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अन्ततः पश्चाताप

25 अप्रैल
( मेरे पसंदीदा कवि ‘भृंग’ की एक रचना)
  पश्चाताप

जग के जंजाल बीच, कूद पड़ा आंख मींच,
सपनों को सींच सींच, बे-लगाम हो गया।
जोश में तो होश भूल, खुशियों के झूले झूल,
समय के प्रतिकूल, बे-नकाब हो गया।
सुन के रसीली राग, खेलने लगा हूँ फाग,
बात बात में हूँ आग, मैं अलाम हो गया।
इन्द्रियों के वशीभूत, कैसे होऊं फलीभूत,
करमों की करतूत, मैं गुलाम हो गया।
आँख साख झूठी देवे, कान किये हथलेवे,
मुख निरा मुसकावे, कटि वाम हो गया।
सांस फूलने लगा है, डील झूलने लगा है,
बात भूलने लगा है, पांव जाम हो गया।
प्रभु तेरे द्वार पर, खड़ा एक पांव पर,
जैसे तैसे पार कर, तेरे नाम हो गया।
इन्द्रियों के वशीभूत, “भृंग” कैसे फलीभूत,
कैसी करतूत, तन तामजाम हो गया॥

                                               -कवि भंवरलाल ‘भृंग’

 
8 टिप्पणियाँ

Posted by on 25/04/2011 in बिना श्रेणी

 

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8 responses to “अन्ततः पश्चाताप

  1. अरुण चन्द्र रॉय

    25/04/2011 at 2:42 अपराह्न

    बढ़िया कविता !

     
  2. रश्मि प्रभा...

    25/04/2011 at 2:43 अपराह्न

    achhi rachna

     
  3. Rakesh Kumar

    25/04/2011 at 4:27 अपराह्न

    बेहतरीन,शानदारप्रभु तेरे द्वार पर, खड़ा एक पांव पर,जैसे तैसे पार कर, तेरे नाम हो गया।

     
  4. नीरज गोस्वामी

    25/04/2011 at 5:16 अपराह्न

    वाह…वाह…वाह…बेहतरीन छंद…नीरज

     
  5. राज भाटिय़ा

    25/04/2011 at 11:13 अपराह्न

    अति सुंदर कविता, धन्यवाद।

     
  6. मनोज कुमार

    25/04/2011 at 11:28 अपराह्न

    बहुत अच्छी रचना से परिचय कराया आपने। आभार।

     
  7. निर्मला कपिला

    27/04/2011 at 12:29 अपराह्न

    दिल से निकले हुये उद्गार। शुभकामनायें।

     
  8. रंजना

    29/04/2011 at 4:34 अपराह्न

    ओह….मन मुग्ध हो गया…क्या कृति है….अद्वितीय !!!बहुत बहुत आभार आपका पढने का सुअवसर देने के लिए…

     

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