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अनुकूल हवा में जग चलता, प्रतिकूल चलो तो हम जानें।

26 जनवरी

अनुकूल हवा में जग चलता, प्रतिकूल चलो तो हम जानें।

कलियाँ खिलती है सावन में, पतझड़ में खिलो तो हम जानें॥
तृप्तों को भोज दिया करते, मित्रों को जिमाना तुम जानो।
अनजानी भूख की चिंता में, भोजन त्यागो तो हम जानें॥
इस हंसती गाती दुनिया में, मदमस्त बसना तुम जानो।
मधु की मनुहारें मिलने पे, तुम गरल पियो तो हम जानें॥
मनमौजी बनकर जग रमता, संयम में रहना कठिन महा।
जो पानें में जीवन बीता, उसे भेंट चढाओ तो हम जानें॥
दमन तुम्हारा जग चाहता, और जगत हिलाना तुम जानो।
है लगन सभी की चढने में, स्कंध बढाओ तो हम जानें॥
इन लहरों का रुख देख-देख, जग की पतवार चला करती।
झंझावात भरे तूफानों में, तरणि को तिराओ तो हम जानें॥
अनुकूल हवा में जग चलता, प्रतिकूल चलो तो हम जानें।
कलियाँ खिलती है सावन में, पतझड़ में खिलो तो हम जानें॥
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60 टिप्पणियाँ

Posted by on 26/01/2011 in बिना श्रेणी

 

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60 responses to “अनुकूल हवा में जग चलता, प्रतिकूल चलो तो हम जानें।

  1. Roshi

    26/01/2011 at 11:47 अपराह्न

    anookool hava mein jag chalta ,,,pratikool chalo to hum jane;;;bahut sunder

     
  2. भारतीय नागरिक - Indian Citizen

    26/01/2011 at 11:51 अपराह्न

    bahut sundar, wah wah, aanand aa gaya..

     
  3. राज भाटिय़ा

    27/01/2011 at 2:55 पूर्वाह्न

    अति सुंदर रचना धन्यवाद

     
  4. डॉ॰ मोनिका शर्मा

    27/01/2011 at 5:23 पूर्वाह्न

    बहुत सुंदर …प्रेरणादायी भाव….

     
  5. Arvind Mishra

    27/01/2011 at 6:43 पूर्वाह्न

    पतझड़ में खिलो तो मैं जानू -पूरी कविता ही अर्थ्मूर्ण और भावमयी है सुज्ञ जी ..वाह को कबूलिये !

     
  6. Rahul Singh

    27/01/2011 at 7:54 पूर्वाह्न

    अनुकूल और सहज बने रहना भी आसान नहीं होता. प्रतिकूल की चाहत कभी-कभी रखें, वरना परिवर्तन कम, बवंडर अधिक होता है.

     
  7. सतीश सक्सेना

    27/01/2011 at 8:26 पूर्वाह्न

    अनुकूल हवा में जग चलता, प्रतिकूल चलो तो हम जानें।कई बार पढ़ी आपकी यह रचना …गुनगुनाने का दिल करता है ..शुभकामनायें आपको

     
  8. Mithilesh dubey

    27/01/2011 at 9:56 पूर्वाह्न

    इन लहरों का रुख देख-देख, जग की पतवार चला करती।झंझावात भरे तूफानों में, तरणि को तिराओ तो हम जानें॥बहुत खूब सुज्ञ भईया , नई उर्जा भर देने वाली रही आपकी ये रचना ।

     
  9. deepak saini

    27/01/2011 at 10:40 पूर्वाह्न

    प्रेरणादय एवं बेहद सुन्दर कविता मन से निकली बधाई को स्वीकार करें

     
  10. ज्ञानचंद मर्मज्ञ

    27/01/2011 at 10:43 पूर्वाह्न

    अनुकूल हवा में जग चलता, प्रतिकूल चलो तो हम जानें।कलियाँ खिलती है सावन में, पतझड़ में खिलो तो हम जानें॥नए तेवर के साथ भावपूर्ण रचना !

     
  11. सुशील बाकलीवाल

    27/01/2011 at 10:54 पूर्वाह्न

    उत्तम प्रस्तुति…

     
  12. प्रतुल वशिष्ठ

    27/01/2011 at 11:46 पूर्वाह्न

    .अनुकूल हवा में जग चलता, प्रतिकूल चलो तो हम जानें।कलियाँ खिलती है सावन में, पतझड़ में खिलो तो हम जानें॥@ अनुकूल टिप्पणी सब लेते, प्रतिकूल लेवो तो हम मानें. तुम दंड पेलते यौवन में, बल झड़ में पेलो तो हम मानें. ………. [ बल झड़ = बुढ़ापा] .

     
  13. प्रतुल वशिष्ठ

    27/01/2011 at 11:47 पूर्वाह्न

    .तृप्तों को भोज दिया करते, मित्रों को जिमाना तुम जानो।अनजानी भूख की चिंता में, भोजन त्यागो तो हम जानें॥ ……….. वाह ! @ जब त्याग करें भोजन अपना, अनजानी भूख की चिंता में. बिन भोजन भूख मिटे मेरी, ऐसा जो हो तो हम मानें. .

     
  14. प्रतुल वशिष्ठ

    27/01/2011 at 11:48 पूर्वाह्न

    .इस हँसती गाती दुनिया में, मदमस्त बसना तुम जानो।मधु की मनुहारें मिलने पे, तुम गरल पियो तो हम जानें॥ …… वाह जी वाह! @ मधु की मनुहारें मिलती हैं, अपशब्द गरल भी पीते हैं. इस हँसती गाती दुनिया में शत्रु पहचानो तो हम मानें. .

     
  15. प्रतुल वशिष्ठ

    27/01/2011 at 11:49 पूर्वाह्न

    .मनमौजी बनकर जग रमता, संयम में रहना कठिन महा।जो पानें में जीवन बीता, उसे भेंट चढाओ तो हम जानें॥@ जो देवि-देव पर भेंट चढ़े, उससे पण्डे का उदर बढ़े.ऎसी उदारता ठीक नहीं, अभाव भरो तो ही मानें. सब छूट जाएगा अंत समय, या बेटे ही छीनेंगे सब. जो होता हो खुद-बा-खुद ही, निर्लिप्त रहो तो हम मानें. .

     
  16. प्रतुल वशिष्ठ

    27/01/2011 at 11:50 पूर्वाह्न

    .दमन तुम्हारा जग चाहता, और जगत हिलाना तुम जानो।है लगन सभी की चढने में, स्कंध बढाओ तो हम जानें॥ …… बेहतरीन भाव.@ स्कंध बढ़ायेंगे हम भी, जब पापी मृत पड़ा होगा. कोमल भावों की डोली को दो ऋषि उठायें तो हम मानें..

     
  17. प्रतुल वशिष्ठ

    27/01/2011 at 11:51 पूर्वाह्न

    .इन लहरों का रुख देख-देख, जग की पतवार चला करती।झंझावात भरे तूफानों में, तरणि को तिराओ तो हम जानें॥@ मैं डूब गया इन भावों में विपरीत बोल-बोलकर के. इन वैचारिक तूफानों से, तुम मुझे निकालो तो मानें. .

     
  18. प्रतुल वशिष्ठ

    27/01/2011 at 11:51 पूर्वाह्न

    .अनुकूल हवा में जग चलता, प्रतिकूल चलो तो हम जानें।कलियाँ खिलती है सावन में, पतझड़ में खिलो तो हम जानें॥@ अनुकूल टिप्पणी सब लेते, प्रतिकूल लेवो तो हम मानें. तुम दंड पेलते यौवन में, बल झड़ में पेलो तो हम मानें..

     
  19. sanjay jha

    27/01/2011 at 11:54 पूर्वाह्न

    post to man-mohak hai hi….adarniye guruji ne iseaur bhi lajij kar diya hai…..jeh-nasib….pranam.

     
  20. वन्दना

    27/01/2011 at 12:21 अपराह्न

    अनुकूल हवा में जग चलता, प्रतिकूल चलो तो हम जानें।कलियाँ खिलती है सावन में, पतझड़ में खिलो तो हम जानें॥वाह वाह वाह! कोमल भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति………………बहुत पसन्द आयी।

     
  21. सुज्ञ

    27/01/2011 at 1:07 अपराह्न

    प्रतुल जी,कविता की अच्छी खासी गवेषणा हो गई, आभार@ अनुकूल टिप्पणी सब लेते, प्रतिकूल लेवो तो हम मानें.तुम दंड पेलते यौवन में, बल झड़ में पेलो तो हम मानें.- अनुकूल टिप्पणी साहस भरे,प्रतिकूल सहज सुधार करे।बलझड में आता धर्य बडा, योवन में दिखाओ तो हम जानें

     
  22. सुज्ञ

    27/01/2011 at 1:32 अपराह्न

    प्रतुल जी,@ जब त्याग करें भोजन अपना, अनजानी भूख की चिंता में.बिन भोजन भूख मिटे मेरी, ऐसा जो हो तो हम मानें. -मिटा किसी का दुख-पीड़न, अनजानी तृप्ति मिलती है।मन-इच्छित कार्य मगनता में, भूख न लगती हम जानें।@ मधु की मनुहारें मिलती हैं, अपशब्द गरल भी पीते हैं.इस हँसती गाती दुनिया में शत्रु पहचानो तो हम मानें.-अपशब्द गरल भी पीते हैं, नहीं ताड़न को फ़िर जीते है।मानहनन जब भूल चुके,अब शत्रु भुलें तो हम जानें॥@ जो देवि-देव पर भेंट चढ़े, उससे पण्डे का उदर बढ़े.ऎसी उदारता ठीक नहीं, अभाव भरो तो ही मानें.सब छूट जाएगा अंत समय, या बेटे ही छीनेंगे सब.जो होता हो खुद-बा-खुद ही, निर्लिप्त रहो तो हम मानें. -भेंट में भाव न देव-चढावे का, यहाँ छुपा भाव दिखावे का।ममत्व संग निर्लिप्त हों कैसे? यह समझ जगे तो हम जानें

     
  23. शारदा अरोरा

    27/01/2011 at 1:38 अपराह्न

    bahut sundar bahv abhivyakti

     
  24. सुज्ञ

    27/01/2011 at 1:57 अपराह्न

    प्रतुल जी,@ स्कंध बढ़ायेंगे हम भी, जब पापी मृत पड़ा होगा.कोमल भावों की डोली को दो ऋषि उठायें तो हम मानें.अब शत्रु से खतरा नहीं, अर्थी को कंधा सब देते।पतित भी पावन बने,करें स्पर्धी हित तो हम जानें।@ मैं डूब गया इन भावों में विपरीत बोल-बोलकर के.इन वैचारिक तूफानों से, तुम मुझे निकालो तो मानें.सहज आवेश चला आता, जब द्वेष दूर न हो मन से।शान्त-चित विचारों से, निरूपण करो तो हम जानें।

     
  25. Udan Tashtari

    27/01/2011 at 4:31 अपराह्न

    बहुत सुन्दर!

     
  26. Kunwar Kusumesh

    27/01/2011 at 5:35 अपराह्न

    अनुकूल हवा में जग चलता, प्रतिकूल चलो तो हम जानेंपहली पंक्ति ही बड़ी सारगर्भित है. वाह वाह.

     
  27. चला बिहारी ब्लॉगर बनने

    27/01/2011 at 8:24 अपराह्न

    बड़ी कठिन परीक्षा रखी है आपने, हंसराज जी.. सारे विषयों में पास हो जाऊँ ऐसा लगता नहीं.. लेकिन कुछ बातें तो प्रकृति का नियम है जैसे पतझड़ में फूलों का मुरझाना और बहारों में खिलना.. अब इस नियम के विपरीत क्यों… बाकी बातें तो सही हैं!! कुछ का अनुपालन हो जाता है, सभी का नहीं, इसे स्वीकारोक्ति मानें!!

     
  28. सुज्ञ

    27/01/2011 at 8:33 अपराह्न

    सलील जी,पतझड़ और बहार तो प्रतीक है, बिंब है। खुशीयों में सभी मुस्कराते है, दुख के अवसर पर मुस्कराएं तो बात बनें।सभी का अनुपालन हो ही जाय कठिन है, यह स्वीकारोक्ति मैं भी करता हूँ। बस बार बार स्मृति में रखने के लिये दोहराता हूँ।

     
  29. विरेन्द्र सिंह चौहान

    27/01/2011 at 8:47 अपराह्न

    आपकी रचना लाजवाब। प्रतुल जी कुछ और पंक्तिया जोड़ी और फ़िर आपने चंद पंक्तिया लिखी। आप दोनो के बीच की ये प्रतिस्पर्धा बहुत ही ज्ञानवर्धक रही। इसके आप मेरी तरफ़ से बधाई के पात्र हैं।

     
  30. विरेन्द्र सिंह चौहान

    27/01/2011 at 8:56 अपराह्न

    'सुज्ञ जी' आज मैं 'निरामिष' ब्लॉग पर भी गया था। इस ब्लॉग की शुरुआत एक स्वागतयोग्य कदम है। आप निशचय ही सफल होंगे। ऐसा मेरा विश्वास है। टिप्पढ़ीकर्ता के रूप में, मैं हमेशा उस ब्लॉग पर आता रहूँगा। जैसे ही कुछ फुर्सत मिलेगी या लगेगा कि यहाँ मुझे कुछ कहना चाहिए तो मैं जरूर लिखूगा। आपके निमंत्रण के लिए आपका आभारी हूँ।

     
  31. मनोज कुमार

    27/01/2011 at 10:36 अपराह्न

    धारा के विपरीत जो सार्थक कदम बढाते हैं वि ही रेगिस्तान में बहार ला सकते हैं।बहुत अच्छी रचना।

     
  32. rashmi ravija

    27/01/2011 at 11:40 अपराह्न

    अनुकूल हवा में जग चलता, प्रतिकूल चलो तो हम जानें।सच धारा के विपरीत चलना ही सबसे दुष्कर है…पर महान भी वही लोग होते हैं जो प्रतिकूल चलने की हिम्मत रखते हैं.बहुत ही सार्थक कविता

     
  33. दीप्ति शर्मा

    28/01/2011 at 10:00 पूर्वाह्न

    bahut sunder prastuti.

     
  34. प्रतुल

    28/01/2011 at 1:25 अपराह्न

    .मिटा किसी का दुख-पीड़न, अनजानी तृप्ति मिलती है।मन-इच्छित कार्य मगनता में, भूख न लगती हम जानें। …………… सुन्दर अति सुन्दर.

     
  35. प्रतुल

    28/01/2011 at 1:25 अपराह्न

    …अपशब्द गरल भी पीते हैं, नहीं ताड़न को फ़िर जीते है।मान हनन जब भूल चुके, अब शत्रु भुलें तो हम जानें॥ ……. इसने भी निरुत्तर कर दिया.

     
  36. प्रतुल

    28/01/2011 at 1:28 अपराह्न

    …भेंट में भाव न देव-चढावे का, यहाँ छुपा भाव दिखावे का।ममत्व संग निर्लिप्त हों कैसे? यह समझ जगे तो हम जानें…………. आपने सही कहा. पर मेरा भाव यहाँ 'दान दिया' जैसा भाव भी लिप्तता का सुख देता है – से है. मैंने ब्लड डोनेट किया … मैं इस बात को दस जगह गाता फिरा तो कैसी निर्लिप्तता. मेरा यहाँ निर्लिप्तता से तात्पर्य … भेंट चढाने वाले की मानसिकता को ध्यान में रखकर उसपर कटाक्ष करना था. 'वह फिर भी लिप्त ही रहता है उसे 'कीर्ति सुख' चाहिये, उसका दस लोग आभार ज्ञापन करें.

     
  37. sada

    28/01/2011 at 1:28 अपराह्न

    अनुकूल हवा में जग चलता, प्रतिकूल चलो तो हम जानें।कलियाँ खिलती है सावन में, पतझड़ में खिलो तो हम जानें॥वाह …बहुत ही सुन्‍दर भावों को प्रस्‍तुत किया है इस रचना में …आभार ।

     
  38. प्रतुल

    28/01/2011 at 1:29 अपराह्न

    .अब शत्रु से खतरा नहीं, अर्थी को कंधा सब देते।पतित भी पावन बने, करें स्पर्धी हित तो हम जानें।………….. आपकी हाजिर जवाबी का कायल हुआ. विषय कुछ जरूर दिशा बदल गया.

     
  39. प्रतुल

    28/01/2011 at 1:34 अपराह्न

    …सहज आवेश चला आता, जब द्वेष दूर न हो मन से।शान्त-चित विचारों से, निरूपण करो तो हम जानें। ….. मुझे योगदर्शन का सूत्र ध्यान आ गया : "योगः चित्तवृत्ति निरोधः" . यदि स्वयं को परम सत्ता से जोड़ना है तो समस्त शारीरिक और मानसिक व्यापारों को रोकना होगा." आपसे मार्गदर्शन मिले तो लाभ ही लाभ है – यह जान गया. .

     
  40. सुज्ञ

    28/01/2011 at 7:11 अपराह्न

    प्रतुल जी,योगदर्शन का यह सूत्र हर दशा में जीवन के उपयुक्त है…।"योगः चित्तवृत्ति निरोधः" इसी शिक्षा से हम प्रवृति में भी निर्लिप्त रह सकते है। प्रवृत रहते हुए भी हम अनावश्यक चित्तवृत्ति का निरोध करें।

     
  41. महेन्द्र मिश्र

    28/01/2011 at 7:17 अपराह्न

    बहुत सुन्दर रचना प्रस्तुति.. बधाई सुज्ञ जी

     
  42. सम्वेदना के स्वर

    28/01/2011 at 8:31 अपराह्न

    आपकी हर पोस्ट दीवार पर सजा कर रखने योग्य होती है.. ताकि प्रतिकूल परिस्थितियों में बल प्राप्त होता रहे!!

     
  43. क्षितिजा ....

    29/01/2011 at 12:29 पूर्वाह्न

    तृप्तों को भोज दिया करते, मित्रों को जिमाना तुम जानो।अनजानी भूख की चिंता में, भोजन त्यागो तो हम जानें॥निशब्द हूँ में रचना पढ़ कर … बहुत खूबसूरत शब्द दिए हैं भावों को … आभार

     
  44. amit-nivedita

    29/01/2011 at 11:39 पूर्वाह्न

    bahut hi shaandaar…

     
  45. Kunwar Kusumesh

    29/01/2011 at 12:52 अपराह्न

    सुज्ञ जी,अभी आपकी पोस्ट दुबारा पढ़ रहा था.अचानक किसी का एक बड़ा प्यारा शेर याद आ गया,आप भी देखिये,बहुत मौजूं है:-खामोश हवा बेशक तूफां की निशानी है.ये नाव हमें फिर भी उस पार लगानी है.

     
  46. रंजना

    29/01/2011 at 5:20 अपराह्न

    वाह वाह वाह…लाजवाब रचना…मन मुग्ध कर लिया इस रचना ने…आनंद आ गया पढ़कर…आभार…बहुत बहुत आभार..

     
  47. daanish

    29/01/2011 at 5:29 अपराह्न

    इन लहरों का रुख देख-देख, जग की पतवार चला करती।झंझावात भरे तूफानों में, तरणि को तिराओ तो हम जानें॥ज़िंदगी के हर रुख सेवाकिफ़,, काव्य का एक-एक लफ्ज़बहुत ही सुलझा हुआ सन्देश दे रहा हैवाह !!

     
  48. कुमार राधारमण

    30/01/2011 at 6:04 अपराह्न

    यह चुनौती नहीं प्रेरणा है-स्वयं को प्रतिकूल परिस्थितियों के लिए भी तैयार रखने के लिए।

     
  49. ZEAL

    30/01/2011 at 6:05 अपराह्न

    तृप्तों को भोज दिया करते, मित्रों को जिमाना तुम जानो।अनजानी भूख की चिंता में, भोजन त्यागो तो हम जानें॥ यही सच्चा त्याग है। .

     
  50. उपेन्द्र ' उपेन '

    31/01/2011 at 10:12 पूर्वाह्न

    सुज्ञ जी, बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति. सच असल परीक्षा तो विपरीत धारा मेँ ही होती है.

     
  51. mridula pradhan

    31/01/2011 at 11:19 अपराह्न

    अनुकूल हवा में जग चलता, प्रतिकूल चलो तो हम जानें।कलियाँ खिलती है सावन में, पतझड़ में खिलो तो हम जानें॥bahut sunder likhe hain.

     
  52. Rakesh Kumar

    26/02/2011 at 12:18 पूर्वाह्न

    "अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः"(गीता अ.१५ श्.१४ )सभी प्राणियों की भूख में परमात्मा विद्यमान है.दूसरों की भूख को तृप्त करने में जो आनंद मिलता है वह परमार्थिक आनंद है और वह तो वही जान सकता है जिसने ऐसा किया हो.अति उच्च भावों को संप्रेषित करती हुई आपकी रचना के लिए आपका बहुत बहुत आभार .

     
  53. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

    05/12/2012 at 6:48 पूर्वाह्न

    वाह! क्या बात है!

     
  54. सतीश सक्सेना

    24/06/2013 at 9:05 अपराह्न

    इस हंसती गाती दुनिया में, मदमस्त बसना तुम जानो।मधु की मनुहारें मिलने पे,तुम गरल पियो तो हम जानें॥वा वाह …वा वाह

     
  55. Madan Mohan saxena

    25/07/2013 at 2:51 अपराह्न

    अनुकूल हवा में जग चलता, प्रतिकूल चलो तो हम जानें।कलियाँ खिलती है सावन में, पतझड़ में खिलो तो हम जानें॥बहुत अद्भुत अहसास…सुन्दर प्रस्तुति

     
  56. ब्लॉग बुलेटिन

    08/10/2013 at 5:17 अपराह्न

    ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन गुनाह किसे कहते हैं ? मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है … सादर आभार !

     
  57. सुज्ञ

    08/10/2013 at 6:45 अपराह्न

    रशमि जी, आपका बहुत बहुत आभार!!

     
  58. ajay yadav

    08/10/2013 at 8:54 अपराह्न

    बहुत ही खूबसूरत ,अदभुत रचना |

     
  59. कालीपद प्रसाद

    08/10/2013 at 10:42 अपराह्न

    बहुत खुबसूरत यज्ञ जी latest post: कुछ एह्सासें !

     

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