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सम्यक् भेद ही नीर क्षीर विवेक

09 जुलाई

प्रायः लोग कहते है कि हमें किसी की निंदा नहीं करनी चाहिए। किसी को भला, किसी को बुरा कहना राग-द्वेष है। सही भी है किसी से अतिशय राग अन्याय को न्योता देता है। और किसी की निंदा विद्वेष पैदा करती है।
पर-निंदा बुरी बात है किन्तु, भले और बुरे सभी को एक ही तराजु पर समतोल में तोलना मूर्खता है। उचित अनुचित में सम्यक भेद करना विवेकबुद्धि है।  भला-बुरा, हित-अहित और सत्यासत्य का विवेक रखकर,  बुरे, अहितकारी और असत्य का त्याग करना। भले, हितकारी और सत्य का आदर करना एक उपादेय आवश्यक गुण है। जो जैसा है, उसे वैसा ही, बिना किसी अतिश्योक्ति के निरूपित करना, कहीं से भी बुरा कर्म नहीं है।
एक व्यापारी को एक अपरिचित व्यक्ति के साथ लेन-देन व्यवहार करना था। रेफरन्स के लिए उसने, उसके परिचित और अपने एक मित्र को पूछा- “यह व्यक्ति कैसा है? इसके साथ लेन देन व्यवहार करनें में कोई हानि तो न होगी”
उस व्यापारी का मित्र सोचने लगा- मैं किसी के दोष क्यों बताऊँ? दोष दर्शाना तो निंदा है। मुझे तो उसकी प्रसंशा करनी चाहिए। इस प्रकार विचार करते हुए उस मित्र नें उस रेफर धूर्त की प्रशंसा ही कर दी। सच्चाई और ईमानदारी गुण, जो कि उसमें तनिक भी नही थे, व्यापारी के मित्र नें उस धूर्त के लिए गढ दिए। मित्र की बात पर विश्वास करके व्यापारी ने उस धूर्त व्यक्ति के साथ व्यवहार कर दिया और कुछ ही समय में धूर्त सब कुछ समेट कर गायब हो गया। ठगा सा व्यापारी अपने मित्र के पास जाकर कहनें लगा- “मैने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था, तुमनें तो मुझे बरबाद ही कर दिया। तुम्हारे द्वारा की गई धूर्त की अनावश्यक प्रसंशा नें मुझे तो डूबा ही दिया। कहिए आपने मुझ निरपराध को क्यों धोखा दिया? तुम तो मेरे मित्र-परिचित थे, तुमनें उसकी सत्य वास्तविकता का गोपन कर झूठी प्रसंशा क्यों की?”
प्रशंसक कहने लगा- “मैं आपका शत्रु नहीं, मित्र ही हूँ। और पक्का सज्जन भी हूँ। कोई भी भला व्यक्ति, कभी भी किसी के दोष नहीं देखता, आलोचना नहीं करता। निंदा करना तो पाप है। मैनें तुम्हें हानि पहूँचाने के उद्देश्य से उसकी प्रशंसा नहीं की, बल्कि यह सोचकर कि, सज्ज्न व्यक्ति सदैव सभी में गुण ही देखता है, मैं भी क्यों बुरा देखन में जाउँ, इसलिए मैने सद्भाव से प्रशंसा की”
“तो क्या उसमें ईमानदारी और सच्चाई के गुण थे?”
-“हाँ, थे न! वह प्रथम ईमानदारी प्रदर्शीत करके ही तो अपनी प्रतिष्ठा जमाता था। वह  सच्चाई व ईमानदारी से साख जमा कर प्रभाव पैदा करता था। धौखा तो  उसने मात्र अन्तिम दिन ही दिया जबकि लम्बी अवधी तक वह नैतिक ही तो बना रहा। अधिक काल के गुणों की उपेक्षा करके थोड़े व न्यूनकाल के दोषों को दिखाकर निंदा करना पाप है। भला मैं ऐसा पाप क्यों करूँ?” उसने सफाई दी।
-“वाह! भाई वाह!, कमाल है तुम्हारा चिंतन और उत्कृष्ट गुणग्राहकता!! तुम्हारी इस सज्जनता नें, मेरी तो लुटिया ही डुबो दी। तुम्हारी गुणग्राहकता उस ठग का तो हथियार ही बन गई। उसकी ईमानदारी और सच्चाई जो प्रदर्शन मात्र थी, धूर्तता के लिए आवरण थी जिसे तुम अच्छे से जानते भी थे। मैने आज यह समझा कि धूर्तो से भी तुम्हारे जैसे सदभावी शुभचिंतक तो अधिक खतरनाक होते है”। उसी पर अविश्वास करता तो बच जाता, पर तुम्हारे पर आस्था नें तो मुझे कहीं का न रखा। व्यापारी अपने भाग्य को कोसता हुआ चला गया।
कोई वैद्य या डॉक्टर यदि रोग को उजागर करना बुरा मानते हुए,  रोग लक्षणों देखते हुए भी रोग  उजागर न करे। रोग प्रकटन को हीन कृत्य अथवा रोग से बचने के उपाय को सेहत की श्रेष्ठता का बखान माने, या फिर सेहत और रोग के लक्षणों को सम्भाव से ग्रहण करते हुए दोनो ही समान रूप से अच्छे है कहकर, रोग विश्लेषण ही न करे, तो निदान ईलाज कैसे होगा? और आगे चलकर वह रोग कारकों से बचने का परामर्श न दे। कुपथ्य से परहेज का निर्देश न करे। उपचार हेतू कड़वी दवा न दे तो रोगी का रोग से पिंड छूटेगा कैसे? ऐसा करता हुआ डॉक्टर कर्तव्यनिष्ट सज्जन या मौत का सौदागर?
कोई भी समझदार कांटों को फूल नहीं कहता, विष को अमृत समझकर ग्रहण नहीं करता। गोबर और हलवे के प्रति समभाव रखकर कौन समाचरण करेगा? छोटा बालक यदि गोद में मल विसर्जन कर कपडे खराब कर दे तो कहना ही पडता है कि ‘उसने गंदा कर दिया’। न कि बच्चे के प्रति राग होते हुए भी यह कहेंगे कि- ‘उसने अच्छा किया’। इस प्रकार गंदा या बुरा कहना, बच्चे के प्रति द्वेष नहीं है। जिस प्रकार गंदे को गंदा और साफ को साफ ही व्यवहार है उसी प्रकार बुरे को बुरा कहना सम्यक् आचरण है। निंदा नहीं।
संसार में अनेक मत-मतान्तर है। उसमें से जो हमें अच्छा, उत्तम और सत्य लगे, उसे  अगर मानें, तो यह हमारा अन्य के साथ द्वेष नहीं है बल्कि विवेक है। विवेकपूर्वक हितकारी को अंगीकार करना और अहितकारी को छोडना ही चेतन के लिए कल्याणकारी है।
अनुकरणीय अकरणीय में विवेक करना ही तो नीर क्षीर विवेक है।
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9 टिप्पणियाँ

Posted by on 09/07/2011 in बिना श्रेणी

 

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9 responses to “सम्यक् भेद ही नीर क्षीर विवेक

  1. अमित शर्मा

    09/07/2011 at 10:54 पूर्वाह्न

    बहुत गहरी बात छिपी है इस छोटी सी कहानी में जिसे आपने अपने सम्यक विश्लेषण से सुबोध बना दिया है……. आभार सहित !

     
  2. रश्मि प्रभा...

    09/07/2011 at 11:03 पूर्वाह्न

    kaafi gyanvardhak aalekh hai…

     
  3. प्रतुल वशिष्ठ

    09/07/2011 at 12:46 अपराह्न

    गोबर और हलवे के प्रति समभाव रखकर कौन समाचरण करेगा?@ मन में एक विचार आया है..साधु वृत्ति … सुख और दुःख में समभाव रहती है.अर्थात साधु वृत्ति अभाव में और कष्ट में या समृद्धि में और ऐश्वर्य में … संभावी रहती है. राजा जनक … गृहस्थी होकर भी विरक्त भाव से रहते थे… योगियों सा जीवन जीते थे.क्या 'हलवा' सुख है तब क्या 'गोबर' दुःख है? दोनों के अलग-अलग प्रकार के प्रयोग होने से वे सुख के कारण बन जाया करते हैं.क्या साधु स्वभावी को 'गोबर' को देखकर समभाव का त्याग कर देना चाहिए.जबकि मैंने गुरुकुलों में 'गौशालाओं' में साधु गुरुओं को/ सेवकों को गोबर के विभिन्न प्रयोग करते देखा है. हमारी माताजी तीस वर्ष पहले तक घर का आँगन गोबर से लीपा करती थीं. वे हमें गोबर लेने भेजा करती थीं. हम गोबर को देखकर प्रसन्न होते थे. हाँ हमारी प्रसन्नता तब काफूर हो जाती थी जब वह सड़ता हुआ होता था या फिर वह गाय के अलावा किसी अन्य पशु/मानव का होता था. फिर भी …. साधु भी वहीँ तक समभाव बरतता है जहाँ तक सह्य होता है. प्रकृति प्रदत्त अभाव या विषमता तो वह सह सकता है किन्तु मानवकृत अभाव या विषमता में उसकी सहनशीलता जवाब दे जाती है. — कोई साधु हिंसक कृत्य से दूरी बना कर रखेगा ही.— कोई साधु मानवीय गंदगी से दूरी बनाकर रखेगा ही. — कोई साधु संक्रमित रोगों से दूरी बनाकर रखेगा ही. — कोई साधु कीचड़, काँटों से बचकर निकलेगा……. यहाँ वह समभाव नहीं बरतेगा.जो दुःख और विषम परिस्थितयाँ स्वतः बन जाएँ … वहाँ वह धैर्यपूर्वक सहन भी करेगा. संभावी होने से अर्थ निकला… किसी भी परिस्थिति में धैर्य न खोना. सुज्ञ जी, मैं तो आपको एक बार फिर से प्रश्नों में उलझाने आया था … लेकिन लिखते-लिखते खुद ही सुलझ गया. यही तो है चर्चा का लाभ.कभी-कभी हम खुद बा खुद उत्तर पा जाते हैं.

     
  4. प्रतुल वशिष्ठ

    09/07/2011 at 12:47 अपराह्न

    संभावी = समभावी

     
  5. सुज्ञ

    09/07/2011 at 1:10 अपराह्न

    प्रतुल जी,टिप्पणी पढते हुए मैं भी उत्तर की तैयारी ही कर रहा था कि अन्त में आपको अभूतपूर्व चिंतन युक्त समाधान पर देखा। और यही तो आशय था इस पोस्ट का। मैं उत्तर देता तो कदाचित विषय से विचलित हो जाता। आपकी तो गज़ब की पकड रही।वस्तुतः जो वस्तु जैसी है उसको उसके गुण-अवगुण सहित स्वीकार करना और यथार्थ मानना। न राग अतिरेक, न द्वेष अतिरेक। उसे सही स्वरूप में ग्रहण करना।

     
  6. अरुण चन्द्र रॉय

    09/07/2011 at 6:52 अपराह्न

    बहुत सुन्दर और मार्गदर्शक आलेख ! भाषा प्रभावित करती है आपकी !

     
  7. Sawai Singh Rajpurohit

    11/07/2011 at 11:43 पूर्वाह्न

    आदरणीय सुज्ञ जी बहुत गहरी बात मगर साथ ही सोचने को मजबूर करती है और मार्गदर्शक,बहुत ही बेहतरीन आलेख.

     
  8. Kunwar Kusumesh

    12/07/2011 at 11:44 पूर्वाह्न

    आपने उदाहरण बहुत अच्छा दिया,वाह सुज्ञ जी.मज़ा आ गया पढ़कर.

     
  9. रंजना

    13/07/2011 at 6:09 अपराह्न

    सुन्दर दृष्टान्तों से आपने विषय को युक्ति युक्त विवेचित किया….आभार इस महत कल्याणकारी सुन्दर पोस्ट के लिए…

     

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