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अधिक सम्मान का अधिकारी कौन?

23 जुलाई
क बार राजा के पुरोहित के मन में विचार आया कि राजा जो मुझे आदर भाव से देखता है, वह सम्मान मेरे ज्ञान का है या मेरे सदाचार का? अगले दिन पुरोहित ने राजकोष से एक सिक्का उठा लिया, जिसे कोष-मंत्री ने देख लिया। उसने सोचा पुरोहित जैसा महान व्यक्ति सिक्का उठाता है तो कोई विशेष प्रयोजन होगा। दूसरे दिन भी यही घटना दोहराई गई। फ़िर भी मंत्री कुछ नहीं बोला तीसरे दिन पुरोहित नें कोष से मुट्ठी भर सिक्के उठा लिए। तब मंत्री ने राजा को बता दिया। राजा नें दरबार में राज पुरोहित से पुछा- क्या मंत्री जी सच कह रहे है?
राज पुरोहित ने उत्तर दिया-‘हां महाराज’ राजा नें राज पुरोहित को तत्काल दंड सुना दिया। तब राजपुरोहित बोला-महाराज! मैने सिक्के उठाए पर मैं चोर नहीं हूँ। मैं यह जानना चाहता था कि सम्मान मेरे ज्ञान का हो रहा है या मेरे सदाचार का? वह परीक्षा हो गई। सम्मान अगर ज्ञान का होता तो आज कटघरे में खड़ा न होता। ज्ञान जितना कल था, उतना ही आज भी मेरे पास सुरक्षित है। पर मेरा केवल सदाचार खण्ड़ित हुआ और मैं सम्मान की जगह दंड योग्य अपराधी निश्चित हो गया। सच ही है चरित्र ही सम्मान पाता है।
मित्रों!! आप क्या सोचते है, सम्मान ज्ञान को अधिक मिलता है या सदाचार को?
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10 responses to “अधिक सम्मान का अधिकारी कौन?

  1. Rakesh Kumar

    23/07/2011 at 9:23 पूर्वाह्न

    ज्ञानी और सदाचारी यदि दुराचारियों के बीच फँस जाये तो सम्मान के बजाय ठोकरें ही मिलेंगीं.ज्ञानी का सम्मान तभी हो सकता है जब वह सदाचार भी अपनाए.वैसे असली ज्ञान भी सदाचार को सही प्रकार से जानना और अपनाना ही है.सदाचार का मार्ग ज्ञानियों द्वारा ही पोषित होता है.एक बार फिर से आपने विचार करवाया इसके लिए आभार सुज्ञ जी.

     
  2. रश्मि प्रभा...

    23/07/2011 at 9:26 पूर्वाह्न

    सदाचार को….बिना सदाचार ज्ञान अधूरा है

     
  3. Navin C. Chaturvedi

    23/07/2011 at 2:48 अपराह्न

    उत्तम विचार

     
  4. ज्ञानचंद मर्मज्ञ

    23/07/2011 at 4:50 अपराह्न

    उत्तम लघु कथा !आभार !

     
  5. रंजना

    23/07/2011 at 6:09 अपराह्न

    वाह…क्या सुन्दर कथा कही आपने…निःसंदेह…सम्मान सदा सदाचार ही पता है…यूँ भी उस ज्ञान का लाभ ही क्या जो आचार में न हो…

     
  6. प्रतुल वशिष्ठ

    23/07/2011 at 6:24 अपराह्न

    मैं तो आगे की स्थिति पर विचार करने लगा… राज पुरोहित को राजा ने सजा दी अथवा या नहीं?…फिर एक अन्य स्थिति पर विचार करने लगा : यदि राज पुरोहित की जगह आधुनिक चरित्र होते …जैसे 'राजा', 'कलमाडी', 'सोनिया' (अघोषित) वैसे ये बड़ी कष्ट कल्पना है फिर भी कर रहा हूँ :चलो पहले 'राजा' जी को पकड़ते हैं…… पकड़कर उन्हें कोर्ट में ले गये … सुप्रीम कोर्ट ने सजा सुनाई, 'राजा' ने सफाई में कहा :"माईलोर्ड, मैं तो केवल ये देख रहा था कि …. 'राजा' नाम वाले लोगों का सम्मान होता है 'राजा' पद वाले लोगों का?"दूसरी बार में कलमाडी को पकड़कर … कोर्ट में पेश किया … सुप्रीम कोर्ट ने सजा सुनाई, कलमाडी ने सफाई में कहा : "माईलोर्ड, मैं निर्दोष हूँ …. मैं तो केवल ये देख रहा था कि … चोरी के पैसे के हिस्सेदार क्या उसके पापकर्म के भी हिस्सेदार होते हैं अथवा नहीं?"तीसरी बार में सोनिया को पकड़कर …. कोर्ट में पेश किया …. सुप्रीम कोर्ट ने सजा सुनाई, सोनिया ने सफाई में कहा : "मीलोड, मैं भी निर्दोष हूँ …. मैं तो देख रही थी कि 'स्विस बैंक' के पास कितना स्पेस है रुपया रखने का… वो थकते हैं या नहीं?"

     
  7. प्रतुल वशिष्ठ

    23/07/2011 at 6:27 अपराह्न

    अनावश्यक टिप्पणी : भूल सुधार वास्ते … पहली पंक्ति में 'या' or 'अथवा' में से किसी एक को ही स्वीकार किया जाये. जल्दबाजी में सारे ऑप्शन खुल गये.

     
  8. प्रतुल वशिष्ठ

    23/07/2011 at 6:30 अपराह्न

    तीन प्रश्न : राजा, कलमाडी और सोनिया के …१] "माईलोर्ड, मैं तो केवल ये देख रहा था कि …. 'राजा' नाम वाले लोगों का सम्मान होता है या 'राजा' पद वाले लोगों का?"२] "माईलोर्ड, मैं निर्दोष हूँ …. मैं तो केवल ये देख रहा था कि … चोरी के पैसे के हिस्सेदार क्या उसके पापकर्म के भी हिस्सेदार होते हैं अथवा नहीं?"३] "मीलोड, मैं भी निर्दोष हूँ …. मैं तो देख रही थी कि 'स्विस बैंक' के पास कितना स्पेस है रुपया रखने का… वो थकते हैं या नहीं?"

     
  9. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

    23/07/2011 at 7:40 अपराह्न

    कहानी भी रोचक है और टिप्पणियाँ भी।

     
  10. अनामिका की सदायें ......

    23/07/2011 at 8:20 अपराह्न

    sugy ji bahut acchhi katha ke jariye sumarg ke liye sachet karaya. aur Pratul ji ki katha bhi aapki katha ke sath mila di jaye to atyant rochak lekin kashtkarak bhi hai. saty yahi hai aaj ka jo pratul ji ne paish kiya hai. aur durachaar in teeno ka dekh dukh hota hai.

     

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर रेलवे अफसर।

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