RSS

Monthly Archives: मई 2011

समभावों से कष्ट सहूँ बस, मुझ में ऐसी शक्ति दो॥

(निराशा, विषाद, अश्रद्धा के बीच जीवट अभिव्यक्ति : प्रार्थना)

॥समभावों से कष्ट सहूँ बस, मुझ में ऐसी शक्ति दो॥

आत्मश्रद्धा से भर जाऊँ, प्रभुवर ऐसी भक्ति दो।
समभावों से कष्ट सहूँ बस, मुझ में ऐसी शक्ति दो॥

कईं जन्मों के कृतकर्म ही, आज उदय में आये है।
कष्टो का कुछ पार नहीं, मुझ पर सारे मंडराए है।
डिगे न मन मेरा समता से, चरणो में अनुरक्ति दो।
समभावों से कष्ट सहूँ बस, मुझ में ऐसी शक्ति दो॥

कायिक दर्द भले बढ जाय, किन्तु मुझ में क्षोभ न हो।
रोम रोम पीड़ित हो मेरा, किंचित मन विक्षोभ न हो।
दीन-भाव नहीं आवे मन में, ऐसी शुभ अभिव्यक्ति दो।
समभावों से कष्ट सहूँ बस, मुझ में ऐसी शक्ति दो॥

दुरूह वेदना भले सताए, जीवट अपना ना छोडूँ।
जीवन की अन्तिम सांसो तक, अपनी समता ना छोडूँ।
रोने से ना कष्ट मिटे, यह पावन चिंतन शक्ति दो।
समभावों से कष्ट सहूँ बस, मुझ में ऐसी शक्ति दो॥

 
10 टिप्पणियां

Posted by on 05/05/2011 में बिना श्रेणी

 

टैग: , , , , ,

जीवन का लक्ष्य

जो मनुष्य, ‘जीव’ (आत्मा) के अस्तित्व को मानता है, उसी के लिए जीवन के लक्ष्य को खोजने की बात पैदा होती है। जो मनुष्य जीव के अस्तित्व को नहीं मानता या मात्र इस भव (मनुष्य जीवन) जितना ही इस जीवन को मानता है तो उसके लिए कमाना, खाना और मज़े करना ( जैसे : Eat, Drink and be merry) यह बाह्य बातें ही जीवन लक्ष्य होती है। अगर चिंतक नास्तिक हुआ तो कला, साहित्य, संगीत, सिनेमा आदि को भी अपने जीवन का लक्ष्य मान सकता है। किन्तु यह उच्च श्रेणी के नैतिकता सम्पन्न नास्तिक के विषय में ही समझना चाहिए।
 
इसी प्रकार जिन जीवों को कुछ भी तत्व जिज्ञासा नहीं है, वे जीव भी बाहर के लक्ष्य में ही खो जाते है। ऐसे जीव बहिरात्मा है। वे स्थूल लक्ष्यों को ही अपने जीवन का लक्ष्य समझते है। परन्तु जिसे जीव के त्रैकालिक अस्तित्व में विश्वास है, वह चिंतन के माध्यम से अपने जीवन लक्ष्य का निर्धारण करता है।

वह सोचता है कि सामान्य मनुष्य जैसे- खाने,पीने और मज़े करने में अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं, क्या मुझे भी वैसे ही जीवन व्यतीत कर देना है? – ऐसा जीवन तो मात्र मृत्यु के लक्ष्य से ही जीया जाता है। जन्म लेना और भोग-भाग कर मर जाना तो मेरे जीवन का लक्ष्य नहीं हो सकता। अथवा मात्र नाम अमर रखने का लक्ष्य नहीं हो सकता, क्योंकि उस नाम-अमरता का मेरी आत्मा को कोई फायदा मिलना नहीं है। जन्म और मृत्यु के मध्य का काल किसी विशिष्ठ पुरूषार्थ के प्रयोजनार्थ है। इसलिए कोई ऐसा उत्तम लक्ष्य मेरे जीवन का अवश्य होना चाहिए, जिससे मेरा जीवन सार्थक हो। जब वह ज्ञानियों के वचनों के बल से, अपने जीवन लक्ष्य को खोजता है, तो वह निर्णय करता है कि मेरी आत्मा की शक्तियों का चरम और परम विकास ही मेरे जीवन का लक्ष्य है

हमारे विकास में मुख्य बाधक कारण है- हमारे विकार। अतः मुझे दो साधनो को अपनाना होगा। पहला साधन है- विकारों का विराम। और दूसरा साधन है- मेरे गुणों के समरूप भावों का आराधन। विकारों के विराम हेतू व्रत-नियम-संयम है और आत्मा के सद्गुणों में उत्थान हेतू ज्ञान-दर्शन-चरित्र का आराधन है। इसी से मोक्ष रूप लक्ष्य की सिद्धि होती है। वही सत्-चित-आनंद अवस्था होगी।

 

टैग: , ,

ईश्वर सबके अपने अपने रहने दो

ब सभा भवन में ईश्वर पर परिचर्चा हो रही थी। बाहर से तेज नारों की आवाजें आ रही थी। ‘धर्म के नाम लडना बंद करो’ ‘भगवान के नाम पर खून बहाना बँद करो’ आदि। सभा खत्म होने पर बाहर देखा काफ़ी लोग थे। ‘दुर्बोध दासा’ सहित ‘निर्बोध नास्ति’, ‘मनमौजी राम’, ‘उच्छ्रंखला देवी’, ‘आजादख्याली’, ‘मस्तमलंग खान’ आदि आग बरसा रहे थी। उन्हें प्यार से समझाया कि यहां मात्र ईश्वर पर बात परिचर्चा हो रही है, कोई लडाई-झगडा नहीं है। किन्तु वे सब आरोप के मूड मेँ थे शीघ्र ही बहस पर उतर आए। अपने आप को सेक्यूलर कह रहे थे, कह रहे थे, यद्पि हमें किसी के धर्म से कोई मतलब नहीं है। तथापि जहाँ धर्म की बात होगी हमारी टांग बीच में स्थापित रहेगी ही, यह समझ बना के चलो। हम सभी धर्मों में आपसी शान्ति लानेवाले लोग है। श्रमजीवियोँ के सलाहकार है अपने लिए श्रम की सम्भावनाएँ भी हम ही पैदा करते है हम अपने ही प्रयासों से अपने लिए काम तैयार कर ही लेते है। और उसके बाद हमारा काम होता है समाधान समझे?
कहीं सभा फ़्लॉप होने की न्यूज न फैल जाय, मैने उन्हें आदर से अन्दर बुलाया और अपनी बात रखने को कहा।
पहले से ही बिफरा दुर्बोध दासा फट पड़ा- ‘ईश्वर है ही नहीं, क्यों तुम लोगो को अन्धविश्वासी बनाने पर तुले हो?’
मै– मैं कहाँ ईश्वर थोप रहा हूँ, यहां पहले से ही सभी ईश्वर मानने वाले लोग है। यह उनकी अपनी मर्जी, अपने ईश्वर पर बात करे, आपको क्या?
मस्तमलंग खान– तुमनें जरूर दूसरो के रहन-सहन, खान-पान पर व्यंग्य किया होगा, मुझे मालूम है।
मैं– किन्तु, रहन-सहन, खान-पान हमारा आज का विषय नहीं था, खान!
निर्बोध नास्ति बोला– सबके अपने अपने ईश्वर है, उन्हें अपने अपने सेपरेट ही रहने दो…, आप क्योँ मिक्सअप करते हो
मैं– नहीं! कुल मिलाकर सभी के एक ‘ईश्वर’ है।
मनमौजी चिल्लाया- नही हमारे पूर्वजो ने बडी महनत से विभाजित किया था तुमने शोषको के ईश्वर को श्रेष्ठ बताया होगा, और किसी बेचारे गरीब के ईश्वर को तुच्छ कहा होगा।
मैं– जब वह एक है, तो उसका एकत्व अपने आप मेँ श्रेष्ठ है।
मनमौजी कुछ याद करते हुए पुनः भडका- तो उनकी किताबों को छोटा बड़ा बताया होगा?
मैं– किताबें तो सबके अपनी क्षमता अनुसार् बालबोध से लेकर डॉक्टरेट (पाण्डित्य) तक अलग अलग श्रेणी की होती ही है, उसमें निम्न उच्च कहने मेँ बुरा क्या है?
मनमौजी को जैसे लू प्वॉईंट मिल गया- तुम लोग कुछ तो उँच-नीच करोगे ही, सीधे बैठ ही नहीं सकते। किसनें तुम्हें हक दिया कि किसी की निम्न छोटी बताओ?, जरा बतलाओ तो आपने किसकी निम्न बतायी। उस ग्रुप को सहानुभुति देना जरूरी है, उन बेचारो को भड़काना निताँत ही आवश्यक है।
मैने देखा इसतरह तो ये लोग किसी भी हद तक जाकर बात बिगाड लेंगे। अब जवाब की जगह, इन्हें ही प्रश्न में घेरते हैं।
मैनें कहा– आप लोग सेक्यूलर है, अधर्मी है धर्म से आपहा क्या वास्ता? धर्म को मानने वाले उसका चाहे जो करे, आप क्योँ दुखी होते है?
आजादख्याली टपका- ‘अधर्मी क्यों? धर्म हमारा व्यक्तिगत मामला है, हमारी एक टांग व्यक्तिगत मेँ भी,और एक ऐसी सामाजिक धार्मिक भीड मेँ भी रहेगी। समाज की ‘सामुहिक सज्जनता’ से हमें कुछ भी लेना देना नहीं है। किंतु निरपेक्ष होने का यह मतलब थोडे ही है कि कोने में जाकर मौन खडे रहेंगे? टांग अडाने का हमारा कर्तव्य है हमारी अभिलाषा रहती है। हमारी नल-नाली सँस्कृति है. अन्याय महसुस करवाना हमारा फर्ज है हमेँ बताना होता है कि ‘देख! उसने, तेरे धर्म को उन्नीस कहा।’ वर्ना वे बेचारे भोले लोग, कहां उँच-नीच को समझ पाते है। उन्हें हम ही सिखाते-पढाते है तब जाकर उन्हे समझ मेँ आता है कि “धर्म आपस में लड़ाता है”।’
मैने पुछा– आपको धर्मों से किस जन्म की दुश्मनी है?
अब मनमौजी ने कमान सम्हाली- ‘यह धर्म नामक अफीम वास्तव मेँ हमारा दमन करता है, हमें अपने मन की करने ही नहीं  देता। क्या क्या सपने संजोते है हम कि बस निरंकुश आंधी की तरह बहे, जब जो मन में आया करे, बिन्दास। धर्म तो अक्सर, सज्जनता सभ्यता और संस्कृति का ढोल पीटता रहता है। जरा देखो!- जंगल में पशु कैसे स्वेच्छा विचरण करते है। कोई बंधन नहीं, कोई अनुशासन नहीं। हम भी ऐसे ही स्वछंद विचरना चाहते है। तुम धर्म के चोखिले लोग सफाई ठोकने लगते हो। जब तब धर्म आदर्श जीवन के गुणगान शुरू कर देते हो। इन उपदेशोँ से हमेँ ग्लानी होती है, हमारी तो सारी मन ही मन में रह जाती है। यहाँ कोई भी व्यक्ति आदर्श नहीं होना चाहिए, सभी का समान अध्यःपतन होना चाहिए। साम्य-पतन। जब सभी पतन के निम्न धरातल पर एकसम होंगे तो किसी को भी अपराध-बोध न होगा, यही हमारा लक्ष्य है। ‘यह मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसे संयत रहना है’, ऐसी अनुशासन की बेडियां, यह धर्म ही डालता है। हमें नफरत है संयम से। हमें तो सुनामी की तरह आजादी चाहिए। पता नहीं किसके लिये खाद्य बचाना है, व्रत का महिमामंडन कर कर के, धर्म हमें भूखा मारता है। हमें अनवरत और अबाध चरना है। हमें तो इच्छा के आगे उदर पूर्णता का अवरोध भी मंजूर नहीं’
आजादख्याली नें हां में हां मिलायी- यह धर्म तो हमारे आवेगों और हमारी तृष्णाओं पर लगाम कसता है यह हमारे लोभ लालच का शोषण है।
भय से मैं अन्दर तक कांप उठा, क्या आनेवाली पीढी, श्रेष्ठ सुविधाओं के बीच भी जंगली समान जीवन जिएगी?
इतने में सभागार में रिपोर्टर धुस आए, मनमौजी उसे इंटरव्यूह दे रहे थे- हमनें सभी पक्षों को बडे परिश्रम से मना लिया है, हम पर पूर्ण विश्वास के साथ, सभी नें अपने हथियार डाल दिए है। और यहाँ हमनें शान्ति और सौहार्द कायम कर दिया है।
टीवी का कैमरा हमारे पर केन्द्रित हो, उसके पूर्व ही हमारा खिसक जाना ही बेहतर था, हम तो सटक लिए।
 
24 टिप्पणियां

Posted by on 02/05/2011 में बिना श्रेणी

 

टैग:

 
गहराना

विचार वेदना की गहराई

॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

तिरछी नजरिया

हितेन्द्र अनंत का दृष्टिकोण

मल्हार Malhar

पुरातत्व, मुद्राशास्त्र, इतिहास, यात्रा आदि पर Archaeology, Numismatics, History, Travel and so on

मानसिक हलचल

मैं, ज्ञानदत्त पाण्डेय, गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश (भारत) में ग्रामीण जीवन जी रहा हूँ। मुख्य परिचालन प्रबंधक पद से रिटायर रेलवे अफसर। वैसे; ट्रेन के सैलून को छोड़ने के बाद गांव की पगडंडी पर साइकिल से चलने में कठिनाई नहीं हुई। 😊

सुज्ञ

चरित्र विकास

WordPress.com

WordPress.com is the best place for your personal blog or business site.

हिंदीज़ेन : HindiZen

जीवन में सफलता, समृद्धि, संतुष्टि और शांति स्थापित करने के मंत्र और ज्ञान-विज्ञान की जानकारी

WordPress.com News

The latest news on WordPress.com and the WordPress community.