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नास्तिक के लिए सदाचार निष्प्रयोजन

02 जुलाई
हमारे में सभी सद्गुण भय से ही स्थापित होते है। पापभीरुता ही हमारे अन्तरमन का अनुशासन है। कोई भी अनुशासन भय केन्दित ही होगा। भय प्रत्येक जीव की प्राकृतिक संज्ञा है। ‘ईश्वर-आस्तिक’ को ईश्वर के नाराज़ होनें का भय रहता है। ‘कर्म-सिद्धान्त-आस्तिक’ को बुरे प्रतिफल मिलने का भय, और नास्तिक को बुरा व्यक्तित्व कहलाने का भय रहता ही है। इसी भय से ही सभी सदाचारी बनना और बने रहना उचित मानते है। आस्तिको को ईश्वर और कर्म-फल का आधार रहता है। उन्हें सदाचार की प्रसंसा और प्रतिफल अगर त्वरित नहीं भी मिलते तो आस्तिक सब्र कर लेता है। और निर्णायक दिन या अगले जन्म का इन्तजार कर लेता है। इसके विपरित भौतिकवादी नास्तिक, सदाचार के प्रतिफल में अनुकूल परिणाम न मिलने पर अधीर होकर सदाचार से पल्ला झाड़ लेता है। अर्थात्, सदाचार पर टिके रहने को उसके पास पर्याप्त आधार नहीं होता। उसी अपेक्षा से यह कथन सटीक है कि “नास्तिकी सदाचार के पैर ही नहीं होते”

सदाचार हमेशा घोर पुरूषार्थ, सहनशीलता और धैर्य मांगता है। प्रतिकूल स्थिति में भी पूर्ण समता भाव चाहिए। कईं बार उपकार का बदला अपकार से भी मिलता है। कईं बार सदाचारी कायर मान लिया जाता है, तो कभी डरपोक भी। अधिकांश मामलों में तो सदाचारी के शत्रुओं की संख्या भी बढ जाती है। कभी अपकीर्ती भी आरोपित कर दी जाती है। इस मार्ग पर चलना तलवार की धार पर चलनें के समान है, और डटे रहना लोहे के चने चबाने जैसा।
कर्म-फल पर विश्वास करता हुआ आस्तिक इस विश्वास के साथ अटल रहता है कि ‘देर-सबेर मुझे अच्छे कर्मों का प्रतिफल अच्छा ही मिलना है’। आज नहीं तो कल, इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में। मै अपने सब्र की डोर न छोडूं। वह इसी आशा पर दृढता से सुकृत निभाता चला जाता है। और इसी आत्मबल के आधार पर सदाचार निभ भी जाते है।

वहीं थोड़ी सी भी प्रतिकूल परिस्थिति आने पर, अधिसंख्य लोगों को स्वार्थ में सफल होते देखकर, नास्तिक के सब्र का बांध टूट जाता है। जब भी बह भलाई का बदला बुराई से मिलता देखता है, उसके भौतिक नियमों में खलबली मच जाती है। वह यह निश्चित कर लेता है कि  सदाचार का बदला सदैव बुरा ही मिलता है। फिर वह ही क्यों अनावश्यक सदाचार निभाकर दुख पीड़ा और प्रतीक्षा मोल ले? धर्मग्रंथों से मिलने वाली उर्ज़ा के अभाव में, ‘नास्तिक-सदाचार’ लम्बी दौड नहीं दौड सकता। आधार रहित ‘नास्तिक-सदाचार’  पैर रहित अर्थात निराधार से होते है। कोई मजबूत मनोबल युक्त नास्तिक दृढ भी रह जाय जो कि सम्भव है, किन्तु यह अपवाद है। और यह ध्रुव सत्य है कि बिना कारण कोई कर्म नहीं होता। पुरूषार्थ के लिए भी हमें पर्याप्त नैतिक बल प्रेरणा चाहिए।

 
5 टिप्पणियाँ

Posted by on 02/07/2011 in बिना श्रेणी

 

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5 responses to “नास्तिक के लिए सदाचार निष्प्रयोजन

  1. रश्मि प्रभा...

    02/07/2011 at 3:22 अपराह्न

    जैसा करते हैं , वैसा पाते हैं … हाँ अच्छाई का सिला देर से मिलता है, थक जाता है आदमी

     
  2. Rajey Sha राजे_शा

    02/07/2011 at 5:24 अपराह्न

    भय से स्‍थापि‍त होने वाले गुण क्‍या सदगुण हैं? या र्नि‍भयता के बाद ही सदगुण नाम की चीज अस्‍ति‍त्‍व में आती है। क्‍या डरा हुआ आदमी कुछ भी भला कर सकता है? पाप क्‍या है? क्‍या धर्मग्रंथ हमें उर्जा देते हैं? मेरे खयाल से काफी कुछ समझना बाकी है।

     
  3. सुज्ञ

    02/07/2011 at 6:38 अपराह्न

    राजे_शा जी,हाँ, सब कुछ समझना बाकी है। सबसे पहले तो 'भय' को ही समझना बाकी है।@भय से स्‍थापि‍त होने वाले गुण क्‍या सदगुण हैं?क्‍या डरा हुआ आदमी कुछ भी भला कर सकता है?उदाहरण तो बहुत है, किन्तु आपके लिए एक उदाहरण ही पर्याप्त होगा। सैनिक को शिस्त में रखने के लिये उन्हें अनुशासन में रखा जाता है और उन्हें बार बार वरिष्टों की नाराजगी का भय दिखाया जाता है। उन्हें आज्ञापालन न करनें पर कोर्ट-मार्शल का भय दिखाया जाता है तभी वे अनुशासन में रह पाते है। उस भय के होने के उपरांत भी वे बहादुरी और वीरता का सदगुण दिखाते हैं।@पाप क्‍या है? क्‍या धर्मग्रंथ हमें उर्जा देते हैं?लो यहां तो आपके प्रश्न में स्वयं उत्तर ही छुपा हुआ है। यदि आपको पता नहीं पाप, बुरे-कर्म या अवगुण क्या है? तो आप अपने कृतत्व का मूल्यांकन कैसे करेंगे। आपके मानस में तो पाप और पुण्य में कोई अन्तर नहीं होगा। आप अपने दृष्टिकोण से जो आपके अनुकूल नहीं होगा चट से पाप कह देंगे या अनाचार कह देंगे। और वह अनुशीलन किसी अन्य के लिए अहितकर होगा। कहने का यह प्रयास किया गया है कि उचित अनुचित का विवेक और प्रेरणा हमें धर्म-ग्रंथ देते है। इसलिए आपकी विचारधारा में पाप क्या? यह प्रश्न अनुत्तरित रहेगा, जब तक हम सदाचार की शिक्षा रूप धर्म-ग्रंथों को नहीं मानते। (मैं धर्म-ग्रंथों से सदाचार की शिक्षा पुण्य कर्म के आदेश का ही समर्थन करता हूँ, उनमें जो मिथ्यात्व है उसका विरोध करता हूँ)उचित (पुण्य-कर्म) अनुचित (पाप-कर्म) को जानकर फिर उसमें भेद करते हुए, अनुचित करनें से डरें, यही पापभीरूता है।

     
  4. Er. Diwas Dinesh Gaur

    03/07/2011 at 3:14 पूर्वाह्न

    बिलकुल, आपकी एक एक बात से सहमत हूँ|आपकी उक्त टिप्पणी भी बेहद सार्थक लगी…आभार…

     
  5. Kunwar Kusumesh

    03/07/2011 at 7:53 पूर्वाह्न

    आस्तिक v/s नास्तिक पर आपने बहुत तर्कपूर्ण तरह से अपनी बात रक्खी.मगर नास्तिक आसानी से मानते नहीं हैं.वो न सिर्फ बहस करते हैं बल्कि भिड़ जाते हैं.भई मैं तो १००% सहमत हूँ आपकी बात से.

     

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