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कलियाँ खिलती है सावन में, पतझड़ में खिलो तो हम जानें॥

01 फरवरी
अनुकूल हवा में जग चलता, प्रतिकूल चलो तो हम जानें।
कलियाँ खिलती है सावन में, पतझड़ में खिलो तो हम जानें॥
तृप्तों को भोज दिया करते, मित्रों को जिमाना तुम जानो।
अनजानी भूख की चिंता में, भोजन त्यागो तो हम जानें॥
इस हंसती गाती दुनिया में, मदमस्त बसना तुम जानो।
मधु की मनुहारें मिलने पे, तुम गरल पियो तो हम जानें॥
मनमौजी बनकर जग रमता, संयम में रहना कठिन महा।
जो पानें में जीवन बीता, उसे भेंट चढाओ तो हम जानें॥
दमन तुम्हारा जग चाहता, और जगत हिलाना तुम जानो।
है लगन सभी की चढने में, स्कंध बढाओ तो हम जानें॥
इन लहरों का रुख देख-देख, जग की पतवार चला करती।
झंझावात भरे तूफानों में, तरणि को तिराओ तो हम जानें॥
अनुकूल हवा में जग चलता, प्रतिकूल चलो तो हम जानें।
कलियाँ खिलती है सावन में, पतझड़ में खिलो तो हम जानें॥
 
10 टिप्पणियाँ

Posted by on 01/02/2011 in बिना श्रेणी

 

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10 responses to “कलियाँ खिलती है सावन में, पतझड़ में खिलो तो हम जानें॥

  1. मनोज कुमार

    01/02/2011 at 7:51 अपराह्न

    विपरीत परिस्थितियों में जो राह बनाते हैं सच्चे विजेता तो वही होते हैं।

     
  2. ehsas

    01/02/2011 at 7:57 अपराह्न

    मनमौजी बनकर जग रमता, संयम में रहना कठिन महा।जो पानें में जीवन बीता, उसे भेंट चढाओ तो हम जानें॥सच्चाई बयान करती हुई सुन्दर रचना। आभार।

     
  3. राज भाटिय़ा

    02/02/2011 at 12:34 पूर्वाह्न

    अनुकूल हवा में जग चलता, प्रतिकूल चलो तो हम जानें।कलियाँ खिलती है सावन में, पतझड़ में खिलो तो हम जानें॥बहुत खुब जी…. बने बनाये रास्ते पर तो सभी चलते हे, अपना रास्ता खुद बनाओ तो जाने.धन्यवाद

     
  4. रंजना

    02/02/2011 at 3:11 अपराह्न

    तृप्तों को भोज दिया करते, मित्रों को जिमाना तुम जानो।अनजानी भूख की चिंता में, भोजन त्यागो तो हम जानें॥क्या बात कही है….रचना के भाव कला सौन्दर्य और प्रवाहमयता ने तो बस मन ही बाँध लिया है…अद्वितीय रचना…वाह !!!

     
  5. वाणी गीत

    02/02/2011 at 5:28 अपराह्न

    प्रतिकूल चलो तो हम जाने …हवा के साथ बहते तो बहुत हैं , विपरीत धारा में चल कर जीतो तो कोई बात है … सार्थक सन्देश !

     
  6. सतीश सक्सेना

    07/02/2011 at 11:00 पूर्वाह्न

    प्रतिकूल चलो तो हम जानें…..कोशिश अलग करने की रहती है मगर हर जगह जीत नहीं पाते हंसराज भाई और उस हार को जीत मानने की चेष्टा करते हुए अक्सर आगे बढ़ जाते हैं ! 🙂 बहुत प्यारी रचना है !शुभकामनायें आपको !

     
  7. smshindi By Sonu

    08/02/2011 at 7:45 अपराह्न

    बहुत ही सुंदर प्रस्तुति…. आपको वसंत पंचमी की ढेरों शुभकामनाएं!

     
  8. सदा

    09/02/2011 at 12:51 अपराह्न

    अनुकूल हवा में जग चलता, प्रतिकूल चलो तो हम जानें।कलियाँ खिलती है सावन में, पतझड़ में खिलो तो हम जानें॥बहुत ही सुन्‍दर बात कही है आपने …।

     
  9. CS Devendra K Sharma "Man without Brain"

    12/02/2011 at 12:21 पूर्वाह्न

    अनुकूल हवा में जग चलता, प्रतिकूल चलो तो हम जानें।कलियाँ खिलती है सावन में, पतझड़ में खिलो तो हम जानेंkyaaa baat hai…………

     
  10. ज़ाकिर अली ‘रजनीश’

    19/02/2011 at 4:29 अपराह्न

    सुझ भाई, बहुत ही प्रेरक रचना है। बधाई स्‍वीकारें।———ब्‍लॉगवाणी: ब्‍लॉग समीक्षा का एक विनम्र प्रयास।

     

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