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सन्देश !!

11 जनवरी
सेवा और समर्पण का कोई दाम नहीं है।
मानव तन होने से कोई इन्सान नहीं है।
नाम प्रतिष्ठा की चाहत छोडो यारों,
बड़बोलो का यहां अब काम नहीं है।
                  ***
बिना काम के यहाँ बस नाम चाहिए।
सेवा के बदले भी यहाँ इनाम चाहिए।
श्रम उठाकर भेजा यहाँ कौन खपाए?
मुफ़्त में ही सभी को दाम चाहिए॥
                  ***
आलोक सूर्य का देखो, पर जलन को मत भूलो।
चन्द्र पूनम का देखो, पर ग्रहण को मत भूलो।
किसी आलोचना पर होता तुम्हे खेद क्योंकर,

दाग सदा उजले पर लगे, इस चलन को मत भूलो॥

                  ***

 
30 टिप्पणियाँ

Posted by on 11/01/2011 in बिना श्रेणी

 

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30 responses to “सन्देश !!

  1. राज भाटिय़ा

    11/01/2011 at 2:06 पूर्वाह्न

    क्या बात हे जी बहुत सच सच लिख रहे हे आज कल , राम राम

     
  2. Rahul Singh

    11/01/2011 at 7:04 पूर्वाह्न

    दाग, शुभंकर और छींटें सुंदर भी होते हैं.

     
  3. Kunwar Kusumesh

    11/01/2011 at 8:35 पूर्वाह्न

    कविताओं के ज़रिये अच्छा व्यंग

     
  4. सतीश सक्सेना

    11/01/2011 at 9:28 पूर्वाह्न

    लग रहा है आपने आसपास के लोगों का चरित्र पढ़ रहे हैं ! आखिरी लाइने हमेशा याद रहेंगी आजके समय में यही सत्य है ! शुभकामनायें !

     
  5. deepak saini

    11/01/2011 at 10:48 पूर्वाह्न

    सुज्ञ जी, आज तो अंदाज ही निराले है।श्रम उठाकर भेजा यहाँ कौन खपाए?मुफ़्त में ही सभी को दाम चाहिए॥किसी आलोचना पर होता तुम्हे खेद क्योंकर,दाग सदा उजले पर लगे, इस चलन को मत भूलो॥सत्य वचन

     
  6. ajit gupta

    11/01/2011 at 11:03 पूर्वाह्न

    दाग सदा उजले पर लगे इस चलन को मत भूलो। एकदम सटीक है। बढिया हैं मुक्‍तक।

     
  7. प्रतुल वशिष्ठ

    11/01/2011 at 11:07 पूर्वाह्न

    .किसी आलोचना पर होता तुम्हे खेद क्योंकर,दाग सदा उजले पर लगे, इस चलन को मत भूलो॥@ 'दाग' भी हाईलाइट हो जाता है उजले दामन पर लगकर. 'आलोचना' भी व्यर्थ की .. जी ही लेती है कुछ सिमटकर. .

     
  8. प्रतुल वशिष्ठ

    11/01/2011 at 11:08 पूर्वाह्न

    इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

     
  9. प्रतुल वशिष्ठ

    11/01/2011 at 11:09 पूर्वाह्न

    .आहत मन को … तसल्ली देने के लिये ये बातें अच्छी हैं. अन्यथा मैंने देखा है गदले चरित्र पर यदि कोई उजला दाग लग जाता है उसे वे मेडल बता घूमते हैं. एक गेरुआ वस्त्र के भिखारी के पाँव इलाहाबाद में कभी इंदिरा गांधी ने छू लिये थे वह साधुओं की पंगत में बैठ गया था. दरअसल वह अफीमची था, दाड़ी बड़ी होने के कारण उसे साधु समझ लिया गया था. जीवन भर उसने इस प्रकरण को गाया. उसके लिये वह गदले वस्त्र पर मेडल की ही तरह था. बाक़ी भिखारी उसका बेहद सम्मान करते रहे. [सत्य घटना].

     
  10. anshumala

    11/01/2011 at 11:31 पूर्वाह्न

    सच और सही बात कही आप ने

     
  11. Gourav Agrawal

    11/01/2011 at 5:27 अपराह्न

    सुज्ञ जीआश्चर्य !! आपकी सभी पोस्ट सभी को समझ में आ रही है उम्मीद है ब्लॉग जगत में अब कोई पंगा नहीं होगा :))

     
  12. Gourav Agrawal

    11/01/2011 at 5:39 अपराह्न

    लेख पर कमेन्ट : शुरूआती दो पेराग्राफ बड़े मस्त लगे 🙂

     
  13. सुज्ञ

    11/01/2011 at 6:09 अपराह्न

    गौरव जी,उम्मीद है ब्लॉग जगत में अब कोई पंगा नहीं होगा :))यह मेरी गारंटी थोडे ही है? :)) हां, यह विश्वास दिला सकता हूँ मैं, पंगा पड भी गया तो जल्द दूर हट जाउँगा।

     
  14. Gourav Agrawal

    11/01/2011 at 6:13 अपराह्न

    @सुज्ञ जी,ओहो,ये बात तो सभी समझने वालों को सोचनी है :))

     
  15. Gourav Agrawal

    11/01/2011 at 6:40 अपराह्न

    @सुज्ञ जीएक प्रश्न है …. "सच हमेशा कड़वा होता है" क्या ये सही है ? इस बारे में आप क्या सोचते हैं

     
  16. सुज्ञ

    11/01/2011 at 6:49 अपराह्न

    गौरव जी,यह सापेक्ष कथन है कि "सच हमेशा कड़वा होता है"सच छुपाने में प्रयासरत के सामने वही सच उजागर किया जाय तो उसके लिये कडवा होगा।आज हम झूठ के इतने अभ्यस्त हो गये हैं, सच दृष्टि में आते ही बेस्वाद या कडवा लगता है।

     
  17. Gourav Agrawal

    11/01/2011 at 7:00 अपराह्न

    @सुज्ञ जीवाह ! एक दम सारगर्भित और सीधी मन तक पहुँचने वाली बात कही है आपने , हमेशा की तरहकृपया एक बढ़िया सा "लाइफ का फंडा" मेरे ब्लॉग पर भी विचारों के रूप में दें तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा

     
  18. सुज्ञ

    11/01/2011 at 7:09 अपराह्न

    गौरव जी,आपने सम्मान दिया, आपका आभार!! एक माइक्रो पोस्ट डालिये, कोई न कोई "लाइफ का फंडा" का डाल ही दुंगा। फिर पता नहीं सही बैठे या गलत्।:))

     
  19. सुज्ञ

    11/01/2011 at 7:12 अपराह्न

    प्रतुल जी,आपके विचार सटीक व सार्थक है। बस सिक्के का दूसरा पहलू है।

     
  20. मनोज कुमार

    11/01/2011 at 9:47 अपराह्न

    बहुत सुंदर और प्रेरक बातें। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!‘मंहगाई मार गई..!!

     
  21. कुमार राधारमण

    11/01/2011 at 9:53 अपराह्न

    सही कह रहे हैं। पर जीवन की आपाधापी में कौन किसकी सुनता है!

     
  22. सम्वेदना के स्वर

    11/01/2011 at 10:29 अपराह्न

    सुज्ञ जी! चारों तरफ आपा धापी के माहौल में यहाँ आकर एक स्वर्गिक आनंद आता है!!

     
  23. सुज्ञ

    11/01/2011 at 10:37 अपराह्न

    सम्वेदना बंधु,आपकी इस एक टिप्पणी नें मेरा ब्लॉग लिखना सार्थक कर दिया।आप जैसे मित्रो के कारण यह आस्था बनी रहती है कि सद्विचारों को लोग आज भी प्रोत्साहित करते है।आप संरक्षक है जीवन-मूल्यों के।

     
  24. उपेन्द्र ' उपेन '

    11/01/2011 at 10:55 अपराह्न

    बेहद भावपूर्ण रचना …… सुंदर प्रस्तुति.

     
  25. "पलाश"

    12/01/2011 at 12:05 पूर्वाह्न

    दाग सदा उजले पर लगे, इस चलन को मत भूलो॥मगर इन नेताओ का क्या किया जाय , जो सफेद पोशाक मे अनगिनत अदृश्य दाग लगाने मे ही अपनी शान और समृद्धि समझते है ।कुछ उनके लिये भी कहिये

     
  26. भारतीय नागरिक - Indian Citizen

    12/01/2011 at 1:01 पूर्वाह्न

    बहुत अच्छा लगता है आपके ब्लाग पर..

     
  27. Gourav Agrawal

    12/01/2011 at 7:52 पूर्वाह्न

    @सुज्ञ जीआपके स्नेह से अभिभूत हूँलेकिन उलझा दिया आपने तो :)इसका मतलब ये समझूँ की ……."नो माइक्रो पोस्ट" मतलब "नो फंडा" !!आप जैसे सभी मित्रों की टिप्पणियाँ मेरे लिए तो मेरी पोस्ट से ज्यादा मायने रखती हैं .. कहीं आप मेरी बातों को ज़बानी जमा खर्च तो नहीं समझ रहे ना !समयाभाव की वजह से टिपण्णी करना भी जल्दी ही बंद करना पड़ सकता है

     
  28. सुज्ञ

    12/01/2011 at 8:00 पूर्वाह्न

    गौरव जी,नहीं बंधु कोई अन्यार्थ न निकालें,मुझे प्रसन्न्ता ही होगी आपके विचार पढकर, और मनन के साथ प्रतिभाव देकर।

     
  29. Gourav Agrawal

    12/01/2011 at 8:10 पूर्वाह्न

    मतलब आप मेरी टिप्पणी को मेरे विचार नहीं मानते 🙂

     
  30. सुज्ञ

    12/01/2011 at 8:14 पूर्वाह्न

    लो, करलो बात, लगता है आज प्रात: ही मुड लपेटे में लेने का है।:)

     

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