहतरीन अभिव्यक्ति,,,,सुज्ञ जी,बधाई,,,,स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाए,,,,RECENT POST…: शहीदों की याद में,,

     
  18. S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib')

    17/08/2012 at 9:29 पूर्वाह्न

    कितनी सरलता, सहजता और रोचकता के साथ… वाह!! इतनी अच्छी बोध कथा….सादर आभार।

     
  19. प्रवीण पाण्डेय

    18/08/2012 at 10:12 अपराह्न

    बुराईयों को सीमित क्षेत्र में ही रखा जाये..

     

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं यह ब्लॉग लिखने के अलावा गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। रेलवे से ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर्ड अफसर।

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