RSS

Monthly Archives: दिसम्बर 2010

ब्लॉग मैं लिखता हूँ इस अभिव्यक्ति के लिए…………

(1) 
 
है सभ्यता की मांग शिक्षा संस्कार की।
विवेक से पाई यह विद्या पुरस्कार सी।
अश्लील दृश्य देखे मेरे देश की पीढी।
गर्त भी इनको लगती विकास की सीढी।
नवपीढी कहीं कपडों से कंगली न हो जाय।
और नाच इनका कहीं जंगली हो जाय।
इसलिये मैं लिखता नूतन शक्ति के लिए।
ब्लॉग मैं लिखता हूँ इस अभिव्यक्ति के लिए॥
(2)
आभिव्यक्ति का अक्षर अनुशासन है हिन्दी।
सहज सरल समझ का संभाषण है हिन्दी।
समभाषायी छत्र में सबको एक करती है।
कई लोगों के भारती अब तो पेट भरती है।
प्रलोभन में हिन्दी का कहीं हास होजाए।
और मेरी मातृ वाणी का उपहास हो जाय।
इसलिए मैं लिखता मेरी भाषा के लिए।
ब्लॉग मैं लिखता हूँ इस अभिलाषा के लिए॥
 (3)
मानव है तो मानवता की कद्र कुछ कीजिए।
अभावग्रस्त बंधुओ पर थोडा ध्यान दीजिए।
जो सुबह खाते और शाम भूखे सोते है
पानी की जगह अक्सर आंसू पीते है।
आंसू उनके उमडता सैलाब हो न जाए।
और देश के बेटे कहीं यूं तेज़ाब हो न जाए।
इसलिए मैं लिखता अन्तिम दीन के लिए।
ब्लॉग मैं लिखता हूँ इस यकीन के लिए॥
 (4)
निरीह जीवहिंसा में जिनको शर्म नहीं है।
बदनीयत के सब बहाने, सच्चा कर्म नहीं है।
यूँ भूख स्वाद की कुतर्की में मर्म नहीं है।
‘जो मिले वह खाओ’ सच्चा धर्म नहीं है।
दिलों से दया भाव कहीं नष्ट हो न जाए।
सभ्यता विकास आदिम भ्रष्ट हो न जाए।
इसलिये मैं लिखता सम्वेदना मार्ग के लिए।
ब्लॉग मैं लिखता हूँ दु:चिंतन त्याग के लिए।
____________________________________________
Advertisements
 
5 टिप्पणियाँ

Posted by on 13/12/2010 in बिना श्रेणी

 

टैग: , , , , , , , ,

ब्लॉग मैं लिखता हूँ बस सुमार्ग के लिए

निरीह जीवहिंसा में जिनको शर्म नहीं है।
बदनीयत के  बहाने, सच्चा कर्म नहीं है।
भूख स्वाद की कुतर्की में मर्म नहीं है।
‘जो मिले वह खाओ’ सच्चा धर्म नहीं है।
मनों से अनुकम्पा कहीं नष्ट हो न जाए।
सभ्यता विकास आदिम भ्रष्ट हो न जाए।
इसलिये मैं लिखता दुर्भाव त्याग के लिए।
ब्लॉग मैं लिखता हूँ बस सुमार्ग के लिए।
_______________________________

 

टैग: , , ,

ब्लॉग मैं लिखता हूँ इस यकीन के लिए

मानव है तो मानवता की कद्र कुछ कीजिए।

अभावग्रस्त बंधुओ पर थोडा ध्यान दीजिए।
जो सुबह खाते और शाम भूखे सोते है
पानी की जगह अक्सर आंसू पीते है।
आंसू उनके उमडता सैलाब हो न जाए।
और देश के बेटे कहीं यूं तेज़ाब हो न जाए।
इसलिए मैं लिखता अन्तिम दीन के लिए।
ब्लॉग मैं लिखता हूँ इस यकीन के लिए॥
___________________________________
 

टैग: ,

ब्लॉग मैं लिखता हूँ इस अभिलाषा के लिए

आभिव्यक्ति का अक्षत अनुशासन है हिन्दी।
सहज सरल बोध सा संभाषण है हिन्दी।
समभाषायी छत्र में सबको एक करती है।
कई लोगों का भारती अब भी पेट भरती है।
प्रलोभन में हिन्दी का कहीं हास  हो न जाए। 
मेरी मातृ वाणी का उपहास  हो न जाय।
इसलिए मैं लिखता मेरी भाषा के लिए।
ब्लॉग मैं लिखता हूँ इस अभिलाषा के लिए॥
___________________________________

 

टैग: , ,

ब्लॉग मैं लिखता हूँ अभिव्यक्ति के लिए

सभ्यता की मांग है शिक्षा संस्कार की।
विवेक से पाई यह विद्या पुरस्कार सी।
किन्तु अश्लील दृश्य देखे मेरे देश की पीढी।
गर्त भी इनको लगती विकास की सीढी।
कपडों से कहीं यह पीढी कंगली ना हो जाय।
नाच इनका भी कहीं जंगली ना हो जाय।
इसलिये मैं लिखता नूतनशक्ति के लिए।
ब्लॉग मैं लिखता हूँ अभिव्यक्ति के लिए॥
_____________________________
 

टैग: , ,

मृगतृष्णा सी होती है मैत्री

स्वार्थ भरा संसार, बडी दुर्लभ सी होती है मैत्री।
अपेक्षाएं हो असीम, मृगतृष्णा सी होती है मैत्री।


निश्छल नेह मिले कहां, मात्र दंभ पे पलती है मैत्री।
दमन के चलते है दांव, छल को ही छलती है मैत्री।


मित्रता आयेगी काम, अपेक्षाओं पर चलती है मैत्री।
निपट जाते है जब काम, स्वार्थ सी खलती है मैत्री।
________________________________________
 

टैग: , , , ,

जीवन के 50 वर्ष मैने बालक अवस्था में ही खो दिए

ज मेरा चिंतन दिवस है। निश्चित ही बहुमूल्य मनुष्य जीवन पाना अतिदुर्लभ है। पता नहीं कितने ही शुभकर्मों के पश्चात यह मनुष्यायु प्राप्त होती है। कठिन शुभकर्मों से उपार्जित इस प्रतिफल को मुझे वेस्ट करना है या पुनः उत्थान विकास के लिये इनवेस्ट करना है।

क्या मेरा उद्देश्य निरंतर विकास नहीं होना चाहिए? यदि साधना विकास है तो साध्य क्या है? चरम परिणिति क्या है। क्या है जो मुझे पाना चाहिए? यदि लक्ष्य निर्धारित हो जाय तो मै उस और सामर्थ्यानुसार गति कर पाऊँ।
वस्तुतः मै परम् सुख चाहता हूँ, ऐसा सुख जो स्थाई रहे, जिसके बाद पुनः दुख न आए। अनंत सुख जहाँ सुख-दुख का भेद ही समाप्त हो जाए। क्षणिक सुखों की तरह नहीं कि आए और जाए। वो सुख भी नहीं, जिसे इन सांसारिक सुखों से तुलना कर परिभाषित किया जाय। इन भौतिक सुखो के समान प्रलोभन दिया जाय अथवा लॉलीपॉप की तरह दूर से दर्शाया जाय।
क्या मैं किसी ‘जजमेंट डे’ के भरोसे जिऊँ, जहाँ अच्छे या बुरे कर्म में भेद तय करने का अवसर ही नहीं मिलेगा? सीधी ही सजा मुक्कर्र हो जायेगी।और मेरे पास अपने कर्म में सुधार, परिमार्जन का समय ही नहीं होगा? नहीं अब तो मेरा हर पल आखरत होना चाहिए। मुझे हर क्षण शुभ कर्म और सार्थक गुण अपनाने चाहिए बिना किसी भय या संशय के। मेरा विवेक हर पल जाग्रत रहना चाहिए। चिंतन मनन मेरे गवाह रहने चाहिए। मेरे विचारों का क्षण क्षण, प्रतिलेखन, समीक्षा और शुद्धिकरण अनवरत जारी रहना चाहिए। क्षण मात्र का प्रमाद किए बिना।
जीवन के 50 वर्ष मैने बालक अवस्था में ही खो दिए। कब आयेगी मुझ में पुख्तता? पुरूषार्थ की इच्छाएँ तो बहुत है पर इस मार्ग पर इतनी बाधाएँ क्यों? मनोरथ तो मात्र तीन है…… निस्पृह, संयम और समाधी!!
आज मेरा जन्मदिन है। यही चिंतन चल रहा है। मुझे मनुष्य जन्म क्यों मिला? क्या है मेरा प्रयोजन?
मेरे आत्मोत्थान में मददगार उदगार देकर, मेरे प्रेरकबल बनें। मुझे प्रेरणा व प्रोत्साहन दें……।
______________________________________________________
 

टैग: , , ,

 
गहराना

विचार वेदना की गहराई

॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

तिरछी नजरिया

हितेन्द्र अनंत का दृष्टिकोण

मल्हार Malhar

पुरातत्व, मुद्राशास्त्र, इतिहास, यात्रा आदि पर Archaeology, Numismatics, History, Travel and so on

मानसिक हलचल

ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर रेलवे अफसर।

सुज्ञ

चरित्र विकास

Support

WordPress.com Support

Hindizen - हिंदीज़ेन

Hindizen - हिंदीज़ेन : Best Hindi Motivational Stories, Anecdotes, Articles...

The WordPress.com Blog

The latest news on WordPress.com and the WordPress community.