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धर्म का स्वरूप

29 जुलाई
न, सम्पत्ति, सुख-सुविधा और कीर्ती  प्राप्त करनें के बाद भी जीवन में असंतोष की प्यास शेष रह जाती है। कारण कि जीवन में शान्ति नहीं सधती। और आत्म का हित शान्ति में स्थित है। आत्मिक दृष्टि से सदाचरण ही शान्ति का एक मात्र उपाय है।
धर्माचरण अपने शुद्ध रूप में सदाचरण ही है। धर्म की परिभाषा है ‘वत्थुसहावो धम्मो ’ अर्थात् वस्तु का ‘स्वभाव’ ही धर्म है। स्वभाव शब्द में भी बल ‘स्व’ पर है ‘स्व’ के भाव को स्वभाव कहते है। यदि हमारा स्वभाव ही धर्म है तो प्रश्न उठता है, हमारा स्वभाव क्या है? हम निश दिन झूठ बोलते है, कपट करते है, येन केन धन कमाने में ही लगे रहते है अथवा आपस में लड़ते रहते है, क्या यह हमारा स्वभाव है? हम क्रोध करते है, लोभ करते है, हिंसा करते है, क्या यह हमारा स्वभाव है? वास्तव में यह हमारा स्वभाव नहीं है। क्योंकि प्रायः हम सच बोलते है मात्र लोभ या भयवश झूठ बोलते है। यदि हम दिन भर क्रोध करें तो जिंदा नहीं रह सकते। थोडी देर बाद जब क्रोध शान्त हो जाता है, तब हम कहते है कि हम सामान्य हो गए। अतः हमारी सामान्य दशा क्रोध नहीं, शान्त रहना है। क्रोध विभाव दशा है और शान्त रहना स्वभाव दशा है। अशान्ति पैदा करने वाले सभी आवेग-आवेश हमारी विभाव दशा है। शान्तचित सदाचार में रत रहना ही हमारा स्वभाव है। और ‘स्वभाव’ में रहना ही हमारा धर्म है।
धर्म की यह भी परिभाषा है – धारयेति इति धर्मः  अथवा यतस्य धार्यती सः धर्मेणं ”  धारण करने योग्य धर्म है। यह भी स्वभाव अपेक्षा से ही है। सदाचार रूप ‘स्वभाव’ को धारण करना ही धर्म है। इसिलिए यह निर्देश है कि स्वभाव में स्थिर रहो। यही तो धर्म है। और हमारा शाश्वत स्वभाव, सदाचरण ही है। क्योंकि लक्षित शान्ति ही है।
धृति: क्षमा दमो स्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रह: ।   
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम् ।  
– धर्म के यह दस लक्षण स्पष्ठ रूप से सदाचरण के ही स्वभाविक लक्षण है।

 ‘स्व’ भाव अपने आप में आत्मस्वभाव के अर्थ में है। और वह स्वयं में व्यापक अर्थ लिए हुए है।

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3 टिप्पणियाँ

Posted by on 29/07/2011 in बिना श्रेणी

 

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3 responses to “धर्म का स्वरूप

  1. रश्मि प्रभा...

    29/07/2011 at 8:52 पूर्वाह्न

    bahut hi gahan vivechan

     
  2. Navin C. Chaturvedi

    30/07/2011 at 8:25 पूर्वाह्न

    पुन: साधुवाद

     
  3. Dinesh pareek

    09/08/2011 at 8:31 पूर्वाह्न

    मुझे क्षमा करे की मैं आपके ब्लॉग पे नहीं आ सका क्यों की मैं कुछ आपने कामों मैं इतना वयस्थ था की आपको मैं आपना वक्त नहीं दे पाया आज फिर मैंने आपके लेख और आपके कलम की स्याही को देखा और पढ़ा अति उत्तम और अति सुन्दर जिसे बया करना मेरे शब्दों के सागर में शब्द ही नहीं है पर लगता है आप भी मेरी तरह मेरे ब्लॉग पे नहीं आये जिस की मुझे अति निराशा हुई है http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/

     

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