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सार्थक पुरूषार्थ

12 जनवरी
जो सोते है उनकी किस्मत भी सोती है
श्रम से ही तो कल्पना साकार होती है
बंद कर बैठे रहे जो सारी खिड़कियां
भरी दोपहर उन घरो में रात होती है
रोशनी मांगने से उधार नहीं मिलती।
बैठे रहने से जीत या हार नहीं मिलती।
असफलताओ से  निराश क्या होना?
पतझड के आए बिन बहार नहीं खिलती।
सपनो में खोना, छूना परछाई होता है।
पुरूषार्थ भरा जीवन ही सच्चाई होता है।
सोते हुओं की नाप लो तुम मात्र लम्बाई,
जगे हुओं का नाप सदैव उँचाई होता है॥

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4 टिप्पणियाँ

Posted by on 12/01/2011 in बिना श्रेणी

 

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4 responses to “सार्थक पुरूषार्थ

  1. मनोज भारती

    12/01/2011 at 8:23 अपराह्न

    एक प्रेरक कविता !!! बधाई !

     
  2. अनामिका की सदायें ......

    12/01/2011 at 10:47 अपराह्न

    bahut hi prerak bhaav bharti rachna. aabhar.

     
  3. राज भाटिय़ा

    12/01/2011 at 11:15 अपराह्न

    बहुत सुंदर बात कही आप ने, धन्यवाद

     
  4. RAJEEV KUMAR KULSHRESTHA

    13/01/2011 at 8:42 पूर्वाह्न

    निसंदेह ।यह एक प्रसंशनीय प्रस्तुति है ।धन्यवाद । satguru-satykikhoj.blogspot.com

     

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं यह ब्लॉग लिखने के अलावा गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। रेलवे से ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर्ड अफसर।

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