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सज्ज्न बोलो दुर्गम पथ पर, तुम न चलोगे कौन चलेगा?

19 जनवरी
साधक बोलो दुर्गम पथ पर, तुम न चलोगे कौन चलेगा?
कदम कदम पर बिछे हुए है, तीखे तीखे कंकर कंटक।
मूढ मिथ्या व मायाचारी, फिरते यहाँ हैं वक्र वंचक॥
पर इन बाधाओ को बंधु, तुम न दलोगे कौन दलेगा?
सूरज कब का डूब चला है, रह गया अज्ञान अकेला।
चहुं ओर घोर तिमिर है, और निकट तूफानी बेला॥
किन्तु इस रजनी में दीपक, तुम न जलोगे कौन जलेगा?
नीलाम्बर में सघन घन का, दूर दूर आसार नहीं है।
उष्ण पवन है तप्त धरा है, कोई भी उपचार नहीं है॥
इस विकट वेला में तरूवर, तुम न फलोगे कौन फलेगा?
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3 टिप्पणियाँ

Posted by on 19/01/2011 in बिना श्रेणी

 

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3 responses to “सज्ज्न बोलो दुर्गम पथ पर, तुम न चलोगे कौन चलेगा?

  1. रश्मि प्रभा...

    19/01/2011 at 6:12 अपराह्न

    कदम कदम पर बिछे हुए है, तीखे तीखे कंकर कंटक।मूढ मिथ्या व मायाचारी, फिरते यहाँ हैं वक्र वंचक॥पर इन बाधाओ को बंधु, तुम न दलोगे कौन दलेगा?mujhe lag raha hai jayshanker prasad ko padh rahi hun

     
  2. Arvind Mishra

    19/01/2011 at 9:48 अपराह्न

    वाह गजब का उदबोधन !

     
  3. राज भाटिय़ा

    19/01/2011 at 10:02 अपराह्न

    कदम कदम पर बिछे हुए है, तीखे तीखे कंकर कंटक।मूढ मिथ्या व मायाचारी, फिरते यहाँ हैं वक्र वंचक॥पर इन बाधाओ को बंधु, तुम न दलोगे कौन दलेगा?सत्य वचन जी धन्यवाद

     

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