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पतंग की नियति

15 जनवरी
तंग, उँचा आसमान छूने के लिये अधीर। दूसरी पतंगो को मनमौज से झूमती इठलाती देखकर बेताब। किन्तु एक अनुशासन की डोर से बंधी हुई। सधे आधार से उडती-लहराती, फ़िर भी परेशान। आसमान तो अभी और शेष है। शीतल पवन के होते भी, अन्य पतंगो का नृत्य देख उपजी ईर्ष्या, उसे झुलसा रही थी। श्रेय की अदम्य लालसा और दूसरो से उँचाई पाने की महत्वाकांक्षा ने उसे बेकरार कर रखा था। स्वयं को तर्क देती, हाँ!‘प्रतिस्पृदा उन्नति के लिये आवश्यक है’।
किन्तु, उफ्फ!! यह डोर बंधन!! डोर उसकी स्वतंत्रता में बाधक थी। अपनी महत्वाकांक्षा पूर्ति के लिए, वह दूसरी पतंगो की डोर से संघर्ष करने लगी। इस घर्षण में उसे भी अतीव आनंद आने लगा। अब तो वह डोर से मुक्ति चाहती थी । अनंत आकाश में स्वच्छंद विचरण करना चाहती थी।
निरंतर घर्षण से डोर कटते ही, वह स्वतंत्र हो गई। सूत्रभंग के झटके ने उसे उंचाई की ओर धकेला, वह प्रसन्न हो गई। किन्तु यह क्या? वह उँचाई क्षण मात्र की थी। अब स्वतः उपर उठने के प्रयत्न विफल हो रहे थे। निराधार डोलती हुई नीचे गिर रही थी। सांसे हलक में अटक गई थी, नीचे गहरा गर्त, बडा डरावना भासित हो रहा था। उसे डोर को पुनः पाने की इच्छा जगी,किन्तु देर हो चुकी थी, डोर उसकी दृष्टि से ओझल हो चुकी थी। अन्तत: धरती पर गिर कर धूल धूसरित हो गई, पतंग।

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6 responses to “पतंग की नियति

  1. सतीश सक्सेना

    15/01/2011 at 10:55 अपराह्न

    बड़ा सुन्दर प्रसंग ….हम सबके लिए सबक देता हुआ ! अनुशासन चाहे स्वयं का ही क्यों न हो बेहद आवश्यक है ! शुभकामनायें आपको !

     
  2. राज भाटिय़ा

    15/01/2011 at 11:27 अपराह्न

    वाह पंतग के माध्यम से आप ने बहुत सुंदर बात कह दी, पहले घरो मे बेटियो को ऎसी ही शिक्षा देते थे, आज तो बेटिया बहुत समझ दार ओर क्माऊ हो गई हे,ओर वो भी आजादी चाहती हे, बंधन से

     
  3. सुज्ञ

    15/01/2011 at 11:44 अपराह्न

    राज साहब,बेटे या बेटियां ही क्यों, हम सभी अनुशासन से मुक्त होना चाहते है,हमारा मन चंचलता से उन्मुक्त हो स्वच्छंदता चाहता है। जीवन नियमों को ही नहीं कुदरत के नियमों को भी तोड देना चाहते है।हमें हमारे लिये जीवन उपयोगी आधार सम डोर-बंधन भी पसंद नहीं।

     
  4. अमित शर्मा

    16/01/2011 at 11:06 पूर्वाह्न

    यदि स्वछन्द प्रकृति के व्यक्ति को पतन्ग माने और समाज को डोर तो कथा का सारा अभिप्राय प्रकट हो जाता है……………… उत्तम अभिव्यति प्रकाशन के लिए आभार !!!!!!!

     
  5. रश्मि प्रभा...

    17/01/2011 at 12:16 अपराह्न

    पतंग की नियति/सार्थक पुरूषार्थ…bahut achhi rachnayen … kripya ise vatvriksh ke liye bhejen rasprabha@gmail.com parichay tasweer blog link ke saath

     
  6. रंजना

    18/01/2011 at 3:59 अपराह्न

    पतंग और डोर के माध्यम से जीवन दर्शन प्रस्तुत कर दिया आपने…सही… बहुत बहुत सही…अपरिमित अभिलाषा और स्वच्छंदता नाश का कारण बनती है..

     

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