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ब्लॉग मैं लिखता हूँ इस यकीन के लिए

11 दिसम्बर

मानव है तो मानवता की कद्र कुछ कीजिए।

अभावग्रस्त बंधुओ पर थोडा ध्यान दीजिए।
जो सुबह खाते और शाम भूखे सोते है
पानी की जगह अक्सर आंसू पीते है।
आंसू उनके उमडता सैलाब हो न जाए।
और देश के बेटे कहीं यूं तेज़ाब हो न जाए।
इसलिए मैं लिखता अन्तिम दीन के लिए।
ब्लॉग मैं लिखता हूँ इस यकीन के लिए॥
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16 responses to “ब्लॉग मैं लिखता हूँ इस यकीन के लिए

  1. shekhar suman

    11/12/2010 at 6:57 अपराह्न

    बहुत ही नेक काम के लिए लिखते हैं आप….हमेशा ही लिखते रहे…

     
  2. ana

    11/12/2010 at 7:03 अपराह्न

    bahut sundar

     
  3. सम्वेदना के स्वर

    11/12/2010 at 7:50 अपराह्न

    नमन गुरुदेव.. इतना कुछ कहा है आपने कि अभिभूत हैं हम अभी तक… सचमुच ये विचार सच्चे मोतियों की तरह हैं..

     
  4. संगीता स्वरुप ( गीत )

    11/12/2010 at 8:28 अपराह्न

    सुन्दर भावना …

     
  5. Kunwar Kusumesh

    11/12/2010 at 8:50 अपराह्न

    मानव है तो मानवता की कद्र कुछ कीजिए।अभावग्रस्त बंधुओ पर थोडा ध्यान दीजिए।सही सीख देती सही कविता.

     
  6. डॉ॰ मोनिका शर्मा

    11/12/2010 at 11:11 अपराह्न

    सुंदर विचार …. प्रभावी सोच

     
  7. anshumala

    11/12/2010 at 11:17 अपराह्न

    विचार तो सुन्दर है पर यथार्थ में हम इसे लागु नहीं कर पाते है |

     
  8. भारतीय नागरिक - Indian Citizen

    11/12/2010 at 11:32 अपराह्न

    बहुत सही लिखा है..

     
  9. सुज्ञ

    12/12/2010 at 12:35 पूर्वाह्न

    शेखर जी,आना जी,सम्वेदना बंधु,सराहना के लिये आभार जी

     
  10. सुज्ञ

    12/12/2010 at 12:38 पूर्वाह्न

    संगीता स्वरुप जी,कुसुमेश जी, डॉ॰ मोनिका शर्मा जी,बहुत बहुत आभार प्रोत्साहन के लिये

     
  11. सुज्ञ

    12/12/2010 at 12:41 पूर्वाह्न

    अंशुमाला जी,भारतीय नागरिक जी,आभार आपका,सराहना के लिए।

     
  12. राज भाटिय़ा

    12/12/2010 at 1:21 पूर्वाह्न

    बहुत सुंदर विचार पेश किया आप ने कविता के रुप मे, धन्यवाद

     
  13. Kajal Kumar

    12/12/2010 at 2:22 अपराह्न

    अच्छी बात है जी प्रयास यूं ही जारी रखें

     
  14. पं.डी.के.शर्मा"वत्स"

    12/12/2010 at 9:20 अपराह्न

    सुन्दर!आपका ये यकीन बरकरार रहे….

     
  15. दिगम्बर नासवा

    13/12/2010 at 3:41 अपराह्न

    जो सुबह खाते और शाम भूखे सोते हैपानी की जगह अक्सर आंसू पीते है।आंसू उनके उमडता सैलाब हो न जाए।और देश के बेटे कहीं यूं तेज़ाब हो न जाए ..सच है जिस रफ़्तार से देश बदल रहा है …. संवेदनाएँ मार रही हैं … जल्दी ही ऐसा हो जाएगा अगर नही जागे तो …

     
  16. ZEAL

    13/12/2010 at 4:54 अपराह्न

    प्रयास जारी रखिये।

     

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ज्ञानदत्त पाण्डेय का हिन्दी ब्लॉग। मैं गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही, उत्तरप्रदेश, भारत में रह कर ग्रामीण जीवन जानने का प्रयास कर रहा हूँ। ज़ोनल रेलवे के विभागाध्यक्ष के पद से रिटायर रेलवे अफसर।

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