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अस्थिर आस्था के लूटेरे

22 मार्च

क विशाल नगर में हजारों भीख मांगने वाले थे। अभावों में भीख मांगकर आजिविका चलाना उनका पेशा था। उनमें कुछ अन्धे भी थे। उस नगर में एक ठग आया और भीखमंगो में सम्मलित हो गया। दो तीन दिन में ही उसने जान लिया कि उन भीखारियों में अंधे भीखारी अधिक समृद्ध थे। अन्धे होने के कारण दयालु लोग उन्हे कुछ विशेष ही दान देते थे। उनका धन देखकर ठग ललचाया। वह अंधो के पास पहुंच कर कहने लगा-“सूरदास महाराज ! धन्य भाग जो आप मुझे मिल गये। मै आप जैसे महात्मा की खोज में था ! गुरूवर, आप तो साक्षात भगवान हो। मैं आप की सेवा करना चाहता हूँ ! लीजिये भोजन ग्रहण कीजिए, मेरे सर पर कृपा का हाथ रखिए और मुझे आशिर्वाद दीजिये।“

अन्धे को तो जैसे बिन मांगी मुराद मिल गई। वह प्रसन्न हुआ और भक्त पर आशिर्वाद की झडी लगा दी। नकली भक्त असली से भी अधिक मोहक होता है। वह सेवा करने लगा। अंधे सभी साथ रहते थे। वैसे भी उन्हे आंखो वाले भीखमंगो पर भरोसा नहीं था। थोडे ही दिनों में ठग ने अंधो का विश्वास जीत लिया। अनुकूल समय देखकर उस भक्त ने, अंध सभा को कहा-“ महात्माओं मुझे आप सभी को तीर्थ-यात्रा करवाने की मनोकामना है। आपकी यह सेवा कर संतुष्ट होना चाहता हूँ। मेरा जन्म सफल हो जाएगा। सभी अंधे ऐसा श्रवणकुमार सा योग्य भक्त पा गद्गद थे। उन्हे तो मनवांछित की प्राप्ति हो रही थी। वे सब तैयार हो गये।सभी ने आपना अपना संचित धन साथ लिया और चल पडे। आगे आगे ठगराज और पिछे अंधो की कतार।

भक्त बोला- “महात्माओं, आगे भयंकर अट्वी है, जहाँ चोर डाकुओं का उपद्रव रहता है। आप अपने अपने धन को सम्हालें”। अंध-समूह घबराया ! हम तो अंधे है अपना अपना धन कैसे सुरक्षित रखें? अंधो ने निवेदन किया – “भक्त ! हमें तुम पर पूरा भरोसा है, तुम ही इस धन को अपने पास सुरक्षित रखो”, कहकर सभी ने नोटों के बंडल भक्त को थमा दिये। ठग ने इस गुरुवर्ग को आपस में ही लडा मारने की युक्ति सोच रखी थी। उसने सभी अंधो की झोलीयों में पत्थर रखवा दिये और कहा – “आप लोग मौन होकर चुपचाप चलते रहना, आपस में कोई बात न करना। कोई मीठी मीठी बातें करे तो उस पर विश्वास न करना और ये पत्थर मार-मार कर भगा देना। मै आपसे दूरी बनाकर नजर रखते हुए चलता रहूंगा”। इस प्रकार सभी का धन लेकर ठग चलते बना।

उधर से गुजर रहे एक राहगीर सज्जन ने, इस अंध-समूह को इधर उधर भटकते देख पूछा –“सूरदास जी आप लोग सीधे मार्ग न चल कर, उन्मार्ग – अटवी में क्यों भटक रहे हो”? बस इतना सुनते ही सज्जन पर पत्थर-वर्षा होने लगी. पत्थर के भी कहाँ आँखे होती है, एक दूसरे अंधो पर भी पत्थर बरसने लगे। अंधे आपस में ही लडकर समाप्त हो गये।

आपकी डाँवाडोल, अदृढ श्रद्धा को चुराने के लिए,  सेवा, परोपकार और सरलता का स्वांग रचकर ठग, आपकी आस्था को लूटेने के लिए तैयार बैठे है। यथार्थ दर्शन चिंतन के अभाव में हमारा ज्ञान भी अंध है। अज्ञान का अंधापा हो तो अस्थिर आस्था जल्दी विचलित हो जाती है। एक बार आस्था लूट ली जाती है तो सन्मार्ग दिखाने वाला भी शत्रु लगता है. अज्ञानता के कारण ही अपने  समृद्ध दर्शन की कीमत हम नहीं जान पाते। हमेशा डाँवाडोल श्रद्धा को सरल-जीवन, सरल धर्म के पालन का प्रलोभन देकर आसानी से ठगा जा सकता है। विचलित विचारी को गलत मार्ग पर डालना बड़ा आसान है। आस्था टूट जाने के भय में रहने वाले ढुल-मुल  अंधश्रद्धालु को सरलता से आपस में लडाकर खत्म किया जा सकता है।

अस्थिर आस्थाओं की ठग़ी ने आज जोर पकड़ा हुआ है। निष्ठा पर ढुल-मुल नहीं सुदृढ बनें।

 

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56 responses to “अस्थिर आस्था के लूटेरे

  1. प्रतुल वशिष्ठ

    22/03/2011 at 10:50 पूर्वाह्न

    ."नकली हितैषी असली से भी अधिक सगा लगता है." जैसे सूत्र ……… गाँठ बाँध लेता हूँ…… आपकी कथाएँ हमारे हाथ में एक डिटेक्टर थमा रही हैं. जो हमारी कमज़ोर पारखी दृष्टि-क्षमता को उन्नत कर देती है..

     
  2. Deepak Saini

    22/03/2011 at 10:55 पूर्वाह्न

    गहन चिन्तन के बाद उपजी एक बोधकथा। प्रेरणादायक रचना आभार

     
  3. आलोक मोहन

    22/03/2011 at 10:57 पूर्वाह्न

    pralobhan aamod pramod sukh bhog jayda hi achha lagta hai bahut acchi kahani aur sandesh

     
  4. अन्तर सोहिल

    22/03/2011 at 10:59 पूर्वाह्न

    सामयिक मुद्दे पर प्रेरक पोस्ट, आभारप्रणाम स्वीकार करें

     
  5. संगीता स्वरुप ( गीत )

    22/03/2011 at 11:13 पूर्वाह्न

    बहुत सार्थक ज्ञान दिया इस कथा ने … बहुत ज्यादा मीठा बोलने वाले से सावधान रहने को प्रेरित करती अच्छी पोस्ट

     
  6. Manpreet Kaur

    22/03/2011 at 11:16 पूर्वाह्न

    हम्म सही बात लिखी है !हवे अ गुड डे ! मेरे ब्लॉग पर आये ! Music BolLyrics MantraShayari Dil SeLatest News About Tech

     
  7. ajit gupta

    22/03/2011 at 11:37 पूर्वाह्न

    जो जितना नकली या धूर्त होता है वो उतना ही बड़ा नाटकबाज होता है, अच्‍छी कथा है।

     
  8. सतीश सक्सेना

    22/03/2011 at 12:00 अपराह्न

    नकली भक्त असली से भी अधिक मोहक होता है….बहुत ठीक कह रहे हो , बहुमत भी इन्ही का है ! शुभकामनायें आपको !

     
  9. anshumala

    22/03/2011 at 12:04 अपराह्न

    सही है दिखावो पर हर कोई रीझता है और उसे ही ज्यादा सच्चा सही मनाता है दुनिया प्रतिको के पीछे ही ज्यादा भागती है |

     
  10. सञ्जय झा

    22/03/2011 at 12:34 अपराह्न

    hum to prati din 'sugya-vachan' aur 'darshan-prashan' ke saath hi blog-jagat ghoomte hain.pranam.

     
  11. मंजुला

    22/03/2011 at 12:45 अपराह्न

    अन्धे को तो जैसे मांगी मुराद मिल गई। वह प्रसन्न हुआ और भक्त पर आशिर्वाद की झडी लगा दी। नकली भक्त असली से भी अधिक मोहक होता है। बहुत सही पन्तियाँ .. सिख देती एक अच्छी रचना शुभकामनाये मंजुला

     
  12. मनोज कुमार

    22/03/2011 at 3:49 अपराह्न

    एक प्रेरक व सीख देती रचना।

     
  13. RAJEEV KUMAR KULSHRESTHA

    22/03/2011 at 5:01 अपराह्न

    एक बेहद सार्थक दृष्टांत । वाकई साधु इंसान हो आप सुग्य जी

     
  14. सुज्ञ

    22/03/2011 at 5:12 अपराह्न

    राजीव जी,इतना बड़ा पद, इतनी बड़ी उपमा न दें आर्यश्रेष्ठ!!

     
  15. Satish Chandra Satyarthi

    22/03/2011 at 8:22 अपराह्न

    बड़ा ही प्रेरक प्रसंग दिया आपने… सीखने को बहुत कुछ है इसमें…आभार…

     
  16. सुशील बाकलीवाल

    22/03/2011 at 8:31 अपराह्न

    सार्थक जीवन दर्शन का ज्ञान देती संक्षिप्त कथा.

     
  17. Rahul Singh

    22/03/2011 at 8:40 अपराह्न

    खुली नजर और बंद आंख का खेल.

     
  18. Kailash C Sharma

    22/03/2011 at 8:46 अपराह्न

    यथार्थ दर्शन चिंतन के अभाव में हमारी आस्था, अंधो के समान है।…बहुत सही कहा है…बहुत प्रेरक प्रस्तुति..

     
  19. डॉ॰ मोनिका शर्मा

    22/03/2011 at 8:50 अपराह्न

    सार्थक बोधकथा….

     
  20. Roshi

    22/03/2011 at 9:20 अपराह्न

    hum sabhi ankho ke sath andhe hi hai

     
  21. राज भाटिय़ा

    23/03/2011 at 12:06 पूर्वाह्न

    अंध-समूह हम हे भारतिया जनता ओर ठग के बारे अब सब जान गये कोन हे….अब इस अंध-समूह को अकल हो तो इस ठग को पकड कर मारे

     
  22. सुज्ञ

    23/03/2011 at 2:09 पूर्वाह्न

    [co="red"]सभी मित्रों का प्रतिक्रिया के लिये आभार[/co]

     
  23. विशाल

    23/03/2011 at 9:41 पूर्वाह्न

    बहुत ही बढ़िया बोध कथा.आपकी रचनायों का अध्यात्मिक पुट दिल को छू लेता हैचंद गिने चुने ब्लॉग ही हैं यहाँ आकर कदम थम जातें है.सलाम.

     
  24. ज़ाकिर अली ‘रजनीश’

    23/03/2011 at 10:20 पूर्वाह्न

    होली के पर्व की अशेष मंगल कामनाएं। जानिए धर्म की क्रान्तिकारी व्‍याख्‍या।

     
  25. Patali-The-Village

    23/03/2011 at 4:17 अपराह्न

    बहुत ही बढ़िया बोध कथा| धन्यवाद|

     
  26. Global Agrawal

    23/03/2011 at 7:43 अपराह्न

    @नकली भक्त असली से भी अधिक मोहक होता है।सच में बड़ा ग्लोबल फंडा है हर क्षेत्र में फिट है……… सुपर हिट हैएक बोलीवुड फिल्म है "कांटे' ..[ये एक होलीवुड फिल्म "Reservoir Dogs " से कथित तौर पर प्रेरित बतायी जाती है] आपकी कथा पढ़ कर कांटे फिल्म का अंत याद आ गया

     
  27. Global Agrawal

    23/03/2011 at 7:46 अपराह्न

    @दुनिया प्रतिको के पीछे ही ज्यादा भागती है |अंशुमाला जी बिलकुल ठीक कह रहीं हैं , अगर लोग प्रतीक की जगह उनके पीछे छिपे लोजिक के पीछे भागें तो वे सही मायने में तार्किक कहलायेंगे

     
  28. सुज्ञ

    23/03/2011 at 8:00 अपराह्न

    गौरव जी,आपकी प्रतीकों की बात पर कथा में दिये प्रतीको की और ध्यान दिलाना चाहूंगा… ठग नें अंधो की झोली से आस्था का प्रतीक धन लेकर वहाँ विरोध के प्रतीक पत्थर रख दिये।

     
  29. Global Agrawal

    23/03/2011 at 8:00 अपराह्न

    दृढ दर्शन के अभाव वाली श्रद्धा को, सेवा परोपकार सरलता का स्वांग रच ठगने वाले लूटेरों से बचाना अति कठिन है। यथार्थ दर्शन चिंतन के अभाव में हमारी आस्था, अंधो के समान है। ठग उस आस्था का लूटेरा है जो हमें सरल-जीवन, सरल धर्म पालन, का प्रलोभन देकर उस रही सही आस्था को लूट्नें में सफल होता है। और हमें उन्मार्ग में चढा देता है।मैं इसको और ग्लोबल ढंग से समझ रहा हूँ…. सुज्ञ जी बताएं सही है या नहीं ?श्रृद्धा का मतलब किसी भी विषय या वाद में श्रृद्धा हो सकता है ना सरल धर्म पालन = में धर्म का अर्थ०१ कर्तव्य की पूर्ति, यानि कर्तव्य को पूरा करना। जो भी हमारी जिम्मेदारियां हैं उन्हें पूरा करना। धर्म इसी को कहते हैं०२ धर्म का अर्थ कर्मकांड नहीं होता, वह हमारे हृदय की संचित ऊर्जा है जो सबके कल्याण के लिए उद्यम करती है। ( विवेकानंद )….. हो सकता है ना ?

     
  30. Global Agrawal

    23/03/2011 at 8:15 अपराह्न

    हाँ… तो ठीक ही कहा ना मैंने ?.. उसके पीछे छिपे लोजिक के पीछे भागना चाहिए ?.. आप जो बताएँगे वो सही मानूंगा , वेरीफाई तो आप को ही करना है :))

     
  31. Global Agrawal

    23/03/2011 at 8:17 अपराह्न

    ये चर्चा तो लम्बी चलेगी लगती है .. मजा आयेगा 🙂

     
  32. सुज्ञ

    23/03/2011 at 8:18 अपराह्न

    गौरव जी,धर्म की परिभाषा की अपेक्षा से आपके दोनो मुद्दे सही है।किन्तु प्रस्तुत वाक्य समूह "सरल धर्म पालन" में यह कथित धर्म है,जिसमें दर्शन व लोजिक का अभाव हो और मात्र जीवन-नियमों का पुलिंदा हो जो मानव को पालन के बाध्य करने के लिये छोड दिया गया हो। और लोग माने की यह सब पालन करना सरल है। जबकि धर्म दुष्कर कृतव्यों और दुर्लभ संयम का विधान होता है। और कठिनता का स्पष्ठ लोजिक(दर्शन)होता है

     
  33. सुज्ञ

    23/03/2011 at 8:23 अपराह्न

    मैने आपके ब्लॉग पर इस पोस्ट की भूमिका में यह लिखा था………पारंपरिक जीवन-मूल्यों के दर्शन को समझे बिना जो आस्था रखते है वह आस्था कच्ची होती है। उसे कोई भी ठग लूट सकता है…

     
  34. सुज्ञ

    23/03/2011 at 8:29 अपराह्न

    गौरव जी,कथित धर्म ठग, सेवा परोपकार सरलता का ही स्वांग रचते है। ऐसे ठग आस्थावानों से भी अधिक मोहक होते है।वास्त्विक धर्म-पालन कठिन ही होता है, सहजता से संयम में रहना मुश्किल है। सहजता से व्यक्ति कभी सेल्फ कंट्रोल में रह ही नहीं सकता।

     
  35. Global Agrawal

    23/03/2011 at 8:32 अपराह्न

    हाँ बाकी सब तो ठीक है शायद ………@"सरल धर्म पालन" में यह कथित धर्म है,जिसमें दर्शन व लोजिक का अभाव हो और मात्र जीवन-नियमों का पुलिंदा हो जो मानव को पालन के बाध्य करने के लिये छोड दिया गया होइससे पूर्ण समाधान हुआ …लगता है यहीं गड़बड़ थी , बाद में दोबारा आ कर फिर से पढूंगा , कुछ गड़बड़ रही तो फिर दो चार सवाल पूछे जा सकता है :))इस बार तो ज्ञान प्राप्त हुआ …..आभार 🙂 बाकी इस पोस्ट से दिमाग में एक नया कांसेप्ट/सोच/फंडा चल रहा है जो एक दम ग्लोबल टाईप का है

     
  36. सुज्ञ

    23/03/2011 at 8:36 अपराह्न

    "दिमाग में एक नया कांसेप्ट/सोच/फंडा चल रहा है जो एक दम ग्लोबल टाईप का है" गौरव जी,प्रकाश में लाइए

     
  37. Global Agrawal

    23/03/2011 at 8:46 अपराह्न

    दिमाग की लाईट तो जले पहले, तब तो क्लियर उजाला हो :)) आपके पास तो अनुभव (ओरजिनल वाला ) + शब्द कोष (बढ़िया वाला ) ….मैं तो दोनों से पैदल हूँ :))कभी इसे साइकोलोजी के साथ मिक्स करके पोस्ट बनाऊंगा ..देखें कब होता है पूरा काम ?? :)लाइफ में इम्प्लीमेंट करके ही तो बनते हैं "हर सन्डे लाइफ के नए फंडे"🙂

     
  38. Global Agrawal

    23/03/2011 at 8:49 अपराह्न

    ~~~~अभी तो ये नयी कमेन्ट पालिसी~~~~~एक गैर जरूरी स्पष्टीकरण :मोडरेटर महोदय / लेखक महोदय ,वैसे तो मैंने जानबूझ कर अपने कमेंट्स में लिंक्स कुछ कम ही दिए हैंअगर आप को मेरे कमेन्ट विषय से बाहर लगे तो आप हटा सकते हैं , मैं खुद ही समझ जाऊँगा :([मुझे इस ब्लॉग की कमेन्ट पालिसी पता नहीं है इसलिए कह रहा हूँ]

     
  39. सुज्ञ

    23/03/2011 at 8:59 अपराह्न

    गौरव जी,आपके पास तो अनुभव (ओरजिनल वाला ) + शब्द कोष (बढ़िया वाला ) ….मैं तो इन दोनों की अपार कमी महसुस कर रहा हूँ और झेल भी रहा हूं।न तो तलस्पर्शी अनुभव है न शब्द भडार में उपयुक्त सामर्थ्यवान शब्द।गैर जरूरी स्पष्ठीकरण है। जिसे आपके कमेंट के महत्व का पता होगा वह तो स्वतः योग्य समझेगा। और जिसे आवश्यक्ता नहीं वो चाहे रखे या मिटाये, क्या फर्क पडता है।जिन्हें विचारों के आदान-प्रदान का महत्व पता है,वे ही ब्लॉगिंग के महत्व को जान सकते है। ब्लॉगिंग में टिप्पणी के बॉक्स का यही अर्थ है "विरोधी विचारधारा का स्वागत"

     
  40. सम्वेदना के स्वर

    23/03/2011 at 9:30 अपराह्न

    सुज्ञ जी,हमारे बैंकिंग क्षेत्र में भी कहा जाता है की जब किसी के हस्ताक्षर हू-ब-हू मिलते हों तो अपनी आँखें खोलकर एक बार फिर से जांच लो.. असत्य सत्य से भी सुन्दर और लुभावना होता है!!अच्छी और प्रेरक कथा!!

     
  41. Kunwar Kusumesh

    23/03/2011 at 10:02 अपराह्न

    सबक सिखाती बेहतरीन पोस्ट. वाह सुज्ञ जी.

     
  42. ZEAL

    24/03/2011 at 6:46 अपराह्न

    जो बइमान होते हैं , उनकी बुद्धि पर भ्रम का आवरण पड़ा होता है । अच्छे बुरे की पहचान खो देते हैं , चाटुकारों के वश में आकर अपना सब कुछ आसानी से गवां देते हैं । इसके विपरीत सत्य के मार्ग पर चलने वाले को कोई लोभ नहीं होता और उसे कोई कोई मूर्ख भी नहीं बना सकता , क्यूंकि उसकी विभेदक-बुद्धि सदैव उसका मार्ग दर्शन करती है।

     
  43. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

    25/03/2011 at 5:03 पूर्वाह्न

    सुन्दर बोधकथा – इसे कहते हैं, अन्धोंकी आँख में धूल झोंकना। संत कबीर के शब्द याद आ गये: माया तो ठगिनी बनी, ठगत फिरे सब देश,जो ठग या ठगनी ठगो, ता ठग को आदेश

     
  44. रजनीश तिवारी

    25/03/2011 at 5:17 अपराह्न

    बहुत अच्छी बोधकथा । ऐसे ठग आज की दुनिया में सफल भी हो जाते है धन को पत्थर में बदलने के कृत्य में, बहुत दुख होता है ।

     
  45. ललित ''अकेला''

    25/03/2011 at 5:21 अपराह्न

    सुज्ञ जी,बोध कथा शानदार है, शुभकामनाएँ।

     
  46. सदा

    25/03/2011 at 5:51 अपराह्न

    बहुत ही प्रेरक व सार्थक प्रस्‍तुति ।

     
  47. Kajal Kumar

    26/03/2011 at 10:59 अपराह्न

    आंख के अंधों को तो लूट लेना ही बेहतर है…

     
  48. Apanatva

    27/03/2011 at 3:51 अपराह्न

    asar chodne walee prerak katha….. sunder prastuti ke liye aabhar .

     
  49. सारा सच

    28/03/2011 at 5:48 अपराह्न

    nice

     
  50. देवेन्द्र पाण्डेय

    29/03/2011 at 10:13 अपराह्न

    अच्छा लगा पढ़कर। "नकली हितैषी असली से भी अधिक सगा लगता है." …बहुत सुंदर।

     
  51. rashmi ravija

    04/04/2011 at 1:10 पूर्वाह्न

    गहन चिंतन के लिए प्रेरित करती बढ़िया बोधकथा

     
  52. अमित शर्मा---Amit Sharma

    04/04/2011 at 1:33 अपराह्न

    नए संवत २०६८ विक्रमी की हार्दिक बधाई।नया साल आपके और आपके कुटुंब को आनंद प्रदायी हो।

     
  53. विरेन्द्र सिंह चौहान

    04/04/2011 at 8:33 अपराह्न

    कहानी के माध्यम से महत्त्व पूर्ण बात बताई.इसीलिए ये पसंद आई.आपको नवसंवत्सर की ढेरों शुभकामनाएँ….

     
  54. Vivek Jain

    05/04/2011 at 9:27 पूर्वाह्न

    अच्छी पोस्ट और आपको बधाई Vivek Jain vivj2000.blogspot.com

     
  55. सुज्ञ

    27/07/2012 at 4:42 अपराह्न

    आपकी सुस्थापित श्रद्धा को चुराने के लिए, सेवा, परोपकार और सरलता का स्वांग रचकर ठग, आपकी आस्था को लूटेने के लिए तैयार बैठे है। यथार्थ दर्शन चिंतन के अभाव में हमारा ज्ञान भी अंध है। अज्ञान का अंधापा हो तो अस्थिर आस्था जल्दी विचलित हो जाती है। अज्ञानता के कारण ही अपने समृद्ध दर्शन की कीमत हम नहीं जान पाते। डगमग़ श्रद्धा को सरल-जीवन, सरल धर्म के पालन का प्रलोभन देकर आसानी से ठगा जा सकता है। विचलित विचारी को गलत मार्ग पर डालना बड़ा आसान है। आस्था टूट जाने के भय में रहने वाले ढुल-मुल अंधश्रद्धालु को सरलता से आपस में लडाकर खत्म किया जा सकता है।

     
  56. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

    27/07/2012 at 9:32 अपराह्न

    यही हो रहा है। जितनी जल्दी आँख खुले बेहतर हो!

     

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