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Monthly Archives: जनवरी 2011

संस्कार और हार ? -लघुकथा

गोपालदास जी के एक पुत्र और एक पुत्री थे। उन्हे अपने पुत्र के विवाह के लिये संस्कारशील पुत्रवधु की तलाश थी। किसी मित्र ने सुझाया कि पास के गांव में ही स्वरूपदास जी के एक सुन्दर सुशील कन्या है।
गोपालदास जी किसी कार्य के बहाने स्वरूपदास जी के घर पहूंच गये, कन्या स्वरूपवान थी देखते ही उन्हे पुत्रवधु के रूप में पसन्द आ गई। गोपालदास जी ने रिश्ते की बात चलाई जिसे स्वरूपदास जी ने सहर्ष स्वीकार किया। स्वरूपदास जी की पत्नी ने मिष्ठान भोजन आदि से आवभगत की।
संयोगवश स्वरूपदास जी की पत्नी के लिये उसी दिन एक नवसहर सोने का हार बनकर आया था। समधन ने बडे उत्साह से समधी को दिखाया, हार वास्तव में मोहक और सुन्दर था। गोपालदास जी ने जी भरकर उस हार की तारीफ की। तत्पश्चात कुछ देर बातो का दौर चला और फ़िर गोपालदास जी ने लौटने के लिये विदा लेकर अपने घर के लिये चल दिये।
सँयोग से चार दिन बाद ही स्वरूपदास जी की पत्नी को किसी समारोह में जाने की योजना बनी, और उन्हे वही हार पहनना था। उन्होने ड्रॉअर का कोना कोना छान मारा, पर हार नहीं मिला। सोचने लगी आखिर हार गया तो गया कहाँ? उसी क्षण स्वरूपदास जी की पत्नी के मन एक विचार कौँधा, कुछ निश्चय करते हुए स्वरूपदास जी को बताया कि हार तो गोपालदास जी चोरी कर गये है।
स्वरूपदास जी ने कहा भागवान! ठीक से देख, घर में ही कहीं होगा, समधी ऐसी हरक़त नहीं कर सकते। उसने कहा मैने सब जगह देख लिया है और मुझे पूरा यकीन है हार गोपाल जी ही ले गये है, हार देखते ही उनकी आंखे फ़टी रह गई थी। वे बडा घूर कर देख रहे थे, निश्चित ही हार तो समधी जी ही लेकर गये है।आप गोपाल जी के यहां जाईए और पूछ देखिए हार वहां से ही मिलेगा।
बडी ना-नुकर के बाद पत्नी की जिद्द के आगे स्वरूप जी को झुकना पडा और बडे भारी मन से वे गोपाल जी के घर पहूंचे। आचानक स्वरूप जी को घर आया देखकर गोपाल जी शंकित हो उठे कि क्या बात हो गई?
स्वरूपजी दुविधा में कि आखिर समधी से कैसे पूछा जाय? इधर उधर की बात करते हुए, साहस जुटा कर बोले- आप जिस दिन हमारे घर आए थे, उसी दिन घर एक हार आया था, वह मिल नहीं रहा।
कुछ क्षण के लिये गोपाल जी स्तब्ध हो गए, जरा विचार में पडे, और बोले अरे हाँ, ‘वह हार तो मैं लेकर आया था’, मुझे अपनी पुत्री के लिये ऐसा ही हार बनवाना था, अतः सुनार को सेम्पल दिखाने के लिये, मैं ही ले आया था। वह हार तो अब सुनार के यहां है। आप तीन दिन रुकिये और हार ले जाईए।
किन्तु असलियत में तो हार के बारे में पूछते ही गोपाल जी को आभास हो गया कि हो न हो समधन ने चोरी का इल्जाम लगाया है। उसी समय सुनार के यहां जाकर, देखे गये हार की डिज़ाइन के आधार पर सुनार को बिलकुल वैसा ही हार, मात्र दो दिन में तैयार करने का आदेश दे आए। तीसरे दिन सुनार के यहाँ से हार लाकर स्वरूप जी को सौपते हुए कहा, लिजिये सम्हालिये अपना हार।
घर आकर स्वरूप जी ने हार श्रीमति को सौपते हुए हक़िक़त बता दी। पत्नी ने कहा- मैं न कहती थी, हार गोपाल जी चोरी कर् गए है, बाकि सब तो बहाने मात्र है, भला कोई बिना बताए सोने का हार लेकर जाता है ? समधी सही व्यक्ति नहीं है, आप आज ही समाचार कर दिजिये कि यह रिश्ता नहीं हो सकता।
स्वरूप जी नें फ़ोन पर गोपाल जी को सूचना दे दी, गोपाल जी को आभास था ऐसा ही होना है वे कुछ न बोले।
सप्ताह बाद स्वरूप जी की पत्नी साफ सफ़ाई कर रही थी, उन्होने पूरा ड्रॉअर ही बाहर निकाला तो पिछे के भाग में से हार मिला, निश्चित करने के लिये कि यह पहला वाला हार है, दूसरा हार ढूढा तो वह भी था। दो हार थे। वह सोचने लगी, अरे यह तो भारी हुआ, समधी जी नें इल्जाम से बचने के लिये बिलकुल वैसा ही दूसरा हार बनवा कर दिया है।
तत्काल उसने स्वरूप जी को वस्तुस्थिति बताई और कहा, समधी जी तो बहुत उंचे खानदानी है। ऐसे समधी को खोना तो रत्न खोने के समान है। आप पुनः जाईए, उन्हें हार वापस लौटा कर और समझा बुझा कर रिश्ता पुनः जोड कर आईए। ऐसा रिश्ता बार बार नहीं मिलता।
स्वरूप जी पुनः दुविधा में फंस गये सफलता में उन्हें भी संदेह था पर सोचा कोशीश तो की ही चाहिए। ऐसे विवेकवान समधी से पुनः सम्बंध जोडने का एक प्रयास उन्हे भी उचित प्रतीत हो रहा था।
स्वरूप जी, गोपाल जी के यहां पहूँचे गोपाल जी समझ गये कि शायद अब पुराना हार मिल चुका होगा।
स्वरूप जी ने क्षमायाचना करते हुए हार सौपा और अनुनय करने लगे कि जल्दबाजी में हमारा निर्णय गलत था। आप हमारी भूलों को क्षमा कर दिजिए, और उस सम्बंध को पुनः कायम कीजिए।
गोपाल जी नें कहा, देखिए स्वरूप जी यह रिश्ता तो अब हो नहीं सकता, आपके घर में शक्की और जल्दबाजी के संस्कार है जो इस रिश्ते के कारण मेरे भी घर के संस्कारो को प्रभावित कर सकते है।

लेकिन मैं आपको निराश नहीं करूंगा। मैं अपनी बेटी का रिश्ता आपके बेटे के लिये देता हूँमेरी बेटी में वो संस्कार है जो आपके परिवार को निश्चित ही सुधार देने में सक्षम है। मुझे अपने संस्कारो पर ऐसा भरोसा है। और यह इसलिए कि जहाँ पहले रिश्ते में दो घर बिगडने की सम्भावनाएं थी, वहां यह नया रिश्ता दोनो घर सुधारने में सक्षम होगा। 

स्वरूप जी की आंखे ऐसा हितैषी सम्बन्धी पाकर छल छला आई।

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धर्म पर छद्मावरण

कुछ ने अपने तुच्छ लाभ के लिये तो कुछ ने मोहवश,मात्र धर्म के महिमामंडन के लिये, जाने-अनजाने में कईं कुरितियों का प्रक्षेप कर दिया। पहले तो वे कुरितियां प्रतीक रूप में आई व धीरे धीरे वे रुढ कर्म-कांड बन गई। और धर्म का ही आभास देने लगी। शुद्ध धर्म पर अशुद्ध आवरण बन छा गई और अन्ततः वे धर्म के मूल सिद्धान्तों के विरुद्ध विरोधाभास बनकर प्रकट हुई।
जगत के मानव हितार्थ प्रकाशित सरल सुबोध धर्म को, इन कुरितियों के छद्मावरण ने दुर्बोध दुष्कर बना दिया। और धर्मद्वेषियों को हथियार दे दिया।
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सज्ज्न बोलो दुर्गम पथ पर, तुम न चलोगे कौन चलेगा?

साधक बोलो दुर्गम पथ पर, तुम न चलोगे कौन चलेगा?
कदम कदम पर बिछे हुए है, तीखे तीखे कंकर कंटक।
मूढ मिथ्या व मायाचारी, फिरते यहाँ हैं वक्र वंचक॥
पर इन बाधाओ को बंधु, तुम न दलोगे कौन दलेगा?
सूरज कब का डूब चला है, रह गया अज्ञान अकेला।
चहुं ओर घोर तिमिर है, और निकट तूफानी बेला॥
किन्तु इस रजनी में दीपक, तुम न जलोगे कौन जलेगा?
नीलाम्बर में सघन घन का, दूर दूर आसार नहीं है।
उष्ण पवन है तप्त धरा है, कोई भी उपचार नहीं है॥
इस विकट वेला में तरूवर, तुम न फलोगे कौन फलेगा?
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Posted by on 19/01/2011 में बिना श्रेणी

 

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आज कल के चक्कर में ही, मानव जाता व्यर्थ छला…….

आज नहीं मैं कल कर लूंगा, जीवन में कोई काम भला।
आज कल के चक्कर में ही, मानव जाता व्यर्थ छला॥
इक दो पल नहीं लक्ष-कोटि नहीं, अरब खरब पल बीत गये।
अति विशाल सागर के जैसे, कोटि कोटि घट रीत गये।
पर्वत जैसा बलशाली भी, इक दिन ओले जैसा गला।
आज कल के चक्कर में ही, मानव जाता व्यर्थ छला॥
आज करे सो कर ले रे बंधु, कल की पक्की आश नहीं।
जीवन बहता तीव्र पवन सा, पलभर का विश्वास नहीं।
मौत के दांव के आगे किसी की, चलती नहीं है कोई कला।
आज कल के चक्कर में ही, मानव जाता व्यर्थ छला॥
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Posted by on 19/01/2011 में बिना श्रेणी

 

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दुर्गम पथ पर तुम न चलोगे कौन चलेगा?

साधक* बोलो दुर्गम पथ पर तुम न चलोगे कौन चलेगा?

कदम कदम पर बिछे हुए है, तीखे तीखे कंकर कंटक।
भ्रांत भयानक पूर्वाग्रह है, और फिरते हैं वंचक।
पर साथी इन बाधाओ को तुम न दलोगे कौन दलेगा?
सूरज कब का डूब चला है, रह गया अज्ञान अकेला।
चारो ओर घोर तिमिर है, और निकट तूफानी बेला।
फिर भी इस रजनी में दीपक, तुम न जलोगे कौन जलेगा?
अम्बर में सघनघन का, कोई भी आसार नहीं है।
उष्ण पवन है तप्त धरा है, कोई भी उपचार नहीं है।
इस विकट वेला में तरूवर, तुम न फलोगे कौन फलेगा?
* साधक = कर्तव्य पथिक


(यह गीत समर्पित है मेरे सदाचार व्याख्याता ब्लॉगर मित्रों को, जिनका वर्तमान माहोल मेँ ब्लॉगिंग से मोहभंग सा हो रहा है.)

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Posted by on 17/01/2011 में बिना श्रेणी

 

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पतंग की नियति

तंग, उँचा आसमान छूने के लिये अधीर। दूसरी पतंगो को मनमौज से झूमती इठलाती देखकर बेताब। किन्तु एक अनुशासन की डोर से बंधी हुई। सधे आधार से उडती-लहराती, फ़िर भी परेशान। आसमान तो अभी और शेष है। शीतल पवन के होते भी, अन्य पतंगो का नृत्य देख उपजी ईर्ष्या, उसे झुलसा रही थी। श्रेय की अदम्य लालसा और दूसरो से उँचाई पाने की महत्वाकांक्षा ने उसे बेकरार कर रखा था। स्वयं को तर्क देती, हाँ!‘प्रतिस्पृदा उन्नति के लिये आवश्यक है’।
किन्तु, उफ्फ!! यह डोर बंधन!! डोर उसकी स्वतंत्रता में बाधक थी। अपनी महत्वाकांक्षा पूर्ति के लिए, वह दूसरी पतंगो की डोर से संघर्ष करने लगी। इस घर्षण में उसे भी अतीव आनंद आने लगा। अब तो वह डोर से मुक्ति चाहती थी । अनंत आकाश में स्वच्छंद विचरण करना चाहती थी।
निरंतर घर्षण से डोर कटते ही, वह स्वतंत्र हो गई। सूत्रभंग के झटके ने उसे उंचाई की ओर धकेला, वह प्रसन्न हो गई। किन्तु यह क्या? वह उँचाई क्षण मात्र की थी। अब स्वतः उपर उठने के प्रयत्न विफल हो रहे थे। निराधार डोलती हुई नीचे गिर रही थी। सांसे हलक में अटक गई थी, नीचे गहरा गर्त, बडा डरावना भासित हो रहा था। उसे डोर को पुनः पाने की इच्छा जगी,किन्तु देर हो चुकी थी, डोर उसकी दृष्टि से ओझल हो चुकी थी। अन्तत: धरती पर गिर कर धूल धूसरित हो गई, पतंग।

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निष्फल है,निस्सार है॥

ज्ञान के बिना क्रिया।
दर्शन के बिना प्रदर्शन।
श्रद्धा के बिना तर्क।
आचार के बिना प्रचार।
नैतिकता के बिना धार्मिकता।
समता के बिना साधना।
दान के बिना धन।
शील के बिना शृंगार।
अंक के बिना शून्य सम।
निष्फल है,निस्सार है॥
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कटी पतंग

तंग, उँचा आसमान छूने के लिए अधीरदूसरी पतंगो को मनमौज से झूमती इठलाती देखकर मायुस। वह एक नियंत्रण की डोर से बंधी हुईसधे अनुशासन के आधार से उडती-लहराती, फ़िर भी परेशान। आसमान तो अभी और शेष थाशीतल समीर के उपरांत भी, अन्य पतंगो का नृत्य देख उपजीर्ष्या, उसे झुलसा रही थी। श्रेय की अदम्य लालसा और दूसरो से उँचाई पाने की महत्वाकांक्षा ने उसे बेकरार कर रखा था। स्वयं को तर्क देती, हाँ! प्रतिस्पर्धा ही तो उन्नति की सीढी है

किन्तु,फ्फ!! यह डोर बंधन!! डोर उसकी स्वतंत्रता में बाधक थी। अपनी महत्वाकांक्षा पूर्ति के लिए, वह दूसरी पतंगो की डोर से संघर्ष करने लगी। इस घर्षण में उसे भी अतीव आनंद आने लगा। अब तो  वह डोर से बस मुक्ति चाहती थी । अनंत आकाश में स्वच्छंद विचरण करना चाहती थी।
निरंतर घर्षण से डोर कटते ही, वह स्वतंत्र हो गई। सूत्रभंग के झटके ने उसे सहसा उंचाई की ओर धकेला, वह प्रसन्न हो गईकिन्तु यह क्या? वह उँचाई तो क्षण मात्र की थी। अब स्वयंमेव उपर उठने के सारे प्रयत्न विफल हो रहे थे। निरूपाय-निराधार डोलती हुई वह नीचे गिर रही थी। सांसे हलक में अटक गई थी, नीचे गहरा गर्त, बडा डरावना भासित हो रहा था। उसे डोर को पुनः पाने की प्रबल इच्छा जगी, किन्तु देर हो चुकी थी, डोर उसकी दृष्टि से ओझल हो चुकी थी। अन्तत: धरती पर गिर कर धूल धूसरित हो गई, पतंग

 

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निर्मल-संदेश

सेवा और समर्पण का कोई दाम नहीं है।
मानव तन होने से कोई इन्सान नहीं है।
नाम प्रतिष्ठा की चाहत छोडो यारों,
बड़बोलो का यहां अब काम नहीं है।
                  ***
बिना काम के यहाँ बस नाम चाहिए।
सेवा के बदले भी यहाँ इनाम चाहिए।
श्रम उठाकर भेजा यहाँ कौन खपाए?
मुफ़्त में ही सभी को दाम चाहिए॥
                  ***
आलोक सूर्य का देखो, पर जलन को मत भूलो।
चन्द्र पूनम का देखो, पर ग्रहण को मत भूलो।
किसी आलोचना पर होता तुम्हे खेद क्योंकर,

दाग सदा उजले पर लगे, इस चलन को मत भूलो॥

                  ***

 
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Posted by on 13/01/2011 में बिना श्रेणी

 

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नर-वीर

चोट खाकर रो पडे वो आदमी नादान है।

गिरते हुए गैर पर हँसना बड़ा आसान है।
थाम ले जो हाथ गिरते आदमी का,
बस आदमी होता वही इन्सान है॥
तन को निर्मल बना दे वह नीर होता है।
शान्ति से सहन करे वह धीर होता है।
क्रोध करने वाले में छिपी है कायरता,
समभावी क्षमाशील ही नर-वीर होता है॥
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Posted by on 12/01/2011 में बिना श्रेणी

 

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गहराना

विचार वेदना की गहराई

॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

दृष्टिकोण

दुनिया और ज़िंदगी के अलग-अलग पहलुओं पर हितेन्द्र अनंत की राय

मल्हार Malhar

पुरातत्व, मुद्राशास्त्र, इतिहास, यात्रा आदि पर Archaeology, Numismatics, History, Travel and so on

मानसिक हलचल

मैं, ज्ञानदत्त पाण्डेय, गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश (भारत) में ग्रामीण जीवन जी रहा हूँ। मुख्य परिचालन प्रबंधक पद से रिटायर रेलवे अफसर। वैसे; ट्रेन के सैलून को छोड़ने के बाद गांव की पगडंडी पर साइकिल से चलने में कठिनाई नहीं हुई। 😊

सुज्ञ

चरित्र विकास

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