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हिन्दी ब्लॉग जगत में गुटबाजी?

06 जनवरी

हिन्दी ब्लॉग जगत में एक शिकायत बडी आम है कि ब्लॉगर गुट बनाते है, और अपने गुट विशेष के सदस्यों की सराहना करते है। मैं स्वयं गिरोहबाजी का समर्थक नहीं, पर हमेशा जो दिखाई देता है, वास्तव में वह मात्र गुटबाजी ही नहीं होता।

हिन्दी ब्लॉग जगत में सभी उच्च साहित्यकार नहीं आते, अधिसंख्य वे सामान्य से लेखक, सहज अभिव्यक्ति करने वाले ब्लॉगर ही होते है। ऐसे नव-आगंतुको को प्रेरणा व प्रोत्साहन की नितांत आवश्यकता होती है। उनकी विशिष्ठ सराहने योग्य कृतियों पर भी, ‘बढिया पोस्ट’ ‘उम्दा पोस्ट ‘Nice post’  मात्र जैसी टिप्पणियाँ भी, उनके लिये बहुत मायने रखती है। उनके लिये तो यह भी बहुत होता है, लोगों ने उसका ब्लॉग देखा। स्थापित होने के संघर्ष में वे भी यथा प्रयत्न दूसरे ब्लॉगर के समर्थक बनते है, बिना लेख पढे ज्यादा से ज्यादा टिप्पणियाँ करते है, इसलिये कि उन्हे भी याद रखा जाय, और न्यूनाधिक महत्व दिया जाय।

इसतरह लेन-देन के प्रयास में एक नियमितता आती है, जिसे हम अक्सर गुट समझने की भूल करते है,जबकि वह सहयोग मात्र होता है।

कुछ प्रतिष्ठित प्रतिभावान साहित्यक ब्लॉगर्स के साथ भी यही दृष्टिगोचर होता है, किन्तु वहां भी उनकी आवश्यकताएँ होती है। साहित्यक प्रतिभावान ब्लॉगर भी अपेक्षा रखता है उसे साहित्यक समझ वाले पाठक उपलब्ध हो। वह टिप्पणीकर्ता के अभिगम से भांप लेता है, पाठक भी साहित्यक समझ का योग्य पात्र है, और उसके साथ संवाद की निरंतरता बनाता है, और उसके लेखादि को सराहता है, जो कि सराहने योग्य ही होता है। ऐसी आपसी सराहना को हम गुट मान लेते है। हमारी दुविधा यह है कि इस विकासशील दौर में हर ब्लॉगर ही पाठक होता है। अतः आपस में जुडाव सहज है।

स्थापित वरिष्ठ बलॉगर भी वर्षों से ब्लॉगिंग में है। प्रतिदिन के सम्पर्कों और अनुभव के आधार पर वे एक दूसरे को जानने समझने लगते है, ऐसे परिचित ब्लॉगर से सम्पर्क का स्थाई बनना आम बात है। इसे भी हम गुट मान लेते है।

कोई भी व्यक्ति विचारधारा मुक्त नहीं होता, उसी प्रकार प्रत्येक ब्लॉगर की भी अपनी निर्धारित विचारधारा होती है। सम्पर्क में आनेवाले दूसरे ब्लॉगर में जब वह उसी विचार को पाता है, तो उसके प्रति आकृषण होना सामान्य है। ऐसे में निरंतर सम्वाद बनता है। समान विचारो पर समान प्रतिक्रिया देनेवालों को भी एक गुट मान लिया जाता है।

इस प्रकार के सम्पर्को को यदि गुट भी कहें तब भी यह गुट बनना प्राकृतिक है। और कुदरती रूप से यह केन्द्रियकरण अवश्यंभावी है। यह वर्ग विभाजन की तरह भी हो सकता है। जैसे बौद्धिक अभिजात्य वर्ग, सामान्य वर्ग, सहज अभिव्यक्ति वर्ग। स्थापित ब्लॉगर, सधारण ब्लॉगर, संघर्षशील ब्लॉगर।

लेकिन इस वर्ग विभाजन से भय खाने की आवश्यकता नहीं। जैसे जैसे ब्लॉगिंग का विस्तार होता जायेगा, पाठक अपनी रूचि अनुसार पठन ढूंढेगा। विषयानुसार केटेगरी बनना तो निश्चित है। साथ ही सारे के सारे विभाजन हिन्दी ब्लॉग पाठकों  की सुविधा में अभिवृद्धि ही करेंगे।

इसलिये बस लिखते चलो………लिखते चलो………
 

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19 responses to “हिन्दी ब्लॉग जगत में गुटबाजी?

  1. भारतीय नागरिक - Indian Citizen

    06/01/2011 at 9:42 अपराह्न

    आप भी कहां उलझ गये.

     
  2. चला बिहारी ब्लॉगर बनने

    06/01/2011 at 9:43 अपराह्न

    सुज्ञ जी!क्या बात है कि आज इसी विषय पर यह दूसरी पोस्त पढने को मिली! कई और तथ्य हैं जिनको भी टटोलना आवश्यक है.अच्छा है कि आप ऐसा नहीं सोचते. पर जब हर तरफ ऐसी चर्चा होने लगे तो लगता है कि कहीं न कहीं आग तो है, वर्ना धुँआ नहीं उठता!

     
  3. सुरेश शर्मा (कार्टूनिस्ट) http://cartoondhamaka.blogspot.com/

    06/01/2011 at 9:43 अपराह्न

    हम आपके विचारों की तहे दिल से सराहना करते हैं ..थैंक्स !

     
  4. VICHAAR SHOONYA

    06/01/2011 at 9:57 अपराह्न

    सुज्ञ जी ब्लॉगजगत की गुटबाजी पर आपके विचारों से मेरी भी सहमती है.

     
  5. VICHAAR SHOONYA

    06/01/2011 at 9:59 अपराह्न

    सलिल जी पहली पोस्ट कौन सी है ये भी बता दें. मौका मिला तो मैं भी पढ़ लूँगा.

     
  6. सुज्ञ

    06/01/2011 at 10:11 अपराह्न

    सलिल जी,निश्चित ही और भी तथ्य है, आने वाले कल की पोस्ट में उस धुंए की मूल आग को ढूंढ्ने का प्रयास करूंगा।दीपक पाण्डेय जी,मेरी ही 5 दिस्म्स्बर वाली पोस्ट की बात सलिल जी कह रहे है।

     
  7. कविता रावत

    06/01/2011 at 10:28 अपराह्न

    Badiya Prastutiसुज्ञ जी !बस लिखते चलो………लिखते चलो………

     
  8. मनोज कुमार

    06/01/2011 at 10:30 अपराह्न

    हम तो गुट बनाने में विश्वास रखते हैं, ऐसे लोगों का गुट जो किसी गुट में न हो … पर ऐसा मिलता कहां है, इसलिए कवि गुरु के गीत गाता चलता हूं,यदि तोर डाक शुने केऊ न आसे तबे एकला चलो रे। एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे!

     
  9. सतीश सक्सेना

    06/01/2011 at 10:43 अपराह्न

    @ बिलकुल ठीक कहा आपने …रूचि अनुसार अगर पाठकों के ग्रुप बन भी जाएँ तो इससे भला ही होगा और यह स्वाभाविक भी है ख़राब तो तब है, जब परस्पर विरोधी विचारधाराएँ, रंजिश में बदल जाती हैं !सादर

     
  10. उपेन्द्र ' उपेन '

    06/01/2011 at 10:44 अपराह्न

    शत प्रतिशत सहमत ………

     
  11. anshumala

    06/01/2011 at 10:56 अपराह्न

    आप की बात अपनी जगह सही है किन्तु उसके बाद भी कहूँगी की गुट है और उसे बनाया और बढाया जाता है | बहुत सारी और भी बाते तथ्य है पर उन पर ज्यादा बहस करना ही बेकार है सबसे सही वही है जो आप ने कहा की लिखते चलो |

     
  12. चला बिहारी ब्लॉगर बनने

    06/01/2011 at 11:59 अपराह्न

    @विचार शून्य जीःआपके लिये लिंक दे रहा हूँ..http://uchcharan.uchcharan.com/2011/01/blog-post_06.html

     
  13. राज भाटिय़ा

    07/01/2011 at 1:00 पूर्वाह्न

    जहां कही चार लोग प्यार से मिले उन्हे गुट का नाम नही देना चाहिये, अच्छा हे ना…… हमेशा लडते रहने से मिल कर रहे.आप से सहमत हे जी, बहुत सुंदर लिखा धन्यवाद

     
  14. अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी

    07/01/2011 at 2:11 पूर्वाह्न

    ब्लागिंग की सामयिकी से जुड़ी पोस्ट . भाई , टीपक की मेहनत कौन देखता है , लोगों को तो 'नाइस' नाइस लगता है . और प्रचलित धारा से अलग कुछ कहने वाला कुपाच्य हो जाता है . बहरहाल… लीजिये हम टीप दिए . कहीं किसी ग्रुप-संकल्पना को इकाई-स्तरीय चोट तो लगेगी ही :)आपकी अगली पोष्ट का इन्तजार ! शुभकामनाएं !

     
  15. ZEAL

    07/01/2011 at 8:18 पूर्वाह्न

    .सुज्ञ जी ,एक बेहद सार्थक एवं सामयिक लेख के लिए आभार। इस लेख में गहन मनोवैज्ञानिक विश्लेषण है। लेख बहुत ही सकारात्मक तर्ज पर लिखा गया है। आपकी बात से पूर्णतः सहमत हूँ । Indeed very motivating and inspirational post.Thanks..

     
  16. Akhtar Khan Akela

    07/01/2011 at 8:43 पूर्वाह्न

    hns raaj bhaayi aap to hnson ke raaja he chlo hm or aap mil kr is gut baazi ko dur kr pyaar ka sndesh dete hen sb logon ko aap khen to aap ke yhaan nhin to hmare kotaa men akhtta kr aek dusre se pyaar sneh ki baat krte hen bolo thik he naa men jvab ka bhi intizaar krungaa . akhtar khan akela kota rajsthan

     
  17. Rahul Singh

    07/01/2011 at 9:23 पूर्वाह्न

    प्रशंसनीय है आपकी यह संतुलित सहजता.

     
  18. ajit gupta

    07/01/2011 at 11:25 पूर्वाह्न

    हम तो पठनीय पोस्‍ट को तलाशते रहते हैं और जब बात अच्‍छी लगती है तो टिप्‍पणी भी कर देते हैं। कभी कोई विचार मांगता है तो भिन्‍न विचार होने पर भी टिप्‍पणी करते हैं। लेकिन कभी यह नहीं देखते कि यह व्‍यक्ति मेरे ब्‍लाग पर आता है या नहीं। पहले किसी किसी ब्‍लाग पर अपना परामर्श भी दे देते थे लेकिन अब अनुभव में आ रहा है कि लोगों को परामर्श रुचते नहीं तो अब बन्‍द कर दिए हैं। बस उस पोस्‍ट का पढ़कर बिना टिप्‍पणी करे ही लौट आते हैं। आपका लेख अच्‍छा है। गुट तो बनेंगे ही। कभी विचारों के अनुरूप कुभी विधा विशेष के अनुरूप।

     
  19. deepak saini

    07/01/2011 at 11:31 पूर्वाह्न

    सुज्ञ जी ब्लॉगजगत की गुटबाजी पर आपके विचारों से मेरी भी सहमती है.

     

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं यह ब्लॉग लिखने के अलावा गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। रेलवे से ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर्ड अफसर।

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