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सदाचार का आधार

23 जून
कल मैने चर्चा के दौरान कहा था कि “नास्तिक-सदाचार अपने पैरों पर क्या खड़ा होगा? उस सदाचार के तो पैर ही नहीं होते”।

हमारे में सभी सद्गुण भय से ही स्थायित्व पाते है। भय प्रत्येक जीव की प्राकृतिक संज्ञा है। ईश्वर-आस्तिक को ईश्वर के नाराज़ होनें का भय होता है तो कर्म-फल-आस्तिक को बुरे प्रतिफल मिलने का भय रहता है। नास्तिक को बुरा व्यक्तित्व कहलाने का भय रहता है। इसी भय से सभी सदाचारी रहना उचित मानते है। और कदाचारों से दूर रहने का प्रयास करते है। आस्तिको को ईश्वर और कर्म-फल के प्रति श्रद्धा व सबूरी का आधार होता है। अगर आस्तिक को सदाचार के एवज मे प्रशंसा और प्रतिफल त्वरित न भी मिले तो  वह सब्र कर लेता है, और निर्णायक दिन या अगले जन्म तक का भी इन्तजार कर लेता है।  किन्तु विश्वास से विचलित नहीं होता।

वहाँ भौतिकवादी नास्तिक, सदाचार के प्रतिफल में अनुकूल परिणाम न मिलने , या विपरित परिणाम भांप कर विचलित होते हुए निराश हो जाता है और सदाचार से पल्ला झाड़ लेता है। वह जरा सी प्रतिकूलता देखते ही अपने अनास्थक मानसिकता पर और भी मजबूत हो जाता है। इसप्रकार सदाचार पर टिके रहने के लिए न तो उसके पास पर्याप्त मनोबल बचता है,और न ही पूर्ण विश्वास। पर्याप्त आधार के बिना भला वह क्यों सब्र करेगा? ‘अच्छे का नतीजा अच्छा’, या ‘भले का परिणाम भला’ वाला नीतिबल तो कब का नष्ट हो चुका, नैतिकता पर ‘चलने’ का आधार समाप्त ही हो जाता है। विश्वास स्वरूप ‘पैर’ ही न हो तो कदम क्या खाक उठा पाएगा? इसी आशय से मैने कहा था, “नास्तिकी-सदाचार के तो पैर ही नहीं होते” उसके पास दृढ़ता से खडे रहने का नैतिक बल ही नहीं होता। किस भरोसे रहेगा खडा? क्यों मोल लेगा भावी निश्चित कष्ट व तनाव?

सदाचार, घोर परिश्रम, सहनशीलता और धैर्य की मांग करते है। अधिकांश बार उपकार का बदला अपकार से भी मिलता है। कईं बार सदाचारियों की गणना कायरों में गिनी जाती है। सामान्यतया तो उसे डरपोक ही मान लिया जाता है। सदाचारी के शत्रुओं की भी संख्या बढ जाती है। उसे पाखण्डी ही समझा जाता है। कभी कभी तो उसकी कीर्ती का भी हनन कर दिया जाता है। इसप्रकार अनास्थावान्  सदाचारी के विश्वास पर टिके रहना तलवार की धार पर चलनें के समान है साथ ही इस मार्ग पर चलना लोहे के चने चबाने जैसा दुष्कर है।

जबकि कर्म-फल पर विश्वास करता हुआ आस्तिक, श्रद्धा के साथ प्रतिफल धारणा पर अटल रहता है और विश्वास के प्रति सजग भी. उसे भरोसा होता है कि देर-सबेर अच्छे कर्मों का प्रतिफल अच्छा ही मिलना है। आज नहीं तो कल, इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में, वह सोचता है मै अपने सब्र की डोर क्यो छोडूं। वह सदाचरण दृढता से निभाता चला जाता है। इसी आत्मबल के कारण सदाचार निभ भी जाते है।

जबकि प्रतिकूल परिस्थिति में नास्तिक के सब्र का बांध टूट जाता है। भलाई का बदला बुराई से मिलते ही उसके भौतिक नियमों में खलबली मच जाती है। वह सोचता है, आजकल तो सदाचार का बदला बुरा ही मिलता है। कोई आवश्यक नहीं अच्छे कार्यों का नतीजा अच्छा ही हो। ऐसा कोई भौतिक नियम तो है नहीं कि नियमानुसार भले का परिणाम भला ही मिले। फिर क्यों किसी उलजलूल कर्म-सिद्धांतो की पग-चंपी की जाय,और अनावश्यक सदाचार निभाकर क्यों दुख पीड़ा और प्रतीक्षा मोल ले। इसप्रकार धर्मग्रंथों से मिलने वाले नीतिबल के अभाव में, व प्रतिफल की धारणा के अभाव में, अपनी नैतिक उर्ज़ा दांव पर नहीं लगाता। इसीलिए पैरविहिन नास्तिक, सदाचार की ‘लम्बी दौड’  दौडने मे अक्षम होता है। नास्तिक-सदाचार की आधार विहीन धारणाओं को पैर रहित ही कहा जाएगा। बिना दृढ़ आस्था के वे ‘आचार’ आखिर किसके पैरों पर खड़े होंगे?

(प्रस्तुत लेख में ‘नास्तिक’ शब्द से अभिप्राय ‘धर्मद्वेषी’ या ‘धर्महंता नास्तिक’ से है)

 
71 टिप्पणियाँ

Posted by on 23/06/2011 in बिना श्रेणी

 

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71 responses to “सदाचार का आधार

  1. सम्वेदना के स्वर

    23/06/2011 at 8:54 अपराह्न

    सरल शब्दों में गहरी बात!!

     
  2. VICHAAR SHOONYA

    23/06/2011 at 9:32 अपराह्न

    आस्तिक सदाचार और नास्तिक सदाचार के बीच का फर्क. कौन सा वाला बेहतर है ? यहाँ मैं उन लोगों का पक्ष भी जानना चाहूँगा जो नास्तिक सदाचार के पालनकर्ता हैं.

     
  3. शिखा कौशिक

    23/06/2011 at 10:15 अपराह्न

    sahmat hun par kai bar sabr toot jane par hi aastik nastik ban jata hai ..

     
  4. शालिनी कौशिक

    23/06/2011 at 11:08 अपराह्न

    poori tarh se sahmat kyonki aastik ke pas jo hai vah nastik ke pas kabhi ho hi nahi sakta aur vah hai bhagwan par vishas aur yah ishas use jeean kee chaunotiyo se ladne me madad karta hai aur vijayeebanata hai.

     
  5. Global Agrawal

    23/06/2011 at 11:45 अपराह्न

    सरल शब्दों में गहरी बात!!

     
  6. Global Agrawal

    23/06/2011 at 11:48 अपराह्न

    इस पोस्ट में फोटो बढ़िया लगाया है :))

     
  7. Global Agrawal

    23/06/2011 at 11:53 अपराह्न

    @पाण्डेय जीइस पोस्ट के अंतिम पेराग्राफ को मेरी ओर से आपके पूछे प्रश्न का उत्तर मानियेगा 🙂

     
  8. Rakesh Kumar

    24/06/2011 at 12:16 पूर्वाह्न

    सुज्ञ जी आपने बहुत सुन्दर तरीके से आस्तिकों के धर्य का और नास्तिकोंके अधर्य का अनुपम निरूपण किया है.आस्तिक यदि अन्धविश्वास से मुक्त हो 'तत्व-ज्ञान' के आधार पर आस्तिकता को बढ़ाएँ तो अति उत्तम धर्य से कर्मयोग का अनुसरण कर सकता है,जो जीवन केसर्वश्रेष्ठ लक्ष्य परमानन्द ओर पूर्ण शान्ति का आधार है.

     
  9. संगीता स्वरुप ( गीत )

    24/06/2011 at 12:46 पूर्वाह्न

    बहुत अच्छी और गहन बात को सरलता से कह दिया है

     
  10. डॉ॰ मोनिका शर्मा

    24/06/2011 at 1:48 पूर्वाह्न

    सही कहा आपने…. सार्थक आलेख

     
  11. Er. Diwas Dinesh Gaur

    24/06/2011 at 2:44 पूर्वाह्न

    हंसराज भाई साधुवाद…कल की बहस के परिणामस्वरुप बहुत कुछ आपसे सीखा| एक अम्न्थान हो गया| आस्तिक व नास्तिक के बीच के अंतर को आपने बखूबी समझाया है| आस्तिक की श्रेष्ठता निसंदेह नास्तिक से अधिक है|आभार…

     
  12. : केवल राम :

    24/06/2011 at 7:01 पूर्वाह्न

    सदाचार घोर परिश्रम, सहनशीलता और धैर्य मांगता है। लेकिन इस परिश्रम का लाभ हमें जीवनपर्यंत भी मिलता है अगर हम कुछ कर पाए तो …इसलिए सदाचार का जीवन महत्वपूर्ण है …!

     
  13. ajit gupta

    24/06/2011 at 10:54 पूर्वाह्न

    एक बात मैं बहुत गहराई से अनुभव करती हूँ और अक्‍सर कहती भी हूँ कि हमारे जीवन में डर ही डर था और वर्तमान जीवन से डर ही समाप्‍त हो गया है। हम भगवान से डरते थे, पाप-पुण्‍य से डरते थे, माता-पिता से डरते थे यहाँ तक की सारे जमाने से ही डरते थे। लेकिन वर्तमान में युवा पीढी के मन से सभी प्रकार के डर निकल गए हैं और उसका परिणाम हम देख रहे हैं कि बच्‍चों के मन में किसी भी प्रकार की और किसी के भी प्रति आस्‍था नहीं है। वे केवल कमाना और खर्च करना जानते हैं।

     
  14. रश्मि प्रभा...

    24/06/2011 at 12:26 अपराह्न

    sahajta se bahut badee baat

     
  15. सदा

    24/06/2011 at 1:18 अपराह्न

    आपके विचारों से पूर्णत: सहमत हूं … बहुत ही अच्‍छा लिखा है आपने ।

     
  16. Global Agrawal

    24/06/2011 at 2:52 अपराह्न

    @लेकिन वर्तमान में युवा पीढी के मन से सभी प्रकार के डर निकल गए हैं और उसका परिणाम हम देख रहे हैं कि बच्‍चों के मन में किसी भी प्रकार की और किसी के भी प्रति आस्‍था नहीं है। वे केवल कमाना और खर्च करना जानते हैं हाँ, बहुत सही कहा है

     
  17. सुज्ञ

    24/06/2011 at 3:03 अपराह्न

    अजित दीदी नें उसी समस्या को इंगित किया है।डर के प्रति निष्ठुरता नें स्वेच्छाचार को बढावा दिया है।यही स्वेच्छाचार अनाचार को निमंत्रित करता है।जीवन-अनुशासन के लिए भय आवश्यक है।

     
  18. सुज्ञ

    24/06/2011 at 3:09 अपराह्न

    @आस्तिक सदाचार और नास्तिक सदाचार के बीच का फर्क. कौन सा वाला बेहतर है ?दीप पाण्डेय जी,वही बेहतर है जो लम्बी दौड़ का घोड़ा हो।@ग्लोबल जी,आपने सही निशानदेही की!!

     
  19. चंदन कुमार मिश्र

    24/06/2011 at 9:12 अपराह्न

    अच्छा तो आप फिर उसी मुद्दे पर हैं! अभी अभी पता चला। लेकिन मेरी बात का जवाब तो किसी ने दिया नहीं कि अपराधियों में से कितने नास्तिक हैं और कितने आस्तिक।दूसरी बात किसी नास्तिक की तुलना में हमेशा आस्तिकों के शत्रु कम होते हैं। क्योंकि वह वर्तमान व्यवस्था को स्वीकारता है लेकिन नास्तिक विद्रोह करता है। स्वयं के विवेक से चलता है दूसरों के विवेक के पास अपने विवेक को गिरवी नहीं रखता। आप अच्छे से जानते हैं कि राहुल सांकृत्यायन के शत्रु ज्यादा थे या विवेकानन्द के। आपकी दोनों बातों का कोई आधार है ही नहीं, कम से कम मैं जहाँ तक समझता हूँ। मैं औरों की तरह हाँ में हाँ मिलाता रहूँ तो सब ठीक होगा, तो यह मुझे मंजूर नहीं है। और यह भी जान लीजिए कि मैंने अपने चिट्ठे पर ईश्वर और धर्म को लेकर बहुत सारे आलेखों को लिखने की ठान ली है और आज शुरु कर चुका हूँ।

     
  20. निशांत मिश्र - Nishant Mishra

    24/06/2011 at 9:33 अपराह्न

    आदरणीय सुज्ञ जी, मैं यथासंभव सदाचार का पालन करते हुए अपने कर्तव्यों का पालन कर रहा हूँ. मैं असत्य और अनीति के मार्ग पर नहीं चल रहा हूँ. फिर भी मेरे मन, वचन, या कर्म से मेरी किसी भी परा शक्ति (ईश्वर, देवता, अवतार) आदि पर आस्था नहीं है. मैं गीता के उपदेशों के अनुरूप उन्हें अपने कर्म भी अर्पित नहीं करता. मैं प्रातः उठते ही उनका नाम नहीं लेता और न ही सोने के पहले उनका स्मरण करता हूँ. मैं उनकी पूजा या उनका भजन आदि भी नहीं करता. मैं न तो उनके विषय में चिंतन करता हूँ और न ही उनके अस्तित्व या अनस्तित्व के प्रश्नों में पड़ता हूँ. मैं नहीं मानता कि कहीं कोई मेरे कर्मों का हिसाब रख रहा है. मैं यही मानता हूँ कि मेरे कर्म ही मेरे लिए अंततः शांति या वेदनाकारक होंगे. मेरी दृष्टि में तो सदाचार के प्रत्यय को आस्तिकता या नास्तिकता से जोड़ना उचित नहीं है. न तो सारे आस्तिक भले होते हैं और न ही सारे नास्तिक.मुझे लगता है कि न केवल ब्लौग जगत में बल्कि सम्पूर्ण समाज में नास्तिकों या अज्ञेयवादियों को पापी और दुष्टात्माओं के रूप में ही जाना जाता है. यह स्थिति तब है जब भारत के दो महत्वपूर्ण धर्मों यथा बौद्ध और जैन धर्मों में सशक्त अनीश्वरवादी विचारों को स्थान दिया गया है.वैसे, आप मुझे किसी कोटि में रखेंगे? सद्मार्गी आस्तिक की या पतित नास्तिक की?

     
  21. डॉ० डंडा लखनवी

    24/06/2011 at 10:24 अपराह्न

    व्यक्ति को सबसे अधिक सताने वाला भय मृत्यु भय होता है। दूसरे भय इससे न्युन होते हैं। भय से धार्मिक दुकानदारी खूब चमकाई जाती है। किन्तु मृत्यु से कोई बच नहीं पाता है। यह एक शास्वत सत्य है। इसका असर आस्तिक और नास्तिक दोनों पर होता है। सदाचार, सदाचार होता है। सदाचार के माध्यम से हम अपने परिवेश को सुखद बनाते हैं। यह मानवीय व्यवहार का व्याकरण है। आस्तिक सदाचार और नास्तिक सदाचार अलग-अलग चीज नहीं है। जाति, धर्म, भाषा, लिंग आदि के आधार पर असहिष्णु होना भी कदाचार है।

     
  22. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

    25/06/2011 at 6:25 पूर्वाह्न

    @आस्तिक सदाचार और नास्तिक सदाचार के बीच का फर्क. कौन सा वाला बेहतर है?ज़ाहिर है कि सदाचार सदाचार ही है आधार कुछ भी हो।@अपराधियों में से कितने नास्तिक हैं और कितने आस्तिक।मुझे नहीं लगता कि ऐसी फ़िज़ूल स्टडी में कभी कोई संसाधन लगाये गये होन्गे। कॉमन सैंस से कहूँ तो नास्तिकों का प्रतिशत अपराधियों में भी कमोबेश उतना ही होगा जितना सदाचारियों में@भय से धार्मिक दुकानदारी खूब चमकाई जाती है। भय से सांसारिक दुकानदारी भी खूब चमकाई जाती है, ये अस्पताल, बीमा आदि क्या हैं? @निशांत,तुम्हारी बात सबसे अच्छी लगी। तुम जैसे लोग धार्मिक आचरण वाले नास्तिक कहे जायेंगे। भारतीय परम्परा में आस्तिक-नास्तिक की कोई समस्या नहीं है। समस्या तब आती है जब दो क्रूर और अति-असहिष्णु वर्ग (धर्मान्ध और धर्महंता) सात्विक (आस्तिक और नास्तिक) वर्गों की आड में अपना उल्लू सीधा करते हैं। इन मौकापरस्तों को अपनी असलियत ज़ाहिर करने का साहस नहीं होता है इसलिये नास्तिक/आस्तिक की आड लिये रहते हैं मगर सच्चाई कब तक छिप सकती है?

     
  23. चंदन कुमार मिश्र

    25/06/2011 at 7:19 पूर्वाह्न

    श्रीमान स्मार्ट इंडियन,असहिष्णुता का अर्थ मालूम है? वैसे भी विदेश में रहनेवालों को कोई महत्व नहीं दिया जाना चाहिए क्योंकि यहाँ से भागकर अपने देश को अंगूठा दिखाकर झूठ-मूठ काबिल बनने से क्या होता है जनाब? कितने अस्पताल और बीमा में नास्तिक लोग हैं? कामन सैंस लगाते हैं। आपने दूसरे देशों को छोड़िए भारत में ही कितने नास्तिकों को देखा है? भारत में एक करोड़ लोग भी नास्तिक नहीं है। यानि अपराधी अक्सर क्या होते हैं, खुद समझ लीजिए। आपको नास्तिकता और आस्तिकता की समझ नहीं है, ऐसा मुझे लगता है,आप मुझे ऐसे नास्तिकों की गिनती बताइए जिन्होंने संसार को खराब किया और ऐसे आस्तिकों की गिनती खुद कर लें जिन्होंने देश और संसार को क्या दिया?

     
  24. JC

    25/06/2011 at 7:42 पूर्वाह्न

    @ "व्यक्ति को सबसे अधिक सताने वाला भय मृत्यु भय होता है। दूसरे भय इससे न्युन होते हैं।…"इसी लिए ज्ञानी-ध्यानी इसी जीवन में प्रश्न का उत्तर ढूँढने का उपदेश दे गए – 'मैं कौन हूँ"?, और उनके अनुसार, तपस्या कर, उत्तर भी बता गए, "मैं, और आप भी, अमृत शिव हैं !" यानि हम सभी वास्तव में परमात्मा के अंश आत्माएं हैं जो अग्नि से नहीं जलती, पानी में नहीं घुलती, हवा से नहीं सूखती, शस्त्रादि से नहीं कटती, इत्यादि (और ये सारे गुण हम अपनी पृथ्वी में भी पाते हैं जो साढ़े चार अरब वर्षों से अस्तित्व में है, सौर-मंडल के एक सदस्य के रूप में)…और किसी भी साकार रूप के लिए 'पंचतत्व' अथवा 'पंचभूत' आवश्यक जाने गए – 'अग्नि', 'जल', 'वायु', (सब साकार वस्तुओं को उपलब्ध कराने वाली) 'पृथ्वी', और 'आकाश' यानि अंतरिक्ष (शून्य) का प्रतिरूप पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र के भीतर वातावरण, और पृथ्ची का ही एक अंश चंद्रमा…अब यदि योगी, सिद्ध पुरुष सही थे तो हम अपने सौर-मंडल के नौ सदस्यों के, 'ग्रहों' के, जो हमारी गैलेक्सी के भीतर स्थित है, उस के सार से बने हैं, और उनके अनुसार 'ग्रहों' का प्रभाव मानव जीवन में जन्म से मृत्यु तक होता है… तो क्या कोई भी व्यक्ति स्वतंत्र है कर्म करने में?… जो तीन वर्ग में उनके अनुसार बांटे गए (राजस यानि सूर्य के गुण जैसे, तामसिक यानि उन ग्रहों के, जिनका अस्तित्व सूर्य से प्राप्त शक्ति पर निर्भर है, उनके अपने अपने विभिन्न गुणों जैसे, और सात्विक यानि गैलेक्सी के केंद्र में संचित अदृश्य शक्ति, 'ब्लैक होल' अथवा 'कृष्ण', जो गीता में कह गए कि मृत्यु तो आत्मा के फटे पुराने वस्त्र रुपी शरीर बदल नूतन वस्त्र रुपी शरीर धारण करने समान है)?

     
  25. संजय @ मो सम कौन ?

    25/06/2011 at 9:14 पूर्वाह्न

    श्रीमान चंदन कुमार मिश्र जी,असहिष्णुता का अर्थ पूछ रहे हैं तो अपना ही कमेंट शांत होकर पढ़ देखिये, शायद दोबारा न पूछना पड़े। पहले भी आपके कमेंट्स पढ़े हैं और आपसे सहमत न होते हुये भी आपकी एक स्वस्थ बहस करने वाले की छवि बन रही थी, लेकिन आजके कमेंट में आप अपनी राय, निर्णय थोपते से लग रहे हैं। भावी प्रधानमंत्री से इतनी तानाशाही की अपेक्षा तो नहीं:)हम तो दर्शक दीर्घा वाले हैं, बहस करने लायक नहीं हैं। बहस देखकर एकाध सवाल पैदा हुआ है, उसका निवारण करेंगे तो कृपा होगी -अस्पताल और बीमा जैसी(दुकानदारी ही सही) संस्थानों में नास्तिक क्यों नहीं हैं? अगर सारे आस्तिक ही वहाँ हैं, जैसा आपके प्रश्न से लगा, तब तो आपकी श्रेणी के लोग अवश्य इन संस्थानों का बहिष्कार करते होंगे।अभी नैट से दूर जाना पड़ रहा है, पापी पेट का सवाल है, लौटकर आपके ब्लॉग पर ईश्वर धर्म आदि पर आपकी ठानी शुरुआत चैक करेंगे, हो सकता है हम ही अपनी प्लेसमेंट जान सकें कि आस्तिक हैं या नास्तिक। लेकिन हम मूकदर्शक बने रहकर ही विद्वानों के ज्ञान से लाभ उठाना चाहेंगे, बहस करने लायक ज्ञान नहीं है।

     
  26. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

    25/06/2011 at 9:25 पूर्वाह्न

    @ श्रीमान चंदन कुमार मिश्र आपने जो प्रश्न पूछे, मैंने सदाशयता से उनका उत्तर देने का प्रयास यह सोचकर किया कि आप वाकई उत्तर जानने में उत्सुक हैं। मगर आपके जवाबों की तिलमिलाहट और व्यक्तिगत आक्षेप एक दूसरी ही कहानी कह रहे हैं। आपके ऐटिट्यूड ने काफ़ी निराश किया। मेरे पास फ़िज़ूल बातों के जवाब देते रहने का समय नहीं है फिर भी एक बार हर किसी को अवसर देने का प्रयास अवश्य करता हूँ इसलिये इस बार के सवालों के उत्तर अवश्य दे रहा हूँ, आगे की कोई गारंटी नहीं है। @असहिष्णुता का अर्थ मालूम है?नहीं जी, क्षमा कीजिये। इस सभा में एक आप ही महापण्डित हैं, विस्तार से समझाइये, जिन पर समय होगा वे सुन लेंगे। वैसे निष्पक्ष होकर देखने वालों को "असहिष्णुता" का अर्थ आपके उपरोक्त सवाल में ही मिल जायेगा।@ वैसे भी विदेश में रहनेवालों को कोई महत्व नहीं दिया जाना चाहिएआप वाकई गम्भीर हैं? जब आप प्रधानमंत्री बन जायें तब सम्विधान में ऐसा लिखा दें। अगर अंग्रेज़ों की जगह आपका राज होता तो शायद गान्धीजी जैसों के बारे में यही प्रचारित कर रहे होते। BTW, Who are you to decide it? A self-proclaimed arrogant future PM? The world has already seen many dictators, can't tolerate anymore. @क्योंकि यहाँ से भागकर अपने देश को अंगूठा दिखाकर झूठ-मूठ काबिल बनने से क्या होता है जनाब?आप मुझे जाने बिना मेरे बारे में इतनी बडी बात कह रहे हैं कि यदि आप कभी अपनी बात के खोखलेपन को जानने लायक परिपक्व हुए तो अपनी उद्दंडता पर शर्म करेंगे। और अगर मुझे जाने बिना ही आपको यक़ीन है कि मैं किसे अंगूठा दिखाकर कैसे भागा हूँ तो फिर आप जैसे आदमी से बात करके मैं ही नहीं शायद बहुत से अन्य लोग अपना वक़्त बर्बाद कर रहे हैं क्योंकि वार्ता की भी एक मर्यादा होती है। "झूठ-मूठ काबिल बनने" और "सचमुच काबिल बनने" का परीक्षण कहाँ होता है और उसके प्रमाणपत्र कहाँ मिलते हैं, यह भी बताते जाते तो शायद आगे से लोग आपकी बहस में प्रमाणपत्र लेकर ही घुसेंगे। @आपको नास्तिकता और आस्तिकता की समझ नहीं है, ऐसा मुझे लगता हैआपके लगने से इस ब्रह्माण्ड को कोई फर्क पडने वाला है क्या? ब्रह्माण्ड के अनंत काल में आपका यहाँ अस्तित्व है ही कितनी देर का? आपकी सारी बहस कुछ एक दशकों में मिट्टी होने वाली है। याद रखिये एक शताब्दी के अन्दर न आप यहाँ होंगे न ऐसा एक भी व्यक्ति जिससे बहस करके आप अपने अहम को पोषित कर रहे हैं। आप नास्तिक हैं तो रहिये। Who cares! लेकिन अगर स्टालिन, माओ जैसे तथाकथित नास्तिक तानाशाहों की तरह सारी दुनिया को ज़बर्दस्ती धर्मविरोधी बनाना चाहेंगे तो याद रहे कि उनके सपने भी उन्हीं के साथ दफन हो गये। @ऐसे नास्तिकों की गिनती बताइए जिन्होंने संसार को खराब किया और ऐसे आस्तिकों की गिनती खुद कर लें जिन्होंने देश और संसार को क्या दिया?अगर अभी तक आपने खुद ही इस सवाल का उत्तर नहीं ढूंढा, तो अभी बहसों में पडने से पहले थोडा होमवर्क कीजिये। फिर भी एक क्लू देता हूँ कि हिंसक कम्म्युनिस्ट तानाशाह, विचारक और उनके रक्त-पिपासु चमचे अपने को नास्तिक ही कहते रहे हैं। गिनना शुरू कर दीजिये।जय राम जी की! खुदा हाफिज़। गुड बाय (यह गुड भी गॉडली ही है)

     
  27. चंदन कुमार मिश्र

    25/06/2011 at 10:18 पूर्वाह्न

    श्री स्मार्ट इंडियन(भारतीय नहीं) साहब,आपका ईमेल पता मिल गया है, जवाब भेज देता हूँ।और जेसी जी का भी जवाब उन्हीं के ईमेल पते पर वरना सुज्ञ जी को लगेगा कि मैंने यहाँ भी बहस शुरु कर दी।

     
  28. VICHAAR SHOONYA

    25/06/2011 at 10:48 पूर्वाह्न

    सुज्ञ जी, चन्दन कुमार मिश्र जी किस बहस की बात कर रहे हैं , क्या कुछ लिंक मिलेगा. @चन्दन जी अपने नाम के विपरीत आप गरम दल के मालूम होते हैं. आपको मुफ्त में एक सलाह दूंगा (वैसे मुफ्त में भी दो की चाह रखेंगे तो दो सलाहें भी दे दूंगा). किसी भी विषय में वाद विवाद करते वक्त किसी पर भी व्यक्तिगत आक्षेप करने से पहले कम से कम दस दुसरे ब्लोग्स पर जाकर टिप्पणियां कर लिया करें. आपका क्रोध शांत हो जाया करेगा.

     
  29. चंदन कुमार मिश्र

    25/06/2011 at 10:54 पूर्वाह्न

    नाटक में एक और पात्र! विचार शून्य जी। अहा!

     
  30. चंदन कुमार मिश्र

    25/06/2011 at 11:03 पूर्वाह्न

    anvarat.blogspot.com/2011/06/blog-post_19.htmlhttp://zealzen.blogspot.com/2011/06/blog-post_22.htmlवैसे नाम बड़ा अच्छा रखा है विचार शून्य जी। लीजिए लिंक और तमाशा देखिए।

     
  31. सुज्ञ

    25/06/2011 at 11:54 पूर्वाह्न

    चंदन कुमार मिश्र जी,आप विद्वानों की सभा में अभिव्यक्ति के योग्य ही नहीं है।आपको यह भी नहीं पता चर्चा कैसे की जाती है।श्रीमान अनुराग शर्मा जी(स्मार्ट इन्डियन)प्रथम पंक्ति के विद्वान ब्लॉगर है। वे विदेश में होकर भी भारतीय संस्कृति के पुरोधा है। पहले उनके ब्लॉग पर जाकर उनके व्यक्तिव को देखों, उनके सामनें खुद बौने नजर आओगे। आपका दुस्साहस कैसे होता है वैचारिक चर्चा में व्यक्तिगत मिथ्या प्रलाप करने का।और दीप पाण्डेय जी (विचार शून्य) भी एक विशिष्ठ चिंतक है। उनके मौलिक विचारों को जानिए फिर किसी के बारे में कहनें की हिम्मत करिए।मेरा ब्लॉग विद्वानों के अपमान के लिए नहीं है। वे विद्वान भी जो मेरे विचारों से विपरित विचार ही क्यों न रखते हो।मैं नास्तिकों का पूरा सम्मान करता हूँ। बस उनकी विचारधारा पर चिंतन करना ही इस तरह के लेखों का उद्देश्य होता है। किन्तु आप जैसी तुच्छ सोच अगर सभी नास्तिकों की होती हो तो नास्तिकों से घृणा होना स्वभाविक है। आप इस ब्लॉग पर चर्चा के लिये गैर-लायक है। यहाँ दोबारा न रूख न करें।मैनें आज तक किसी ब्लॉगर का अपमान नहीं किया। आप बिना शर्त अनुराग जी से माफ़ी मांगे। और यहां दोबारा न पधारें।

     
  32. सुज्ञ

    25/06/2011 at 12:03 अपराह्न

    आदरणीय अनुराग शर्मा जी एवं मान्यवर दीप पाण्डेय जी,मेरी नेट पर अनुपस्थिति में द्वेषी मानसिकता नें मेरे ब्लॉग मंच का उपयोग करके आपके बारे में जो अनर्गल प्रलाप किया उसके लिए मैं हृदय से क्षमाप्रार्थी हूँ।

     
  33. सुज्ञ

    25/06/2011 at 12:37 अपराह्न

    @"मुझे लगता है कि न केवल ब्लौग जगत में बल्कि सम्पूर्ण समाज में नास्तिकों या अज्ञेयवादियों को पापी और दुष्टात्माओं के रूप में ही जाना जाता है."माननीय निशांत जी,वस्तुतः विद्वज्ञ नास्तिकों को सम्मान ही मिलता है, और उनकी वैचारिकता पर मनन भी होता है। किन्तु कईं नव-नास्तिक, नास्तिकता में द्वेष युक्त अतिक्रमण करते है, चन्दन कुमार मिश्र जी का उदाहरण आपके सामनें है। इस प्रकार के नास्तिक लॉजिक से चर्चा करनें की जगह ईश्वर का अपमान, आस्तिकों को मूर्ख आदि कुटिलता का प्रयोग करने लगते है। इनकी यहीं कुत्सित मानसिकता 'दुष्टात्मा' कहलवाने का सबब बनती है। अन्यथा नास्तिकता और वह भी विभिन्न रूपों में समाज में स्वीकृत है।

     
  34. सुज्ञ

    25/06/2011 at 12:50 अपराह्न

    @ वैसे, आप मुझे किसी कोटि में रखेंगे? सद्मार्गी आस्तिक की या पतित नास्तिक की?माननीय निशांत जी,मित्र क्यों दुविधा में डाल रहे हो :))बौद्ध और जैन धर्म अनीश्वरवादी होते हुए भी आत्मा के अस्तित्व में विश्वास रखते है। और कर्म-फल में भी। इसी आशय से वे अनीश्वरवादी होते हुए भी आस्तिक कहलाते हैपहले मेरे प्रश्न का उत्तर दें…………कर्म-फल में विश्वास न होते हुए भी जब आप असत्य और अनीति के मार्ग का त्याग करते है यह प्रेरणा आपको कहाँ से प्राप्त होती है। यदि आप कहेंगे कि अन्तरात्मा से तब भी आपको यह बोध कैसे होता है कि अच्छे कार्य अपनाने योग्य होते है और बुरे कार्य त्यागने योग्य होते है, यह धारणा कहां से प्राप्त होती है?

     
  35. Global Agrawal

    25/06/2011 at 2:09 अपराह्न

    देरी से आने के लिए क्षमा …. पाण्डेय जी और अनुराग जी दो बेहतरीन ब्लोगर्स हैं जिनकी ब्लोगिंग से ब्लोगिंग के सही मायने समझ में आते हैं …..मेरा विरोध भी दर्ज किया जाए

     
  36. Global Agrawal

    25/06/2011 at 2:13 अपराह्न

    श्रीमान अनुराग शर्मा जी(स्मार्ट इन्डियन)प्रथम पंक्ति के विद्वान ब्लॉगर है। वे विदेश में होकर भी भारतीय संस्कृति के पुरोधा है।…..दीप पाण्डेय जी (विचार शून्य) भी एक विशिष्ठ चिंतक है………बिलकुल सही कहा सुज्ञ जी ने ….. मेरा भी अनुरोध है की कृपया उनके ब्लोग्स पर जाकर लोग उनसे सीखें की ब्लोगिंग किसे कहा जाता है ???

     
  37. Global Agrawal

    25/06/2011 at 2:33 अपराह्न

    सुज्ञ जी ,मैंने कहीं पढ़ा था या सुना था की सज्जन और ज्ञानवान व्यक्ति फलदार पेड़ की तरह ही होते हैं , मतलब कोई कुतर्क के पत्थर फेंके तो भी ज्ञान के फल देते रहते हैं (जब तक संभव हो)….. मैं स्मार्ट इन्डियन जी की टिप्पणियों को इस पोस्ट की उपलब्धि मान रहा हूँ ..

     
  38. चंदन कुमार मिश्र

    26/06/2011 at 1:06 पूर्वाह्न

    मेरी तरफ़ से जवाब,यह जवाब मैंने जे सी जी को, विचार शून्य जी को, स्मार्ट इंडियन जी को(जो अपना नाम तक विदेशी रखते हैं लेकिन भारतीयता के पुरोधा हैं) और सुज्ञ जी को ईमेल से भेज रहा हूँ। अपने ब्लाग पर भी डाल रहा हूँ। और हंसराज जी, अन्तिम बार दुस्साहस करते हुए आपके ब्लाग पर सम्भवत: आज तक की सबसे लम्बी टिप्पणी करके जा रहा हूँ।मैंने अपने ब्लाग पर जो लिखा है, आपने उसे गलत समझा। ये रही मेरी गलती कि अपने ब्लाग पे मजाक-मजाक में कुछ लिखा और आप उससे इतने परेशान हो गए। मुझे यह तो अधिकार है ही कि मैं अपने ब्लाग पर शीर्षक क्या दूँ? महाशक्ति हो या आशा की परतें हर ब्लागर को इतना तो अधिकार है कि वह अपने ब्लाग का नाम क्या रखे। आप स्वयं का उदाहरण लें तो स्मार्ट इंडियन नाम रखने के लिए आपने किसी से नहीं पूछा।अब सुनिए एक कहानी तब आगे बढ़ता हूँ।सम्भवत: दादू की कहानी है यह। एक राजा था जिसे दादू से ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा हुई और वह दादू का शिष्य बनना चाहता था। घोड़े से गया दादू के इलाके में। उनकी कुटिया के पास एक बूढ़ा आदमी घास काट रहा था(घास काटना हमारी भाषा में घास गढ़ना कहा जाता है)। राजा ने उस आदमी से पूछा- दादू कहाँ हैं? उस आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया। राजा ने फिर पूछा और इस बार भी आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया। अब राजा गुस्सा गया। उसने तीसरी बार पूछा- दादू कहाँ हैं? इस बार भी जवाब नहीं देने पर राजा ने जोर से कहा- गूंगे हो क्या? और दो कोड़े बरसा दिए। तमतमाया हुआ कुटिया के अन्दर गया। वहाँ उसने दादू के बारे में पूछा तो किसी ने बताया कि बाहर घास काट रहे हैं। राजा बहुत पछताया और जाकर दादू के पैरों पर गिर पड़ा। माफी मांगते हुए उसने एक सवाल पूछा- दादू, आपने बताया क्यों नहीं कि आप ही दादू हैं? दादू ने जवाब दिया- जिस तरह शिष्य की परीक्षा होती है उस तरह गुरु को भी परीक्षा देनी चाहिए कि वह इस काबिल है कि नहीं?अब आपकी बात पर आते हैं। यह कहानी क्यों कहा, यह सोचने की चीज है।anvarat.blogspot.com/2011/06/blog-post_19.htmlhttp://zealzen.blogspot.com/2011/06/blog-post_22.htmlइन दोनों लिंकों पर मैंने बहस में भाग लिया था और वहीं की एक बात लेकर सुज्ञ जी ने लिखा है। सबसे पहले बात करेंगे सुज्ञ जी द्वारा मुझे कुछ बताए जाने की। उनका कहना है कि मैंने विचार शून्य और स्मार्ट इंडियन का अपमान किया है। नाम में आदर इसलिए क्योंकि दोनों के नाम ये नहीं हैं।हंसराज(अब बार बार जी नहीं लगा सकता) जी को किसने यह अधिकार दिया है कि वे सदाचार को बाँटे और वे भी महान ग्रन्थकार बनते हुए- आस्तिक सदाचार और नास्तिक सदाचार। सदाचार पर बहस चल चुकी थी और उसमें दिनेशराय द्विवेदी जी से मैंने अपनी सहमति अपने तर्कों से जताई थी। वहाँ कोई व्यक्तिगत आलोचना नहीं हुई थी इस बात को लेकर।

     
  39. चंदन कुमार मिश्र

    26/06/2011 at 1:07 पूर्वाह्न

    जारी हैसबसे पहले विचार शून्य ने लिखा_______________________________________23 June, 2011 20:24 VICHAAR SHOONYA ने कहा…आस्तिक सदाचार और नास्तिक सदाचार के बीच का फर्क. कौन सा वाला बेहतर है ? यहाँ मैं उन लोगों का पक्ष भी जानना चाहूँगा जो नास्तिक सदाचार के पालनकर्ता हैं._______________________________मैं हर बात का गरम और नरम जवाब देने की कोशिश करूंगा।यहाँ विचार शून्य के इस टिप्पणी का जिक्र इस लिया किया गया कि इस पूरे मुद्दे में आप, मैं, विचार शून्य और हंसराज सब शामिल हैं।तो यहाँ उस टिप्पणी से बात शुरु होती है लेकिन मुझे इससे कोई मतलब नहीं था।उसके बाद एक और टिप्पणी आई____________________Er. Diwas Dinesh Gaur ने कहा…हंसराज भाई साधुवाद…कल की बहस के परिणामस्वरुप बहुत कुछ आपसे सीखा| एक अम्न्थान हो गया| आस्तिक व नास्तिक के बीच के अंतर को आपने बखूबी समझाया है| आस्तिक की श्रेष्ठता निसंदेह नास्तिक से अधिक है|आभार…_________________________अब अगर आप शिक्षक हैं और शिक्षक के उपर बहस चले तो आपको अधिकार है कि आप इस बहस का हिस्सा बनें। ठीक उसी प्रकार मैं इस बहस का हिस्सा बना क्योंकि दिवस से मेरी बहस पहले भी हो चुकी थी।यह वाक्य इनका अहंकार दिखाता है कि आस्तिक की श्रेष्ठता निस्सन्देह नास्तिक से अधिक है। यह अहंकारी भाव है। यहाँ याद रहे कि राहुल सांकृत्यायन और भगतसिंह भी नास्तिक थे। मैंने जो बहस की है उसी तरह उन्होंने अपनी किताबों में की है। आप चाहें तो उपर वाले लिंक से भगतसिंह का प्रसिद्ध आलेख 'मैं नास्तिक क्यों हूँ?' पढ़ सकते हैं या आप पढ़ चुके होंगे।लेकिन मैंने दिवस की बात पर ध्यान नहीं दिया।तभी मैं इस ब्लाग पर आता हूँ। और टिप्पणी करता हूँ।

     
  40. चंदन कुमार मिश्र

    26/06/2011 at 1:08 पूर्वाह्न

    जारी है__________________चंदन कुमार मिश्र ने कहा…अच्छा तो आप फिर उसी मुद्दे पर हैं! अभी अभी पता चला। लेकिन मेरी बात का जवाब तो किसी ने दिया नहीं कि अपराधियों में से कितने नास्तिक हैं और कितने आस्तिक।दूसरी बात किसी नास्तिक की तुलना में हमेशा आस्तिकों के शत्रु कम होते हैं। क्योंकि वह वर्तमान व्यवस्था को स्वीकारता है लेकिन नास्तिक विद्रोह करता है। स्वयं के विवेक से चलता है दूसरों के विवेक के पास अपने विवेक को गिरवी नहीं रखता। आप अच्छे से जानते हैं कि राहुल सांकृत्यायन के शत्रु ज्यादा थे या विवेकानन्द के। आपकी दोनों बातों का कोई आधार है ही नहीं, कम से कम मैं जहाँ तक समझता हूँ। मैं औरों की तरह हाँ में हाँ मिलाता रहूँ तो सब ठीक होगा, तो यह मुझे मंजूर नहीं है। और यह भी जान लीजिए कि मैंने अपने चिट्ठे पर ईश्वर और धर्म को लेकर बहुत सारे आलेखों को लिखने की ठान ली है और आज शुरु कर चुका हूँ।24 June, 2011 20:42 _____________________यह मेरा अपना मत है। इससे किसी को सहमति या असहमति हो सकती है। निश्चित तौर पर कुछ हाथ की अंगुलियों पर गिने जाने लायक नास्तिक हैं जो हिंसा का बहुत क्रूर खेल खेल चुके जैसे स्टालिन, माओ(जैसा कि आपने कहा) लेकिन दुनिया में यातना शिविरों के लिए जाना जाने वाला हिटलर तो अपने को आर्य यानि श्रेष्ट कहता था, और ईश्वर की सत्ता में विश्वास भी करता था।यहाँ हंसराज ने कहा कि आस्तिकों के दुश्मन ज्यादा होते हैं लेकिन यह बात कितनी सही है, आप भी जानते हैं। दुश्मन तो परम्परा को तोड़नेवालों के होते हैं अधिक संख्या में न कि परम्परा में जीने वालों के। भारत में ऐसे एक नहीं सैकड़ों उदाहरण हैं। जैसे तुलसीदास को ही देखें तो उन्होंने परम्परा से हटकर किताब क्या लिख दी सारे पंडित उनके शत्रु बन गए। वैसे भी नास्तिकों की संख्या आप अच्छी तरह जानते हैं कि कितनी है? मैं जब भी बोलता हूँ तब भारत के संदर्भ में। इसलिए किसी अन्य देश से मेरे कहे का अर्थ नहीं जोड़ा जाय। मैं भारत से बाहर की बात करते समय बता दूंगा कि भारत से बाहर किसी दूसरे देश की बात कर रहा हूँ।अब वापस आते हैं अपनी बहस की कहानी पर।उसके बाद आप आते हैं इस टिप्पणी के साथ।_________________________Smart Indian – स्मार्ट इंडियन ने कहा…@आस्तिक सदाचार और नास्तिक सदाचार के बीच का फर्क. कौन सा वाला बेहतर है?ज़ाहिर है कि सदाचार सदाचार ही है आधार कुछ भी हो।

     
  41. चंदन कुमार मिश्र

    26/06/2011 at 1:09 पूर्वाह्न

    जारी है@अपराधियों में से कितने नास्तिक हैं और कितने आस्तिक।मुझे नहीं लगता कि ऐसी फ़िज़ूल स्टडी में कभी कोई संसाधन लगाये गये होन्गे। कॉमन सैंस से कहूँ तो नास्तिकों का प्रतिशत अपराधियों में भी कमोबेश उतना ही होगा जितना सदाचारियों में@भय से धार्मिक दुकानदारी खूब चमकाई जाती है। भय से सांसारिक दुकानदारी भी खूब चमकाई जाती है, ये अस्पताल, बीमा आदि क्या हैं?@निशांत,तुम्हारी बात सबसे अच्छी लगी। तुम जैसे लोग धार्मिक आचरण वाले नास्तिक कहे जायेंगे। भारतीय परम्परा में आस्तिक-नास्तिक की कोई समस्या नहीं है। समस्या तब आती है जब दो क्रूर और अति-असहिष्णु वर्ग (धर्मान्ध और धर्महंता) सात्विक (आस्तिक और नास्तिक) वर्गों की आड में अपना उल्लू सीधा करते हैं। इन मौकापरस्तों को अपनी असलियत ज़ाहिर करने का साहस नहीं होता है इसलिये नास्तिक/आस्तिक की आड लिये रहते हैं मगर सच्चाई कब तक छिप सकती है?25 June, 2011 05:55________________________________________यह आपकी सोच है। मुझे इसमें कुछ मतभेद दिखाई पड़े तो टिप्पणी करना मैंने आवश्यक समझा। आपकी पहली बात का मुझसे कोई संबंध नहीं है।दूसरी बात आपने मेरे सवाल को फालतू स्टडी करार दिया। और कामन सैंस से आपने जो कहा वह गलत है क्योंकि अपराधियों या कैदियों की गिनती कर लें तो पता चल जाएगा कि ज्यादा अपराधी कौन होता है? लेकिन आपको अपनी बात रखने का पूरा पूरा अधिकार था। यह भी ठीक था। मैं कहूँ तो आप बुरा मानेंगे जैसे मैंने किसी काम को मूर्खता करार् दिया उसी तरह आपने मेरे सवाल पर फालतू स्टडी का विचार रखा। किसी के विचारों के अपमान का(अगर इससे अपमान होता है तब) पहला काम आपने शुरु किया। लेकिन फिर भी सुज्ञ को आप सही लगे। उनके विचार से निश्चय ही मैं गलत रुख अपनाता हूँ जब किसी को मूर्खता वाली बात करने वाला कह देता हूँ(जिसे सीधे-सीधे मूर्ख भी कह सकते हैं लेकिन शब्दों की चालाकी से हँसने या मूर्खता की बात कह दिया जाता है) और इस हिसाब से आप मेरे प्रति बुरा शब्द इस्तेमाल करनेवाले पहले आदमी हुए(हम दोनों के बीच में)। आप कल्पना कीजिए कि कोई वैज्ञानिक जोंक पर शोध कर रहा है और उसे कहें कि आप फालतू स्टडी कर रहा है, बस समझ में आ जाएगा कि अच्छा लगेगा। अगर आप उसकी जगह हों और आपको यह अच्छा लगे तो आप महान हैं और मैं इतना महान नहीं। अगर मैं पूछूँ कि आप होते कौन हैं यह कहने वाले की मेरी बात या मेरे विचार या तर्क फालतू स्टडी से संबन्धित हैं, तो कैसा लगेगा?

     
  42. चंदन कुमार मिश्र

    26/06/2011 at 1:09 पूर्वाह्न

    जारी हैअब आपकी दूसरी बात आती है कि भय से सांसारिक दुकानदारी भी खूब चमकाई जाती है। मै जानना चाहता हूँ( और यही मान कर चलता हूँ कि भारत के ही बारे में ही बात की जा रही है क्योंकि सभी ब्लागर भारत के हैं) कि बीमा और अस्पताल में कितने नास्तिक लोग काम करते हैं। इन सबको या नास्तिक शब्द के मेरे लिए क्या अर्थ हैं, यह जानने के लिए आप अनवरत ब्लाग को पढ़ लें(अगर चाहें तो)। भारत के कितने प्रतिशत अमीर लोग, बीमा से सम्बन्धित लोग, अस्पताल से संबन्धित लोग ईश्वर पर यकीन नहीं करते हैं। बजाज से लेकर गाँ व के भारतीय जीवन बीमा निगम के अभिकर्ता तक, सभी लगभग सभी आस्तिक हैं। आप याद रखें कि भारत में नास्तिक दर्शन से संबन्धित लोगों ने भी कोई गलत काम नहीं किया जैसे चार्वाक, बहुत हद तक बुद्ध और महावीर या आधुनिक काल के राहुल जी या शहीद-ए-आजम भगतसिंह आदि। अब आप लेनिन का उदाहरण नहीं चिपकाएँ क्योंकि भारत के संबंध में बात हो रही है और अगर यह बात पहले नहीं समझ सके तो आपने पूछा नहीं और मैंने बताया नहीं।(आपकी भूल कि आपने अपने से अर्थ निकाला और मेरी भूल कि इस ओर मैंने ध्यान नहीं दिलाया) आपसे आग्रह है कि अगर आप मेरे लिए नास्तिकता आदि का अर्थ जानना चाहते हैं तो आपको अनवरत पढ़ना ही होगा।अब अगली टिप्पणी जब आपने निशान्त के लिए की। तो मैं खुश हुआ आपके विचारों में मानव का उज्जवल पक्ष देखकर लेकिन आपकी भाषा और संकेत(जैसा कि मैं समझा) मुझे अच्छे नहीं लगे। धर्मान्ध और धर्महन्ता कहकर आपने अपने शब्दों का कैसा प्रयोग किया यह तो आप ही जानते हैं लेकिन मैं इसे आपकी सोच से समझ नहीं सकता था क्योंकि आप मेरी भावनाओं को नहीं समझ सकते थे। भारतीय परम्परा में आस्तिक-नास्तिक की कोई समस्या नहीं है। यह वाक्य क्या है? आप इसे क्या कहेंगे। ग्रन्थों में जो लिखा है उससे हटकर आपने खुद ही विचारधारा स्थापित कर ली है। जबकि भारत वह पहला देश है जहाँ चार्वाक नास्तिकता का दर्शन उठाते हैं। वेदों, स्वर्ग, ईश्वर और आत्मा आदि की निंदा करते हैं। भारतीय परंपरा पर अपने आपको या अपनी बात को ब्रह्मवाक्य मानना मुझे बुद्धिमानी नहीं लगी।धर्महन्ता, अति-असहिष्णु, उल्लू सीधा करना, मौकापरस्त, आड़ लेना ये सारे शब्द आपकी सभ्य शब्दावली के नमूने थे। भगतसिंह का लिखा मैं नास्तिक क्यों हूँ? पढ़ें। मैं आपको भगतसिंह से ज्यादा महत्व नहीं दे सकता। उन्होंने जब लिखा तब वे किस मौके की तलाश में थे, कहाँ से वे उल्लू सीधा कर रहे थे, वे अति-असहिष्णु थे , मैंने तो आपक्से शब्दों का यही अर्थ लगाया। और यह कहीं से कोई अपराध नहीं है क्योंकि हरि का अर्थ एक जगह बन्दर और दूसरे स्थान पर साँप लगाना कहीं से गलत नहीं हैंमैं शहीदों का, सच्चे लोगों का अपमान नहीं सहते हुए आपके उपर कड़ी टिप्पणियाँ कर गया। अब इसकी वजह देखिए।अपमान क्यों सहूँ जब आप भगतसिंह और राहुल सांकृत्यायन से न तो बुद्धिमान हैं और देश सेवी हैं। जाहिर है आप गदर पार्टी की स्थापना के लिए अमेरिका में नहीं रह रहे हैं कि आपकी तरफ़दारी करता। न उनके इतनी आपकी हैसियत है। आप होंगे बड़े ब्लागर या चिन्तक देश को फर्क क्या पड़ता है इससे। यहाँ याद रखा जाय कि मेरे लिए भारत का अर्थ 90 करोड़ लोग हैं और बहुत बाद में किनारे पर 30 करोड़(ये सब घोर आस्तिक होते हैं और बेचारे 90 करोड़ लोग इन सबके जाल में फँसे हुए हैं)। अब मैं इतनी कड़ी(मैं तो नहीं मानता कि इतनी कड़ी) टिप्पणियाँ कर गया तो इसके पीछे वजह एक नहीं है। आप देख रहे हैं आपने भारतीय परम्परा का उत्तराधिकारी समझना बिलकुल ठीक नहीं, चाहे आपके साथ पूरा संसार खड़ा हो जाय, हिन्दी ब्लाग-जगत तो बहुत छोटा है।

     
  43. चंदन कुमार मिश्र

    26/06/2011 at 1:10 पूर्वाह्न

    जारी हैअब सोचते हैं कि कब कोई कड़ी टिप्पणी करता है? शायद आप समझ सकते हैं क्योंकि आप मुझसे बड़े हैं(उम्र में इसका मतलब ये तो नहीं कि मैं आँख मूँद कर आपके चरणस्पर्श करता रहूँ)। या लीजिए यह भी अपनी समझ से रख देता हूँ। अगर आपको कोई बार-बार आपका नाम पूछे, तो कैसा महसूस करेंगे? झल्लाना कही से जायज नहीं। यानि जब आपकी विचारधारा का कहीं टकराव होता है और वह भी पुनरावर्ती बातों से तो आपमें क्रोध पैदा होना चाहिए नहीं तो या तो आप गीता में वर्णित स्थितप्रज्ञ हैं या स्वयं समझ लें। यही बात मेरे उपर भी लागू होती है। आपके विचारों में टकराव हो तो यह अच्छा भी है क्योंकि इससे मालूम होता है कि आप सोच रहे हैं और चेतन हैं वरना जड़ की स्थिति हो जाएगी। या दूसरी स्थिति है कि आप थोड़े कड़े शब्द बोलने के आदी हैं। मैं किसी को कोई गाली कभी नहीं देता। यहाँ तक सर्वव्यापी साला शब्द भी मेरे मुँह से नहीं निकलता। इसलिए मैं कम से कम इतना तो कह ही सकता हूँ कि मैंने आपको गाली नहीं दी। लेकिन जैसा कि आपने इस्तेमाल किए हुए पाँच-छ: शब्द देखा, आप समझते होंगे कड़ी टिप्पणी या कटु शब्द किसने शुरु किया। तो इससे इतना तो मुझे भी अधिकार मिलता है कि थोड़े से कटु शब्द मैं भी इस्तेमाल कर सकूँ(अगर लगे)। लेकिन हंसराज को इन शब्दों में कुछ कुटिलता नहीं दिखाई देती लेकिन मेरे शब्दों में दिखाई देती है तो मुझे नहीं लगता कि हंसराज की सोच पर मैं अपना माथा पीटूँ!अब आगे बढ़ते हैं।फिर मैंने टिप्पणी की________________ चंदन कुमार मिश्र ने कहा…श्रीमान स्मार्ट इंडियन,असहिष्णुता का अर्थ मालूम है? वैसे भी विदेश में रहनेवालों को कोई महत्व नहीं दिया जाना चाहिए क्योंकि यहाँ से भागकर अपने देश को अंगूठा दिखाकर झूठ-मूठ काबिल बनने से क्या होता है जनाब? कितने अस्पताल और बीमा में नास्तिक लोग हैं? कामन सैंस लगाते हैं। आपने दूसरे देशों को छोड़िए भारत में ही कितने नास्तिकों को देखा है? भारत में एक करोड़ लोग भी नास्तिक नहीं है। यानि अपराधी अक्सर क्या होते हैं, खुद समझ लीजिए। आपको नास्तिकता और आस्तिकता की समझ नहीं है, ऐसा मुझे लगता है,आप मुझे ऐसे नास्तिकों की गिनती बताइए जिन्होंने संसार को खराब किया और ऐसे आस्तिकों की गिनती खुद कर लें जिन्होंने देश और संसार को क्या दिया?25 June, 2011 06:49 __________________

     
  44. चंदन कुमार मिश्र

    26/06/2011 at 1:11 पूर्वाह्न

    जारी हैमैं कह चुका हूँ कि 'इन मौकापरस्तों को अपनी असलियत ज़ाहिर करने का साहस नहीं होता है इसलिये नास्तिक/आस्तिक की आड लिये रहते हैं मगर सच्चाई कब तक छिप सकती है?' इस वाक्य ने मेरे जैसे विचार वाले को क्या माना है, आप खुद जानते हैं(भले ही आस्तिक शामिल हैं लेकिन अगर कोई कहे कि हर भारतीय चोर होता है तो आपको बुरा नहीं लगेगा क्या?, कम से कम जो चोर नहीं हैं उनका तो फर्ज बनता है कि वे बताएँ और जवाब दें)। यह कहाँ से गलत हो गया? मेरी नजर में इसमें रत्ती भर गलती नहीं है।अब विचार करते हैं आपकी बात पर बिंदुवार।___________________________@ श्रीमान चंदन कुमार मिश्र आपने जो प्रश्न पूछे, मैंने सदाशयता से उनका उत्तर देने का प्रयास यह सोचकर किया कि आप वाकई उत्तर जानने में उत्सुक हैं। मगर आपके जवाबों की तिलमिलाहट और व्यक्तिगत आक्षेप एक दूसरी ही कहानी कह रहे हैं। आपके ऐटिट्यूड ने काफ़ी निराश किया। मेरे पास फ़िज़ूल बातों के जवाब देते रहने का समय नहीं है फिर भी एक बार हर किसी को अवसर देने का प्रयास अवश्य करता हूँ इसलिये इस बार के सवालों के उत्तर अवश्य दे रहा हूँ, आगे की कोई गारंटी नहीं है।_______________________________चलिए अपने को सदाशयी माना। मेरी बातें फिजूल हैं। आप किसी को अवसर भी दे सकते हैं यानि आप इस लायक अपने को मानते हैं कि आप लोगों से हटकर कोई महान व्यक्तित्व हैं।आत्मप्रशंसा और दूसरे की बातें फिजूल! अच्छा विचार है। विद्वान होंगे आप। किताबें, कविताएँ सब लिखी होंगी आपने लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि गाँधी के निर्मल चरित्र वाले हैं। मैकाले भी कम विद्वान नहीं था। उसकी किताबें इंग्लैंड में इतिहास पर बहुत महत्व की मानी जाती हैं। लेकिन भारत उसके द्वारा किए घृणित कार्यों(शायद महान लोगों की नजर में प्रशंसनीय और महान कार्य) से, उसके द्वारा उठाए गए कदमों से जानता है कि मैकाले कितना दयावान और महान था। मेरे नजरिये ने नहीं ऐट्टिट्यूड ने आपको निराश ही नहीं किया, काफी निराश किया और आपके द्वारा दिए गए पाँच विशेषणों ने मुझे काफी खुशी प्रदान की! अब आगे

     
  45. चंदन कुमार मिश्र

    26/06/2011 at 1:12 पूर्वाह्न

    जारी है_______________@असहिष्णुता का अर्थ मालूम है?नहीं जी, क्षमा कीजिये। इस सभा में एक आप ही महापण्डित हैं, विस्तार से समझाइये, जिन पर समय होगा वे सुन लेंगे। वैसे निष्पक्ष होकर देखने वालों को "असहिष्णुता" का अर्थ आपके उपरोक्त सवाल में ही मिल जायेगा।________________________अब मैंने कहा कि असहिष्णु का अर्थ मालूम है? क्यों कहा, क्या आप यह सोच भी नहीं सकते थे? बस बौखलाहट में आप भी जवाब दे गए(कम से कम आप तो हंसराज और अन्य लोगों की नजरों में तो विद्वान और अग्रिम पंक्ति के ब्लागर हैं, मैं तो मूर्ख और दुष्टात्मा हूँ)? क्या आपने यह कहकर समूचे अनीश्वरवादियों को कायर, छिपने वाला और असहिष्णु नहीं कहा? और अगर कहा तो मेरा प्रश्न किस हिसाब से गलत है? मुझे महापंडित करार देकर आपने यह तो बता ही दिया कि आप भी टेढ़ी बात करते हैं और जब ऐसा है तब अपने को किसी से महान और सदाशयी कैसे कह सकते हैं? वैसे यह मामला निजी है। कितने लोग मैकाले को भी महान कहते हैं। यहीं नहीं आपने मुझे अप्रत्यक्षत: पक्षपाती भी कहा। (अब कह दीजिए कि मैं बाल की खाल निकाल रहा हूँ क्योंकि प्रथम पंक्ति के विद्वान ब्लागर हैं और सारे लोग या मैं निम्न पंक्ति का)। यानि आपने एक और विशेषण प्रदान किया। कोई यह नहीं मानेगा कि व्यंग्यात्मक लहजे में कही गई बात आपको निष्कपट साबित करती है। मैं तो हूँ कपटी और अहंकारी, आप सबों की दृष्टि में। जब आदमी टेढ़ी बात बोले तो वह निर्मल ह्रदय वाला हो ही नहीं सकता, कम से कम उस वक्त जिस वक्त वो तीखी बात बोल रहा है।अगर आपने असहिष्णु कहा और मैंने आपसे इतना ही पूछा कि इसका अर्थ मालूम है? वह भी प्रश्नवाचक चिन्ह के साथ यानि सवाल पूछा जा रहा है। लेकिन यह बात आपको इतनी खली आपने अपने अहं की पुष्टि के लिए मुझे महापंडित कह दिया।अब आगे

     
  46. चंदन कुमार मिश्र

    26/06/2011 at 1:12 पूर्वाह्न

    जारी है___________________________@ वैसे भी विदेश में रहनेवालों को कोई महत्व नहीं दिया जाना चाहिएआप वाकई गम्भीर हैं? जब आप प्रधानमंत्री बन जायें तब सम्विधान में ऐसा लिखा दें। अगर अंग्रेज़ों की जगह आपका राज होता तो शायद गान्धीजी जैसों के बारे में यही प्रचारित कर रहे होते। BTW, Who are you to decide it? A self-proclaimed arrogant future PM? The world has already seen many dictators, can't tolerate anymore. ____________________________________________अब दूसरी बात कि मैंने विदेश की बात की तो खुद गाँधीजी से तुलना(अप्रत्यक्ष ही सही) कर ली। अच्छा है तुलना घटिया लोगों से नहीं ही करनी चाहिए। जब आपने सवाल पूछा कि क्या मैं वाकई गम्भीर हूँ तो आपने जवाब का इन्तजार किया? लेकिन यहाँ भी आपने द्वेषपूर्ण रवैया अपनाते हुए फिर सुझाव के साथ व्यंग्य कसा। एक बात कहूँ तो बुरा लगेगा और लगना ही चाहिए। जब हिन्दी प्रदेश में शराबी शराब पी लेता है तब वह अंग्रेजी झाड़ना शुरु कर देता है। जब आप यह फैसला कर सकते हैं कि कौन असहिष्णु है और कौन दयालु, कौन मौकापरस्त है और कौन नहीं, कौन क्रूर है और धर्महन्ता तो मुझे यह अधिकार कैसे नहीं है कि विदेशी भारतीय(मतलब विदेशों में रहनेवाले भारतीय- आप चाहें तो नाराज हो सकते हैं क्योंकि मैं कुटिलता से अपनी बात कहता हूँ, यह आपके शुभचिन्तक हंसराज ऐलान कर चुके हैं और इसलिए मैं कितनी भी टेढ़ी बात करूं, इसमें कुछ बुरा नहीं क्योंकि बुरा आदमी तो बुरा ही कहेगा) के उपर अपने विचार रखूँ? है कोई जवाब? क्या आप तय करेंगे कि मैं क्या सोचूँ और क्या नहीं? जब आप इसके लिए स्वतंत्र हैं कि किसी को साहस नहीं करने वाला करार दें(चाहे वह जिस तरह कहा गया है। कहा तो किसी आदमी के लिए ही है) तो मैं क्यों नहीं?यह तो वैसी ही बात हुई कि आप जो कहें वह सही और मै जो कहूँ वह गलत। यह एकांगी सोच कौन रखता है- मैं या आप? यहीं नहीं रुके आप। अभी और कहते जा रहे हैं कि मैं तानाशाह हूँ(या बनना चाहता हूँ)। इतना ही नहीं आप मुझे मेरी इच्छाओं पर रोक लगाने जैसी बात सोच रहे हैं। एक स्वघोषित अहंकारी भावी प्रधानमंत्री – यही कहा है न आपने। जब आप व्यक्तिगत टिप्पणी कर सकते हैं तो और कोई क्यों नहीं। क्या आप अपने को बादशाह समझते हैं। यह भ्रम छोड़ दीजिए जनाब। आपको झेलने को कौन कहता है? आप इतने परेशान दिखते हैं सिर्फ़ मेरे ब्लाग के एक छोटे से शब्द-समूह से। आपमें कितना धैर्य है, इसका अन्दाजा है आपको(मैं अवगुणी हूँ, यह याद रखें इसलिए यह अपेक्षा आपसे और सिर्फ़ आपसे कर रहा हूँ)? गाँधी वहाँ गए थे गुलामी के दौर में अपने पिता के भेजने के कारण और आप भूल रहे हैं कि वकालत के पढ़ाई की तत्कालीन राजधानी भारत न होकर इंग्लैंड थी। वह पैसे कमाकर इंग्लैंड को देने नहीं गए थे। यह बात भी मालूम होनी चाहिए। उस समय भारत की असली राजधानी यानि केंद्र दिल्ली नहीं इंग्लैंड है, क्या यह याद नहीं आपको? निश्चित रुप से मैं नहीं जानता कि आप वहाँ क्या करते हैं, लेकिन इतना मालूम है भारत को कोई लाभ नहीं पहुँचाते हैं। अगर मेरी बात झूठ साबित करनी हो तो बताइए कि देश को क्या क्या दिया है आपने? मुझसे यह सवाल पूछने के पहले बता दूँ कि अभी मैं छात्र हूँ और जीवन का छात्र हमेशा रहूंगा, विद्वानों का कभी नहीं। जब लोग अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं कि भारत-अमेरिका परमाणु करार सही है या गलत तो आप कौन होते हैं मुझे इस बात पर सोचने से रोकने वाले कि विदेशों में जाना भारत के लिए फायदेमंद है या नहीं?यह आपकी तानाशाही सोच को दर्शाता है मेरी नहीं। इतना काफी होगा। आगे देखते हैं

     
  47. चंदन कुमार मिश्र

    26/06/2011 at 1:13 पूर्वाह्न

    जारी है_______________________@क्योंकि यहाँ से भागकर अपने देश को अंगूठा दिखाकर झूठ-मूठ काबिल बनने से क्या होता है जनाब?आप मुझे जाने बिना मेरे बारे में इतनी बडी बात कह रहे हैं कि यदि आप कभी अपनी बात के खोखलेपन को जानने लायक परिपक्व हुए तो अपनी उद्दंडता पर शर्म करेंगे। और अगर मुझे जाने बिना ही आपको यक़ीन है कि मैं किसे अंगूठा दिखाकर कैसे भागा हूँ तो फिर आप जैसे आदमी से बात करके मैं ही नहीं शायद बहुत से अन्य लोग अपना वक़्त बर्बाद कर रहे हैं क्योंकि वार्ता की भी एक मर्यादा होती है। "झूठ-मूठ काबिल बनने" और "सचमुच काबिल बनने" का परीक्षण कहाँ होता है और उसके प्रमाणपत्र कहाँ मिलते हैं, यह भी बताते जाते तो शायद आगे से लोग आपकी बहस में प्रमाणपत्र लेकर ही घुसेंगे। _____________________________________________इस सवाल का जवाब तो देना अभी भी आसान है लेकिन आपकी बात रह जाय इसलिए आप अपना विस्तृत परिचय बता दें। अब कहिएगा कि क्यों बताऊँ, तो मत बताइए। देश के सुधार के लिए आपने क्या किया है? अंगूठा दिखाकर भागने का मतलब यह था कि भारत में पढ़ लिखकर विदेशों में भागने का कोई आवश्यक कारण आपके लिए नहीं दिखा। आप ऐसे वैज्ञानिक भी नहीं कि अमेरिका में ही शोध कर सकें और उस शोध के लिए भारत में कोई व्यवस्था नहीं है।जब भारत का एक आदमी विदेश भाग जाता है(जी हाँ, भाग जाता है) तब इस देश के पास एक दिमाग और दो हाथ कम हो जाते हैं। यह परम सत्य याद रखें जनाब।अगर आपको इन जवाबों से फिर भी इस सवाल के जवाब से संतुष्टि नहीं मिले तो (जी हाँ सिर्फ़ इस सवाल के लिए) मैं आपसे माफ़ी मांगता हूँ। मैं माफ़ी चाहता हूँ कि मैं एक नहीं सौ भगतसिंह के बराबर एक आदमी से बात कर रहा हूँ और मैं खुद एक भगतसिंह के अरबवें हिस्से में नहीं आता।झूठ-मूठ काबिल बनने का अर्थ अब साफ हो गया होगा, जहाँ तक मैं समझता हूँ।इस सवाल का जवाब ज्यादा नहीं।

     
  48. चंदन कुमार मिश्र

    26/06/2011 at 1:13 पूर्वाह्न

    जारी हैअब अगले सवाल पर__________________________@आपको नास्तिकता और आस्तिकता की समझ नहीं है, ऐसा मुझे लगता हैआपके लगने से इस ब्रह्माण्ड को कोई फर्क पडने वाला है क्या? ब्रह्माण्ड के अनंत काल में आपका यहाँ अस्तित्व है ही कितनी देर का? आपकी सारी बहस कुछ एक दशकों में मिट्टी होने वाली है। याद रखिये एक शताब्दी के अन्दर न आप यहाँ होंगे न ऐसा एक भी व्यक्ति जिससे बहस करके आप अपने अहम को पोषित कर रहे हैं। आप नास्तिक हैं तो रहिये। Who cares! लेकिन अगर स्टालिन, माओ जैसे तथाकथित नास्तिक तानाशाहों की तरह सारी दुनिया को ज़बर्दस्ती धर्मविरोधी बनाना चाहेंगे तो याद रहे कि उनके सपने भी उन्हीं के साथ दफन हो गये। ___________________________________________आप कैसे कह सकते हैं कि मैं सारी दुनिया को धर्मविरोधी, वह भी जबरदस्ती बनाना चाहता हूँ? हर बार ऐसा लगता है कि आपके अहंकार को जबरदस्त ठेस पहुँचने से बौखलाए हुए हैं। इस बार के सवाल में आप प्रवचन करते नजर आ रहे हैं। आपको मेरे नास्तिक होने की चिन्ता करने की क्या जरूरत आन पड़ी कि हू केयर्स का अंग्रेजी वाक्य चिपका गए। आप अंग्रेजी का प्रकोप बार-बार झेलते हुए नजर आते हैं। मैं भी झेलते हुए नजर आता हूँ लेकिन अपनी जिंदगी में अंग्रेजी को घटाने पर लगा हुआ हूँ। माओ के सपने को छोड़िए लेकिन चीन याद रहे और आप इतने महान हैं तो चीन से अपनी जमीन(गलती हो गई, अपनी नहीं भारत देश की)छीन कर या मांगकर ला देते हैं?माओ की बदौलत ही आज चीन आज का चीन है। स्टालिन मरा तो क्या हुआ? आपको कौन याद रखेगा, स्टालिन आपसे ज्यादा मायने रखता है। ब्रह्मांड में न तो मैं ज्यादा दिनों का मेहमान हूँ और न आप लेकिन आप मुझपर ही वाक्य झाड़ रहे हैं, झाड़ लीजिए, जितना मन हो क्योंकि मन का गुबार निकाल ही लेना चाहिए। क्यों? और मेरे इस बात का कि मुझे लगता है कि आस्तिकता और नास्तिकता की समझ आपको नहीं है, यह जवाब भी नहीं है जो आपने दिया है। कहीं से नहीं एक प्रतिशत भी नहीं।जब मैंने अपनी क्षमता स्वीकार करते हुए कहा कि मुझे लगता है और आपने कहीं अपने को ज्ञानी समझने से ऐतराज नहीं किया, तो खुद सोच लें कि अहंकारी कौन है?हाँ आपने कहा कि स्टालिन, माओ की तरह यानि आप फिर अपनी मशीन से मेरे वाक्य और मेरे दिमाग का हिसाब-किताब कर रहे हैं। यह आप कैसे सोच सकते हैं जबकि मैंने स्टालिन और माओ का नाम तक नहीं लिया।

     
  49. चंदन कुमार मिश्र

    26/06/2011 at 1:14 पूर्वाह्न

    जारी हैआपको नास्तिकता से और आस्तिकता से कोई झगड़ा तो है नहीं और अन्त में कह क्यों डालते हैं आप नास्तिक हैं तो रहिये। Who cares! यहीं आपकी पोल पट्टी और असलियत सामने आ जाती है कि आप सारे बहस करने वालों के प्रतिनिधि जैसे स्वर में अपना निर्णय सुना डालते हैं। जिस बहस में नास्तिक आस्तिक अपनी अपनी बात कह रहे थे(भले ही कुछ तीखे स्वर में वह भी हमेशा नहीं) उसका नेता बनकर अपना यह फैसला सुनाया क्यों आपने जब आपको कोई चिन्ता नहीं है?और जहाँ तक लगने की बात है शायद आपके लगने से कुछ फर्क पड़ जाता है या कुछ भविष्य में हो जाये, क्यों? अब आगे बढ़ते हैं________________________________@ऐसे नास्तिकों की गिनती बताइए जिन्होंने संसार को खराब किया और ऐसे आस्तिकों की गिनती खुद कर लें जिन्होंने देश और संसार को क्या दिया?अगर अभी तक आपने खुद ही इस सवाल का उत्तर नहीं ढूंढा, तो अभी बहसों में पडने से पहले थोडा होमवर्क कीजिये। फिर भी एक क्लू देता हूँ कि हिंसक कम्म्युनिस्ट तानाशाह, विचारक और उनके रक्त-पिपासु चमचे अपने को नास्तिक ही कहते रहे हैं। गिनना शुरू कर दीजिये।जय राम जी की! खुदा हाफिज़। गुड बाय (यह गुड भी गॉडली ही है)25 June, 2011 08:55__________________________________________दुनिया के 50 से ज्यादा देशों पर राज करने वाले, भारत के दस लाख से ज्यादा क्रांतिकारियों को जान से मारने वाले, भारत से खरबों लूट ले जाने वाले आस्तिक थे और वे थे अंग्रेज? भारत पत आज तक जितने आक्रमण हुए हैं उनमें 1962 के चीनी आक्रमण के अलावे कोई आक्रमण शायद ही ऐसा रहा है जब आक्रमणकारी आस्तिक न हो। बलात्कार को मैं हत्या से बड़ा जुर्म मानता हूँ। और संसार के सारे बलात्कारी में से कितने नास्तिक हैं, यह बताइए?वैसे मैं साफ कहना चाहता हूँ कि नास्तिक का मतलब भले ही ईश्वर से है लेकिन मानवता नास्तिकों में ज्यादा है। इस बात का प्रमाण चाहिए तो बताऊँ कि आपने कितने लोगों के नाम लिए स्टालिन, लेनिन, माओ जैसे कितने नाम हैं इतिहास में। लेकिन ईसाई अंग्रेज, आतंकवादी के लिए मशहूर(मेरा मतलब सिर्फ़ आतंकवादी से है) धर्म, परमाणु बम बनानेवाले और गिरानेवाले सब आस्तिक ही तो थे या हैं। फिर भी एक क्लू देता हूँ कि हिंसक कम्म्युनिस्ट तानाशाह, विचारक और उनके रक्त-पिपासु चमचे अपने को नास्तिक ही कहते रहे हैं। गिनना शुरू कर दीजिये।

     
  50. चंदन कुमार मिश्र

    26/06/2011 at 1:15 पूर्वाह्न

    जारी हैयह वाक्य आपकी मानसिकता और निशान्त की मानसिकता को साफ करती है। निशान्त ने कहा था कि नास्तिक को पापी और दुष्ट ही माना जाता है और वहाँ तो भाषण दे रहे थे आप और यहाँ वही बात दुहरा बैठे। कब तक छलिए खुद को। और हाँ विश्वविजेता बनने का ख्वाब देखने वाले – सिकन्दर, हिटलर, अंग्रेज, चंगेज खाँ, नेपोलियन सब आस्तिक थे। इससे तो पता चलता ही है कि साम्राज्यवाद कौन चाहता है, पूँज़ीवाद, लूट, शोषण कौन चाहता है? कम्युनिस्ट बेशक हिंसक रहे हैं (हालांकि 100 प्रतिशत सही नहीं कह सकते) लेकिन कितने नास्तिक को आप जानते हैं जिसने दुनिया में खुद को तानाशाह या साम्राज्य का सम्राट बनाने की कोशिश की। सबसे सफल और भारत से जुड़ा मामला अंग्रेजों का हैं। वे ईसाई धर्म को मानते हैं और आस्तिक हैं। निस्संदेह हिंसा का निंदक हूँ मैं लेकिन उसी रुप में जैसे भगतसिंह ने हिंसा की निंदा की है। यह भी बता दूँ शाकाहारी हूँ जिससे मालूम हो जाय कि हिंसा का मेरे जीवन में क्या स्थान है? अब आगे और तमाशा देखिए।____________________________VICHAAR SHOONYA ने कहा…सुज्ञ जी, चन्दन कुमार मिश्र जी किस बहस की बात कर रहे हैं , क्या कुछ लिंक मिलेगा. @चन्दन जी अपने नाम के विपरीत आप गरम दल के मालूम होते हैं. आपको मुफ्त में एक सलाह दूंगा (वैसे मुफ्त में भी दो की चाह रखेंगे तो दो सलाहें भी दे दूंगा). किसी भी विषय में वाद विवाद करते वक्त किसी पर भी व्यक्तिगत आक्षेप करने से पहले कम से कम दस दुसरे ब्लोग्स पर जाकर टिप्पणियां कर लिया करें. आपका क्रोध शांत हो जाया करेगा.25 June, 2011 10:18 चंदन कुमार मिश्र ने कहा…नाटक में एक और पात्र! विचार शून्य जी। अहा!25 June, 2011 10:24 चंदन कुमार मिश्र ने कहा…anvarat.blogspot.com/2011/06/blog-post_19.htmlhttp://zealzen.blogspot.com/2011/06/blog-post_22.htmlवैसे नाम बड़ा अच्छा रखा है विचार शून्य जी। लीजिए लिंक और तमाशा देखिए।25 June, 2011 10:33 __________________________

     
  51. चंदन कुमार मिश्र

    26/06/2011 at 1:15 पूर्वाह्न

    जारी है।विचार शून्य का नाम और तस्वीर बहुत अच्छी लगी। इसलिए बोला कि नाम बड़ा अच्छा रखा है लेकिन इस हंसराज महाराज को इसमें अपनी नजर के चलते अपमान दिख गया।विचार शून्य को मैंने कहीं से एक भी बुरी बात नहीं कही न ही किसी किस्म का अपमान किया है। मैंने यह कहा कि नाटक में एक और पात्र तो उसके पीछे मेरा कोई गुप मतलब नहीं था। लेकिन हंसराज जी हंस हैं नीर क्षीर विवेक तो है ही, पहचान लेंगे।विचार शून्य को मैंने लिंक दे दिया, उन्होंने कहा था कि किस बात की बहस हो रही है? बस इस बात से भी हंसराज जी पर पहाड़ टूट पड़ा।मैंने कभी किसी एक आदमी के लिए इतना लम्बा जवाब नहीं लिखा। _______________________________सुज्ञ ने कहा…चंदन कुमार मिश्र जी,आप विद्वानों की सभा में अभिव्यक्ति के योग्य ही नहीं है।आपको यह भी नहीं पता चर्चा कैसे की जाती है।श्रीमान अनुराग शर्मा जी(स्मार्ट इन्डियन)प्रथम पंक्ति के विद्वान ब्लॉगर है। वे विदेश में होकर भी भारतीय संस्कृति के पुरोधा है। पहले उनके ब्लॉग पर जाकर उनके व्यक्तिव को देखों, उनके सामनें खुद बौने नजर आओगे। आपका दुस्साहस कैसे होता है वैचारिक चर्चा में व्यक्तिगत मिथ्या प्रलाप करने का।और दीप पाण्डेय जी (विचार शून्य) भी एक विशिष्ठ चिंतक है। उनके मौलिक विचारों को जानिए फिर किसी के बारे में कहनें की हिम्मत करिए।मेरा ब्लॉग विद्वानों के अपमान के लिए नहीं है। वे विद्वान भी जो मेरे विचारों से विपरित विचार ही क्यों न रखते हो।मैं नास्तिकों का पूरा सम्मान करता हूँ। बस उनकी विचारधारा पर चिंतन करना ही इस तरह के लेखों का उद्देश्य होता है। किन्तु आप जैसी तुच्छ सोच अगर सभी नास्तिकों की होती हो तो नास्तिकों से घृणा होना स्वभाविक है। आप इस ब्लॉग पर चर्चा के लिये गैर-लायक है। यहाँ दोबारा न रूख न करें।मैनें आज तक किसी ब्लॉगर का अपमान नहीं किया। आप बिना शर्त अनुराग जी से माफ़ी मांगे। और यहां दोबारा न पधारें।25 June, 2011 11:24 सुज्ञ ने कहा…आदरणीय अनुराग शर्मा जी एवं मान्यवर दीप पाण्डेय जी,मेरी नेट पर अनुपस्थिति में द्वेषी मानसिकता नें मेरे ब्लॉग मंच का उपयोग करके आपके बारे में जो अनर्गल प्रलाप किया उसके लिए मैं हृदय से क्षमाप्रार्थी हूँ।25 June, 2011 11:33___________________________

     
  52. चंदन कुमार मिश्र

    26/06/2011 at 1:16 पूर्वाह्न

    जारी हैहंसराज जी ने धार्मिक धारावाहिकों के अन्दाज में कहा कि दुस्साहस कैसे किया मैंने? और एक शाश्वत झूठ जो आस्तिक अक्सर बोलते हैं(कम से कम ब्लाग पर तो जरूर-100 नहीं तो 99 प्रतिशत) कि वे आस्तिक का सम्मान करते हैं, यह सरासर झूठ है। इसका सबूत है और आप देख रहे हैं उनके कुछ कुछ चापलूसी भरे वाक्य कि कहीं आका नाराज न हो जायें। मुझे आकाओं से क्यों डर हो? और माफ़ी तो सिर्फ़ एक बात के लिए मांग सकता हूँ क्योंकि और कोई बात गलत ही नहीं है।सुज्ञ की अन्तिम टिप्पणी मेरे बारे में__________________सुज्ञ ने कहा…@"मुझे लगता है कि न केवल ब्लौग जगत में बल्कि सम्पूर्ण समाज में नास्तिकों या अज्ञेयवादियों को पापी और दुष्टात्माओं के रूप में ही जाना जाता है."माननीय निशांत जी,वस्तुतः विद्वज्ञ नास्तिकों को सम्मान ही मिलता है, और उनकी वैचारिकता पर मनन भी होता है। किन्तु कईं नव-नास्तिक, नास्तिकता में द्वेष युक्त अतिक्रमण करते है, चन्दन कुमार मिश्र जी का उदाहरण आपके सामनें है। इस प्रकार के नास्तिक लॉजिक से चर्चा करनें की जगह ईश्वर का अपमान, आस्तिकों को मूर्ख आदि कुटिलता का प्रयोग करने लगते है। इनकी यहीं कुत्सित मानसिकता 'दुष्टात्मा' कहलवाने का सबब बनती है। अन्यथा नास्तिकता और वह भी विभिन्न रूपों में समाज में स्वीकृत है।_____________________अब एक बात विदेशी भारतीय लोगों के लिए। आपको ऐतराज हो तो जताते रहिए।भारत में कोई हिन्दी की सौ किताबें लिखे तो कुछ नहीं लेकिन अमेरिका और दूसरे देशों में जाकर एक घटिया किताब भी लिख दे तो सरकार और समाज की नजरों में बड़ा हिन्दी और देश का प्रेमी हो जाता है। ठीक वैसे ही जैसे आप हिन्दी या संस्कृत के महान आचार्य हों तब भी आपकी कोई पूछ नहीं लेकिन दस शब्द जानने वाले अंग्रेजी स्पोकेन कोचिंग चलाने वाले के पास पचास साइकिल तो दिख ही जाती है।जैसे भारत में आप की पूछ कोई हो चाहे मत हो लेकिन आप अमेरिका में भोजपुरी सम्मेलन कर लीजिए या पचास लोगों के साथ छठ मना लीजिए तो आप भारत प्रेमी और भारतीय संस्कृति के पुरोधा हो जाते हैं।_______________________________________________

     
  53. चंदन कुमार मिश्र

    26/06/2011 at 1:17 पूर्वाह्न

    जारी हैअब निष्कर्षत: सुनिए। मुझे इन सबने मिलकर अज्ञानी(क्योंकि मैं दिद्वानों की सभा के लायक नहीं यानि हंसराज उर्फ़ सुज्ञ सहित यहाँ आने वाले तमाम लोग खुद को विद्वान घोषित करते हैं) ,दुष्ट, दुष्टात्मा, अहंकारी, द्वेष युक्त, तानाशाही सोच का, धर्मविरोधी, धर्महन्ता, अति-असहिष्णु, उल्लू सीधा करना, मौकापरस्त, आड़ लेना , मेरी बातों को फालतू, कायर और कुछ कुछ कहा। और खुद को कहीं दोषी नहीं पाते।अन्त में इतनी बातें बहुत थीं और समय भी लगा लिखने में। और इसको फिर से देखने की फुरसत मेरे पास नहीं है। इसलिए कुछ गलतियाँ टंकण के दौरान हुई होंगी। उस पर ध्यान न दें।

     
  54. चंदन कुमार मिश्र

    26/06/2011 at 2:01 पूर्वाह्न

    चलते चलते एक श्लोक:दुर्जन: परिहर्तव्य: विद्ययालंकृतोSपि सन्।मणिनाविभूषित: सर्प: किमसौ न भयंकर:॥घबड़ाइए नहीं। अब नहीं आऊंगा।

     
  55. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi

    26/06/2011 at 8:48 पूर्वाह्न

    बहस बहुत लंबी हो चली है। मूल प्रश्नों से भटक गई है। आखिर बहस के कुछ नियम भी होने चाहिए। मेरी व्यक्तिगत मान्यता है कि- 1. आस्तिकता और नास्तिकता इस मामले में समान हैं कि दोनों ही विश्वास मात्र हैं। 2. आस्तिक इस बात में विश्वास करता है कि ईश्वर जैसी कोई अज्ञेय शक्ति है जिस ने इस जगत का निर्माण किया है और वही इसे संचालित भी करता है। लेकिन तब प्रश्न यह उठता है कि ईश्वर को किसने बनाया? तो इस का उत्तर आस्तिक यह देता है कि वह सदा से है और सदा रहेगा। अर्थात वह खुद-ब-खुद है, इसीलिए उसे खुदा भी कहा जाता है। इस तरह आस्तिक ईश्वर की कल्पना के सहारे पूरा जीवन जीता है।3. नास्तिक इस कल्पना को नहीं मानता। वह मानता है कि यह संज्ञेय जगत सदा से और सदा रहेगा, उसे बनाने वाला कोई नहीं है, वह खुद-ब-खुद है। इस तरह वह अज्ञेयवाद में विश्वास नहीं करता। 4. सदाचारी होने और दुराचारी होने में दोनों ही विश्वास न तो कोई मदद करते हैं और न ही कोई अवरोध उत्पन्न करते हैं। 5. जहाँ आस्तिक एक कल्पना में विश्वास करते हैं वहीं नास्तिक लोग स्वयं अपने आप में विश्वास करते हैं। अपनी कहूँ तो मैं ने अपने होश एक मंदिर में संभाले थे। जहाँ रोज कम से कम चार-पाँच घंटे सत्संग होता था और पूजा अर्चना तो चलती ही रहती थी। सभी मानते थे कि यह सब दुनिया में सदाचार को बढ़ावा देगा। लेकिन मैं ने प्रत्यक्ष देखा कि मंदिर की संचालन समिति में एक से बढ़ कर एक दुराचारी, बेईमान, झूठे लोग हैं और लगातार वे ही वहाँ बने रहते हैं। जो उन का विरोध करता है उसे न होते हुए भी नास्तिक, कम्युनिस्ट आदि पता नहीं क्या क्या कहना आरंभ कर देते हैं। मैं ने पाया कि धर्म और आस्तिकता समाज के सुधार में कोई योगदान नहीं करता। वस्तुतः उस के पास समाज को उत्तम बनाने के लिए कोई उपकरण है ही नहीं। वह इन्हें सुधारने का ढोंग करता है और उस के उपकरणों के पीछे समाज को बिगाड़ने और भ्रष्ट करने वाले लोग पनाह पाए रहते हैं।

     
  56. JC

    26/06/2011 at 12:48 अपराह्न

    एक दम संक्षिप्त में कहा जाए तो कोई व्यक्ति यदि सत्य जानने का इच्छुक है तो वो पांच मिनट बिना किसी सोच के बैठ 'विचार शून्य' हो कर दिखा दे, तो 'मैं' कहूँगा कि उस के द्वारा प्रस्तुत किये गए विचार वास्तव में उस के ही हैं, किसी और के नहीं या रिकॉर्ड किये हुए नहीं…यद्यपि योगी उसको कहेगा आत्मा का परमात्मा में मिलन ('कॉपी-पेस्ट', 'गागर में सागर', यानी कुंडली जागरण द्वारा सम्पूर्ण शक्ति/ ज्ञान सहस्रार चक्र में उठाना)! और यही मानव जीवन का उद्देश्य भी माना गया है!

     
  57. JC

    26/06/2011 at 1:04 अपराह्न

    एक अन्य सन्दर्भ में, किसी अन्य ब्लॉग में प्रकाशित करने हेतु निम्न-लिखित टिप्पणी भी, थोड़ी त्रुटी सुधार के पश्चात, आपकी सूचना हेतु भी प्रस्तुत कर रहा हूँ… @ "…प्रश्न ये है की क्या किसी भी देव मूर्ति के प्राण का स्तर इतना उठ जाता है की वो याचको की मनोकामना पूर्ण कर सके ."इसके संकेत आपको उनके मृत राजा आदि के शरीर में स्थित आत्मा के भविष्य में सुधार/ भलाई हेतु, मिस्र में स्थित भौतिक चतुर्मुखी संरचना, (प्राचीनतम सभ्यता के निवास स्थान भारत के 'ब्रह्मा'?), 'पिरामिड' यानि 'पायर + एमिड' = 'बीच में अग्नि', अथवा हिन्दू मान्यतानुसार शरीर के बीच में तथाकथित आत्मा, से मिलेगा… और अनादि काल से चले आ रहे 'हिन्दू' मंदिरों में 'विमान' का जनता के हित में उपयोग,,, जो संकेत करता है 'प्राण प्रतिष्ठित' मूर्तियों के माध्यम से उस स्वयंभू शक्ति (भूतनाथ शिव) का उपयोग भक्तों की साधारण स्तर पर स्थित आत्मा का स्तर उठाने के लिए… उसी प्रकार जैसे विमान कई यात्रियों को एक साथ, पंचभूतों में से एक, 'आकाश' में, ऊपर ले जाता है…किन्तु योगी यह भी कह गए कि क्यूंकि काल के प्रभाव से सतयुग से कलियुग तक आते आते भौतिक पदार्थ से बने मानव शरीर की पहुँच कलियुग में केवल अधिक से अधिक २५% और कम से कम ०% के बीच ही रह जाती है…

     
  58. कुमार राधारमण

    26/06/2011 at 6:13 अपराह्न

    सद्कर्मों का सुफल मिलना अनिवार्य नहीं है. फिर भी,यह मार्ग इसलिए उचित है कि यह निष्कलुष है।

     
  59. सुज्ञ

    26/06/2011 at 7:34 अपराह्न

    @जहाँ आस्तिक एक कल्पना में विश्वास करते हैं वहीं नास्तिक लोग स्वयं अपने आप में विश्वास करते हैं। दिनेशराय द्विवेदी जी,बस इसी मान्यता के पिछे कहीं है विश्वास की मदद और अवरोध के उपकरण।आस्तिक कल्पना एक आशावादिता होती है सर्वजगहित सुखरूप परिकल्पना। स्व पर के भेद रहित। जैसे किसी कार्य की हममें पर्याप्त क्षमता न होते हुए भी आत्मविश्वास और आशावाद से कार्य सफल होता है। उसी प्रकार दुनिया अवश्य अच्छी बनेगी यह कल्पना भी जगहित कर जाती है। आशा उपकरण उसके सदाचार में मदद कर देता है। (दिखावटी देव-दृव्य-खोर पुरोहित तो असल में आस्तिक होते ही नहीं है। वे आस्तिक के भेष में, न डरनें वाले नास्तिक ही होते है। सच्चा आस्तिक दुराचार के प्रति पापभीरू ही होगा। जिन लोगों को धर्म-स्थलों पर ही दुराचार करते डर नहीं लगता फिर काहे के आस्तिक?) नास्तिक लोगों का 'स्वयं अपने आप में विश्वास' ही वह निज स्वार्थ उपकरण है जो सदाचार में अवरोध उत्पन्न करता है। वह अपने से आगे सोच ही नहीं पाता। उचित अनुचित का स्वयं की आवश्यकता के आधार पर निर्णय लेता है। उसे बस अपने आप पर ही विश्वास होता है। वह स्व और पर का भेद कर देता है। समस्त जग हित तो उसकी कल्पना में समाता ही नहीं। अतः 'स्वार्थ' उपकरण उसके सदाचार में अवरोध उत्पन्न करता है।

     
  60. JC

    26/06/2011 at 10:08 अपराह्न

    कई दशक पहले एक सोलह वर्षीय बालक घर आया था तो उससे 'मैंने' बातों बातों में 'भगवान्' के बारे में कुछ कहा तो उसने तुरंत रटा रटाया उत्तर दिया, "अंकल, में भगवान् में विश्वास नहीं करता"! तो 'मैंने' उसे कहा, "वाह! तुम तो बुद्ध समान पहुंचे हुए लग रहे हो! क्यूंकि सदियों से अनंत व्यक्ति इस विषय पर चर्चा करते आ रहे हैं भगवान् है कि नहीं और किसी एक निर्णय पर नहीं पहुँच पाए हैं…जबकि तुम इस उम्र में ही जान गए हो कि भगवान् नहीं है"!सुन कर उसके चेहरे पर एक प्रसन्नता का भाव आ गया… किन्तु तभी 'मैंने' कहा कि यदि 'मैं' कहूं भगवान् है तो तुम मुझसे सबूत चाहोगे?… उसका उत्तर हाँ में था… तो मैंने कहा, फिर उसी प्रकार तुमने भी उसके न होने के सबूत एकत्र किये होंगे? तो वो बगलें झाँकने लगा…सारी कठिनाई यह है कि किसी भी समय किसी भी विषय पर, 'द्वैतवाद' के कारण, यानि 'सही'/ 'गलत' आदि (सिक्के के दो पहलू समान) , किसी क्षण विशेष पर हरेक व्यक्ति के अपने भूत के अनुभव के आधार पर सोच कर लिए निर्णय पर उसके भविष्य पर मिलने वाला 'फल' आधारित है… जो किसी व्यक्ति विशेष के लिए हो सकता है अधिकतर सही निकलता हो और किसी के लिए गलत…जिस कारण हर व्यक्ति या तो 'आशावादी' अथवा 'निराशावादी' प्रकृति का हो जाता है…

     
  61. Global Agrawal

    27/06/2011 at 6:29 पूर्वाह्न

    @ "वाह! तुम तो बुद्ध समान पहुंचे हुए लग रहे हो! क्यूंकि सदियों से अनंत व्यक्ति इस विषय पर चर्चा करते आ रहे हैं भगवान् है कि नहीं और किसी एक निर्णय पर नहीं पहुँच पाए हैं…जबकि तुम इस उम्र में ही जान गए हो कि भगवान् नहीं है"! JC जी ,हा हा …..आनंद आ गया 🙂

     
  62. JC

    27/06/2011 at 11:08 पूर्वाह्न

    @ Global Agrawal जी, धन्यवाद! सत्य की बात करें तो जब हर व्यक्ति इस भौतिक संसार में पैदा होता है तो, उसीके जीवन हेतु, उसे रुलाया जाता है! और यह रुलाने वाला सिलसिला तो जीवन पर्यंत मिलता ही रहता है – किसी को कम तो किसी को अधिक… शारीरिक अथवा मानसिक कष्ट, या दोनों पहुंचा, जिसमें यदि मानव समाज का हाथ होता है तो 'प्रकृति' का हाथ भी शायद उस से अधिक होता है…या यह भी संभव हो सकता है कि दोनों प्राकृतिक ही हों – यदि मानव के विचारों के पीछे प्रकृति का ही हाथ हो! जो भी कारण हो, किसी भी व्यक्ति को प्रसन्न रहने के लिए ही प्रयास अधिक करना पड़ता है, मौके ढूँढने पड़ते हैं, जैसे प्राकृतिक संकेत के अनुसार आलू पाने के लिए ज़मीन थोड़ी सी सतह पर ही खोदनी पड़ती है, किन्तु भूमिगत जल/ तेल पाने के लिए गहराई में जाना पड़ता है (और मोती पाने के लिए समुद्र कि गहराई में :)… गंभीर नाटक में भी बीच बीच में, जब मंच सजाया जा रहा होता है, किसी विदूषक की आवश्यकता महसूस होती आई है,,, सर्कस, और फिल्मों में भी, वातावरण को हल्का करने में 'जोकर' सहायक सिद्ध होते हैं… समाचार पत्रों आदि प्रिंट मीडिया, और अन्य मीडिया में भी चुटकलों, हास्य कविताएँ, लेख आदि को शामिल किया जाता है… इत्यादि इत्यादि…इसी लिए कहा गया, "जीयो और जीने दो"! और, "प्रेम की गंगा बहाते चलो"! आदि…

     
  63. सुज्ञ

    27/06/2011 at 12:07 अपराह्न

    जे सी जोशी जी,आपने सही कहा…"गंभीर नाटक में भी बीच बीच में, जब मंच सजाया जा रहा होता है, किसी विदूषक की आवश्यकता महसूस होती आई है,,, "जीवन में सभी रंग है, और सभी जीवन के अंग है।"इसी लिए कहा गया, "जीयो और जीने दो"! और, "प्रेम की गंगा बहाते चलो"!हितकर बात!!

     
  64. सञ्जय झा

    27/06/2011 at 3:00 अपराह्न

    net-gear se tippani blocked tha……..ab khula hai…..apni upasthiti vidw-janon ke vich rakheja raha hoon……….pranam.

     
  65. JC

    27/06/2011 at 5:49 अपराह्न

    हंसराज जी, धन्यवाद! आपने प्रकृति की विविधता को ध्यान में रख श्वेत-श्याम चित्र में इन्द्रधनुषी रंग भर मानव जीवन की विविधता की ओर भी संकेत कर दिया!

     
  66. Arvind Mishra

    29/06/2011 at 8:07 पूर्वाह्न

    विचारोत्तेजक

     
  67. अनुपमा त्रिपाठी...

    01/07/2011 at 12:33 अपराह्न

    आपकी किसी पोस्ट की चर्चा है कल ..शनिवार(२-०७-११)को नयी-पुराणी हलचल पर ..!!आयें और ..अपने विचारों से अवगत कराएं …!!

     
  68. JHAROKHA

    07/07/2011 at 7:29 अपराह्न

    sugy ji main aapke vicharon se sahmat hun .kisi ne kaha hai ki shathe satharye samachret——-arthat dushht ke saath dushhtata ka hi vyvhar karna chaiye. eir bhi ham apne bachchon ko seekhate hain ki yadi agla galat kar raha hai fir tum bhi badle me vahi karoge to tumhaare aur us galat insaan me antar kya raha? kisi ki peeth peechhe buraai karna bhi galat hai.atah jo sach hai ki hame jo jaisa hai uske baare me saty batana galat nahi hai kyon ki fir vo us vykti ko dhokha dene wali baat ho jaayegi.aapka lekh bahut hi vicharniy vprabhavkari hai .bahut bahut badhai poonam

     
  69. shilpa mehta

    14/07/2011 at 6:29 अपराह्न

    कमाल की बात कही आपने – यह कितना आसान तरीका है समझाने का | फिर भी जो नहीं मानना चाहते – वे नहीं ही मानेंगे ना ? लेकिन मैं समझ नहीं पा रही कि इतने सारे ब्लोग्स पर यह बहस चल क्यों रही है ? क्यों हम दूसरे के ऊपर अपनी विचारधारा को थोपना चाहते हैं ? जो आस्तिक हैं उन्हें आस्तिक रहने दीजिये और जो नास्तिक हैं उन्हें नास्तिक रहने दीजिये ? यह जबरदस्ती क्यों भला?

     
  70. सुज्ञ

    14/07/2011 at 10:26 अपराह्न

    शिल्पा जी,सुज्ञ ब्लॉग पर आपका स्वागत है। आपने सही कहा वे नहीं मानेंगे।रही बात विचारधारा थोपने की तो अक्सर न मानने वाले नास्तिक ही नास्तिकत्व थोपने का कार्य करते है। वे कहते है ईश्वर, आत्मा, पुर्नजन्म-पूर्वजन्म और धर्म में विश्वास मत रखो। जबकि आस्तिक अक्सर मात्र अपनी आस्था बचाने का ही उपक्रम करते है। बताते मात्र है कि वे आस्तिक क्यों है यही जवाब भी देते है। वे आस्तिक बनने पर विवश करने की लय में कभी तर्क प्रस्तुत नहीं करते।पर संशय खडे करनें के उनके प्रयोजन का प्रत्युत्तर देना आवश्यक है, अन्यथा साधारण चिंतनशील लोग शंकाशील होकर संशयवादी हो जाएगें। नास्तिक पहले अक्सर संशयवादी का चोला ही ओढते है।

     
  71. DR. ANWER JAMAL

    06/01/2012 at 9:55 पूर्वाह्न

    @ भाई सुज्ञ जी ! वाक़ई आपने हक़ीक़त बयान की है। डर इंसान की प्रवृत्ति का अंग है। उसका सही इस्तेमाल किया जाए तो एक अच्छे चरित्र का निर्माण किया जा सकता है। हरेक इंसान को अपने अच्छे बुरे कर्मों का फल भोगना ही है। इसीलिए कुछ भी करने से पहले उसे उसके फल के बारे में ज़रूर सोच लेना चाहिए।क़ुरआन में कहा गया है-ऐ ईमान वालो! परमेश्वर का डर (तक़वा) इख्तियार करो और हर आदमी को देखना चाहिये कि उसने आने वाले कल के लिए आगे क्या भेजा है ? और डरो परमेश्वर से निस्संदेह परमेश्वर को उन तमाम कामों की ख़बर है जो तुम करते हो । पवित्र कुरआन, 59, 18आदमी का स्वभाव है कि वह काम का अंजाम चाहता है। परमेश्वर ने उसे उसके स्वभाव के अनुसार ही शिक्षा दी है कि हरेक आदमी को चाहिए कि वह पहले फल की चिन्ता करे ताकि उसका काम फलप्रद हो। जो भी उपदेशक आदमी को फल से बेफ़िक्र करता है दरअस्ल वह उसका दिल काम से ही उचाट कर देता है।आपने बिल्कुल सही कहा है कि ‘नास्तिक सदाचार के पांव ही नहीं हैं।‘झूठ के पांव होते भी नहीं हैं।इनके पांव तो क्या, शायद इनके सिर भी नहीं होता वर्ना इंसान की प्रवृत्ति को तो यह जान ही लेते। जब ये लोग इंसान के दिल से डर ही निकाल देते हैं कि कर्मों का फल देने वाली कोई अलौकिक व्यवस्था नहीं है तो फिर लोग ऐसी जगह जुर्म करने से क्यों डरेंगे, जहां क़ानून के हाथ पहुंचते ही नहीं या वे उसे भी ख़रीदने की ताक़त रखते हैं। इस तरह ताक़तवर के लिए डरने की कोई वजह नहीं रह जाती।आपके इस लेख की जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है।Fruit n work हरेक आदमी को चाहिए कि वह पहले फल की चिन्ता करे ताकि उसका काम फलप्रद हो।http://vedquran.blogspot.com/2010/05/fruit-n-work.html

     

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं यह ब्लॉग लिखने के अलावा गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। रेलवे से ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर्ड अफसर।

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